Mahabharata Adi Parva Chapter 47 to 51

॥ श्रीहरिः ॥
श्रीगणेशाय नमः
॥ श्रीवेदव्यासाय नमः ॥
श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत आस्तीकपर्व में (Adi Parva Chapter 47 to 51)
इस पोस्ट में श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत आस्तीकपर्व अध्याय 47 से अध्याय 51 (Adi Parva Chapter 47 to 51) दिया गया है। इसमें जरत्कारु मुनिका नागकन्याके साथ विवाह, नागकन्या जरत्कारुद्वारा पतिसेवा तथा पतिका उसे त्यागकर तपस्याके लिये गमन, वासुकि नागकी चिन्ता, बहिनद्वारा उसका निवारण तथा आस्तीकका जन्म एवं विद्याध्ययन, राजा परीक्षित्के धर्ममय आचार तथा उत्तम गुणोंका वर्णन, राजाका शिकारके लिये जाना और उनके द्वारा शमीक मुनिका तिरस्कार, शृंगी ऋषिका परीक्षित्को शाप, तक्षकका काश्यपको लौटाकर छलसे परीक्षित्को हँसना और पिताकी मृत्युका वृत्तान्त सुनकर जनमेजयकी तक्षकसे बदला लेनेकी प्रतिज्ञा और जनमेजयके सर्पयज्ञका उपक्रम का वर्णन किया है।
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सैंतालीसवाँ अध्याय
जरत्कारु मुनिका नागकन्याके साथ विवाह, नागकन्या जरत्कारुद्वारा पतिसेवा तथा पतिका उसे त्यागकर तपस्याके लिये गमन
सौतिरुवाच
वासुकिस्त्वब्रवीद् वाक्यं जरत्कारुमृषिं तदा ।
सनाम्नी तव कन्येयं स्वसा मे तपसान्विता ॥ १ ॥
भरिष्यामि च ते भार्या प्रतीच्छेमां द्विजोत्तम । रक्षणं च करिष्येऽस्याः सर्वशक्त्या तपोधन । त्वदर्थं रक्ष्यते चैषा मया मुनिवरोत्तम ॥ २ ॥
उग्रश्रवाजी कहते हैं- शौनक ! उस समय वासुकिने जरत्कारु मुनिसे कहा – ‘द्विजश्रेष्ठ ! इस कन्याका वही नाम है, जो आपका है। यह मेरी बहिन है और आपकी ही भाँति तपस्विनी भी है। आप इसे ग्रहण करें। आपकी पत्नीका भरण-पोषण मैं करूँगा। तपोधन ! अपनी सारी शक्ति लगाकर मैं इसकी रक्षा करता रहूँगा। मुनिश्रेष्ठ ! अबतक आपहीके लिये मैंने इसकी रक्षा की है ॥ १-२ ॥
ऋषिरुवाच
न भरिष्येऽहमेतां वै एष मे समयः कृतः ।
अप्रियं च न कर्तव्यं कृते चैनां त्यजाम्यहम् ॥ ३ ॥
ऋषिने कहा- नागराज! मैं इसका भरण-पोषण नहीं करूँगा, मेरी यह शर्त तो तय हो गयी। अब दूसरी शर्त यह है कि तुम्हारी इस बहिनको कभी ऐसा कार्य नहीं करना चाहिये, जो मुझे अप्रिय लगे। यदि अप्रिय कार्य कर बैठेगी तो उसी समय मैं इसे त्याग दूँगा ॥ ३ ॥ (Adi Parva Chapter 47 to 51)
सौतिरुवाच
प्रतिश्रुते तु नागेन भरिष्ये भगिनीमिति ।
जरत्कारुस्तदा वेश्म भुजगस्य जगाम ह ॥ ४ ॥
उग्रश्रवाजी कहते हैं- नागराजने यह शर्त स्वीकार कर ली कि ‘मैं अपनी बहिनका भरण-पोषण करूँगा।’ तब जरत्कारु मुनि वासुकिके भवनमें गये ॥ ४ ॥
तत्र मन्त्रविदां श्रेष्ठस्तपोवृद्धो महाव्रतः ।
जग्राह पाणिं धर्मात्मा विधिमन्त्रपुरस्कृतम् ॥ ५ ॥
वहाँ मन्त्रवेत्ताओंमें श्रेष्ठ तपोवृद्ध महाव्रती धर्मात्मा जरत्कारुने शास्त्रीय विधि और मन्त्रोच्चारणके साथ नागकन्याका पाणिग्रहण किया ॥ ५ ॥
ततो वासगृहं रम्यं पन्नगेन्द्रस्य सम्मतम् ।
जगाम भार्यामादाय स्तूयमानो महर्षिभिः ॥ ६ ॥
तदनन्तर महर्षियोंसे प्रशंसित होते हुए वे नागराजके रमणीय भवनमें, जो मनके अनुकूल था, अपनी पत्नीको लेकर गये ॥ ६ ॥
शयनं तत्र संक्लृप्तं स्पर्ध्यास्तरणसंवृतम् ।
तत्र भार्यासहायो वै जरत्कारुरुवास ह ॥ ७ ॥
वहाँ बहुमूल्य बिछौनोंसे सजी हुई शय्या बिछी थी। जरत्कारु मुनि अपनी पत्नीके साथ उसी भवनमें रहने लगे ॥ ७ ॥
स तत्र समयं चक्रे भार्यया सह सत्तमः ।
विप्रियं मे न कर्तव्यं न च वाच्यं कदाचन ॥ ८ ॥
उन साधुशिरोमणिने वहाँ अपनी पत्नीके सामने यह शर्त रखी- ‘तुम्हें ऐसा कोई काम नहीं करना चाहिये, जो मुझे अप्रिय लगे। साथ ही कभी अप्रिय वचन भी नहीं बोलना चाहिये ॥ ८ ॥
त्यजेयं विप्रिये च त्वां कृते वासं च ते गृहे ।
एतद् गृहाण वचनं मया यत् समुदीरितम् ॥ ९ ॥
‘तुमसे अप्रिय कार्य हो जानेपर मैं तुम्हें और तुम्हारे घरमें रहना छोड़ दूँगा। मैंने जो कुछ कहा है, मेरे इस वचनको दृढ़तापूर्वक धारण कर लो’ ॥ ९ ॥
ततः परमसंविग्ना स्वसा नागपतेस्तदा ।
अतिदुःखान्विता वाक्यं तमुवाचैवमस्त्विति ॥ १० ॥
यह सुनकर नागराजकी बहिन अत्यन्त उद्विग्न हो गयी और उस समय बहुत दुःखी होकर बोली- ‘भगवन् ! ऐसा ही होगा’ ॥ १० ॥
तथैव सा च भर्तारं दुःखशीलमुपाचरत् ।
उपायैः श्वेतकाकीयैः प्रियकामा यशस्विनी ॥ ११ ॥
फिर वह यशस्विनी नागकन्या दुःखद स्वभाववाले पतिकी उसी शर्तके अनुसार सेवा करने लगी। वह श्वेतकाकीय उपायोंसे सदा पतिका प्रिय करनेकी इच्छा रखकर निरन्तर उनकी आराधनामें लगी रहती थी ॥ ११ ॥
ऋतुकाले ततः स्नाता कदाचिद् वासुकेः स्वसा ।
भर्तारं वै यथान्यायमुपतस्थे महामुनिम् ॥ १२ ॥
तदनन्तर किसी समय ऋतुकाल आनेपर वासुकिकी बहिन स्नान करके न्यायपूर्वक अपने पति महामुनि जरत्कारुकी सेवामें उपस्थित हुई ॥ १२ ॥
तत्र तस्याः समभवद् गर्भा ज्वलनसंनिभः ।
अतीवतेजसा युक्तो वैश्वानरसमद्युतिः ॥ १३ ॥
वहाँ उसे गर्भ रह गया, जो प्रज्वलित अग्निके समान अत्यन्त तेजस्वी तथा तपःशक्तिसे सम्पन्न था। उसकी अंगकान्ति अग्निके तुल्य थी ॥ १३ ॥
शुक्लपक्षे यथा सोमो व्यवर्धत तथैव सः ।
ततः कतिपयाहस्य जरत्कारुर्महायशाः ॥ १४ ॥
उत्सङ्गेऽस्याः शिरः कृत्वा सुष्वाप परिखिन्नवत् ।
तस्मिंश्च सुप्ते विप्रेन्द्रे सवितास्तमियाद् गिरिम् ॥ १५ ॥
जैसे शुक्लपक्षमें चन्द्रमा बढ़ते हैं, उसी प्रकार वह गर्भ भी नित्य परिपुष्ट होने लगा। तत्पश्चात् कुछ दिनोंके बाद महातपस्वी जरत्कारु कुछ खिन्न-से होकर अपनी पत्नीकी गोदमें सिर रखकर सो गये। उन विप्रवर जरत्कारुके सोते समय ही सूर्य अस्ताचलको जाने लगे ॥ १४-१५ ॥(Adi Parva Chapter 47 to 51)
अह्नः परिक्षये ब्रह्मस्ततः साचिन्तयत् तदा ।
वासुकेर्भगिनी भीता धर्मलोपान्मनस्विनी ॥ १६ ॥
किं नु मे सुकृतं भूयाद् भर्तुरुत्थापनं न वा ।
दुःखशीलो हि धर्मात्मा कथं नास्यापराध्नुयाम् ॥ १७ ॥
ब्रह्मन् ! दिन समाप्त होने ही वाला था। अतः वासुकिकी मनस्विनी बहिन जरत्कारु अपने पतिके धर्मलोपसे भयभीत हो उस समय इस प्रकार सोचने लगी- ‘इस समय पतिको जगाना मेरे लिये अच्छा (धर्मानुकूल) होगा या नहीं? मेरे धर्मात्मा पतिका स्वभाव बड़ा दुःखद है। मैं कैसा बर्ताव करूँ, जिससे उनकी दृष्टिमें अपराधिनी न बनूँ ॥ १६-१७ ॥
कोपो वा धर्मशीलस्य धर्मलोपोऽथवा पुनः ।
धर्मलोपो गरीयान् वै स्यादित्यत्राकरोन्मतिम् ॥ १८ ॥
उत्थापयिष्ये यद्येनं ध्रुवं कोपं करिष्यति ।
धर्मलोपो भवेदस्य संध्यातिक्रमणे ध्रुवम् ॥ १९ ॥
