चरक संहिता हिंदी में – आयुर्वेद का अमर ग्रंथ
भारतीय ज्ञान परंपरा में यदि किसी ग्रंथ ने चिकित्सा विज्ञान को एक व्यवस्थित, तर्कपूर्ण और वैज्ञानिक रूप दिया, तो वह है चरक संहिता (Charaka Samhita in Hindi)। यह केवल एक प्राचीन पुस्तक नहीं, बल्कि मानव जीवन, स्वास्थ्य, आहार, दिनचर्या और रोगों के उपचार का गहन दार्शनिक तथा वैज्ञानिक मार्गदर्शक है। हजारों वर्षों पूर्व रचित यह ग्रंथ आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना अपने समय में था। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान जहाँ रोग के उपचार पर केंद्रित है, वहीं चरक संहिता रोग की जड़, शरीर की प्रकृति और संतुलन पर विशेष बल देती है।
आयुर्वेद के तीन प्रमुख ग्रंथों — बृहत् त्रयी — में चरक संहिता का महत्वपूर्ण स्थान है। अन्य दो ग्रंथ हैं सुश्रुत संहिता और अष्टांग हृदयम्। इन तीनों ने मिलकर भारतीय चिकित्सा विज्ञान की नींव को सुदृढ़ किया। लेकिन चरक संहिता की विशेषता यह है कि यह आंतरिक चिकित्सा (कायचिकित्सा) पर सर्वाधिक विस्तार से प्रकाश डालती है।
चरक संहिता के मूल प्रवर्तक माने जाते हैं महान वैद्य आचार्य चरक। माना जाता है कि यह ग्रंथ मूलतः अग्निवेश तंत्र पर आधारित था, जिसे बाद में आचार्य चरक ने संशोधित और विस्तारित किया। कालांतर में दृढबल नामक विद्वान ने इसमें शेष भागों की पूर्ति की।
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इतिहासकारों के अनुसार यह ग्रंथ लगभग 2वीं शताब्दी ईसा पूर्व से 2वीं शताब्दी ईस्वी के बीच विकसित हुआ। यह वह समय था जब भारत में तर्कशास्त्र, दर्शन और चिकित्सा विज्ञान अपने उत्कर्ष पर थे। चरक संहिता में केवल औषधियों का वर्णन नहीं है, बल्कि शरीर रचना, रोग विज्ञान, मनोविज्ञान, नैतिकता और जीवन शैली का भी विस्तारपूर्वक उल्लेख है।
चरक संहिता (Charaka Samhita in Hindi) को आठ प्रमुख स्थानों (अध्याय समूहों) में विभाजित किया गया है, जिसमे सूत्र स्थान, निदान स्थान, विमान स्थान, शरीर स्थान, इन्द्रिय स्थान, चिकित्सा स्थान, कल्प, स्थान और सिद्धि स्थान इन सभी स्थानों में कुल मिलाकर 120 अध्याय हैं।
सूत्र स्थान में दैनिक जीवन, ऋतुचर्या, आहार-विहार, और स्वास्थ्य के मूल सिद्धांतों का वर्णन है। निदान स्थान में रोगों के कारण और लक्षण बताए गए हैं। चिकित्सा स्थान में विभिन्न रोगों के उपचार की विधियाँ दी गई हैं।
चरक संहिता की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि यह व्यक्ति की प्रकृति (वात, पित्त, कफ) के आधार पर उपचार का सुझाव देती है। आयुर्वेद के अनुसार जब ये तीनों दोष संतुलित रहते हैं, तब मनुष्य स्वस्थ रहता है; और असंतुलन रोग का कारण बनता है।
चरक संहिता केवल चिकित्सा ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन दर्शन है। इसमें कहा गया है:
“हिताहितं सुखं दुःखमायुस्तस्य हिताहितम्।
मानं च तच्च यत्रोक्तमायुर्वेदः स उच्यते॥”
अर्थात् — जो शास्त्र जीवन के हित-अहित, सुख-दुःख और आयु के मापदंडों का ज्ञान कराए, वही आयुर्वेद है।
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यह ग्रंथ शरीर को पंचमहाभूतों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) से निर्मित मानता है। मन, आत्मा और शरीर के समन्वय को ही पूर्ण स्वास्थ्य की स्थिति बताया गया है। आज की भाषा में कहें तो यह होलिस्टिक हेल्थ सिस्टम है।
चरक संहिता (Charaka Samhita in Hindi) केवल एक प्राचीन ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला है। यह हमें सिखाती है कि स्वास्थ्य केवल रोग की अनुपस्थिति नहीं, बल्कि शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक संतुलन की स्थिति है। जब हम आधुनिक जीवन की भागदौड़ में तनाव, अनियमित भोजन और असंतुलित दिनचर्या के कारण बीमार पड़ते हैं, तब चरक संहिता हमें मूल की ओर लौटने का मार्ग दिखाती है।
आचार्य चरक की यह अमूल्य धरोहर आज भी हमें प्रेरित करती है कि हम प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर जिएँ, संतुलित रहें और दीर्घायु प्राप्त करें।


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