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Bhagavad Gita Chapter 2 Hindi

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Bhagavad Gita Chapter 2 Hindi

सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता द्वितीय अध्याय

Bhagavad Gita Chapter 2 Hindi

श्रीमद भागवत गीता का द्वितीय (Bhagavad Gita Chapter 2 Hindi) अध्याय सांख्ययोग कहा जाता हे। इस अध्याय मे अर्जुन की कायरता के विषय मे श्री कृष्ण और अर्जुन का संवाद का वर्णन, गीताशास्त्र का अवतरण का वर्णन, क्षत्रिय धर्म और युद्ध करने की आवश्यकता का वर्णन, कर्मयोग विषय का उपदेश और स्थिर बुद्धि पुरुष के लक्षण और उसकी महिमा का वर्णन कहा गया हे।

इस प्रकार भगवान श्री कृष्ण ने श्रीमद भागवत गीता के द्वितीय (Bhagavad Gita Chapter 2 Hindi) अध्याय मे आत्मा की अमरता के सम्बंधित प्रमुख उपदेश दिया गया हे। इस प्रकार आत्मा किसी भी काल मे ना जन्म लेता हे ना कभी मृत्यु होती हे, क्योकि आत्मा तो अजन्मा हे। शरीर के मारे जाने पर भी आत्मा कभी नहीं मरता।

यहां एक क्लिक में सम्पूर्ण ~ श्रीमद् भगवदगीता in Hindi

 

संजय उवाच

तं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् ।
विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः ॥2.1॥

sanjaya uvaca

tan tatha krpaya.vistamasrupurnakuleksanam.
visidantamidan vakyamuvaca madhusudanah৷৷2.1৷৷

भावार्थ : संजय बोले- उस प्रकार करुणा से व्याप्त और आँसुओं से पूर्ण तथा व्याकुल नेत्रों वाले शोकयुक्त उस अर्जुन के प्रति भगवान मधुसूदन ने यह वचन कहा॥1॥

 

यहां एक क्लिक में पढ़ें- श्रीमद भागवत गीता का प्रथम अध्याय

श्रीभगवानुवाच

कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम् ।
अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन॥2.2॥

sri bhagavanuvaca
kutastva kasmalamidan visame samupasthitam.
anaryajustamasvargyamakirtikaramarjuna৷৷2.2৷৷

भावार्थ : श्रीभगवान बोले- हे अर्जुन! तुझे इस असमय में यह मोह किस हेतु से प्राप्त हुआ? क्योंकि न तो यह श्रेष्ठ पुरुषों द्वारा आचरित है, न स्वर्ग को देने वाला है और न कीर्ति को करने वाला ही है॥2॥

 

क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते ।
क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप ॥2.3॥

klaibyan ma sma gamah partha naitattvayyupapadyate.
ksudran hrdayadaurbalyan tyaktvottistha parantapa৷৷2.3৷৷

भावार्थ : इसलिए हे अर्जुन! नपुंसकता को मत प्राप्त हो, तुझमें यह उचित नहीं जान पड़ती। हे परंतप! हृदय की तुच्छ दुर्बलता को त्यागकर युद्ध के लिए खड़ा हो जा।

आत्मज्ञान के मार्ग पर सफलतापूर्वक चलने के लिए उच्च आत्मबल और मनोबल की आवश्यकता होती है। भौतिक मन की नकारात्मकताओं, जैसे आलस्य, अज्ञानता और लगाव पर काबू पाने के लिए व्यक्ति को आशावादी, उत्साही और ऊर्जावान होने की आवश्यकता है। श्री कृष्ण एक कुशल गुरु हैं, और इस प्रकार अर्जुन को फटकार लगाने के बाद, अब वह अर्जुन को प्रोत्साहित करके स्थिति से निपटने के लिए उसके आत्मबल को बढ़ाते हैं।

अर्जुन को कुंती के पुत्र के रूप में संबोधित करके, श्री कृष्ण ने उसे अपनी माँ कुंती को याद करने के लिए कहा। उसने दिव्य देवताओं के प्रमुख इंद्र की पूजा की थी और उनके आशीर्वाद से अर्जुन का जन्म हुआ था। अत: वह इन्द्र के समान असाधारण शक्ति और पराक्रम से सम्पन्न था। श्री कृष्ण उन्हें इसकी याद दिला रहे हैं, उन्हें इस नपुंसकता के आगे न झुकने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं, जो उनके प्रतिष्ठित वंश को शोभा नहीं देता।॥3॥

 

अर्जुन उवाच

कथं भीष्ममहं सङ्‍ख्ये द्रोणं च मधुसूदन ।
इषुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन ॥2.4॥

arjuna uvaca

kathan bhismamahan sankhye dronan ca madhusudana.
isubhih pratiyotsyami pujarhavarisudana৷৷2.4৷৷

भावार्थ : अर्जुन बोले- हे मधुसूदन! मैं रणभूमि में किस प्रकार बाणों से भीष्म पितामह और द्रोणाचार्य के विरुद्ध लड़ूँगा? क्योंकि हे अरिसूदन! वे दोनों ही पूजनीय हैं॥4॥

 

गुरूनहत्वा हि महानुभावा-ञ्छ्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके ।
हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैवभुंजीय भोगान् रुधिरप्रदिग्धान् ॥2.5॥

gurunahatva hi mahanubhavan
sreyo bhoktun bhaiksyamapiha loke.
hatvarthakamanstu gurunihaiva
bhunjiya bhogan rudhirapradigdhan৷৷2.5৷৷

भावार्थ : इसलिए इन महानुभाव गुरुजनों को न मारकर मैं इस लोक में भिक्षा का अन्न भी खाना कल्याणकारक समझता हूँ क्योंकि गुरुजनों को मारकर भी इस लोक में रुधिर से सने हुए अर्थ और कामरूप भोगों को ही तो भोगूँगा॥5॥

 

न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयोयद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः ।
यानेव हत्वा न जिजीविषाम स्तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः ॥2.6॥

na caitadvidmah kataranno gariyo
yadva jayema yadi va no jayeyuh.
yaneva hatva na jijivisama-
ste.vasthitah pramukhe dhartarastrah৷৷2.6৷৷

भावार्थ : हम यह भी नहीं जानते कि हमारे लिए युद्ध करना और न करना- इन दोनों में से कौन-सा श्रेष्ठ है, अथवा यह भी नहीं जानते कि उन्हें हम जीतेंगे या हमको वे जीतेंगे। और जिनको मारकर हम जीना भी नहीं चाहते, वे ही हमारे आत्मीय धृतराष्ट्र के पुत्र हमारे मुकाबले में खड़े हैं॥6॥

 

कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः ।
यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् ॥2.7॥

karpanyadosopahatasvabhavah
prcchami tvan dharmasanmuḍhacetah.
yacchreyah syannisicatan bruhi tanme
sisyaste.han sadhi man tvan prapannam৷৷2.7৷৷

भावार्थ :इसलिए कायरता रूप दोष से उपहत हुए स्वभाव वाला तथा धर्म के विषय में मोहित चित्त हुआ मैं आपसे पूछता हूँ कि जो साधन निश्चित कल्याणकारक हो, वह मेरे लिए कहिए क्योंकि मैं आपका शिष्य हूँ, इसलिए आपके शरण हुए मुझको शिक्षा दीजिए।

