Shri Girija Stuti

श्री रामचरित्रमानस में श्री सिया जी के द्वारा माँ गौरी की स्तुति
भारतीय सनातन परंपरा में स्तुतियाँ और स्तोत्र केवल धार्मिक पाठ नहीं होते, बल्कि वे मनुष्य के भीतर छिपी आस्था, श्रद्धा और आत्मिक शक्ति को जागृत करने का माध्यम होते हैं। जब कोई भक्त सच्चे मन, निष्कपट भाव और पूर्ण विश्वास के साथ ईश्वर की आराधना करता है, तो उसकी प्रार्थना केवल शब्दों तक सीमित नहीं रहती—वह सीधे ईश्वर के हृदय तक पहुँचती है। ऐसी ही एक अत्यंत पवित्र और भावपूर्ण स्तुति है श्री गिरिजा स्तुति (Shri Girija Stuti), जो भक्ति और विश्वास का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत करती है।
यह स्तुति केवल देवी पार्वती की महिमा का गुणगान नहीं है, बल्कि यह एक ऐसी दिव्य घटना का वर्णन है, जिसमें एक आदर्श नारी—माता सीता—अपने जीवन के सबसे महत्वपूर्ण क्षण में माता गिरिजा की शरण में जाती हैं। यह प्रसंग हमें यह सिखाता है कि जब जीवन में कोई गहरी इच्छा या महत्वपूर्ण निर्णय सामने हो, तब केवल प्रयास ही नहीं, बल्कि ईश्वर की कृपा भी उतनी ही आवश्यक होती है।
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श्री गिरिजा स्तुति (Shri Girija Stuti) का यह प्रसंग अत्यंत भावनात्मक और प्रेरणादायक है। इसमें हम देखते हैं कि माता सीता पूर्ण श्रद्धा और विनम्रता के साथ माता पार्वती की पूजा करती हैं। उनके मन में कोई अहंकार नहीं, कोई दिखावा नहीं—सिर्फ एक सच्ची भावना है, एक पवित्र इच्छा है। यही वह तत्व है जो इस स्तुति को अत्यंत विशेष बनाता है। यह हमें सिखाता है कि ईश्वर के सामने केवल वही प्रार्थना स्वीकार होती है, जो हृदय की गहराइयों से निकलती है।
इस स्तुति की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इसमें भक्ति के साथ-साथ स्त्री के आदर्श गुणों का भी वर्णन मिलता है। माता पार्वती को आदर्श पत्नी, शक्ति का स्वरूप और संपूर्ण सृष्टि की जननी के रूप में प्रस्तुत किया गया है। वहीं माता सीता को विनम्रता, श्रद्धा और समर्पण का प्रतीक बताया गया है। इन दोनों दिव्य स्वरूपों के माध्यम से यह स्तुति हमें जीवन के कई महत्वपूर्ण मूल्यों को समझने का अवसर देती है—जैसे धैर्य, विश्वास, प्रेम और आत्मसमर्पण।
अंततः, यह कहा जा सकता है कि श्री गिरिजा स्तुति (Shri Girija Stuti) केवल एक प्रार्थना नहीं, बल्कि एक अनुभव है—एक ऐसा अनुभव जो हमें ईश्वर के और करीब ले जाता है, हमारे भीतर विश्वास को मजबूत करता है और हमें जीवन के सही मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। यदि इसे सच्चे मन से समझा और अपनाया जाए, तो यह स्तुति हमारे जीवन को नई दिशा देने की क्षमता रखती है।
आइए, इस दिव्य स्तुति के माध्यम से हम भी भक्ति, प्रेम और समर्पण के उस मार्ग पर चलने का प्रयास करें, जहाँ हर प्रार्थना सुनी जाती है और हर सच्ची इच्छा पूर्ण होती है।
यहां एक क्लिक में पढ़ें ~ उचित समय पर सही पाठ करें
॥ श्री गिरिजा स्तुति (Shri Girija Stuti) ॥
जय जय गिरिबरराज किसोरी । जय महेस मुख चंद चकोरी ॥
जय गजबदन षडानन माता । जगत जननि दामिनि दुति गाता ॥
नहिं तव आदि मध्य अवसाना । अमित प्रभाउ बेदु नहिं जाना ॥
भव भव बिभव पराभव कारिनि । बिस्व बिमोहनि स्वबस बिहारिनि ॥
पतिदेवता सुतीय महुँ मातु प्रथम तव रेख ।
महिमा अमित न सकहिं कहि सहस सारदा सेष ॥
सेवत तोहि सुलभ फल चारी । बरदायनी पुरारि पिआरी ॥
देबि पूजि पद कमल तुम्हारे । सुर नर मुनि सब होहिं सुखारे ॥
मोर मनोरथु जानहु नीकें । बसहु सदा उर पुर सबही कें ॥
कीन्हेउँ प्रगट न कारन तेहीं । अस कहि चरन गहे बैदेहीं ॥
बिनय प्रेम बस भई भवानी । खसी माल मूरति मुसुकानी ॥
सादर सियँ प्रसादु सिर धरेऊ । बोली गौरि हरषु हियँ भरेऊ ॥
सुनु सिय सत्य असीस हमारी । पूजिहि मन कामना तुम्हारी ॥
नारद बचन सदा सुचि साचा । सो बरु मिलिहि जाहिं मनु राचा ॥
मनु जाहिं राचेउ मिलिहि सो बरु सहज सुंदर साँवरो ।
करुना निधान सुजान सीलु सनेहु जानत रावरो ॥
एहि भाँति गौरि असीस सुनि सिय सहित हिय हरषीं अली ।
तुलसी भवानिहि पूजि पुनि पुनि मुदित मन मंदिर चली ॥
जानि गौरि अनुकूल सिय हिय हरषु न जाइ कहि ।
मंजुल मंगल मूल बाम अंग फरकन लगे ॥


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