‘यदि इन्हें जगाऊँगी तो निश्चय ही इन्हें मुझपर क्रोध होगा और यदि सोते सोते संध्योपासनका समय बीत गया तो अवश्य इनके धर्मका लोप हो जायगा, ऐसी दशामें धर्मात्मा पतिका कोप स्वीकार करूँ या उनके धर्मका लोप? इन दोनोंमें धर्मका लोप ही भारी जान पड़ता है।’ अतः जिससे उनके धर्मका लोप न हो, वही कार्य करनेका उसने निश्चय किया ॥ १८-१९ ॥
इति निश्चित्य मनसा जरत्कारुर्भुजङ्गमा ।
तमृषिं दीप्ततपसं शयानमनलोपमम् ॥ २० ॥
उवाचेदं वचः श्लक्ष्णं ततो मधुरभाषिणी ।
उत्तिष्ठ त्वं महाभाग सूर्योऽस्तमुपगच्छति ॥ २१ ॥
मन-ही-मन ऐसा निश्चय करके मीठे वचन बोलनेवाली नागकन्या जरत्कारुने वहाँ सोते हुए अग्निके समान तेजस्वी एवं तीव्र तपस्वी महर्षिसे मधुरवाणीमें यों कहा- ‘महाभाग ! उठिये, सूर्यदेव अस्ताचलको जा रहे हैं ॥ २०-२१ ॥
संध्यामुपास्स्व भगवन्नपः स्पृष्ट्वा यतव्रतः ।
प्रादुष्कृताग्निहोत्रोऽयं मुहूर्तो रम्यदारुणः ॥ २२ ॥
संध्या प्रवर्तते चेयं पश्चिमायां दिशि प्रभो ।
‘भगवन्! आप संयमपूर्वक आचमन करके संध्योपासन कीजिये। अब अग्निहोत्रकी बेला हो रही है। यह मुहूर्त धर्मका साधन होनेके कारण अत्यन्त रमणीय जान पड़ता है। इसमें भूत आदि प्राणी विचरते हैं, अतः भयंकर भी है। प्रभो! पश्चिम दिशामें संध्या प्रकट हो रही है-उधरका आकाश लाल हो रहा है’ ॥ २२/३ ॥(Adi Parva Chapter 47 to 51)
एवमुक्तः स भगवान् जरत्कारुर्महातपाः ॥ २३ ॥
भार्यं प्रस्फुरमाणौष्ठ इदं वचनमब्रवीत् ।
अवमानः प्रयुक्तोऽयं त्वया मम भुजङ्गमे ॥ २४ ॥
नागकन्याके ऐसा कहनेपर महातपस्वी भगवान् जरत्कारु जाग उठे। उस समय क्रोधके मारे उनके होठ काँपने लगे। वे इस प्रकार बोले- ‘नागकन्ये! तूने मेरा यह अपमान किया है ॥ २३-२४ ॥
समीपे ते न वत्स्यामि गमिष्यामि यथागतम् ।
शक्तिरस्ति न वामोरु मयि सुप्ते विभावसोः ॥ २५ ॥
अस्तं गन्तुं यथाकालमिति मे हृदि वर्तते ।
न चाप्यवमतस्येह वासो रोचेत कस्यचित् ॥ २६ ॥
किं पुनर्धर्मशीलस्य मम वा मद्विधस्य वा ।
‘इसलिये अब मैं तेरे पास नहीं रहूँगा। जैसे आया हूँ, वैसे ही चला जाऊँगा। वामोरु ! सूर्यमें इतनी शक्ति नहीं है कि मैं सोता रहूँ और वे अस्त हो जायँ। यह मेरे हृदयमें निश्चय है। जिसका कहीं अपमान हो जाय ऐसे किसी भी पुरुषको वहाँ रहना अच्छा नहीं लगता। फिर मेरी अथवा मेरे-जैसे दूसरे धर्मशील पुरुषकी तो बात ही क्या है’ ॥ २५-२६/३ ॥
एवमुक्ता जरत्कारुर्भर्त्रा हृदयकम्पनम् ॥ २७ ॥
अब्रवीद् भगिनी तत्र वासुकेः संनिवेशने ।
नावमानात् कृतवती तवाहं विप्र बोधनम् ॥ २८ ॥
धर्मलोपो न ते विप्र स्यादित्येतन्मया कृतम् ।
उवाच भार्यामित्युक्तो जरत्कारुर्महातपाः ॥ २९ ॥
ऋषिः कोपसमाविष्टस्त्यक्तुकामो भुजङ्गमाम् ।
न मे वागनृतं प्राह गमिष्येऽहं भुजङ्गमे ॥ ३० ॥
जब पतिने इस प्रकार हृदयमें कँपकँपी पैदा करनेवाली बात कही, तब उस घरमें स्थित वासुकिकी बहिन इस प्रकार बोली- ‘विप्रवर ! मैंने अपमान करनेके लिये आपको नहीं जगाया था। आपके धर्मका लोप न हो जाय, यही ध्यानमें रखकर मैंने ऐसा किया है।’ यह सुनकर क्रोधमें भरे हुए महातपस्वी ऋषि जरत्कारुने अपनी पत्नी नागकन्याको त्याग देनेकी इच्छा रखकर उससे कहा- ‘नागकन्ये! मैंने कभी झूठी बात मुँहसे नहीं निकाली है, अतः अवश्य जाऊँगा’ ॥ २७-३० ॥
समयो ह्येष मे पूर्व त्वया सह मिथः कृतः ।
सुखमस्म्युषितो भद्रे ब्रूयास्त्वं भ्रातरं शुभे ॥ ३१ ॥
इतो मयि गते भीरु गतः स भगवानिति ।
त्वं चापि मयि निष्क्रान्ते न शोकं कर्तुमर्हसि ॥ ३२ ॥
‘मैंने तुम्हारे साथ आपसमें पहले ही ऐसी शर्त कर ली थी। भद्रे ! मैं यहाँ बड़े सुखसे रहा हूँ। यहाँसे मेरे चले जानेके बाद अपने भाईसे कहना- ‘भगवान् जरत्कारु चले गये।’ शुभे ! भीरु ! मेरे निकल जानेपर तुम्हें भी शोक नहीं करना चाहिये’ ॥ ३१-३२ ॥
इत्युक्ता सानवद्याङ्गी प्रत्युवाच मुनिं तदा ।
जरत्कारुं जरत्कारुश्चिन्ताशोकपरायणा ॥ ३३ ॥
बाष्पगद्गदया वाचा मुखेन परिशुष्यता ।
कृताञ्जलिर्वरारोहा पर्यश्रुनयना ततः ॥ ३४ ॥
धैर्यमालम्ब्य वामोरुहृदयेन प्रवेपता ।
न मामर्हसि धर्मज्ञ परित्यक्तुमनागसम् ॥ ३५ ॥
धर्मे स्थितां स्थितो धर्मे सदा प्रियहिते रताम् ।
प्रदाने कारणं यच्च मम तुभ्यं द्विजोत्तम ॥ ३६ ॥
तदलब्धवतीं मन्दां किं मां वक्ष्यति वासुकिः ।
मातृशापाभिभूतानां ज्ञातीनां मम सत्तम ॥ ३७ ॥
अपत्यमीप्सितं त्वत्तस्तच्च तावन्न दृश्यते ।
त्वत्तो ह्यपत्यलाभेन ज्ञातीनां मे शिवं भवेत् ॥ ३८ ॥
उनके ऐसा कहनेपर अनिन्द्य सुन्दरी जरत्कारु भाईके कार्यकी चिन्ता और पतिके वियोगजनित शोकमें डूब गयी। उसका मुँह सूख गया, नेत्रोंमें आँसू छलक आये और हृदय काँपने लगा। फिर किसी प्रकार धैर्य धारण करके सुन्दर जाँघों और मनोहर शरीरवाली वह नागकन्या हाथ जोड़ गद्गद वाणीमें जरत्कारु मुनिसे बोली- ‘धर्मज्ञ ! आप सदा धर्ममें स्थित रहनेवाले हैं। मैं भी पत्नी-धर्ममें स्थित तथा आप प्रियतमके हितमें लगी रहनेवाली हूँ। आपको मुझ निरपराध अबलाका त्याग नहीं करना चाहिये। द्विजश्रेष्ठ ! मेरे भाईने जिस उद्देश्यको लेकर आपके साथ मेरा विवाह किया था, मैं मन्दभागिनी अबतक उसे पा न सकी। नागराज वासुकि मुझसे क्या कहेंगे? साधुशिरोमणे ! मेरे कुटुम्बीजन माताके शापसे दबे हुए हैं। उन्हें मेरे द्वारा आपसे एक संतानकी प्राप्ति अभीष्ट थी, किंतु उसका भी अबतक दर्शन नहीं हुआ। आपसे पुत्रकी प्राप्ति हो जाय तो उसके द्वारा मेरे जाति-भाइयोंका कल्याण हो सकता है ॥ ३३-३८ ॥
सम्प्रयोगो भवेन्नायं मम मोघस्त्वया द्विज ।
ज्ञातीनां हितमिच्छन्ती भगवंस्त्वां प्रसादये ॥ ३९ ॥
‘ब्रह्मन् ! आपसे जो मेरा सम्बन्ध हुआ, वह व्यर्थ नहीं जाना चाहिये। भगवन्! अपने बान्धवजनोंका हित चाहती हुई मैं आपसे प्रसन्न होनेकी प्रार्थना करती हूँ ॥ ३९ ॥(Adi Parva Chapter 47 to 51)
इममव्यक्तरूपं में गर्भमाधाय सत्तम ।
कथं त्यक्त्वा महात्मा सन् गन्तुमिच्छस्यनागसम् ॥ ४० ॥
‘महाभाग! आपने जो गर्भ स्थापित किया है, उसका स्वरूप या लक्षण अभी प्रकट नहीं हुआ। महात्मा होकर ऐसी दशामें आप मुझ निरपराध पत्नीको त्यागकर कैसे जाना चाहते हैं?’ ॥ ४० ॥
एवमुक्तस्तु स मुनिर्भार्या वचनमब्रवीत् ।
यद् युक्तमनुरूपं च जरत्कारुं तपोधनः ॥ ४१ ॥
यह सुनकर उन तपोधन महर्षिने अपनी पत्नी जरत्कारुसे उचित तथा अवसरके अनुरूप बात कही- ॥ ४१ ॥
अस्त्ययं सुभगे गर्भस्तव वैश्वानरोपमः ।
ऋषिः परमधर्मात्मा वेदवेदाङ्गपारगः ॥ ४२ ॥
सुभगे ! ‘अयं अस्ति’- तुम्हारे उदरमें गर्भ है। तुम्हारा यह गर्भस्थ बालक अग्निके समान तेजस्वी, परम धर्मात्मा मुनि तथा वेद-वेदांगोंका पारंगत विद्वान् होगा’ ॥ ४२ ॥