रणभूमि में पहली बार अर्जुन भगवान श्री कृष्ण को अपना गुरु बनने की श्रद्धापूर्वक प्रार्थना करता है। भगवान श्री कृष्ण के सम्मुख अर्जुन कहता हे की मेरा आचरण कायरों जैसा हो गया है, मुज पर ‘कार्पण्यदोष’ हावी हो गया है। इसलिए अर्जुन भगवान श्री कृष्ण को अपना गुरु बनने की लिए अनुरोध करते हे की श्री कृष्ण गुरु बने और धर्म के मार्ग पर चलने का उपदेश दे। वैदिक ग्रंथो घोषणा करते हैं कि आध्यात्मिक गुरु के माध्यम से ही हमें अपने आत्मकल्याण हेतु ज्ञान मिलता है।

परम सत्य को जानना है तो ऐसे गुरु की खोज करनी होगी जो परब्रह्म में स्थित हो चुका हो, वैदिक ग्रन्थों के सार को भलीभांति समझता हो और धर्मग्रन्थों का ज्ञाता हो। सत्य की खोज में अध्यात्मिक गुरु के शरण में रहना चाहिए, जो भौतिक संसार का तिरस्कार कर के भगवान के शरण में रहते है।

परमात्मा और आत्मा से संबंध रखनेवाला इस मायारूपी संसार के भवसागर को गुरु कृपा बिना पार नहीं कर सकते। स्वयं भगवान श्री कृष्ण कहते है की सत्य को पहचानना हे तो गुरु की चरण में जाओ, और श्रद्धापूर्वक उनसे तत्त्व ज्ञान सीखना चाहिए। सिद्ध महापुरुष यर्थाथ को जानते है, वह आपको ज्ञान देंगे।॥7॥

 

न हि प्रपश्यामि ममापनुद्या द्यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम् ।
अवाप्य भूमावसपत्रमृद्धंराज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम् ॥2.8॥

na hi prapasyami mamapanudya-
dyacchokamucchosanamindriyanam.
avapya bhumavasapatnamrddham
rajyan suranamapi cadhipatyam৷৷2.8৷৷

भावार्थ : क्योंकि भूमि में निष्कण्टक, धन-धान्य सम्पन्न राज्य को और देवताओं के स्वामीपने को प्राप्त होकर भी मैं उस उपाय को नहीं देखता हूँ, जो मेरी इन्द्रियों के सुखाने वाले शोक को दूर कर सके॥8॥

 

संजय उवाच

एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परन्तप ।
न योत्स्य इतिगोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह ॥2.9॥

(Bhagavad Gita Chapter 2 Hindi)

sanjaya uvaca

evamuktva hrsikesan guḍakesah parantapa.
na yotsya iti govindamuktva tusnin babhuva ha৷৷2.9৷৷

भावार्थ : संजय बोले- हे राजन्! निद्रा को जीतने वाले अर्जुन अंतर्यामी श्रीकृष्ण महाराज के प्रति इस प्रकार कहकर फिर श्री गोविंद भगवान् से ‘युद्ध नहीं करूँगा’ यह स्पष्ट कहकर चुप हो गए॥9॥

 

तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव भारत ।
सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदंतमिदं वचः ॥2.10॥

tamuvaca hrsikesah prahasanniva bharata.
senayorubhayormadhye visidantamidan vacah৷৷2.10৷৷

भावार्थ : हे भरतवंशी धृतराष्ट्र! अंतर्यामी श्रीकृष्ण महाराज दोनों सेनाओं के बीच में शोक करते हुए उस अर्जुन को हँसते हुए से यह वचन बोले॥10॥

 

श्री भगवानुवाच

अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे ।
गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः ॥2.11॥

sri bhagavanuvaca

asocyananvasocastvan prajnavadansca bhasase.
gatasunagatasunsca nanusocanti panḍitah৷৷2.11৷৷

भावार्थ : श्री भगवान बोले, हे अर्जुन! तू न शोक करने योग्य मनुष्यों के लिए शोक करता है और पण्डितों के से वचनों को कहता है, परन्तु जिनके प्राण चले गए हैं, उनके लिए और जिनके प्राण नहीं गए हैं उनके लिए भी पण्डितजन शोक नहीं करते॥11॥

 

न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः ।
न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम् ॥2.12॥

na tvevahan jatu nasan na tvan neme janadhipah.
na caiva na bhavisyamah sarve vayamatah param৷৷2.12৷৷

भावार्थ : न तो ऐसा ही है कि मैं किसी काल में नहीं था, तू नहीं था अथवा ये राजा लोग नहीं थे और न ऐसा ही है कि इससे आगे हम सब नहीं रहेंगे॥12॥

 

देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा ।
तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति ॥2.13॥

dehino.sminyatha dehe kaumaran yauvanan jara.
tatha dehantarapraptirdhirastatra na muhyati৷৷2.13৷৷

भावार्थ : जैसे जीवात्मा की इस देह में बालकपन, जवानी और वृद्धावस्था होती है, वैसे ही अन्य शरीर की प्राप्ति होती है, उस विषय में धीर पुरुष मोहित नहीं होता।

इस श्लोक में देहे का अर्थ ‘शरीर’ और देहि का अर्थ ‘शरीर की आत्मा है। भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को कहते हे की मनुष्य के जीवनकाल में बाल्यावस्था से युवावस्था और बाद में वृद्धावस्था में परिवर्तित होता है। श्री कृष्ण मनुष्य के एक जन्म से दूसरे जन्म में नया शरीर धारण करना आत्मा के इस सिद्धान्त को सिद्ध करते है।

भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को समझते हे की बुद्धिमान व्यक्ति आत्मा को एक शरीर छोड़कर दूसरे शरीर प्रवेश करने पर शोक नहीं करना चाहिए। बालकपन, जवानी और वृद्धावस्था की मृत्यु होने से हमे शोक नहीं करना चाहिए क्योकि हम जानते हे, की हमारी मौजूदगी बानी रहती हे और हम पहले की अवस्था से श्रेष्ठ अवस्था प्राप्त होती है। इस प्रकार जीवात्मा एक शरीर त्याग कर पूर्व वासनाओं के अनुसार दूसरे शरीर में प्रवेश करता है। इसमें धीर पुरुष मोहित नहीं होता है।13॥

 

मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः ।
आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत ॥2.14॥

matrasparsastu kaunteya sitosnasukhaduhkhadah.
agamapayino.nityastanstitiksasva bharata৷৷2.14৷৷

भावार्थ : हे कुंतीपुत्र! सर्दी-गर्मी और सुख-दुःख को देने वाले इन्द्रिय और विषयों के संयोग तो उत्पत्ति-विनाशशील और अनित्य हैं, इसलिए हे भारत! उनको तू सहन कर।

मनुष्य के शरीर में पांच इंद्रियां होती हैं, सूंघने, स्वाद, स्वाद, स्पर्श और श्रवण करने की ये, उनकी धारणा की वस्तुओं के संपर्क में, सुख-दुःख अनुभव होता हैं। इनमे से कोई भी अनुभव स्थायी नहीं होता है। यह ऋतुओं के परिवर्तन की तरह है। यदि शीतल जल ग्रीष्म ऋतु में सुख देता है, परंतु वही शीतल जल शीत ऋतु में कष्ट देता है। इसी प्रकार सुख और दुख की अनुभूति क्षणिक होती है। यदि हम स्वयं को उनसे प्रभावित होने देते हैं, तो हम पेंडुलम की तरह इधर-उधर झूलते रहते हैं। विवेकशील व्यक्ति को सुख और दुःख दोनों ही परिस्थितियों से विचलित हुए बिना सहन करने का अभ्यास करना चाहिए।॥14॥

