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भज गोविन्दम् हिंदी में

भज गोविन्दम् (Bhaja Govindam in Hindi) श्रीमद् आदि शंकराचार्य जी द्वारा रचित एक अत्यंत प्रभावशाली और कालजयी स्तोत्र है। यह केवल एक भक्ति-गीत नहीं, बल्कि वेदान्त का सार, जीवन का दर्पण और मनुष्य के मोह को तोड़ने वाला दिव्य उपदेश है। यह रचना मनुष्य को उसके ही जीवन पर प्रश्नचिह्न लगाने के लिए प्रेरित करती है—मैं कौन हूँ? यह जीवन क्यों मिला? मैं धन, परिवार और प्रतिष्ठा के पीछे दौड़ते हुए भी अशांत क्यों हूँ? सत्य क्या है और जीवन का वास्तविक लक्ष्य क्या होना चाहिए?

भज गोविन्दम् (Bhaja Govindam in Hindi) इन प्रश्नों के उत्तर सीधे-सीधे नहीं देता, बल्कि मनुष्य की चेतना को झकझोर कर उसे स्वयं सत्य की ओर मोड़ देता है। इसी कारण इस ग्रंथ को “मोहमुद्गर” भी कहा जाता है—अर्थात वह हथौड़ा जो मनुष्य के मोह को चूर्ण कर देता है।

परंपरा के अनुसार, भज गोविन्दम् की रचना का उद्भव काशी नगरी में हुआ। एक बार शंकराचार्य जी अपने शिष्यों के साथ काशी में भ्रमण कर रहे थे। तभी उन्होंने एक वृद्ध व्यक्ति को अत्यंत परिश्रम और तन्मयता से संस्कृत व्याकरण के नियम—धातु रूप और सूत्र—कंठस्थ करते हुए देखा। वह व्यक्ति जीवन की संध्या में था, फिर भी उसका पूरा ध्यान केवल बौद्धिक अभ्यास पर केंद्रित था।

उस दृश्य को देखकर करुणामय शंकराचार्य जी का हृदय द्रवित हो उठा। उन्होंने सोचा कि जब मृत्यु समीप है, तब इस प्रकार बुद्धि का उपयोग केवल शास्त्रीय तर्कों में क्यों किया जा रहा है? क्या यही मानव जीवन का उद्देश्य है? यदि यही बुद्धि ईश्वर-चिंतन, भक्ति और मन-नियंत्रण में लगाई जाए, तो यह जीवन सार्थक हो सकता है।

उसी क्षण उन्हें समूचा संसार स्पष्ट रूप से दिखाई दिया—एक ऐसा संसार जो परब्रह्म के चिंतन के स्थान पर केवल बौद्धिक अहंकार, ऐन्द्रिक सुखों और क्षणभंगुर भोगों के पीछे दौड़ रहा है। इसी करुणा और विवेक से प्रेरित होकर शंकराचार्य जी के मुख से प्रथम श्लोक प्रस्फुटित हुआ—“भज गोविन्दम्, भज गोविन्दम्, गोविन्दम् भज मूढ़मते।”

यहां एक क्लिक में पढ़ें ~ श्री गोविंद स्तोत्रम

भज गोविन्दम् (Bhaja Govindam in Hindi) केवल एक व्यक्ति की रचना नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक परंपरा का सजीव उदाहरण है। इस स्तोत्र के मुख्यतः दो भाग माने जाते हैं:

प्रथम श्लोक के पश्चात शंकराचार्य जी द्वारा रचित 12 श्लोकों का समूह द्वादश-मञ्जरीका स्तोत्रम् कहलाता है। इन श्लोकों में संसार की नश्वरता, शरीर की क्षणभंगुरता, धन और यौवन के प्रति आसक्ति की व्यर्थता तथा भक्ति की अनिवार्यता को अत्यंत सरल, किंतु तीखे शब्दों में व्यक्त किया गया है।

दूसरा शंकराचार्य जी के इस उपदेश से प्रेरित होकर उनके 14 प्रमुख शिष्यों ने 14 श्लोकों की रचना की। यह समूह चतुर्दश-मञ्जरीका स्तोत्रम् कहलाता है। इन श्लोकों में वैराग्य, विवेक, साधना और आत्मज्ञान के विविध आयामों को प्रस्तुत किया गया है।

स्तोत्र की पूर्णता के लिए अंत में स्वयं शंकराचार्य जी ने अतिरिक्त 5 श्लोकों की रचना की, जिससे यह कृति पूर्ण और समग्र रूप ले सकी।

भज गोविन्दम् (Bhaja Govindam in Hindi) का सबसे बड़ा गुण यह है कि यह गूढ़ वेदान्त को अत्यंत सरल भाषा में प्रस्तुत करता है। यह हमें बार-बार स्मरण कराता है कि यह संसार नश्वर है—धन, पद, सौंदर्य, यौवन और संबंध सभी क्षणिक हैं। जिस शरीर पर हमें गर्व है, वही शरीर एक दिन मिट्टी में मिल जाएगा।

यह स्तोत्र हमें यह भी सिखाता है कि केवल शास्त्रों का ज्ञान, व्याकरण की पकड़ या तर्क-वितर्क मुक्ति का साधन नहीं बन सकते। जब तक मन ईश्वर में स्थित नहीं होता और अहंकार का क्षय नहीं होता, तब तक ज्ञान भी बंधन बन जाता है।

आज का मनुष्य भौतिक सुविधाओं से घिरा हुआ है, फिर भी भीतर से अशांत है। प्रतिस्पर्धा, उपभोग और प्रदर्शन ने जीवन को बोझिल बना दिया है। ऐसे समय में भज गोविन्दम् हमें यह स्मरण कराता है कि शांति बाहर नहीं, भीतर है। यह स्तोत्र हमें संतुलित जीवन जीने की प्रेरणा देता है—कर्तव्य निभाते हुए भी आसक्ति से मुक्त रहने की शिक्षा देता है। यह हमें संसार से भागने को नहीं, बल्कि संसार में रहते हुए सत्य को पहचानने को कहता है।

यहां एक क्लिक में पढ़ें ~ श्री राधा कृपा कटाक्ष स्त्रोत्र हिंदी में

भज गोविन्दम् (Bhaja Govindam in Hindi) केवल एक स्तोत्र नहीं, बल्कि आत्मबोध की पुकार है। यह मनुष्य को उसके मोह से जगाकर सत्य की ओर मोड़ता है। जो व्यक्ति इस कृति को केवल पढ़ता नहीं, बल्कि इसके भाव को जीवन में उतारता है, उसके लिए जीवन का प्रत्येक क्षण साधना बन जाता है।

अंततः शंकराचार्य जी का यही संदेश है—जब तक जीवन है, तब तक गोविन्द का भजन करो, क्योंकि वही इस नश्वर संसार में शाश्वत आनंद का एकमात्र मार्ग है।

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