एवमुक्त्वा स धर्मात्मा जरत्कारुर्महानृषिः ।
उग्राय तपसे भूयो जगाम कृतनिश्चयः ॥ ४३ ॥
ऐसा कहकर धर्मात्मा महामुनि जरत्कारु, जिन्होंने जानेका दृढ़ निश्चय कर लिया था, फिर कठोर तपस्याके लिये वनमें चले गये ॥ ४३ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि जरत्कारुनिर्गमे सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत आस्तीकपर्वमें जरत्कारुका तपस्याके लिये निष्क्रमणविषयक सैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४७ ॥
अड़तालीसवाँ अध्याय
वासुकि नागकी चिन्ता, बहिनद्वारा उसका निवारण तथा आस्तीकका जन्म एवं विद्याध्ययन
सौतिरुवाच
गतमात्रं तु भर्तारं जरत्कारुरवेदयत् ।
भ्रातुः सकाशमागत्य याथातथ्यं तपोधन ॥ १ ॥
उग्रश्रवाजी कहते हैं- तपोधन शौनक ! पतिके निकलते ही नागकन्या जरत्कारुने अपने भाई वासुकिके पास जाकर उनके चले जानेका सब हाल ज्यों-का-त्यों सुना दिया ॥ १ ॥
ततः स भुजगश्रेष्ठः श्रुत्वा सुमहदप्रियम् ।
उवाच भगिनीं दीनां तदा दीनतरः स्वयम् ॥ २ ॥
यह अत्यन्त अप्रिय समाचार सुनकर सर्पोंमें श्रेष्ठ वासुकि स्वयं भी बहुत दुःखी हो गये और दुःखमें पड़ी हुई अपनी बहिनसे बोले ॥ २ ॥
वासुकिरुवाच
जानासि भद्रे यत् कार्यं प्रदाने कारणं च यत् ।
पन्नगानां हितार्थाय पुत्रस्ते स्यात् ततो यदि ॥ ३ ॥
वासुकिने कहा-भद्रे ! सर्पोंका जो महान् कार्य है और मुनिके साथ तुम्हारा विवाह होनेमें जो उद्देश्य रहा है, उसे तो तुम जानती ही हो। यदि उनके द्वारा तुम्हारे गर्भसे कोई पुत्र उत्पन्न हो जाता तो उससे सर्पोंका बहुत बड़ा हित होता ॥ ३ ॥
स सर्पसत्रात् किल नो मोक्षयिष्यति वीर्यवान् ।
एवं पितामहः पूर्वमुक्तवांस्तु सुरैः सह ॥ ४ ॥
वह शक्तिशाली मुनिकुमार ही हमलोगोंको जनमेजयके सर्पयज्ञमें जलनेसे बचायेगा; यह बात पहले देवताओंके साथ भगवान् ब्रह्माजीने कही थी ॥ ४ ॥(Adi Parva Chapter 47 to 51)
अप्यस्ति गर्भः सुभगे तस्मात् ते मुनिसत्तमात् ।
न चेच्छाम्यफलं तस्य दारकर्म मनीषिणः ॥ ५ ॥
कार्यं च मम न न्याय्यं प्रष्टुं त्वां कार्यमीदृशम्।
किंतु कार्यगरीयस्त्वात् ततस्त्वाहमचूचुदम् ॥ ६ ॥
सुभगे ! क्या उन मुनिश्रेष्ठसे तुम्हें गर्भ रह गया है? तुम्हारे साथ उन मनीषी महात्माका विवाह-कर्म निष्फल हो, यह मैं नहीं चाहता। मैं तुम्हारा भाई हूँ, ऐसे कार्य (पुत्रोत्पत्ति)-के विषयमें तुमसे कुछ पूछना मेरे लिये उचित नहीं है, परंतु कार्यके गौरवका विचार करके मैंने तुम्हें इस विषयमें सब बातें बतानेके लिये प्रेरित किया है ॥ ५-६ ॥
दुर्वार्यतां विदित्वा च भर्तुस्तेऽतितपस्विनः ।
नैनमन्वागमिष्यामि कदाचिद्धि शपेत् स माम् ॥ ७ ॥
तुम्हारे महातपस्वी पतिको जानेसे रोकना किसीके लिये भी अत्यन्त कठिन है, यह जानकर मैं उन्हें लौटा लानेके लिये उनके पीछे नहीं जा रहा हूँ। लौटनेका आग्रह करूँ तो कदाचित् वे मुझे शाप भी दे सकते हैं ॥ ७ ॥
आचक्ष्व भद्रे भर्तुः स्वं सर्वमेव विचेष्टितम् ।
उद्धरस्व च शल्यं में घोरं हृदि चिरस्थितम् ॥ ८ ॥
अतः भद्रे ! तुम अपने पतिकी सारी चेष्टा बताओ और मेरे हृदयमें दीर्घकालसे जो भयंकर काँटा चुभा हुआ है, उसे निकाल दो ॥ ८ ॥
जरत्कारुस्ततो वाक्यमित्युक्ता प्रत्यभाषत ।
आश्वासयन्ती संतप्तं वासुकिं पन्नगेश्वरम् ॥ ९ ॥
भाईके इस प्रकार पूछनेपर तब जरत्कारु अपने संतप्त भ्राता नागराज वासुकिको धीरज बँधाती हुई इस प्रकार बोली ॥ ९ ॥
जरत्कारुरुवाच
पृष्टो मयापत्यहेतोः स महात्मा महातपाः ।
अस्तीत्युत्तरमुद्दिश्य ममेदं गतवांश्च सः ॥ १० ॥
जरत्कारुने कहा- भाई! मैंने संतानके लिये उन महातपस्वी महात्मासे पूछा था। मेरे गर्भके विषयमें ‘अस्ति’ (तुम्हारे गर्भमें पुत्र है) इतना ही कहकर वे चले गये ॥ १० ॥
स्वैरेष्वपि न तेनाहं स्मरामि वितथं वचः ।
उक्तपूर्व कुतो राजन् साम्पराये स वक्ष्यति ॥ ११ ॥
न संतापस्त्वया कार्यः कार्यं प्रति भुजङ्गमे ।
उत्पत्स्यति च ते पुत्रो ज्वलनार्कसमप्रभः ॥ १२ ॥
इत्युक्त्वा स हि मां भ्रातर्गतो भर्ता तपोधनः ।
तस्माद् व्येतु परं दुःखं तवेदं मनसि स्थितम् ॥ १३ ॥
राजन् ! उन्होंने पहले कभी विनोदमें भी झूठी बात कही हो, यह मुझे स्मरण नहीं है। फिर इस संकटके समय तो वे झूठ बोलेंगे ही क्यों? भैया! मेरे पति तपस्याके धनी हैं। उन्होंने जाते समय मुझसे यह कहा- ‘नागकन्ये! तुम अपनी कार्य-सिद्धिके सम्बन्धमें कोई चिन्ता न करना। तुम्हारे गर्भसे अग्नि और सूर्यके समान तेजस्वी पुत्र उत्पन्न होगा।’ इतना कहकर वे तपोवनमें चले गये। अतः भैया ! तुम्हारे मनमें जो महान् दुःख है, वह दूर हो जाना चाहिये ॥ ११-१३ ॥(Adi Parva Chapter 47 to 51)
सौतिरुवाच
एतच्छ्रुत्वा स नागेन्द्रो वासुकिः परया मुदा ।
एवर्मास्त्वति तद् वाक्यं भगिन्याः प्रत्यगृह्णत ॥ १४ ॥
उग्रश्रवाजी कहते हैं- शौनक ! यह सुनकर नागराज वासुकि बड़ी प्रसन्नतासे बोले – ‘एवमस्तु’ (ऐसा ही हो)। इस प्रकार उन्होंने बहिनकी बातको विश्वासपूर्वक ग्रहण किया ॥ १४ ॥
सान्त्वमानार्थदानैश्च पूजया चानुरूपया ।
सोदर्या पूजयामास स्वसारं पन्नगोत्तमः ॥ १५ ॥
सर्पोंमें श्रेष्ठ वासुकि अपनी सहोदरा बहिनको सान्त्वना, सम्मान तथा धन देकर एवं सुन्दररूपसे उसका स्वागत-सत्कार करके उसकी समाराधना करने लगे ॥ १५ ॥
ततः प्रववृधे गर्भो महातेजा महाप्रभः ।
यथा सोमो द्विजश्रेष्ठ शुक्लपक्षोदितो दिवि ॥ १६ ॥
द्विजश्रेष्ठ ! जैसे शुक्लपक्षमें आकाशमें उदित होनेवाला चन्द्रमा प्रतिदिन बढ़ता है, उसी प्रकार जरत्कारुका वह महातेजस्वी और परम कान्तिमान् गर्भ बढ़ने लगा ॥ १६ ॥
अथ काले तु सा ब्रह्मन् प्रजज्ञे भुजगस्वसा ।
कुमारं देवगर्भाभं पितृमातृभयापहम् ॥ १७ ॥
ब्रह्मन् ! तदनन्तर समय आनेपर वासुकिकी बहिनने एक दिव्य कुमारको जन्म दिया, जो देवताओंके बालक-सा तेजस्वी जान पड़ता था। वह पिता और माता- दोनों पक्षोंके भयको नष्ट करनेवाला था ॥ १७ ॥
ववृधे स तु तत्रैव नागराजनिवेशने ।
वेदांश्चाधिजगे साङ्गान् भार्गवाच्च्यवनान्मुनेः ॥ १८ ॥
वह वहीं नागराजके भवनमें बढ़ने लगा। बड़े होनेपर उसने भृगुकुलोत्पन्न च्यवन मुनिसे छहों अंगोंसहित वेदोंका अध्ययन किया ॥ १८ ॥
चीर्णव्रतो बाल एव बुद्धिसत्त्वगुणान्वितः ।
नाम चास्याभवत् ख्यातं लोकेष्वास्तीक इत्युत ॥ १९ ॥
वह बचपनसे ही ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करनेवाला, बुद्धिमान् तथा सत्त्वगुणसम्पन्न हुआ। लोकमें आस्तीक नामसे उसकी ख्याति हुई ॥ १९ ॥
अस्तीत्युक्त्वा गतो यस्मात् पिता गर्भस्थमेव तम् ।