 

यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ ।
समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते ॥2.15॥

yan hi na vyathayantyete purusan purusarsabha.
samaduhkhasukhan dhiran so.mrtatvaya kalpate৷৷2.15৷৷

भावार्थ : क्योंकि हे पुरुषश्रेष्ठ! दुःख-सुख को समान समझने वाले जिस धीर पुरुष को ये इन्द्रिय और विषयों के संयोग व्याकुल नहीं करते, वह मोक्ष के योग्य होता है॥15॥

 

नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः ।
उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्वदर्शिभिः ॥2.16॥

nasato vidyate bhavo nabhavo vidyate satah.
ubhayorapi drsto.ntastvanayostattvadarsibhih৷৷2.16৷৷

भावार्थ : असत् वस्तु की तो सत्ता नहीं है और सत् का अभाव नहीं है। इस प्रकार इन दोनों का ही तत्व तत्वज्ञानी पुरुषों द्वारा देखा गया है॥16॥

 

अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम् ।
विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति ॥2.17॥

avinasi tu tadviddhi yena sarvamidan tatam.
vinasamavyayasyasya na kasicat kartumarhati৷৷2.17৷৷

भावार्थ : नाशरहित तो तू उसको जान, जिससे यह सम्पूर्ण जगत्- दृश्यवर्ग व्याप्त है। इस अविनाशी का विनाश करने में कोई भी समर्थ नहीं है॥17॥

 

अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः ।
अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत ॥2.18॥

antavanta ime deha nityasyoktah saririnah.
anasino.prameyasya tasmadyudhyasva bharata৷৷2.18৷৷

भावार्थ : इस नाशरहित, अप्रमेय, नित्यस्वरूप जीवात्मा के ये सब शरीर नाशवान कहे गए हैं, इसलिए हे भरतवंशी अर्जुन! तू युद्ध कर॥18॥

 

य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम् ।
उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते ॥2.19॥

ya enan vetti hantaran yascainan manyate hatam.
ubhau tau na vijanito nayan hanti na hanyate৷৷2.19৷৷

भावार्थ : जो इस आत्मा को मारने वाला समझता है तथा जो इसको मरा मानता है, वे दोनों ही नहीं जानते क्योंकि यह आत्मा वास्तव में न तो किसी को मारता है और न किसी द्वारा मारा जाता है॥19॥

 

न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः ।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणोन हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥2.20॥

na jayate mriyate va kadaci-
nnayan bhutva bhavita va na bhuyah.
ajo nityah sasvato.yan purano
na hanyate hanyamane sarire৷৷2.20৷৷

भावार्थ : आत्मा का न तो कभी जन्म होता है न ही कभी मृत्यु होती है और न ही आत्मा किसी काल में जन्म लेती है और न ही कभी मृत्यु को प्राप्त होती है। आत्मा अजन्मा, शाश्वत, अविनाशी और चिरनूतन है। शरीर का विनाश होने पर भी इसका विनाश नहीं होता।

यदि शरीर नष्ट हो जाता है, तब भी सर्वव्यापी आत्मा कभी नहीं मरती। इससे पता चलता है कि आत्मा शरीर के जन्म, युवावस्था और मृत्यु जैसे परिवर्तनों और मन के दुःख और सुख के रूप में केवल एक साक्षी के रूप में रहती है। तूफ़ानी बादलों की अशांति सूर्य या उस आकाश को प्रभावित नहीं करती जहाँ से वे गुजरते हैं। इसलिए मनुष्य को अपनी पहचान गंदे नाशवान शरीर और हमेशा काम करने वाले मन के साथ नहीं रखनी चाहिए, बल्कि स्वयं के साथ अपनी पहचान बनाए रखनी चाहिए। परम आनंद और साहस का एहसास उन बुद्धिमानों को होता है जो आत्मा के साथ एकाकार हैं। मृत्यु का भय तुरंत इस ज्ञान से दूर हो जाता है कि वह अमर आत्मा है। ॥20॥

 

वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम् ।
कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम् ॥2.21॥

vedavinasinan nityan ya enamajamavyayam.
kathan sa purusah partha kan ghatayati hanti kam৷৷2.21৷৷

भावार्थ : हे पृथापुत्र अर्जुन! जो पुरुष इस आत्मा को नाशरहित, नित्य, अजन्मा और अव्यय जानता है, वह पुरुष कैसे किसको मरवाता है और कैसे किसको मारता है?

आध्यात्मिक रूप से उन्नत आत्मा अहंकार को शांत करती है जो हमें यह महसूस कराती है, कि हम अपने कार्यों के कर्ता हैं। उस अवस्था में, कोई देख सकता है कि भीतर बैठा हुआ आत्मा वास्तव में कुछ नहीं करता है। ऐसी श्रेष्ठ आत्मा सभी प्रकार के कर्म करते हुए भी उनसे कभी कलंकित नहीं होती। श्री कृष्ण अर्जुन को सलाह दे रहे हैं कि उसे खुद को उस प्रबुद्ध स्तर तक ऊपर उठाना चाहिए, खुद को गैर-कर्ता के रूप में देखना चाहिए, अहंकार से मुक्त होना चाहिए और इससे भागने के बजाय अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए।॥21॥

 

वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि ।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही ॥2.22॥

vasansi jirnani yatha vihaya
navani grhnati naro.parani.
tatha sarirani vihaya jirna-
nyanyani sanyati navani dehi৷৷2.22৷৷

भावार्थ : जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर दूसरे नए वस्त्रों को ग्रहण करता है, वैसे ही जीवात्मा पुराने शरीरों को त्यागकर दूसरे नए शरीरों को प्राप्त होता है

आत्मा का मूलतत्व समझते हुए श्री कृष्ण पुनर्जन्म का स्मरण करते हुए उसकी तुलना नित्य क्रिया-कलापों से कर रहे हैं। जब वस्त्र पुराने या फट जाते है, तब हम पुराने वस्त्र को त्याग कर नये वस्त्र धारण कर लेते है, और ऐसा करने से हम अपने आप को नहीं बदलते। इस प्रकार आत्मा मृत शरीर को छोड़ देती हे, तब आत्मा में किसी भी प्रकार का परिवर्तन नहीं होता है। पुनर्जन्म की अवधारणा न्यायशास्त्र में प्रदत्त निम्न तर्क द्वारा सिद्ध होती है। ॥22॥

 

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता के सभी अध्यायों को पढ़ें:  सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता

(Bhagavad Gita Chapter 2 Hindi)

नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः ।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ॥2.23॥

nainan chindanti sastrani nainan dahati pavakah.
na cainan kledayantyapo na sosayati marutah৷৷2.23৷৷

भावार्थ : इस आत्मा को शस्त्र नहीं काट सकते, इसको आग नहीं जला सकती, इसको जल नहीं गला सकता और वायु नहीं सुखा सकता॥23॥

