कर्तव्य मनुष्य द्वारा करने योग्य कर्म है और धर्म धारण किया जाने योग्य कर्म।कर्तव्य को जब शास्त्र सम्मत मान कर निर्वाह करने के किए धारण किया जाये तो वह धर्म कहलाता है। कर्तव्य का निर्वाह करने के किए धर्म की शरण लेनी चाहिये । वास्तव मे कर्तव्य ही धर्म है और धर्म ही कर्तव्य ।
जैसे – किसी प्राणी को मन वाणी कर्म से दुःख न देना यह मनुष्य मात्र का कर्तव्य है और जब व्यक्ति इस नियम को धारण कर लेता है तो वह उसका धर्म बन जाता है।