वनं तस्मादिदं तस्य नामास्तीकेति विश्रुतम् ॥ २० ॥
वह बालक अभी गर्भमें ही था, तभी उसके पिता ‘अस्ति’ कहकर वनमें चले गये थे। इसलिये संसारमें उसका आस्तीक नाम प्रसिद्ध हुआ ॥ २० ॥(Adi Parva Chapter 47 to 51)
स बाल एव तत्रस्थश्चरन्नमितबुद्धिमान् ।
गृहे पन्नगराजस्य प्रयत्नात् परिरक्षितः ॥ २१ ॥
भगवानिव देवेशः शूलपाणिर्हिरण्मयः ।
विवर्धमानः सर्वास्तान् पन्नगानभ्यहर्षयत् ॥ २२ ॥
अमित बुद्धिमान् आस्तीक बाल्यावस्थामें ही वहाँ रहकर ब्रह्मचर्यका पालन एवं धर्मका आचरण करने लगा। नागराजके भवनमें उसका भलीभाँति यत्नपूर्वक लालन-पालन किया गया। सुवर्णके समान कान्तिमान् शूलपाणि देवेश्वर भगवान् शिवकी भाँति वह बालक दिनोदिन बढ़ता हुआ समस्त नागोंका आनन्द बढ़ाने लगा ॥ २१-२२ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि आस्तीकोत्पत्तौ अष्टचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत आस्तीकपर्वमें आस्तीककी उत्पत्तिविषयक अड़तालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४८ ॥
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उनचासवाँ अध्याय
राजा परीक्षित्के धर्ममय आचार तथा उत्तम गुणोंका वर्णन, राजाका शिकारके लिये जाना और उनके द्वारा शमीक मुनिका तिरस्कार
शौनक उवाच
यदपृच्छत् तदा राजा मन्त्रिणो जनमेजयः ।
पितुः स्वर्गगतिं तन्मे विस्तरेण पुनर्वद ॥ १ ॥
शौनकजी बोले- सूतनन्दन ! राजा जनमेजयने (उत्तंककी बात सुनकर) अपने पिता परीक्षित्के स्वर्गवासके सम्बन्धमें मन्त्रियोंसे जो पूछ-ताछ की थी, उसका आप विस्तारपूर्वक पुनः वर्णन कीजिये ॥ १ ॥
सौतिरुवाच
शृणु ब्रह्मन् यथापृच्छन्मन्त्रिणो नृपतिस्तदा ।
यथा चाख्यातवन्तस्ते निधनं तत् परीक्षितः ॥ २ ॥
उग्रश्रवाजीने कहा- ब्रह्मन् ! सुनिये, उस समय राजाने मन्त्रियोंसे जो कुछ पूछा और उन्होंने परीक्षित्की मृत्युके सम्बन्धमें जैसी बातें बतायीं, वह सब मैं सुना रहा हूँ ॥ २ ॥
जनमेजय उवाच
जानन्ति स्म भवन्तस्तद् यथा वृत्तं पितुर्मम ।
आसीद् यथा स निधनं गतः काले महायशाः ॥ ३ ॥
जनमेजयने पूछा- आपलोग यह जानते होंगे कि मेरे पिताके जीवनकालमें उनका आचार-व्यवहार कैसा था? और अन्तकाल आनेपर वे महायशस्वी नरेश किस प्रकार मृत्युको प्राप्त हुए थे? ॥ ३ ॥
श्रुत्वा भवत्सकाशाद्धि पितुर्वृत्तमशेषतः ।
कल्याणं प्रतिपत्स्यामि विपरीतं न जातुचित् ॥ ४ ॥
आपलोगोंसे अपने पिताके सम्बन्धमें सारा वृत्तान्त सुनकर ही मुझे शान्ति प्राप्त होगी; अन्यथा मैं कभी शान्त न रह सकूँगा ॥ ४ ॥
सौतिरुवाच
मन्त्रिणोऽथाब्रुवन् वाक्यं पृष्टास्तेन महात्मना ।
सर्वे धर्मविदः प्राज्ञा राजानं जनमेजयम् ॥ ५ ॥
उग्रश्रवाजी कहते हैं- राजाके सब मन्त्री धर्मज्ञ और बुद्धिमान् थे। उन महात्मा राजा जनमेजयके इस प्रकार पूछनेपर वे सभी उनसे यों बोले ॥ ५ ॥
मन्त्रिण ऊचुः
शृणु पार्थिव यद् ब्रूषे पितुस्तव महात्मनः ।
चरितं पार्थिवेन्द्रस्य यथा निष्ठां गतश्च सः ॥ ६ ॥
मन्त्रियोंने कहा- भूपाल ! तुम जो कुछ पूछते हो, वह सुनो। तुम्हारे महात्मा पिता राजराजेश्वर परीक्षित्का चरित्र जैसा था और जिस प्रकार वे मृत्युको प्राप्त हुए वह सब हम बता रहे हैं ॥ ६ ॥
धर्मात्मा च महात्मा च प्रजापालः पिता तव ।
आसीदिह यथावृत्तः स महात्मा शृणुष्व तत् ॥ ७ ॥
महाराज ! आपके पिता बड़े धर्मात्मा, महात्मा और प्रजापालक थे। वे महामना नरेश इस जगत्में जैसे आचार-व्यवहारका पालन करते थे, वह सुनो ॥ ७ ॥
चातुर्वर्ण्य स्वधर्मस्थं स कृत्वा पर्यरक्षत ।
धर्मतो धर्मविद् राजा धर्मो विग्रहवानिव ॥ ८ ॥
वे चारों वर्णोंको अपने-अपने धर्ममें स्थापित करके उन सबकी धर्मपूर्वक रक्षा करते थे। राजा परीक्षित् केवल धर्मके ज्ञाता ही नहीं थे, वे धर्मके साक्षात् स्वरूप थे ॥ ८ ॥
ररक्ष पृथिवीं देवीं श्रीमानतुलविक्रमः ।
द्वेष्टारस्तस्य नैवासन् स च द्वेष्टि न कंचन ॥ ९ ॥
उनके पराक्रमकी कहीं तुलना नहीं थी। वे श्रीसम्पन्न होकर इस वसुधादेवीका पालन करते थे। जगत्में उनसे द्वेष रखनेवाले कोई न थे और वे भी किसीसे द्वेष नहीं रखते थे ॥ ९ ॥
समः सर्वेषु भूतेषु प्रजापतिरिवाभवत् ।
ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्चैव स्वकर्मसु ॥ १० ॥
स्थिताः सुमनसो राजंस्तेन राज्ञा स्वधिष्ठिताः ।
विधवानाथविकलान् कृपणांश्च बभार सः ॥ ११ ॥
प्रजापति ब्रह्माजीके समान वे समस्त प्राणियोंके प्रति समभाव रखते थे। राजन् ! महाराज परीक्षित्के शासनमें रहकर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र सभी अपने-अपने वर्णाश्रमोचित कर्मोंमें संलग्न और प्रसन्नचित्त रहते थे। वे महाराज विधवाओं, अनाथों, अंगहीनों और दीनोंका भी भरण-पोषण करते थे ॥ १०-११ ॥(Adi Parva Chapter 47 to 51)
सुदर्शः सर्वभूतानामासीत् सोम इवापरः ।
तुष्टपुष्टजनः श्रीमान् सत्यवाग् दृढविक्रमः ॥ १२ ॥
दूसरे चन्द्रमाकी भाँति उनका दर्शन सम्पूर्ण प्राणियोंके लिये सुखद एवं सुलभ था। उनके राज्यमें सब लोग हृष्ट-पुष्ट थे। वे लक्ष्मीवान्, सत्यवादी तथा अटल पराक्रमी थे ॥ १२ ॥
धनुर्वेदे तु शिष्योऽभून्नृपः शारद्वतस्य सः ।
गोविन्दस्य प्रियश्चासीत् पिता ते जनमेजय ॥ १३ ॥
राजा परीक्षित् धनुर्वेदमें कृपाचार्यके शिष्य थे। जनमेजय ! तुम्हारे पिता भगवान् श्रीकृष्णके भी प्रिय थे ॥ १३ ॥
लोकस्य चैव सर्वस्य प्रिय आसीन्महायशाः ।
परिक्षीणेषु कुरुषु सोत्तरायामजीजनत् ॥ १४ ॥
परीक्षिदभवत् तेन सौभद्रस्यात्मजो बली ।
राजधर्मार्थकुशलो युक्तः सर्वगुणैर्वृतः ॥ १५ ॥
वे महायशस्वी महाराज सम्पूर्ण जगत्के प्रेमपात्र थे। जब कुरुकुल परिक्षीण (सर्वथा नष्ट) हो चला था, उस समय उत्तराके गर्भसे उनका जन्म हुआ। इसलिये वे महाबली अभिमन्युकुमार परीक्षित् नामसे विख्यात हुए। राजधर्म और अर्थनीतिमें वे अत्यन्त निपुण थे। समस्त सद्गुणोंने स्वयं उनका वरण किया था। वे सदा उनसे संयुक्त रहते थे ॥ १४-१५ ॥
जितेन्द्रियश्चात्मवांश्च मेधावी धर्मसेविता ।
षड्वर्गजिन्महाबुद्धिर्नीतिशास्त्रविदुत्तमः ॥ १६ ॥
उन्होंने अपनी इन्द्रियोंको जीतकर मनको अपने वशमें कर रखा था। वे मेधावी तथा धर्मका सेवन करनेवाले थे। उन्होंने काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मात्सर्य- इन छहों शत्रुओंपर विजय प्राप्त कर ली थी। उनकी बुद्धि विशाल थी। वे नीतिके विद्वानोंमें सर्वश्रेष्ठ थे ॥ १६ ॥
प्रजा इमास्तव पिता षष्टिवर्षाण्यपालयत् ।
ततो दिष्टान्तमापन्नः सर्वेषां दुःखमावहन् ॥ १७ ॥
ततस्त्वं पुरुषश्रेष्ठ धर्मेण प्रतिपेदिवान् ।
इदं वर्षसहस्राणि राज्यं कुरुकुलागतम् ।