 

अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च ।
नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः ॥2.24॥

acchedyo.yamadahyo.yamakledyo.sosya eva ca.
nityah sarvagatah sthanuracalo.yan sanatanah৷৷2.24৷৷

भावार्थ : क्योंकि यह आत्मा अच्छेद्य है, यह आत्मा अदाह्य, अक्लेद्य और निःसंदेह अशोष्य है तथा यह आत्मा नित्य, सर्वव्यापी, अचल, स्थिर रहने वाला और सनातन है॥24॥

 

अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते ।
तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि॥2.25॥

avyakto.yamacintyo.yamavikaryo.yamucyate.
tasmadevan viditvainan nanusocitumarhasi৷৷2.25৷৷

भावार्थ : यह आत्मा अव्यक्त है, यह आत्मा अचिन्त्य है और यह आत्मा विकाररहित कहा जाता है। इससे हे अर्जुन! इस आत्मा को उपर्युक्त प्रकार से जानकर तू शोक करने के योग्य नहीं है अर्थात् तुझे शोक करना उचित नहीं है।

आत्मा इतना सूक्ष्म है इसे सूक्ष्मदर्शी यंत्र से भी देखा नहीं जा सकता, परिणामत आत्मा यह अदृश्य है। जहाँ तक आत्मा की मौजूदगी की बात हे, सुनने के अतिरिक्त अन्य किसी प्रयोग द्वारा इसकी विद्यमानता को सिद्ध नहीं कर सकते। यह सत्य का स्वीकार करना पड़ता हे, क्योकि आत्मा को समझने के लिए कोई दूसरा साधन नहीं है।

अति सूक्ष्म आत्मा निर्विकार होने से आत्मा भगवान के बराबर नहीं हो सकती, यह भाव वेदो और पुराणों में भिन्न-भिन्न प्रकार से स्थायित्व का समर्थन करने के लिए बताया गया है। आत्मा चेतना है, वेदों के इस कथन को हमें स्वीकार करना होगा, क्योकि आत्मा में शरीर जैसे परिवर्तन नहीं होता है। आत्मा भौतिक ऊर्जा से भी अत्यंत सूक्ष्म होने के कारण हमारी बुद्धि की पहुंच से बाहर है।

॥25॥

 

अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम् ।
तथापि त्वं महाबाहो नैवं शोचितुमर्हसि ॥2.26॥

atha cainan nityajatan nityan va manyase mrtam.
tathapi tvan mahabaho naivan socitumarhasi৷৷2.26৷৷

भावार्थ : किन्तु यदि तू इस आत्मा को सदा जन्मने वाला तथा सदा मरने वाला मानता हो, तो भी हे महाबाहो! तू इस प्रकार शोक करने योग्य नहीं है॥26॥

 

जातस्त हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च ।
तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि ॥2.27॥

jatasya hi dhruvo mrtyurdhruvan janma mrtasya ca.
tasmadapariharye.rthe na tvan socitumarhasi৷৷2.27৷৷

भावार्थ : क्योंकि इस मान्यता के अनुसार जन्मे हुए की मृत्यु निश्चित है और मरे हुए का जन्म निश्चित है। इससे भी इस बिना उपाय वाले विषय में तू शोक करने योग्य नहीं है।

जिसका जन्म हुआ है उसका मृत्यु निश्चित है, और जिसकी मृत्यु हुई है, उसका जन्म निश्चित है, इसलिए जन्ममरण का यह चक्र अनिवार्य है, इसका प्रतिकार नहीं किया जा सकता यह सत्य का शोक करना उचित नहीं।

हर क्षण मृत्यु का चक्र चलता रहता है और जो लोग जीवित है, वह सत्य को देख रहे है। परंतु जीवित लोग यह नहीं सोचते की एक दिन उन्हें भी मरना होगा। भगवान श्री कृष्ण इस श्लोक से समझते हे की जिसका जन्म हुआ हे इसकी मृत्यु अनिवार्य है। इसलिए बुद्धिमान को मृत्यु का शोक नहीं करना चाहिए।॥27॥

 

अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत ।
अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना ॥2.28॥

avyaktadini bhutani vyaktamadhyani bharata.
avyaktanidhananyeva tatra ka paridevana৷৷2.28৷৷

भावार्थ : हे अर्जुन! सम्पूर्ण प्राणी जन्म से पहले अप्रकट थे और मरने के बाद भी अप्रकट हो जाने वाले हैं, केवल बीच में ही प्रकट हैं, फिर ऐसी स्थिति में क्या शोक करना है?॥28॥

 

आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेनमाश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः ।
आश्चर्यवच्चैनमन्यः श्रृणोति श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित् ॥2.29॥

ascaryavatpasyati kasicadena-
mascaryavadvadati tathaiva canyah.
ascaryavaccainamanyah srrnoti
srutvapyenan veda na caiva kasicat৷৷2.29৷৷

भावार्थ : कोई एक महापुरुष ही इस आत्मा को आश्चर्य की भाँति देखता है और वैसे ही दूसरा कोई महापुरुष ही इसके तत्व का आश्चर्य की भाँति वर्णन करता है तथा दूसरा कोई अधिकारी पुरुष ही इसे आश्चर्य की भाँति सुनता है और कोई-कोई तो सुनकर भी इसको नहीं जानता॥29॥

 

देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत ।
तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि ॥2.30॥

dehi nityamavadhyo.yan dehe sarvasya bharata.
tasmatsarvani bhutani na tvan socitumarhasi৷৷2.30৷৷

भावार्थ : हे अर्जुन! यह आत्मा सबके शरीर में सदा ही अवध्य अर्थात्जि सका वध नहीं किया जा सके है। इस कारण सम्पूर्ण प्राणियों के लिए तू शोक करने योग्य नहीं है॥30॥

 

स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि ।
धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते ॥2.31॥

svadharmamapi caveksya na vikampitumarhasi.
dharmyaddhi yuddhachreyo.nyatksatriyasya na vidyate৷৷2.31৷৷

भावार्थ : तथा अपने धर्म को देखकर भी तू भय करने योग्य नहीं है अर्थात् तुझे भय नहीं करना चाहिए क्योंकि क्षत्रिय के लिए धर्मयुक्त युद्ध से बढ़कर दूसरा कोई कल्याणकारी कर्तव्य नहीं है॥31॥

 

यदृच्छया चोपपन्नां स्वर्गद्वारमपावृतम् ।
सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम् ॥2.32॥

yadrcchaya copapannan svargadvaramapavrtam.
sukhinah ksatriyah partha labhante yuddhamidrsam৷৷2.32৷৷

भावार्थ : हे पार्थ! अपने-आप प्राप्त हुए और खुले हुए स्वर्ग के द्वार रूप इस प्रकार के युद्ध को भाग्यवान क्षत्रिय लोग ही पाते हैं॥32॥

 

अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं सङ्‍ग्रामं न करिष्यसि ।
ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि ॥2.33॥

atha caittvamiman dharmyan sangraman na karisyasi.
tatah svadharman kirtin ca hitva papamavapsyasi৷৷2.33৷৷

भावार्थ : किन्तु यदि तू इस धर्मयुक्त युद्ध को नहीं करेगा तो स्वधर्म और कीर्ति को खोकर पाप को प्राप्त होगा ॥33॥

