Shri Sukta Path

श्री सूक्त पाठ – सही विधि, लाभ और संपूर्ण श्री सूक्त पाठ | धन व समृद्धि हेतु
श्री सूक्त (Shri Sukta Path) वैदिक काल से चला आ रहा माँ लक्ष्मी का अत्यंत प्रभावशाली स्तोत्र है। यह सूक्त ऋग्वेद से लिया गया है और इसका पाठ करने से धन, वैभव, ऐश्वर्य, सुख‑शांति तथा स्थायी समृद्धि की प्राप्ति मानी जाती है। हिन्दू धर्म में लक्ष्मी प्राप्ति के लिए श्री सूक्त को सर्वोत्तम माना गया है।
श्री सूक्त माँ लक्ष्मी की स्तुति में रचित 15 मंत्रों का वैदिक सूक्त है। इसमें देवी लक्ष्मी को हिरण्यमयी, पद्मवासिनी, ऐश्वर्य की अधिष्ठात्री और सर्वभूतों की ईश्वरी कहा गया है। इस सूक्त में केवल धन ही नहीं, बल्कि कीर्ति, यश, अन्न, पशु, संतान, गृह‑शांति और राष्ट्र की उन्नति की भी कामना की गई है।
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श्री सूक्त का धार्मिक महत्व अत्यंत गहन और व्यापक है। यह वैदिक सूक्त माँ लक्ष्मी की उपासना का सर्वश्रेष्ठ माध्यम माना गया है, क्योंकि इसमें देवी को केवल धन की देवी नहीं बल्कि श्री, अर्थात् समृद्धि, पवित्रता, सौभाग्य, यश और स्थिर ऐश्वर्य की अधिष्ठात्री शक्ति के रूप में स्तुत किया गया है। श्री सूक्त का पाठ जीवन से अलक्ष्मी, दरिद्रता, अभाव और नकारात्मक ऊर्जा को दूर कर घर-परिवार में शांति, संतुलन और सकारात्मकता स्थापित करता है।
वैदिक परंपरा में यह सूक्त साधक के कर्म, विचार और वातावरण को शुद्ध कर स्थायी लक्ष्मी की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करता है। इसी कारण इसे केवल धन प्राप्ति का मंत्र नहीं, बल्कि धार्मिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक उन्नति का साधन माना गया है।
श्री सूक्त पाठ (Shri Sukta Path) करने के लिए प्रातः ब्रह्ममुहूर्त या सायंकाल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें और शांत स्थान पर आसन बिछाकर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें। अपने सामने माँ लक्ष्मी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें, घी का दीपक और धूप जलाएँ तथा मन को पूर्ण रूप से एकाग्र करके देवी लक्ष्मी का ध्यान करें। इसके बाद श्रद्धा और शुद्ध उच्चारण के साथ श्री सूक्त का पाठ करें; पाठ के दौरान मन में धन, ऐश्वर्य के साथ-साथ सद्बुद्धि, शांति और कृतज्ञता की भावना रखें।
श्री सूक्त पाठ पूर्ण होने पर माँ लक्ष्मी से स्थिर समृद्धि और गृह-कल्याण की प्रार्थना करें। विशेष फल की कामना होने पर शुक्रवार, पूर्णिमा, दीपावली या अक्षय तृतीया के दिन 11, 21 या 108 बार श्री सूक्त का पाठ अत्यंत शुभ माना जाता है।
श्री सूक्त पाठ (Shri Sukta Path) केवल एक धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि जीवन को समृद्ध और संतुलित बनाने का वैदिक उपाय है। यदि इसे श्रद्धा, नियम और विश्वास के साथ किया जाए, तो माँ लक्ष्मी की कृपा अवश्य प्राप्त होती है।
“जहाँ श्री सूक्त का नित्य पाठ होता है, वहाँ दरिद्रता नहीं टिकती।”
श्रीसूक्तम् (Shri Sukta Path) (शुद्ध पाठ)
ॐ हिरण्यवर्णां हरिणीं सुवर्णरजतस्रजाम् ।
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह ॥१॥
तां म आवह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम् ।
यस्यां हिरण्यं विन्देयं गामश्वं पुरुषानहम् ॥२॥
अश्वपूर्वां रथमध्यां हस्तिनादप्रबोधिनीम् ।
श्रियं देवीमुपह्वये श्रीर्मा देवी जुषताम् ॥३॥
कां सोऽस्मितां हिरण्यप्राकारामार्द्रां ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीम् ।
पद्मे स्थितां पद्मवर्णां तामिहोपह्वये श्रियम् ॥४॥
चन्द्रां प्रभासां यशसा ज्वलन्तीं श्रियं लोके देवजुष्टामुदाराम् ।
तां पद्मिनीमीं शरणमहं प्रपद्येऽलक्ष्मीर्मे नश्यतां त्वां वृणे ॥५॥
आदित्यवर्णे तपसोऽधिजातो वनस्पतिस्तव वृक्षोऽथ बिल्वः ।
तस्य फलानि तपसा नुदन्तु या अन्तरा याश्च बाह्या अलक्ष्मीः ॥६॥
उपैतु मां देवसखः कीर्तिश्च मणिना सह ।
प्रादुर्भूतोऽस्मि राष्ट्रेऽस्मिन् कीर्तिमृद्धिं ददातु मे ॥७॥
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क्षुत्पिपासामलां ज्येष्ठामलक्ष्मीं नाशयाम्यहम् ।
अभूतिमसमृद्धिं च सर्वां निर्णुद मे गृहात् ॥८॥
गन्धद्वारां दुराधर्षां नित्यपुष्टां करीषिणीम् ।
ईश्वरीं सर्वभूतानां तामिहोपह्वये श्रियम् ॥९॥
मनसः काममाकूतिं वाचः सत्यमशीमहि ।
पशूनां रूपमन्नस्य मयि श्रीः श्रयताम् ॥१०॥
कर्दमेन प्रजा भूता मयि सम्भव कर्दम ।
श्रियं वासय मे कुले मातरं पद्ममालिनीम् ॥११॥
आपः सृजन्तु स्निग्धानि चिक्लीत वस मे गृहे ।
नि च देवीं मातरं श्रियं वासय मे कुले ॥१२॥
आर्द्रां पुष्करिणीं पुष्टिं पिङ्गलां पद्ममालिनीम् ।
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह ॥१३॥
आर्द्रां य करिणीं यष्टिं सुवर्णां हेममालिनीम् ।
सूर्यां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह ॥१४॥
तां म आवह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम् ।
यस्यां हिरण्यं प्रभूतं गावो दास्योऽश्वान् विन्देयं पुरुषानहम् ॥१५॥
यः शुचिः प्रयतो भूत्वा जुहुयादाज्यमन्वहम् ।
सूक्तं पञ्चदशर्चं च श्रीकामः सततं जपेत् ॥१६॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
॥ इति श्रीसूक्तं सम्पूर्णम् ॥


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