बाल एवाभिषिक्तस्त्वं सर्वभूतानुपालकः ॥ १८ ॥
तुम्हारे पिताने साठ वर्षकी आयुतक इन समस्त प्रजाजनोंका पालन किया था। तदनन्तर हम सबको दुःख देकर उन्होंने विदेह-कैवल्य प्राप्त किया। पुरुषश्रेष्ठ ! पिताके देहावसानके बाद तुमने धर्मपूर्वक इस राज्यको ग्रहण किया है, जो सहस्रों वर्षोंसे कुरुकुलके अधीन चला आ रहा है। बाल्यावस्थामें ही तुम्हारा राज्याभिषेक हुआ था। तबसे तुम्हीं इस राज्यके समस्त प्राणियोंका पालन करते हो ॥ १७-१८ ॥
जनमेजय उवाच
नास्मिन् कुले जातु बभूव राजा यो न प्रजानां प्रियकृत् प्रियश्च ।
विशेषतः प्रेक्ष्य पितामहानां वृत्तं महवृत्तपरायणानाम् ॥ १९ ॥
जनमेजयने पूछा- मन्त्रियो ! हमारे इस कुलमें कभी कोई ऐसा राजा नहीं हुआ, जो प्रजाका प्रिय करनेवाला तथा सब लोगोंका प्रेमपात्र न रहा हो। विशेषतः महापुरुषोंके आचारमें प्रवृत्त रहनेवाले हमारे प्रपितामह पाण्डवोंके सदाचारको देखकर प्रायः सभी धर्मपरायण ही होंगे ॥ १९ ॥
कथं निधनमापन्नः पिता मम तथाविधः ।
आचक्षध्वं यथावन्मे श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥ २० ॥
अब मैं यह जानना चाहता हूँ कि मेरे वैसे धर्मात्मा पिताकी मृत्यु किस प्रकार हुई? आपलोग मुझसे इसका यथावत् वर्णन करें। मैं इस विषयमें सब बातें ठीक-ठीक सुनना चाहता हूँ ॥ २० ॥
सौतिरुवाच
एवं संचोदिता राज्ञा मन्त्रिणस्ते नराधिपम् ।
ऊचुः सर्वे यथावृत्तं राज्ञः प्रियहितैषिणः ॥ २१ ॥
उग्रश्रवाजी कहते हैं- शौनक ! राजा जनमेजयके इस प्रकार पूछनेपर उन मन्त्रियोंने महाराजसे सब वृत्तान्त ठीक-ठीक बताया; क्योंकि वे सभी राजाका प्रिय चाहनेवाले और हितैषी थे ॥ २१ ॥
मन्त्रिण ऊचुः
स राजा पृथिवीपालः सर्वशस्त्रभृतां वरः ।
बभूव मृगयाशीलस्तव राजन् पिता सदा ॥ २२ ॥
यथा पाण्डुर्महाबाहुर्धनुर्धरवरो युधि ।
अस्मास्वासज्य सर्वाणि राजकार्याण्यशेषतः ॥ २३ ॥
स कदाचिद् वनगतो मृगं विव्याध पत्रिणा ।
विद्ध्वा चान्वसरत् तूर्णं तं मृगं गहने वने ॥ २४ ॥
मन्त्री बोले- राजन् ! समस्त शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ तुम्हारे पिता भूपाल परीक्षित्का सदा महाबाहु पाण्डुकी भाँति हिंसक पशुओंको मारनेका स्वभाव था और युद्धमें वे उन्हींकी भाँति सम्पूर्ण धनुर्धर वीरोंमें श्रेष्ठ सिद्ध होते थे। एक दिनकी बात है, वे सम्पूर्ण राजकार्यका भार हमलोगोंपर रखकर वनमें शिकार खेलनेके लिये गये। वहाँ उन्होंने पंखयुक्त बाणसे एक हिंसक पशुको बींध डाला। बींधकर तुरंत ही गहन वनमें उसका पीछा किया ॥ २२-२४ ॥
पदातिर्बद्धनिस्त्रिंशस्ततायुधकलापवान् ।
न चाससाद गहने मृगं नष्टं पिता तव ॥ २५ ॥
वे तलवार बाँधे पैदल ही चल रहे थे। उनके पास बाणोंसे भरा हुआ विशाल तूणीर था। वह घायल पशु उस घने वनमें कहीं छिप गया। तुम्हारे पिता बहुत खोजनेपर भी उसे पा न सके ॥ २५ ॥
परिश्रान्तो वयःस्थश्च षष्टिवर्षो जरान्वितः ।
क्षुधितः स महारण्ये ददर्श मुनिसत्तमम् ॥ २६ ॥
स तं पप्रच्छ राजेन्द्रो मुनिं मौनव्रते स्थितम् ।
न च किंचिदुवाचैनं पृष्टोऽपि स मुनिस्तदा ॥ २७ ॥
प्रौढ़ अवस्था, साठ वर्षकी आयु और बुढ़ापेका संयोग इन सबके कारण वे बहुत थक गये थे। उस विशाल वनमें उन्हें भूख सताने लगी। इसी दशामें महाराजने वहाँ मुनिश्रेष्ठ शमीकको देखा। राजेन्द्र परीक्षित्ने उनसे मृगका पता पूछा; किंतु वे मुनि उस समय मौनव्रतके पालनमें संलग्न थे। उनके पूछनेपर भी महर्षि शमीक उस समय कुछ न बोले ॥ २६-२७ ॥
ततो राजा क्षुच्छ्रमार्तस्तं मुनिं स्थाणुवत् स्थितम् ।
मौनव्रतधरं शान्तं सद्यो मन्युवशं गतः ॥ २८ ॥
वे काठकी भाँति चुपचाप, निश्चेष्ट एवं अविचल भावसे स्थित थे। यह देख भूख-प्यास और थकावटसे व्याकुल हुए राजा परीक्षित्को उन मौनव्रतधारी शान्त महर्षिपर तत्काल क्रोध आ गया ॥ २८ ॥
न बुबोध च तं राजा मौनव्रतधरं मुनिम् ।
स तं क्रोधसमाविष्टो धर्षयामास ते पिता ॥ २९ ॥
राजाको यह पता नहीं था कि महर्षि मौनव्रतधारी हैं; अतः क्रोधमें भरे हुए आपके पिताने उनका तिरस्कार कर दिया ॥ २९ ॥(Adi Parva Chapter 47 to 51)
मृतं सर्प धनुष्कोट्या समुत्क्षिप्य धरातलात् ।
तस्य शुद्धात्मनः प्रादात् स्कन्धे भरतसत्तम ॥ ३० ॥
भरतश्रेष्ठ ! उन्होंने धनुषकी नोकसे पृथ्वीपर पड़े हुए एक मृत सर्पको उठाकर उन शुद्धात्मा महर्षिके कंधेपर डाल दिया ॥ ३० ॥
न चोवाच स मेधावी तमथो साध्वसाधु वा ।
तस्थौ तथैव चाक्रुद्धः सर्प स्कन्धेन धारयन् ॥ ३१ ॥
किंतु उन मेधावी मुनिने इसके लिये उन्हें भला या बुरा कुछ नहीं कहा। वे क्रोधरहित हो कंधेपर मरा सर्प लिये हुए पूर्ववत् शान्त-भावसे बैठे रहे ॥ ३१ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि पारीक्षितीये एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ४९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत आस्तीकपर्वमें परीक्षित्-चरित्रविषयक उनचासवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४९ ॥
पचासवाँ अध्याय
शृंगी ऋषिका परीक्षित्को शाप, तक्षकका काश्यपको लौटाकर छलसे परीक्षित्को हँसना और पिताकी मृत्युका वृत्तान्त सुनकर जनमेजयकी तक्षकसे बदला लेनेकी प्रतिज्ञा
मन्त्रिण ऊचुः
ततः स राजा राजेन्द्र स्कन्धे तस्य भुजङ्गमम् ।
मुनेः क्षुत्क्षाम आसज्य स्वपुरं पुनराययौ ॥ १ ॥
मन्त्री बोले- राजेन्द्र ! उस समय राजा परीक्षित् भूखसे पीड़ित हो शमीक मुनिके कंधेपर मृतक सर्प डालकर पुनः अपनी राजधानीमें लौट आये ॥ १ ॥
ऋषेस्तस्य तु पुत्रोऽभूद् गवि जातो महायशाः ।
शृङ्गी नाम महातेजास्तिग्मवीर्योऽतिकोपनः ॥ २ ॥
उन महर्षिके शृंगी नामक एक महातेजस्वी पुत्र था, जिसका जन्म गायके पेटसे हुआ था। वह महान् यशस्वी, तीव्र शक्तिशाली और अत्यन्त क्रोधी था ॥ २ ॥
ब्रह्माणं समुपागम्य मुनिः पूजां चकार ह।
सोऽनुज्ञातस्ततस्तत्र शृङ्गी शुश्राव तं तदा ॥ ३ ॥
सख्युः सकाशात् पितरं पित्रा ते धर्षितं पुरा ।
मृतं सर्प समासक्तं स्थाणुभूतस्य तस्य तम् ॥ ४ ॥
वहन्तं राजशार्दूल स्कन्धेनानपकारिणम् ।
तपस्विनमतीवाथ तं मुनिप्रवरं नृप ॥ ५ ॥
जितेन्द्रियं विशुद्धं च स्थितं कर्मण्यथाद्भुतम् ।
तपसा द्योतितात्मानं स्वेष्वङ्गेषु यतं तदा ॥ ६ ॥
शुभाचारं शुभकथं सुस्थितं तमलोलुपम् ।
अक्षुद्रमनसूयं च वृद्धं मौनव्रते स्थितम् ।
शरण्यं सर्वभूतानां पित्रा विनिकृतं तव ॥ ७ ॥