 

अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम् ।
सम्भावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते ॥2.34॥

akirtin capi bhutani kathayisyanti te.vyayam.
sanbhavitasya cakirtirmaranadatiricyate৷৷2.34৷৷

भावार्थ : तथा सब लोग तेरी बहुत काल तक रहने वाली अपकीर्ति का भी कथन करेंगे और माननीय पुरुष के लिए अपकीर्ति मरण से भी बढ़कर है॥34॥

 

भयाद्रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथाः ।
येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम् ॥2.35॥

bhayadranaduparatan mansyante tvan maharathah.
yesan ca tvan bahumato bhutva yasyasi laghavam৷৷2.35৷৷

भावार्थ : इऔर जिनकी दृष्टि में तू पहले बहुत सम्मानित होकर अब लघुता को प्राप्त होगा, वे महारथी लोग तुझे भय के कारण युद्ध से हटा हुआ मानेंगे॥35॥

 

अवाच्यवादांश्च बहून् वदिष्यन्ति तवाहिताः ।
निन्दन्तस्तव सामर्थ्यं ततो दुःखतरं नु किम् ॥2.36॥

avacyavadansca bahun vadisyanti tavahitah.
nindantastava samarthyan tato duhkhataran nu kim৷৷2.36৷৷

भावार्थ : तेरे वैरी लोग तेरे सामर्थ्य की निंदा करते हुए तुझे बहुत से न कहने योग्य वचन भी कहेंगे, उससे अधिक दुःख और क्या होगा?॥36॥

 

हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम् ।
तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः ॥2.37॥

hato va prapsyasi svargan jitva va bhoksyase mahim.
tasmaduttistha kaunteya yuddhaya krtaniscayah৷৷2.37৷৷

भावार्थ : या तो तू युद्ध में मारा जाकर स्वर्ग को प्राप्त होगा अथवा संग्राम में जीतकर पृथ्वी का राज्य भोगेगा। इस कारण हे अर्जुन! तू युद्ध के लिए निश्चय करके खड़ा हो जा॥37॥

 

सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ ।
ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि ॥2.38॥

sukhaduhkhe same krtva labhalabhau jayajayau.
tato yuddhaya yujyasva naivan papamavapsyasi৷৷2.38৷৷

भावार्थ : जय-पराजय, लाभ-हानि और सुख-दुख को समान समझकर, उसके बाद युद्ध के लिए तैयार हो जा, इस प्रकार युद्ध करने से तू पाप को नहीं प्राप्त होगा॥38॥

 

एषा तेऽभिहिता साङ्‍ख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां श्रृणु ।
बुद्ध्या युक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि ॥2.39॥

esa te.bhihita sankhye buddhiryoge tviman srrnu.
buddhyayukto yaya partha karmabandhan prahasyasi৷৷2.39৷৷

भावार्थ : हे पार्थ! यह बुद्धि तेरे लिए ज्ञानयोग के विषय में कही गई और अब तू इसको कर्मयोग के विषय में सुन- जिस बुद्धि से युक्त हुआ तू कर्मों के बंधन को भली-भाँति त्याग देगा अर्थात सर्वथा नष्ट कर डालेगा॥39॥

 

यनेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवातो न विद्यते ।
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ॥2.40॥

nehabhikramanaso.sti pratyavayo na vidyate.
svalpamapyasya dharmasya trayate mahato bhayat৷৷2.40৷৷

भावार्थ : इस कर्मयोग में आरंभ का अर्थात बीज का नाश नहीं है और उलटा फलरूप दोष भी नहीं है, बल्कि इस कर्मयोग रूप धर्म का थोड़ा-सा भी साधन जन्म-मृत्यु रूप महान भय से रक्षा कर लेता है॥40॥

 

व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन ।
बहुशाका ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम् ॥2.41॥

vyavasayatmika buddhirekeha kurunandana.
bahusakha hyanantasca buddhayo.vyavasayinam৷৷2.41৷৷

भावार्थ : हे अर्जुन! इस कर्मयोग में निश्चयात्मिका बुद्धि एक ही होती है, किन्तु अस्थिर विचार वाले विवेकहीन सकाम मनुष्यों की बुद्धियाँ निश्चय ही बहुत भेदों वाली और अनन्त होती हैं॥41॥

 

यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः ।
वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः ॥2.42॥

yamiman puspitan vacan pravadantyavipasicatah.
vedavadaratah partha nanyadastiti vadinah৷৷2.42৷৷

कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम् ।
क्रियाविश्लेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति ॥2.43॥

kamatmanah svargapara janmakarmaphalapradam.
kriyavisesabahulan bhogaisvaryagatin prati৷৷2.43৷৷

भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम् ।
व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते ॥2.44॥

bhogaisvaryaprasaktanan tayapahrtacetasam.
vyavasayatmika buddhih samadhau na vidhiyate৷৷2.44৷৷

भावार्थ : हे अर्जुन! जो भोगों में तन्मय हो रहे हैं, जो कर्मफल के प्रशंसक वेदवाक्यों में ही प्रीति रखते हैं, जिनकी बुद्धि में स्वर्ग ही परम प्राप्य वस्तु है और जो स्वर्ग से बढ़कर दूसरी कोई वस्तु ही नहीं है- ऐसा कहने वाले हैं, वे अविवेकीजन इस प्रकार की जिस पुष्पित अर्थात् दिखाऊ शोभायुक्त वाणी को कहा करते हैं, जो कि जन्मरूप कर्मफल देने वाली एवं भोग तथा ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिए नाना प्रकार की बहुत-सी क्रियाओं का वर्णन करने वाली है, उस वाणी द्वारा जिनका चित्त हर लिया गया है, जो भोग और ऐश्वर्य में अत्यन्त आसक्त हैं, उन पुरुषों की परमात्मा में निश्चियात्मिका बुद्धि नहीं होती॥42-44॥

 

त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन ।
निर्द्वन्द्वो नित्यसत्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान् ॥2.45॥

traigunyavisaya veda nistraigunyo bhavarjuna.
nirdvandvo nityasattvastho niryogaksema atmavan৷৷2.45৷৷

भावार्थ : हे अर्जुन! वेद उपर्युक्त प्रकार से तीनों गुणों के कार्य रूप समस्त भोगों एवं उनके साधनों का प्रतिपादन करने वाले हैं, इसलिए तू उन भोगों एवं उनके साधनों में आसक्तिहीन, हर्ष-शोकादि द्वंद्वों से रहित, नित्यवस्तु परमात्मा में स्थित योग क्षेम को न चाहने वाला और स्वाधीन अन्तःकरण वाला हो॥45॥

 

यावानर्थ उदपाने सर्वतः सम्प्लुतोदके ।
तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः ॥2.46॥

yavanartha udapane sarvatah sanplutodake.
tavansarvesu vedesu brahmanasya vijanatah৷৷2.46৷৷

भावार्थ : सब ओर से परिपूर्ण जलाशय के प्राप्त हो जाने पर छोटे जलाशय में मनुष्य का जितना प्रयोजन रहता है, ब्रह्म को तत्व से जानने वाले ब्राह्मण का समस्त वेदों में उतना ही प्रयोजन रह जाता है॥46॥

 

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।
मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि ॥2.47॥

