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Shloka of the Day

Shloka of the Day

यक्षस्वरूपाय जटाधराय पिनाकहस्ताय सनातनाय ।
दिव्याय देवाय दिगंबराय तस्मै यकाराय नमः शिवाय ॥५॥

अर्थ :
हे यज्ञस्वरूप वाले जटाधारी शिवजी आप पिनाक नामक धनुष को धारण करते हैं, मध्य एवं अंत रहित सनातन हैं आपके य अक्षर मान्य स्वरूप को में नमस्कार करता हु।

यह श्लोक शिव के “य” बीजाक्षर की महिमा को प्रकट करता है। यक्षस्वरूप का तात्पर्य है कि शिव रहस्य से परिपूर्ण हैं — न दिखाई देने वाले, परंतु सदा विद्यमान। जटाधर होने का अर्थ है, उन्होंने अपने भीतर संपूर्ण ब्रह्मांड की उथल-पुथल (गंगाजल) को समेटा है। पिनाकहस्त – शिव वह हैं जो संहार और संयम के प्रतीक धनुष पिनाक को धारण करते हैं। सनातन – वे समय से परे हैं, न कोई आरंभ, न कोई अंत। इस श्लोक में हम शिव के विराट, रहस्यमय और सनातन स्वरूप को यकार में नमन करते हैं।

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Source: शिव पंचाक्षर स्तोत्र
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