एक दिन उसने आचार्यदेवके समीप जाकर पूजा की और उनकी आज्ञा ले वह घरको लौटा। उसी समय शृंगी ऋषिने अपने एक सहपाठी मित्रके मुखसे तुम्हारे पिताद्वारा अपने पिताके तिरस्कृत होनेकी बात सुनी। राजसिंह ! शृंगीको यह मालूम हुआ कि मेरे पिता काठकी भाँति चुपचाप बैठे थे और उनके कंधेपर मृतक साँप डाल दिया गया। वे अब भी उस सर्पको अपने कंधेपर रखे हुए हैं। यद्यपि उन्होंने कोई अपराध नहीं किया था। वे मुनिश्रेष्ठ तपस्वी, जितेन्द्रिय, विशुद्धात्मा, कर्मनिष्ठ, अद्भुत शक्तिशाली, तपस्याद्वारा कान्तिमान् शरीरवाले, अपने अंगोंको संयममें रखनेवाले, सदाचारी, शुभवक्ता, निश्चल भावसे स्थित, लोभरहित, क्षुद्रताशून्य (गम्भीर), दोषदृष्टिसे रहित, वृद्ध, मौनव्रतावलम्बी तथा सम्पूर्ण प्राणियोंको आश्रय देनेवाले थे, तो भी आपके पिता परीक्षित्ने उनका तिरस्कार किया ॥ ३-७ ॥(Adi Parva Chapter 47 to 51)
शशापाथ महातेजाः पितरं ते रुषान्वितः ।
ऋषेः पुत्रो महातेजा बालोऽपि स्थविरद्युतिः ॥ ८ ॥
यह सब जानकर वह बाल्यावस्थामें भी वृद्धोंका-सा तेज धारण करनेवाला महातेजस्वी ऋषिकुमार क्रोधसे आगबबूला हो उठा और उसने तुम्हारे पिताको शाप दे दिया ॥ ८ ॥
स क्षिप्रमुदकं स्पृष्ट्वा रोषादिदमुवाच ह ।
पितरं तेऽभिसंधाय तेजसा प्रज्वलन्निव ॥ ९ ॥
अनागसि गुरौ यो मे मृतं सर्पमवासृजत् ।
तं नागस्तक्षकः क्रुद्धस्तेजसा प्रदहिष्यति ॥ १० ॥
आशीविषस्तिग्मतेजा मद्वाक्यबलचोदितः ।
सप्तरात्रादितः पापं पश्य मे तपसो बलम् ॥ ११ ॥
शृंगी तेजसे प्रज्वलित-सा हो रहा था। उसने शीघ्र ही हाथमें जल लेकर तुम्हारे पिताको लक्ष्य करके रोषपूर्वक यह बात कही- ‘जिसने मेरे निरपराध पितापर मरा साँप डाल दिया है, उस पापीको आजसे सात रातके बाद मेरी वाक्शक्तिसे प्रेरित प्रचण्ड तेजस्वी विषधर तक्षक नाग कुपित हो अपनी विषाग्निसे जला देगा। देखो, मेरी तपस्याका बल’ ॥ ९-११ ॥
इत्युक्त्वा प्रययौ तत्र पिता यत्रास्य सोऽभवत् ।
दृष्ट्वा च पितरं तस्मै तं शापं प्रत्यवेदयत् ॥ १२ ॥
ऐसा कहकर वह बालक उस स्थानपर गया, जहाँ उसके पिता बैठे थे। पिताको देखकर उसने राजाको शाप देनेकी बात बतायी ॥ १२ ॥
स चापि मुनिशार्दूलः प्रेषयामास ते पितुः ।
शिष्यं गौरमुखं नाम शीलवन्तं गुणान्वितम् ॥ १३ ॥
आचख्यौ स च विश्रान्तो राज्ञः सर्वमशेषतः ।
शप्तोऽसि मम पुत्रेण यत्तो भव महीपते ॥ १४ ॥
तब मुनिश्रेष्ठ शमीकने तुम्हारे पिताके पास अपने शिष्य गौरमुखको भेजा, जो सुशील और गुणवान् था। उसने विश्राम कर लेनेपर राजासे सब बातें बतायीं और महर्षिका संदेश इस प्रकार सुनाया- ‘भूपाल! मेरे पुत्रने तुम्हें शाप दे दिया है; अतः सावधान हो जाओ ॥ १३-१४ ॥
तक्षकस्त्वां महाराज तेजसासौ दहिष्यति ।
श्रुत्वा च तद् वचो घोरं पिता ते जनमेजय ॥ १५ ॥
यत्तोऽभवत् परित्रस्तस्तक्षकात् पन्नगोत्तमात् ।
ततस्तस्मिंस्तु दिवसे सप्तमे समुपस्थिते ॥ १६ ॥
राज्ञः समीपं ब्रह्मर्षिः काश्यपो गन्तुमैच्छत ।
तं ददर्शाथ नागेन्द्रस्तक्षकः काश्यपं तदा ॥ १७ ॥
‘महाराज ! (सात दिनके बाद) तक्षक नाग तुम्हें अपने तेजसे जला देगा।’ जनमेजय ! यह भयंकर बात सुनकर तुम्हारे पिता नागश्रेष्ठ तक्षकसे अत्यन्त भयभीत हो सतत सावधान रहने लगे। तदनन्तर जब सातवाँ दिन उपस्थित हुआ, तब उस दिन ब्रह्मर्षि काश्यपने राजाके समीप जानेका विचार किया। मार्गमें नागराज तक्षकने उस समय काश्यपको देखा ॥ १५-१७ ॥
तमब्रवीत् पन्नगेन्द्रः काश्यपं त्वरितं द्विजम् ।
क्व भवांस्त्वरितो याति किं च कार्यं चिकीर्षति ॥ १८ ॥
विप्रवर काश्यप बड़ी उतावलीसे पैर बढ़ा रहे थे। उन्हें देखकर नागराजने (ब्राह्मणका वेष धारण करके) इस प्रकार पूछा- ‘द्विजश्रेष्ठ ! आप कहाँ इतनी तीव्र गतिसे जा रहे हैं और कौन-सा कार्य करना चाहते हैं?’ ॥ १८ ॥
काश्यप उवाच
यत्र राजा कुरुश्रेष्ठः परिक्षिन्नाम वै द्विज ।
तक्षकेण भुजङ्गेन धक्ष्यते किल सोऽद्य वै ॥ १९ ॥
गच्छाम्यहं तं त्वरितः सद्यः कर्तुमपज्वरम् ।
मयाभिपन्नं तं चापि न सर्पो धर्षयिष्यति ॥ २० ॥
काश्यपने कहा- ब्रह्मन्! मैं वहाँ जाता हूँ जहाँ कुरुकुलके श्रेष्ठ राजा परीक्षित् रहते हैं। सुना है कि आज ही तक्षक नाग उन्हें डॅसेगा। अतः मैं तत्काल ही उन्हें नीरोग करनेके लिये जल्दी-जल्दी वहाँ जा रहा हूँ। मेरे द्वारा सुरक्षित नरेशको वह सर्प नष्ट नहीं कर सकेगा ॥ १९-२० ॥
तक्षक उवाच
किमर्थं तं मया दष्टं संजीवयितुमिच्छसि ।
अहं स तक्षको ब्रह्मन् पश्य मे वीर्यमद्भुतम् ॥ २१ ॥
न शक्तस्त्वं मया दष्टं तं संजीवयितुं नृपम् ।
इत्युक्त्वा तक्षकस्तत्र सोऽदशद् वै वनस्पतिम् ॥ २२ ॥
तक्षकने कहा- ब्रह्मन् ! मेरे डॅसे हुए मनुष्यको जिलानेकी इच्छा आप कैसे रखते हैं। मैं ही वह तक्षक हूँ। मेरी अद्भुत शक्ति देखिये। मेरे डॅस लेनेपर उस राजाको आप जीवित नहीं कर सकते। ऐसा कहकर तक्षकने एक वृक्षको डॅस लिया ॥ २१-२२ ॥
स दष्टमात्रो नागेन भस्मीभूतोऽभवन्नगः ।
काश्यपश्च ततो राजन्नजीवयत तं नगम् ॥ २३ ॥
नागके हँसते ही वह वृक्ष जलकर भस्म हो गया। राजन्! तदनन्तर काश्यपने (अपनी मन्त्र-विद्याके बलसे) उस वृक्षको पूर्ववत् जीवित (हरा-भरा) कर दिया ॥ २३ ॥
ततस्तं लोभयामास कामं ब्रूहीति तक्षकः ।
स एवमुक्तस्तं प्राह काश्यपस्तक्षकं पुनः ॥ २४ ॥
धनलिप्सुरहं तत्र यामीत्युक्तश्च तेन सः ।
तमुवाच महात्मानं तक्षकः श्लक्ष्णया गिरा ॥ २५ ॥
अब तक्षक काश्यपको प्रलोभन देने लगा। उसने कहा- ‘तुम्हारी जो इच्छा हो, मुझसे माँग लो।’ तक्षकके ऐसा कहनेपर काश्यपने उससे कहा- ‘मैं तो वहाँ धनकी इच्छासे जा रहा हूँ।’ उनके ऐसा कहनेपर तक्षकने महात्मा काश्यपसे मधुर वाणीमें कहा ॥ २४-२५ ॥
यावद्धनं प्रार्थयसे राज्ञस्तस्मात् ततोऽधिकम् ।
गृहाण मत्त एव त्वं संनिवर्तस्व चानघ ॥ २६ ॥
‘अनघ ! तुम राजासे जितना धन पाना चाहते हो, उससे भी अधिक मुझसे ही ले लो और लौट जाओ’ ॥ २६ ॥
स एवमुक्तो नागेन काश्यपो द्विपदां वरः ।
लब्ध्वा वित्तं निववृते तक्षकाद् यावदीप्सितम् ॥ २७ ॥
तक्षक नागकी यह बात सुनकर मनुष्योंमें श्रेष्ठ काश्यप उससे इच्छानुसार धन लेकर लौट गये ॥ २७ ॥
तस्मिन् प्रतिगते विप्रे छद्मनोपेत्य तक्षकः ।
तं नृपं नृपतिश्रेष्ठं पितरं धार्मिकं तव ॥ २८ ॥
प्रासादस्थं यत्तमपि दग्धवान् विषवह्निना ।
ततस्त्वं पुरुषव्याघ्र विजयायाभिषेचितः ॥ २९ ॥
ब्राह्मणके चले जानेपर तक्षकने छलसे भूपालोंमें श्रेष्ठ तुम्हारे धर्मात्मा पिता राजा परीक्षित्के पास पहुँचकर, यद्यपि वे महलमें सावधानीके साथ रहते थे, तो भी उन्हें अपनी विषाग्निसे भस्म कर दिया। नरश्रेष्ठ ! तदनन्तर विजयकी प्राप्तिके लिये तुम्हारा राजाके पदपर अभिषेक किया गया ॥ २८-२९ ॥
एतद् दृष्टं श्रुतं चापि यथावन्नृपसत्तम ।
अस्माभिर्निखिलं सर्वं कथितं तेऽतिदारुणम् ॥ ३० ॥