(Bhagavad Gita Chapter 2 Hindi)

karmanyevadhikaraste ma phalesu kadacana.
ma karmaphalaheturbhurma te sango.stvakarmani৷৷2.47৷৷

भावार्थ : तेरा कर्म करने में ही अधिकार है, उसके फलों में कभी नहीं। इसलिए तू कर्मों के फल हेतु मत हो तथा तेरी कर्म न करने में भी आसक्ति न हो॥47॥

 

योगस्थः कुरु कर्माणि संग त्यक्त्वा धनंजय ।
सिद्धयसिद्धयोः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ॥2.48॥

yogasthah kuru karmani sangan tyaktva dhananjaya.
siddhyasiddhyoh samo bhutva samatvan yoga ucyate৷৷2.48৷৷

भावार्थ : हे धनंजय! तू आसक्ति को त्यागकर तथा सिद्धि और असिद्धि में समान बुद्धिवाला होकर योग में स्थित हुआ कर्तव्य कर्मों को कर, समत्व ही योग कहलाता है॥48॥

 

दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनंजय ।
बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः ॥2.49॥

durena hyavaran karma buddhiyogaddhananjaya.
buddhau saranamanviccha krpanah phalahetavah৷৷2.49৷৷

भावार्थ : इस समत्वरूप बुद्धियोग से सकाम कर्म अत्यन्त ही निम्न श्रेणी का है। इसलिए हे धनंजय! तू समबुद्धि में ही रक्षा का उपाय ढूँढ अर्थात् बुद्धियोग का ही आश्रय ग्रहण कर क्योंकि फल के हेतु बनने वाले अत्यन्त दीन हैं॥49॥

 

बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते ।
तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम् ॥2.50॥

buddhiyukto jahatiha ubhe sukrtaduskrte.
tasmadyogaya yujyasva yogah karmasu kausalam৷৷2.50৷৷

भावार्थ : समबुद्धियुक्त पुरुष पुण्य और पाप दोनों को इसी लोक में त्याग देता है अर्थात उनसे मुक्त हो जाता है। इससे तू समत्व रूप योग में लग जा, यह समत्व रूप योग ही कर्मों में कुशलता है अर्थात कर्मबंध से छूटने का उपाय है॥50॥

 

कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः ।
जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम् ॥2.51॥

karmajan buddhiyukta hi phalan tyaktva manisinah.
janmabandhavinirmuktah padan gacchantyanamayam৷৷2.51৷৷

भावार्थ : क्योंकि समबुद्धि से युक्त ज्ञानीजन कर्मों से उत्पन्न होने वाले फल को त्यागकर जन्मरूप बंधन से मुक्त हो निर्विकार परम पद को प्राप्त हो जाते हैं॥51॥

 

यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति ।
तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च ॥2.52॥

yada te mohakalilan buddhirvyatitarisyati.
tada gantasi nirvedan srotavyasya srutasya ca৷৷2.52৷৷

भावार्थ : जिस काल में तेरी बुद्धि मोहरूपी दलदल को भलीभाँति पार कर जाएगी, उस समय तू सुने हुए और सुनने में आने वाले इस लोक और परलोक संबंधी सभी भोगों से वैराग्य को प्राप्त हो जाएगा॥52॥

 

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श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला ।
समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि ॥2.53॥

srutivipratipanna te yada sthasyati niscala.
samadhavacala buddhistada yogamavapsyasi৷৷2.53৷৷

भावार्थ : भाँति-भाँति के वचनों को सुनने से विचलित हुई तेरी बुद्धि जब परमात्मा में अचल और स्थिर ठहर जाएगी, तब तू योग को प्राप्त हो जाएगा अर्थात तेरा परमात्मा से नित्य संयोग हो जाएगा॥53॥

 

अर्जुन उवाच

स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव ।
स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम् ॥2.54॥

arjuna uvaca

sthitaprajnasya ka bhasa samadhisthasya kesava.
sthitadhih kin prabhaseta kimasita vrajeta kim৷৷2.54৷৷

भावार्थ : अर्जुन बोले- हे केशव! समाधि में स्थित परमात्मा को प्राप्त हुए स्थिरबुद्धि पुरुष का क्या लक्षण है? वह स्थिरबुद्धि पुरुष कैसे बोलता है, कैसे बैठता है और कैसे चलता है?॥54॥

 

श्रीभगवानुवाच

प्रजहाति यदा कामान् सर्वान्पार्थ मनोगतान् ।
आत्मयेवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते ॥2.55॥

(Bhagavad Gita Chapter 2 Hindi)

sri bhagavanuvaca

prajahati yada kaman sarvan partha manogatan.
atmanyevatmana tustah sthitaprajnastadocyate৷৷2.55৷৷

भावार्थ : श्री भगवान् बोले- हे अर्जुन! जिस काल में यह पुरुष मन में स्थित सम्पूर्ण कामनाओं को भलीभाँति त्याग देता है और आत्मा से आत्मा में ही संतुष्ट रहता है, उस काल में वह स्थितप्रज्ञ कहा जाता है॥55॥

 

दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः ।
वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते ॥2.56॥

duhkhesvanudvignamanah sukhesu vigatasprhah.
vitaragabhayakrodhah sthitadhirmunirucyate৷৷2.56৷৷

भावार्थ : दुःखों की प्राप्ति होने पर जिसके मन में उद्वेग नहीं होता, सुखों की प्राप्ति में सर्वथा निःस्पृह है तथा जिसके राग, भय और क्रोध नष्ट हो गए हैं, ऐसा मुनि स्थिरबुद्धि कहा जाता है।

एक ज्ञानी मन को वासना, क्रोध, लालच, ईर्ष्या आदि की भौतिक कमजोरियों को आश्रय देने की अनुमति नहीं देता है। केवल तभी मन लगातार अतिक्रमण पर चिंतन कर सकता है और परमात्मा में स्थिर हो सकता है। यदि कोई मन को दुखों के बारे में सोचने की अनुमति देता है, तो परमात्मा पर चिंतन बंद हो जाता है और मन को पारलौकिक स्तर से नीचे खींच लिया जाता है।

इसी प्रकार दुःखोंकी प्राप्ति होनेपर भी जिस मनुष्य का मन क्षुभित नहीं होता अर्थात् चिंतित नहीं होता उसे अनुद्विग्नमना कहते हैं। जिस मनुष्य को सुख प्राप्त होनेपर लालच नष्ट हो गयी हो, उसे अनुद्विग्नमना कहलाता है। और प्रेम, भय और क्रोध नष्ट हो गये हो, उस मनुष्य को वीतरागभयक्रोध कहते है। इसलिए दुखों के लिए शोक और सुखों के लिए लालच करने की मनुष्य का मन अनुमति नहीं देता, वही स्थिर बुद्धि ज्ञानी है। और ज्ञानी प्रेम, भय और क्रोध के आवेग से पराजित नहीं होता वः ज्ञानातीत अवस्था में स्थित रहते है।॥56॥

 

यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम् ।
नाभिनंदति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥2.57॥

yah sarvatranabhisnehastattatprapya subhasubham.
nabhinandati na dvesti tasya prajna pratisthita৷৷2.57৷৷

भावार्थ : जो पुरुष सर्वत्र स्नेहरहित हुआ उस-उस शुभ या अशुभ वस्तु को प्राप्त होकर न प्रसन्न होता है और न द्वेष करता है, उसकी बुद्धि स्थिर है॥57॥

