Shloka of the Day
Shloka of the Day
यस्मिन् सर्वाणि भूतानि आत्मैवाभूद् विजानतः।
तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः ॥
अर्थात:
पूर्ण ज्ञान, विज्ञान को अनुभव करने के बाद जो मनुष्य यह जानता है कि वह स्वयं सभी भौतिक, सभी अमूर्त बना है, उस मनुष्य में फिर मोह कैसे होगा, शोक कहां से होगा जो सर्वत्र आत्मा की एकता ही देखता है।
जब साधक यह समझ लेता है कि हर जीव में वही परमात्मा है, जो उसके भीतर है, तब दूसरों से भेदभाव, ईर्ष्या या द्वेष स्वतः समाप्त हो जाते हैं। जहाँ एकत्व की अनुभूति हो जाती है, वहाँ न अलगाव बचता है, न दुख की कोई जगह होती है।
जिसे सब में स्वयं दिखे और स्वयं में सब — वह मुक्त है।
वहाँ शोक, भय, द्वेष, आसक्ति कुछ भी नहीं टिकते।
Source: ईशा उपनिषद


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