नृपश्रेष्ठ ! यद्यपि यह प्रसंग बड़ा ही निष्ठुर और दुःखदायक है, तथापि तुम्हारे पूछनेसे हमने सब बातें तुमसे कही हैं। यह सब कुछ हमने अपनी आँखों देखा और कानोंसे भी ठीक-ठीक सुना है ॥ ३० ॥
श्रुत्वा चैनं नरश्रेष्ठ पार्थिवस्य पराभवम् ।
अस्य चर्षेरुतंकस्य विधत्स्व यदनन्तरम् ॥ ३१ ॥
महाराज! इस प्रकार तक्षकने तुम्हारे पिता राजा परीक्षित्का तिरस्कार किया है। इन महर्षि उत्तंकको भी उसने बहुत तंग किया है। यह सब तुमने सुन लिया, अब तुम जैसा उचित समझो, करो ॥ ३१ ॥
सौतिरुवाच
एतस्मिन्नेव काले तु स राजा जनमेजयः ।
उवाच मन्त्रिणः सर्वानिदं वाक्यमरिन्दमः ॥ ३२ ॥
उग्रश्रवाजी कहते हैं- शौनक ! उस समय शत्रुओंका दमन करनेवाले राजा जनमेजय अपने सम्पूर्ण मन्त्रियोंसे इस प्रकार बोले ॥ ३२ ॥
जनमेजय उवाच
अथ तत् कथितं केन यद् वृत्तं तद् वनस्पतौ ।
आश्चर्यभूतं लोकस्य भस्मराशीकृतं तदा ॥ ३३ ॥
यद् वृक्षं जीवयामास काश्यपस्तक्षकेण वै ।
नूनं मन्त्रैर्हतविषो न प्रणश्येत काश्यपात् ॥ ३४ ॥
जनमेजयने कहा-उस वृक्षके डॅसे जाने और फिर हरे होनेकी बात आपलोगोंसे किसने कही? उस समय तक्षकके काटनेसे जो वृक्ष राखका ढेर बन गया था, उसे काश्यपने पुनः जिलाकर हरा-भरा कर दिया। यह सब लोगोंके लिये बड़े आश्चर्यकी बात है। यदि काश्यपके आ जानेसे उनके मन्त्रोंद्वारा तक्षकका विष नष्ट कर दिया जाता तो निश्चय ही मेरे पिताजी बच जाते ॥ ३३-३४ ॥
चिन्तयामास पापात्मा मनसा पन्नगाधमः ।
दष्टं यदि मया विप्रः पार्थिवं जीवयिष्यति ॥ ३५ ॥
तक्षकः संहतविषो लोके यास्यति हास्यताम् ।
विचिन्त्यैवं कृता तेन ध्रुवं तुष्टिर्द्विजस्य वै ॥ ३६ ॥
परंतु उस पापात्मा नीच सर्पने अपने मनमें यह सोचा होगा- ‘यदि मेरे हँसे हुए राजाको ब्राह्मण जिला देंगे तो लोग कहेंगे कि तक्षकका विष भी नष्ट हो गया। इस प्रकार तक्षक लोकमें उपहासका पात्र बन जायगा।’ अवश्य ही ऐसा सोचकर उसने ब्राह्मणको धनके द्वारा संतुष्ट किया था ॥ ३५-३६ ॥
भविष्यति ह्युपायेन यस्य दास्यामि यातनाम् ।
एकं तु श्रोतुमिच्छामि तद् वृत्तं निर्जने वने ॥ ३७ ॥
संवादं पन्नगेन्द्रस्य काश्यपस्य च कस्तदा ।
श्रुतवान् दृष्टवांश्चापि भवत्सु कथमागतम् ।
श्रुत्वा तस्य विधास्येऽहं पन्नगान्तकरीं मतिम् ॥ ३८ ॥
अच्छा, भविष्यमें प्रयत्नपूर्वक कोई-न-कोई उपाय करके तक्षकको इसके लिये दण्ड दूँगा। परंतु एक बात मैं सुनना चाहता हूँ। नागराज तक्षक और काश्यप ब्राह्मणका वह संवाद तो निर्जन वनमें हुआ होगा। यह सब वृत्तान्त किसने देखा और सुना था? आपलोगोंतक यह बात कैसे आयी? यह सब सुनकर मैं सर्पोंके नाशका विचार करूँगा ॥ ३७-३८ ॥
मन्त्रिण ऊचुः
शृणु राजन् यथास्माकं येन तत् कथितं पुरा ।
समागतं द्विजेन्द्रस्य पन्नगेन्द्रस्य चाध्वनि ॥ ३९ ॥
तस्मिन् वृक्षे नरः कश्चिदिन्धनार्थाय पार्थिव ।
विचिन्वन् पूर्वमारूढः शुष्कशाखां वनस्पतौ ॥ ४० ॥
मन्त्री बोले- राजन् ! सुनो, विप्रवर काश्यप और नागराज तक्षकका मार्गमें एक-दूसरेके साथ जो समागम हुआ था, उसका समाचार जिसने और जिस प्रकार हमारे सामने बताया था, उसका वर्णन करते हैं। भूपाल ! उस वृक्षपर पहलेसे ही कोई मनुष्य लकड़ी लेनेके लिये सूखी डाली खोजता हुआ चढ़ गया था ॥ ३९-४० ॥
न बुध्येतामुभौ तौ च नगस्थं पन्नगद्विजौ ।
सह तेनैव वृक्षेण भस्मीभूतोऽभवन्नृप ॥ ४१ ॥
तक्षक नाग और ब्राह्मण- दोनों ही नहीं जानते थे कि इस वृक्षपर कोई दूसरा मनुष्य भी है। राजन्! तक्षकके काटनेपर उस वृक्षके साथ ही वह मनुष्य भी जलकर भस्म हो गया था ॥ ४१ ॥
द्विजप्रभावाद् राजेन्द्र व्यजीवत् सवनस्पतिः ।
तेनागम्य नरश्रेष्ठ पुंसास्मासु निवेदितम् ॥ ४२ ॥
परंतु राजेन्द्र ! ब्राह्मणके प्रभावसे वह भी उस वृक्षके साथ जी उठा। नरश्रेष्ठ! उसी मनुष्यने आकर हमलोगोंसे तक्षक और ब्राह्मणकी जो घटना थी, वह सुनायी ॥ ४२ ॥
यथावृत्तं तु तत् सर्व तक्षकस्य द्विजस्य च ।
एतत् ते कथितं राजन् यथा दृष्टं श्रुतं च यत् ।
श्रुत्वा च नृपशार्दूल विधत्स्व यदनन्तरम् ॥ ४३ ॥
राजन् ! इस प्रकार हमने जो कुछ सुना और देखा है, वह सब तुम्हें कह सुनाया। भूपालशिरोमणे ! यह सुनकर अब तुम्हें जैसा उचित जान पड़े, वह करो ॥ ४३ ॥
सौतिरुवाच
मन्त्रिणां तु वचः श्रुत्वा स राजा जनमेजयः ।
पर्यतप्यत दुःखार्तः प्रत्यपिंषत् करं करे ॥ ४४ ॥
उग्रश्रवाजी कहते हैं- मन्त्रियोंकी बात सुनकर राजा जनमेजय दुःखसे आतुर हो संतप्त हो उठे और कुपित होकर हाथसे हाथ मलने लगे ॥ ४४ ॥(Adi Parva Chapter 47 to 51)
निःश्वासमुष्णमसकृद् दीर्घ राजीवलोचनः ।
मुमोचाश्रूणि च तदा नेत्राभ्यां प्ररुदन् नृपः ॥ ४५ ॥
वे बारम्बार लम्बी और गरम साँस छोड़ने लगे। कमलके समान नेत्रोंवाले राजा जनमेजय उस समय नेत्रोंसे आँसू बहाते हुए फूट-फूटकर रोने लगे ॥ ४५ ॥
उवाच च महीपालो दुःखशोकसमन्वितः ।
दुर्धरं वाष्पमुत्सृज्य स्पृष्ट्वा चापो यथाविधि ॥ ४६ ॥
मुहूर्तमिव च ध्यात्वा निश्चित्य मनसा नृपः ।
अमर्षी मन्त्रिणः सर्वानिदं वचनमब्रवीत् ॥ ४७ ॥
राजाने दो घड़ीतक ध्यान करके मन-ही-मन कुछ निश्चय किया, फिर दुःख-शोक और अमर्षमें डूबे हुए नरेश न थमनेवाले आँसुओंकी अविच्छिन्न धारा बहाते हुए विधिपूर्वक जलका स्पर्श करके सम्पूर्ण मन्त्रियोंसे इस प्रकार बोले- ॥ ४६-४७ ॥
जनमेजय उवाच
श्रुत्वैतद् भवतां वाक्यं पितुर्मे स्वर्गतिं प्रति ।
निश्चितेयं मम मतिर्या च तां मे निबोधत ।
अनन्तरं च मन्येऽहं तक्षकाय दुरात्मने ॥ ४८ ॥
प्रतिकर्तव्यमित्येवं येन मे हिंसितः पिता ।
शृङ्गिणं हेतुमात्रं यः कृत्वा दग्ध्वा च पार्थिवम् ॥ ४९ ॥
जनमेजयने कहा- मन्त्रियो ! मेरे पिताके स्वर्गलोकगमनके विषयमें आपलोगोंका यह वचन सुनकर मैंने अपनी बुद्धिद्वारा जो कर्तव्य निश्चित किया है, उसे आप सुन लें। मेरा विचार है, उस दुरात्मा तक्षकसे तुरंत बदला लेना चाहिये, जिसने शृंगी ऋषिको निमित्तमात्र बनाकर स्वयं ही मेरे पिता महाराजको अपनी विषाग्निसे दग्ध करके मारा है ॥ ४८-४९ ॥
इयं दुरात्मता तस्य काश्यपं यो न्यवर्तयत् ।
यदाऽऽगच्छेत् स वै विप्रो ननु जीवेत् पिता मम ॥ ५० ॥
उसकी सबसे बड़ी दुष्टता यह है कि उसने काश्यपको लौटा दिया। यदि वे ब्राह्मणदेवता आ जाते तो मेरे पिता निश्चय ही जीवित हो सकते थे ॥ ५० ॥
परिहीयेत किं तस्य यदि जीवेत् स पार्थिवः ।
काश्यपस्य प्रसादेन मन्त्रिणां विनयेन च ॥ ५१ ॥
यदि मन्त्रियोंके विनय और काश्यपके कृपाप्रसादसे महाराज जीवित हो जाते तो इसमें उस दुष्टकी क्या हानि हो जाती? ॥ ५१ ॥
स तु वारितवान् मोहात् काश्यपं द्विजसत्तमम् ।
