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Bhagwati Stotra

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श्री भगवती स्तोत्रम्: देवी कृपा पाने का दिव्य स्तोत्र

सनातन धर्म में माँ भगवती को सम्पूर्ण सृष्टि की आदिशक्ति माना गया है। वे ही वह दिव्य शक्ति हैं जिनसे सृष्टि की रचना, पालन और संहार का कार्य होता है। जब भी संसार में अधर्म और अत्याचार बढ़ता है, तब यही शक्ति विभिन्न रूपों में प्रकट होकर धर्म की रक्षा करती है। देवी की इसी महिमा और करुणा का वर्णन अनेक स्तोत्रों और ग्रंथों में मिलता है। उन्हीं में से एक अत्यंत पवित्र और प्रभावशाली स्तुति है “श्री भगवती स्तोत्रम् (Bhagwati Stotra)”, जिसे परंपरा में महर्षि व्यास द्वारा रचित माना जाता है।

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“श्री भगवती स्तोत्रम् (Bhagwati Stotra)” देवी के विभिन्न दिव्य रूपों और उनकी शक्तियों का वर्णन करता है। इसमें देवी को पापों का नाश करने वाली, दैत्यों का संहार करने वाली, रोगों को दूर करने वाली और भक्तों की इच्छाओं को पूर्ण करने वाली बताया गया है। इस स्तुति में माँ के अनेक रूपों की महिमा का वर्णन मिलता है—कभी वे महिषासुर का संहार करने वाली वीर देवी हैं, तो कभी भक्तों के दुखों को हरने वाली करुणामयी माता।

इस स्तोत्र के श्लोकों में देवी की उस महान शक्ति का वर्णन किया गया है जिसके आगे देवता भी नतमस्तक होते हैं। कहा गया है कि ब्रह्मा, विष्णु और शिव जैसे देव भी देवी की महिमा का गुणगान करते हैं। यही कारण है कि सनातन परंपरा में देवी को “जगदम्बा” और “आदिशक्ति” कहा जाता है।

“श्री भगवती स्तोत्रम् (Bhagwati Stotra)” का पाठ केवल स्तुति ही नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक साधना भी माना जाता है। श्रद्धा और शुद्ध भाव से इसका नियमित पाठ करने से मन में शांति आती है, नकारात्मकता दूर होती है और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। शास्त्रों में कहा गया है कि जो व्यक्ति इस स्तोत्र का पाठ सच्चे मन से करता है, उस पर देवी की कृपा बनी रहती है और उसके जीवन के कष्ट धीरे-धीरे समाप्त होने लगते हैं।

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श्री भगवती स्तोत्रम

जय भगवति देवि नमो वरदे जय पापविनाशिनि बहुफलदे ।
जय शुम्भ-निशुम्भ कपालधरे प्रणमामि तु देवि नरार्तिहरे ॥१॥

अर्थात:
हे भगवती देवी! आपको प्रणाम है। आप वर देने वाली और पापों का नाश करने वाली हैं। आपने शुम्भ और निशुम्भ जैसे दैत्यों का संहार किया। हे देवी! आप मनुष्यों के दुख और कष्ट दूर करने वाली हैं, मैं आपको नमस्कार करता हूँ।

जय चन्द्रदिवाकर-नेत्रधरे जय पावकभूषितवक्रवरे ।
जय भैरवदेहनिलीनपरे जय अन्धकदैत्यविशोषकरे ॥२॥

अर्थात:
हे देवी! आपकी जय हो। आपके नेत्र चन्द्रमा और सूर्य के समान प्रकाशमान हैं और आपका सुंदर मुख अग्नि के तेज से सुशोभित है। आप भैरव स्वरूप में स्थित परम शक्ति हैं और आपने अंधक नामक दैत्य का संहार किया। हे माँ! आपको बार-बार प्रणाम है।

जय महिषविमर्दिनिशूलकरे जय लोकसमस्तकपापहरे ।
जय देवि पितामहविष्णुनुते जय भास्करशक्रशिराऽवनते ॥३॥

अर्थात:
हे देवी! आपकी जय हो। आप महिषासुर का संहार करने वाली और हाथ में त्रिशूल धारण करने वाली हैं। आप पूरे संसार के सभी पापों को नष्ट करने वाली हैं। आपकी महिमा इतनी महान है कि ब्रह्मा और विष्णु भी आपकी स्तुति करते हैं, और सूर्य तथा इन्द्र जैसे देवता भी आपके सामने सिर झुकाते हैं।

जय षण्मुख-सायुध-ईशनुते जय सागरगामिनि शम्भुनुते ।
जय दुःख-दरिद्र-विनाशकरे जय पुत्रकलत्रविवृद्धिकरे ॥४॥

अर्थात:
हे देवी! आपकी जय हो। आपकी स्तुति कार्तिकेय और भगवान शिव भी करते हैं। आपकी शक्ति समुद्र के समान विशाल है। आप भक्तों के दुःख और दरिद्रता का नाश करने वाली हैं। हे देवी! आप अपने भक्तों को संतान, परिवार और सुख-समृद्धि की वृद्धि प्रदान करती हैं।

जय देवि समस्तशरीरधरे जय नाकविदर्शिनि दुःखहरे ।
जय व्याधिविनाशिनि मोक्षकरे जय वांछितदायिनि सिद्धिकरे ॥५॥

अर्थात:
हे देवी! आपकी जय हो। आप सम्पूर्ण सृष्टि में विद्यमान हैं और स्वर्ग का मार्ग दिखाने वाली हैं। आप भक्तों के सभी दुखों को दूर करती हैं और रोगों का नाश करती हैं। हे माँ! आप अपने भक्तों को मोक्ष प्रदान करने वाली, उनकी इच्छाएँ पूर्ण करने वाली और सिद्धियाँ देने वाली हैं।

एतद्व्यासकृतं स्तोत्रं यः पठेन्नियतः शुचिः ।
गृहे वा शुद्धभावेन प्रीता भगवती सदा ॥६॥

यहां एक क्लिक में पढ़ें ~ उचित समय पर सही पाठ करें

अर्थात:
यह स्तोत्र जो व्यासजी द्वारा रचा गया है, जो व्यक्ति इसे शुद्ध मन और श्रद्धा के साथ नियमित रूप से पढ़ता है, चाहे वह अपने घर में ही क्यों न पाठ करे, तो भगवती देवी उस पर सदा प्रसन्न रहती हैं।

इति व्यासकृतं भगवतीस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥
इस प्रकार व्यासजी द्वारा रचित भगवती स्तोत्र यहाँ पूर्ण होता है।

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