 

यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गनीव सर्वशः ।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥2.58॥

yada sanharate cayan kurmo.nganiva sarvasah.
indriyanindriyarthebhyastasya prajna pratisthita৷৷2.58৷৷

भावार्थ : और कछुवा सब ओर से अपने अंगों को जैसे समेट लेता है, वैसे ही जब यह पुरुष इन्द्रियों के विषयों से इन्द्रियों को सब प्रकार से हटा लेता है, तब उसकी बुद्धि स्थिर है॥58॥

 

विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः ।
रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्टवा निवर्तते ॥2.59॥

visaya vinivartante niraharasya dehinah.
rasavarjan raso.pyasya paran drstva nivartate৷৷2.59৷৷

भावार्थ : इन्द्रियों द्वारा विषयों को ग्रहण न करने वाले पुरुष के भी केवल विषय तो निवृत्त हो जाते हैं, परन्तु उनमें रहने वाली आसक्ति निवृत्त नहीं होती। इस स्थितप्रज्ञ पुरुष की तो आसक्ति भी परमात्मा का साक्षात्कार करके निवृत्त हो जाती है॥59॥

 

यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः ।
इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः ॥2.60॥

yatato hyapi kaunteya purusasya vipasicatah.
indriyani pramathini haranti prasabhan manah৷৷2.60৷৷

भावार्थ : हे अर्जुन! आसक्ति का नाश न होने के कारण ये प्रमथन स्वभाव वाली इन्द्रियाँ यत्न करते हुए बुद्धिमान पुरुष के मन को भी बलात्‌ हर लेती हैं।

श्रीकृष्ण कहते है कि विचार हमें कमजोरी के समय पकड़ सकते हैं, जब हम कम से कम सतर्क होते हैं, और हमारा सारा आत्म-नियंत्रण ख़त्म कर देते हैं। ये विचार हमारी क्रोध या वासनाओं से उत्पन्न होते हैं।

वासनाएँ कोयले के सुप्त अंगारों की तरह हैं जो तब और अधिक जलती हैं जब इंद्रियाँ उनकी आग में ईंधन डालती हैं। वे विचारों के बीज, या “विचार जनरेटर” हैं। इसका मतलब यह है कि कार्यों पर आत्म-नियंत्रण प्रभावी है, लेकिन केवल एक निश्चित सीमा तक, क्योंकि आत्म-नियंत्रण वासनाओं से नहीं निपटता। यह एक घास को पूरी तरह से उखाड़ने के बजाय उसे काटने जैसा है॥60॥

 

तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः ।
वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥2.61॥

tani sarvani sanyamya yukta asita matparah.
vase hi yasyendriyani tasya prajna pratisthita৷৷2.61৷৷

भावार्थ : इसलिए साधक को चाहिए कि वह उन सम्पूर्ण इन्द्रियों को वश में करके समाहित चित्त हुआ मेरे परायण होकर ध्यान में बैठे क्योंकि जिस पुरुष की इन्द्रियाँ वश में होती हैं, उसी की बुद्धि स्थिर हो जाती है।

इस श्लोक में बताया गया है कि योग पूर्णता की सर्वोच्च अवधारणा कृष्ण चेतना है।जब तक कोई प्राणी कृष्णभावनाभावित नहीं हो सकता, इंद्रियों को नियंत्रित करना बिल्कुल भी संभव नहीं है। जैसा कि ऊपर बताया गया है, महान ऋषि दुर्वासा ने महाराज अंबरीष के साथ झगड़ा किया, और दुर्वासा मुनि अनावश्यक रूप से अहंकार के कारण क्रोधित हो गए और इसलिए अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण नहीं रख सके।

दूसरी ओर, राजा, हालांकि ऋषि जितने शक्तिशाली योगी नहीं थे. लेकिन राजा भगवान का भक्त था, उसने चुपचाप ऋषि के सभी अन्यायों को सहन किया और इस तरह विजयी हुआ॥61॥

 

ध्यायतो विषयान्पुंसः संगस्तेषूपजायते ।
संगात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते ॥2.62॥

(Bhagavad Gita Chapter 2 Hindi)

dhyayato visayanpunsah sangastesupajayate.
sangat sanjayate kamah kamatkrodho.bhijayate৷৷2.62৷৷

भावार्थ : विषयों का चिन्तन करने वाले पुरुष की उन विषयों में आसक्ति हो जाती है, आसक्ति से उन विषयों की कामना उत्पन्न होती है और कामना में विघ्न पड़ने से क्रोध उत्पन्न होता है।

वैदिक ग्रंथों में क्रोध, लालच, वासना आदि को मानसिक रोग कहा गया है। हम भलीभांति अवगत होते हैं, की एक शारीरिक रोग में हमारे पूरे दिन को कष्टदायक बनाने की शक्ति होती है। परंतु हम यह नहीं जानते हे की लगातार अधिक मानसिक रोगों से प्रभावित हो रहे है। क्योकि वासना, लोभ आदि को हम मानसिक रोग के रूप में स्वीकार नहीं करते है। ॥62॥

 

क्रोधाद्‍भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः ।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ॥2.63॥

krodhadbhavati sanmohah sanmohatsmrtivibhramah.
smrtibhransad buddhinaso buddhinasatpranasyati৷৷2.63৷৷

भावार्थ : क्रोध से अत्यन्त मूढ़ भाव उत्पन्न हो जाता है, मूढ़ भाव से स्मृति में भ्रम हो जाता है, स्मृति में भ्रम हो जाने से बुद्धि अर्थात ज्ञानशक्ति का नाश हो जाता है और बुद्धि का नाश हो जाने से यह पुरुष अपनी स्थिति से गिर जाता है।

क्रोध वश निर्णय लेने की शक्ति दुर्बल हो जाती है, जैसे सुबह की धुंध सूरज की रोशनी पर एक आवरण बना देती है। क्रोध में लोग ऐसी गलतियाँ कर बैठते हैं जिनका उन्हें बाद में पछतावा होता है, क्योंकि भावनाओं के धुंध से बुद्धि पर पर्दा पड़ जाता है। लोग कहते हैं, ”वह मुझसे बीस साल बड़े हैं. मैंने उससे इस तरह क्यों बात की? मुझे क्या हुआ है?” हुआ यह कि क्रोध से निर्णय की शक्ति प्रभावित हो गई और इस वजह से किसी बुजुर्ग को डांटने की गलती हो गई।

जब बुद्धि धुंधली हो जाती है, तो इससे स्मृति भ्रमित हो जाती है। तब व्यक्ति यह भूल जाता है कि क्या सही है और क्या गलत, और भावनाओं के उफान के साथ बहने लगता है। वहां से नीचे की ओर उतरना जारी रहता है, और स्मृति के भ्रमित होने से बुद्धि का विनाश होता है। और चूँकि बुद्धि आंतरिक मार्गदर्शक है, जब यह नष्ट हो जाती है, तो व्यक्ति बर्बाद हो जाता है।॥63॥

 

रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन् ।
आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति ॥2.64॥

ragadvesaviyuktaistu visayanindriyaiscaran.
atmavasyairvidheyatma prasadamadhigacchati৷৷2.64৷৷