संजिजीवयिषु प्राप्तं राजानमपराजितम् ॥ ५२ ॥
जो कहीं भी परास्त न होते थे, ऐसे मेरे पिता राजा परीक्षित्को जीवित करनेकी इच्छासे द्विजश्रेष्ठ काश्यप आ पहुँचे थे, किंतु तक्षकने मोहवश उन्हें रोक दिया ॥ ५२ ॥
महानतिक्रमो ह्येष तक्षकस्य दुरात्मनः ।
द्विजस्य योऽददद् द्रव्यं मा नृपं जीवयेदिति ॥ ५३ ॥
दुरात्मा तक्षकका यह सबसे बड़ा अपराध है कि उसने ब्राह्मणदेवको इसलिये धन दिया कि वे महाराजको जिला न दें ॥ ५३ ॥
उत्तङ्कस्य प्रियं कर्तुमात्मनश्च महत् प्रियम् ।
भवतां चैव सर्वेषां गच्छाम्यपचितिं पितुः ॥ ५४ ॥
इसलिये मैं महर्षि उत्तंकका, अपना तथा आप सब लोगोंका अत्यन्त प्रिय करनेके लिये पिताके वैरका अवश्य बदला लूँगा ॥ ५४ ॥(Adi Parva Chapter 47 to 51)
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि पारिक्षिन्मन्त्रिसंवादे पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत आस्तीकपर्वमें जनमेजय और मन्त्रियोंका संवादविषयक पचासवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५० ॥
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इक्यावनवाँ अध्याय
जनमेजयके सर्पयज्ञका उपक्रम
सौतिरुवाच
एवमुक्त्वा ततः श्रीमान् मन्त्रिभिश्चानुमोदितः ।
आरुरोह प्रतिज्ञां स सर्पसत्राय पार्थिवः ॥ १ ॥
उग्रश्रवाजी कहते हैं- शौनक! श्रीमान् राजा जनमेजयने जब ऐसा कहा, तब उनके मन्त्रियोंने भी उस बातका समर्थन किया। तत्पश्चात् राजा सर्पयज्ञ करनेकी प्रतिज्ञापर आरूढ़ हो गये ॥ १ ॥
ब्रह्मन् भरतशार्दूलो राजा पारिक्षितस्तदा ।
पुरोहितमथाहूय ऋत्विजो वसुधाधिपः ॥ २ ॥
अब्रवीद् वाक्यसम्पन्नः कार्यसम्पत्करं वचः ।
ब्रह्मन् ! सम्पूर्ण वसुधाके स्वामी भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ परीक्षित्कुमार राजा जनमेजयने उस समय पुरोहित तथा ऋत्विजोंको बुलाकर कार्य सिद्ध करनेवाली बात कही- ॥ २३॥
यो मे हिंसितवांस्तातं तक्षकः स दुरात्मवान् ॥ ३ ॥
प्रतिकुर्यां तथा तस्य तद् भवन्तो ब्रुवन्तु मे ।
अपि तत् कर्म विदितं भवतां येन पन्नगम् ॥ ४ ॥
तक्षकं सम्प्रदीप्तेऽग्नौ प्रक्षिपेयं सबान्धवम् ।
यथा तेन पिता मह्यं पूर्वं दग्धो विषाग्निना ।
तथाहमपि तं पापं दग्धुमिच्छामि पन्नगम् ॥ ५ ॥
‘ब्राह्मणो! जिस दुरात्मा तक्षकने मेरे पिताकी हत्या की है, उससे मैं उसी प्रकारका बदला लेना चाहता हूँ। इसके लिये मुझे क्या करना चाहिये, यह आपलोग बतावें। क्या आपलोगोंको ऐसा कोई कर्म विदित है जिसके द्वारा मैं तक्षक नागको उसके बन्धु-बान्धवोंसहित जलती हुई आगमें झोंक सकूँ ? उसने अपनी विषाग्निसे पूर्वकालमें मेरे पिताको जिस प्रकार दग्ध किया था, उसी प्रकार मैं भी उस पापी सर्पको जलाकर भस्म कर देना चाहता हूँ’ ॥ ३-५ ॥
ऋत्विज ऊचुः
अस्ति राजन् महत् सत्रं त्वदर्थं देवनिर्मितम् ।
सर्पसत्रमिति ख्यातं पुराणे परिपठ्यते ॥ ६ ॥
ऋत्विजोंने कहा- राजन् ! इसके लिये एक महान् यज्ञ है, जिसका देवताओंने आपके लिये पहलेसे ही निर्माण कर रखा है। उसका नाम है सर्पसत्र। पुराणोंमें उसका वर्णन आया है ॥ ६ ॥
आहर्ता तस्य सत्रस्य त्वन्नान्योऽस्ति नराधिप ।
इति पौराणिकाः प्राहुरस्माकं चास्ति स क्रतुः ॥ ७ ॥
नरेश्वर ! उस यज्ञका अनुष्ठान करनेवाला आपके सिवा दूसरा कोई नहीं है, ऐसा पौराणिक विद्वान् कहते हैं। उस यज्ञका विधान हमलोगोंको मालूम है ॥ ७ ॥(Adi Parva Chapter 47 to 51)
एवमुक्तः स राजर्षिर्मेने दग्धं हि तक्षकम् ।
हुताशनमुखे दीप्ते प्रविष्टमिति सत्तम ॥ ८ ॥
साधुशिरोमणे ! ऋत्विजोंके ऐसा कहनेपर राजर्षि जनमेजयको विश्वास हो गया कि अब तक्षक निश्चय ही प्रज्वलित अग्निके मुखमें समाकर भस्म हो जायगा ॥ ८ ॥
ततोऽब्रवीन्मन्त्रविदस्तान् राजा ब्राह्मणांस्तदा ।
आहरिष्यामि तत् सत्रं सम्भाराः सम्भ्रियन्तु मे ॥ ९ ॥
तब राजाने उस समय उन मन्त्रवेत्ता ब्राह्मणोंसे कहा- ‘मैं उस यज्ञका अनुष्ठान करूँगा। आपलोग उसके लिये आवश्यक सामग्री संग्रह कीजिये’ ॥ ९ ॥
ततस्ते ऋत्विजस्तस्य शास्त्रतो द्विजसत्तम ।
तं देशं मापयामासुर्यज्ञायतनकारणात् ॥ १० ॥
द्विजश्रेष्ठ ! तब उन ऋत्विजोंने शास्त्रीय विधिके अनुसार यज्ञमण्डप बनानेके लिये वहाँकी भूमि नाप ली ॥ १० ॥
यथावद् वेदविद्वांसः सर्वे बुद्धेः परं गताः ।
ऋद्धया परमया युक्तमिष्टं द्विजगणैर्युतम् ॥ ११ ॥
प्रभूतधनधान्याढ्यमृत्विग्भिः सुनिषेवितम् ।
निर्माय चापि विधिवद् यज्ञायतनमीप्सितम् ॥ १२ ॥
राजानं दीक्षयामासुः सर्पसत्राप्तये तदा ।
इदं चासीत् तत्र पूर्व सर्पसत्रे भविष्यति ॥ १३ ॥
वे सभी ऋत्विज् वेदोंके यथावत् विद्वान् तथा परम बुद्धिमान् थे। उन्होंने विधिपूर्वक मनके अनुरूप एक यज्ञ-मण्डप बनाया, जो परम समृद्धिसे सम्पन्न, उत्तम द्विजोंके समुदायसे सुशोभित, प्रचुर धनधान्यसे परिपूर्ण तथा ऋत्विजोंसे सुसेवित था। उस यज्ञमण्डपका निर्माण कराकर ऋत्विजोंने सर्पयज्ञकी सिद्धिके लिये उस समय राजा जनमेजयको दीक्षा दी। इसी समय जब कि सर्पसत्र अभी प्रारम्भ होनेवाला था, वहाँ पहले ही यह घटना घटित हुई ॥ ११-१३ ॥(Adi Parva Chapter 47 to 51)
निमित्तं महदुत्पन्नं यज्ञविघ्नकरं तदा ।
यज्ञस्यायतने तस्मिन् क्रियमाणे वचोऽब्रवीत् ॥ १४ ॥
स्थपतिर्बुद्धिसम्पन्नो वास्तुविद्याविशारदः ।
इत्यब्रवीत् सूत्रधारः सूतः पौराणिकस्तदा ॥ १५ ॥
उस यज्ञमें विघ्न डालनेवाला बहुत बड़ा कारण प्रकट हो गया। जब वह यज्ञमण्डप बनाया जा रहा था, उस समय वास्तुशास्त्रके पारंगत विद्वान्, बुद्धिमान् एवं अनुभवी सूत्रधार शिल्पवेत्ता सूतने वहाँ आकर कहा- ॥ १४-१५ ॥
यस्मिन् देशे च काले च मापनेयं प्रवर्तिता ।
ब्राह्मणं कारणं कृत्वा नायं संस्थास्यते क्रतुः ॥ १६ ॥
‘जिस स्थान और समयमें यह यज्ञमण्डप मापनेकी क्रिया प्रारम्भ हुई है, उसे देखकर यह मालूम होता है कि एक ब्राह्मणको निमित्त बनाकर यह यज्ञ पूर्ण न हो सकेगा’ ॥ १६ ॥
एतच्छ्रुत्वा तु राजासौ प्राग्दीक्षाकालमब्रवीत् ।
क्षत्तारं न हि मे कश्चिदज्ञातः प्रविशेदिति ॥ १७ ॥
यह सुनकर राजा जनमेजयने दीक्षा लेनेसे पहले ही सेवकको यह आदेश दे दिया – ‘मुझे सूचित किये बिना किसी अपरिचित व्यक्तिको यज्ञमण्डपमें प्रवेश न करने दिया जाय’ ॥ १७ ॥(Adi Parva Chapter 47 to 51)
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि सर्पसत्रोपक्रमे एकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत आस्तीकपर्वमें सर्पसत्रोपक्रमसम्बन्धी इक्यावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५१ ॥


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