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शिव संहिता हिंदी में

शिव संहिता (Shiva Samhita in Hindi) शिव और पार्वती के संवाद के रूप में प्रस्तुत एक गूढ़ योगग्रंथ है। इसमें शिव स्वयं योग का रहस्य उद्घाटित करते हैं और बताते हैं कि मनुष्य शरीर ही मुक्ति का साधन है। यह ग्रंथ स्पष्ट कहता है कि जो ज्ञान शरीर के माध्यम से प्राप्त होता है, वही सच्चा योग है।

जहाँ आज योग को मुख्यतः आसनों तक सीमित कर दिया गया है, वहीं शिव संहिता योग को शरीर, प्राण और चेतना के समन्वय के रूप में प्रस्तुत करती है। यह ग्रंथ साधक को बाहरी अभ्यास से उठाकर भीतर की दिव्यता तक पहुँचाने का मार्ग बताता है।

शिव संहिता के प्रथम अध्याय में संसार की उत्पत्ति, माया और ब्रह्म का वर्णन मिलता है। शिव कहते हैं कि यह सम्पूर्ण जगत चेतना से उत्पन्न है। जीव अपने अज्ञान के कारण स्वयं को शरीर मानता है, जबकि उसका वास्तविक स्वरूप शुद्ध आत्मा है।

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ग्रंथ में यह भी कहा गया है कि आत्मा न जन्म लेती है, न मरती है। वह सदा शुद्ध, बुद्ध और मुक्त है। माया के कारण जीव बंधन अनुभव करता है, परंतु ज्ञान से वही जीव शिवस्वरूप हो जाता है।

शिव संहिता (Shiva Samhita in Hindi) में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि शरीर को त्याज्य नहीं समझना चाहिए। यही शरीर साधना का मंदिर है। इसमें ही नाड़ियाँ, चक्र और दिव्य शक्तियाँ स्थित हैं। ग्रंथ में 72,000 नाड़ियों का उल्लेख है, जिनमें 14 मुख्य मानी गई हैं। उनमें भी तीन नाड़ियाँ अत्यंत महत्वपूर्ण हैं इड़ा, पिंगला, सुषुम्ना सुषुम्ना को मुक्ति का मार्ग कहा गया है। जब प्राण सुषुम्ना में प्रवाहित होता है, तब योगी उच्च चेतना का अनुभव करता है।

शिव संहिता प्राणायाम को अत्यंत आवश्यक साधना बताती है। इसमें कहा गया है कि श्वास ही जीवन है। जो प्राण को नियंत्रित कर लेता है, वह मन को भी नियंत्रित कर सकता है। ग्रंथ में विशेष रूप से निम्न बातों का उल्लेख मिलता है, नियमित अभ्यास शुद्ध स्थान, संयमित आहार, और गुरु की आज्ञा प्राणायाम के अभ्यास से नाड़ी शुद्ध होती है और साधक का मन स्थिर होने लगता है।

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शिव संहिता (Shiva Samhita in Hindi) में कुण्डलिनी को सर्पाकार शक्ति बताया गया है, जो मूलाधार में स्थित है। यह शक्ति जब तक सुप्त रहती है, तब तक जीव संसार में बंधा रहता है। साधना द्वारा जब यह शक्ति जागृत होती है, तब यह सुषुम्ना मार्ग से ऊपर उठती है। ग्रंथ में वर्णित है कि इस अवस्था में साधक को दिव्य अनुभूतियाँ होती हैं और वह आत्मस्वरूप का अनुभव करता है। कुण्डलिनी जागरण को शिव संहिता मुक्ति का द्वार कहती है।

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