भावार्थ : परंन्तु अपने अधीन किए हुए अन्तःकरण वाला साधक अपने वश में की हुई, राग-द्वेष रहित इन्द्रियों द्वारा विषयों में विचरण करता हुआ अन्तःकरण की प्रसन्नता को प्राप्त होता है॥64॥

 

प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते ।
प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते ॥2.65॥

prasade sarvaduhkhanan hanirasyopajayate.
prasannacetaso hyasu buddhih paryavatisthate৷৷2.65৷৷

भावार्थ : अन्तःकरण की प्रसन्नता होने पर इसके सम्पूर्ण दुःखों का अभाव हो जाता है और उस प्रसन्नचित्त वाले कर्मयोगी की बुद्धि शीघ्र ही सब ओर से हटकर एक परमात्मा में ही भलीभाँति स्थिर हो जाती है॥65॥

 

नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना ।
न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम् ॥2.66॥

nasti buddhirayuktasya na cayuktasya bhavana.
na cabhavayatah santirasantasya kutah sukham৷৷2.66৷৷

भावार्थ : न जीते हुए मन और इन्द्रियों वाले पुरुष में निश्चयात्मिका बुद्धि नहीं होती और उस अयुक्त मनुष्य के अन्तःकरण में भावना भी नहीं होती तथा भावनाहीन मनुष्य को शान्ति नहीं मिलती और शान्तिरहित मनुष्य को सुख कैसे मिल सकता है?

जिस व्यक्ति ने मन और इंद्रियों को नियंत्रण करना नहीं सीखा, वह न तो ईश्वर का ध्यान कर सकता है और न ही उसके दिव्य आनंद का अनुभव कर सकता है। उच्च स्वाद के बिना, निम्न स्वाद को त्यागना असंभव हो जाता है, और ऐसा व्यक्ति भौतिक सुख के लिए लालायित रहता है। ॥66॥

 

इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते ।
तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि ॥2.67॥

indriyanan hi caratan yanmano.nuvidhiyate.
tadasya harati prajnan vayurnavamivambhasi৷৷2.67৷৷

भावार्थ : क्योंकि जैसे जल में चलने वाली नाव को वायु हर लेती है, वैसे ही विषयों में विचरती हुई इन्द्रियों में से मन जिस इन्द्रिय के साथ रहता है, वह एक ही इन्द्रिय इस अयुक्त पुरुष की बुद्धि को हर लेती है॥67॥

 

तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः ।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥2.68॥

tasmadyasya mahabaho nigrhitani sarvasah.
indriyanindriyarthebhyastasya prajna pratisthita৷৷2.68৷৷

भावार्थ : इसलिए हे महाबाहो! जिस पुरुष की इन्द्रियाँ इन्द्रियों के विषयों में सब प्रकार निग्रह की हुई हैं, उसी की बुद्धि स्थिर है॥68॥

या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी ।
यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः ॥2.69॥

ya nisa sarvabhutanan tasyan jagarti sanyami.
yasyan jagrati bhutani sa nisa pasyato muneh৷৷2.69৷৷

भावार्थ : सम्पूर्ण प्राणियों के लिए जो रात्रि के समान है, उस नित्य ज्ञानस्वरूप परमानन्द की प्राप्ति में स्थितप्रज्ञ योगी जागता है और जिस नाशवान सांसारिक सुख की प्राप्ति में सब प्राणी जागते हैं, परमात्मा के तत्व को जानने वाले मुनि के लिए वह रात्रि के समान है॥69॥

 

आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठंसमुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत् ।
तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वेस शान्तिमाप्नोति न कामकामी ॥2.70॥

apuryamanamacalapratisthan
samudramapah pravisanti yadvat.
tadvatkama yan pravisanti sarve
sa santimapnoti na kamakami৷৷2.70৷৷

भावार्थ : जैसे नाना नदियों के जल सब ओर से परिपूर्ण, अचल प्रतिष्ठा वाले समुद्र में उसको विचलित न करते हुए ही समा जाते हैं, वैसे ही सब भोग जिस स्थितप्रज्ञ पुरुष में किसी प्रकार का विकार उत्पन्न किए बिना ही समा जाते हैं, वही पुरुष परम शान्ति को प्राप्त होता है, भोगों को चाहने वाला नहीं

जिस ने सभी इच्छाओ का त्याग किया हो, ऐसे आत्मसंतोषी विद्वान् या संन्यासी को ही मोक्ष प्राप्त होता हैं, भोगो की कामना रखने वाले को नहीं। इस उद्देश्य को दृष्टान्त द्वारा भगवान श्री कृष्ण कहते हे की जिस प्रकार समुद्र में, निरन्तर नदियों के प्रवाह के पश्चात भी समुद्र अशांत न होने की स्थिति को बनाए रखता है। यदि वर्षा ऋतु में नदियाँ अपना सारा जल समुद्र में बहा दे फिर भी समुद्र में बाढ़ कभी नहीं आ सकती। इस प्रकार ब्रह्मज्ञानी इन्द्रियों के विषयों का भोग करके या वंचित रहते दोनों स्थिति में शांत रहता है। ॥70॥

 

विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः ।
निर्ममो निरहंकारः स शान्तिमधिगच्छति ॥2.71॥

(Bhagavad Gita Chapter 2 Hindi)

vihaya kamanyah sarvanpumanscarati nihsprhah.
nirmamo nirahankarah sa santimadhigacchati৷৷2.71৷৷

भावार्थ : जो पुरुष सम्पूर्ण कामनाओं को त्याग कर ममतारहित, अहंकाररहित और स्पृहारहित हुआ विचरता है, वही शांति को प्राप्त होता है अर्थात वह शान्ति को प्राप्त है।

श्रीकृष्ण ने बुद्धिमान व्यक्ति के लक्षण के पूरे विषय को चार भागो में प्रस्तुत किया है। सबसे पहले हमें कर्म योग की तकनीक का उपयोग करके स्वार्थी इच्छाओं को छोड़ने के लिए कहते हैं। इसके बाद, वह हमसे उन चीज़ों की लालसा छोड़ने के लिए कहता है जो हमारे पास पहले से ही हैं, जो यहाँ दूसरा बिंदु है। और स्वार्थ के थोड़े से अंश को भी ख़त्म करने के लिए कहते हैं, जिसे हमने पहले अध्याय में देखा था, जिसे अहंकार और प्रेम के नाम से भी जाना जाता है। इन चार चीजों को त्यागने से प्राप्त लक्ष्य को यहां भी जोर देने के लिए दोहराया गया है: यह शाश्वत शांति है।॥71॥

 

एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति ।
स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति ॥2.72॥

esa brahmi sthitih partha nainan prapya vimuhyati.
sthitva.syamantakale.pi brahmanirvanamrcchati৷৷2.72৷৷

भावार्थ : हे अर्जुन! यह ब्रह्म को प्राप्त हुए पुरुष की स्थिति है, इसको प्राप्त होकर योगी कभी मोहित नहीं होता और अंतकाल में भी इस ब्राह्मी स्थिति में स्थित होकर ब्रह्मानन्द को प्राप्त हो जाता है॥72॥

 

यहां एक क्लिक में पढ़ें- श्रीमद भागवत गीता का तृतीय अध्याय

 

৷৷ द्वितीय अध्याय संपूर्णम् ৷৷

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