Raghuvansham Sarg 13

रघुवंश तेरहवाँ सर्ग | Raghuvansham Sarg 13
॥ कालिदासकृत रघुवंशम् महाकाव्य तेरहवाँ सर्गः ॥
रघुवंशम् सर्ग तेरहवें सर्ग (Raghuvansham Sarg 13) में महाकवि कालिदास ने श्रीराम के अयोध्या लौटने और रामराज्य की स्थापना का सुंदर वर्णन किया है। इस सर्ग में श्रीराम सीता के साथ पुनर्मिलन करते हैं और नगरवासियों का हर्षोल्लासपूर्ण स्वागत करते हैं।
सर्ग में नदियों, उपवनों और पवित्र आश्रमों का चित्रण किया गया है, जो अयोध्या की शोभा और नगरवासियों की खुशहाली को दर्शाता है। भरत का आगमन और उनके सम्मान से आदर्श भाईचारे और भक्ति का संदेश भी मिलता है।
इस सर्ग के माध्यम से कालिदास ने रामराज्य का आदर्श, धर्म और न्याय पर आधारित शासन, और प्रजा की सुरक्षा और समृद्धि का प्रतीक दिखाया है।
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॥ श्रीः रघुवंशम्: Raghuvansham Sarg 13 ॥
अथात्मनः शब्दगुणं गुणज्ञः पदं विसानेन विगाहमानः ।
रत्नाकरं वीक्ष्य मिथः स जायां रामाभिधानो हाररित्युवाच ॥१॥
अर्थात:
इसके बाद गुणों को पहचानने वाले श्रीराम अपनी सेना के साथ समुद्र के तट की ओर जाते हुए, उस रत्नों से भरे समुद्र (रत्नाकर) को देखकर अपनी पत्नी सीता से हँसते हुए बोले— कि “यह समुद्र मानो तुम्हारे लिए एक सुंदर हार (माला) के समान प्रतीत होता है।”
वैदेहिं पश्य मलयाद्विभक्तं मत्सेतुना फेनिलमम्बुराशिम् ।
छायापथेनेव शरत्प्रसन्नमाकाशमाविष्कृतचारुतारम् ॥२॥
अर्थात:
श्रीराम अपनी पत्नी सीता से कहते हैं: हे वैदेहि! इस समुद्र को देखो, जो मेरे बनाए हुए सेतु (रामसेतु) द्वारा मानो दो भागों में बँटा हुआ है और जिसकी लहरें झाग से भरी हुई हैं। यह दृश्य ऐसा प्रतीत होता है, जैसे शरद ऋतु के स्वच्छ आकाश में आकाशगंगा (छायापथ) के कारण सुंदर तारों से युक्त आकाश स्पष्ट दिखाई दे रहा हो।
गुरोर्यियक्षोः कपिलेन मेध्ये रसातलं संक्रमिते तुरङ्गे ।
तदर्थमुर्वीसवदारयद्भिः पूर्वैः किलायं परिवर्धितो नः ॥ ३॥
अर्थात:
जब हमारे गुरु वसिष्ठ के यज्ञ का घोड़ा, महर्षि कपिल द्वारा यज्ञस्थल से पाताल लोक (रसातल) में ले जाया गया था, तब उसे ढूँढने के लिए हमारे पूर्वजों (सगर के पुत्रों) ने पृथ्वी को खोद-खोदकर मार्ग बनाया था। उसी कारण से यह समुद्र (सागर) उत्पन्न होकर आज इतना विस्तृत हुआ है।
गर्भ दधत्यर्कमरीचयोऽस्माद्विवृद्धिमत्राश्नवते वसूनि ॥
अविन्धनं वह्निमसौ विभर्ति प्रह्लादनं ज्योतिरजन्यनेन ॥ ४ ॥
अर्थात:
यह समुद्र सूर्य की किरणों को अपने भीतर गर्भ के समान धारण करता है, और उसी से यहाँ रत्नों की वृद्धि होती है। यह बिना ईंधन के ही अग्नि को धारण करता है तथा अपने उत्पन्न प्रकाश से शीतलता और आनंद प्रदान करता है।(Raghuvansham Sarg 13)
तां तामवस्थां प्रतिपद्यमानं स्थितं दश व्याप्य दिशो महिम्ना ।
विष्णोरिवास्यानवधारणीयमीदृक्तया रूपमियत्तया वा ॥५॥
अर्थात:
वह (समुद्र) विभिन्न अवस्थाओं को धारण करता हुआ अपने प्रभाव से दसों दिशाओं में फैला हुआ है। उसका स्वरूप न तो इस प्रकार से और न ही उसकी सीमा के अनुसार निश्चित रूप से जाना जा सकता है, जैसे भगवान विष्णु का रूप असीम और अवर्णनीय है।
नाभिप्ररूढाम्बुरुहासनेन संस्तूयमानः प्रथमेन धात्रा ।
असुं युगान्तोचितयोगनिद्रः संहृत्य लोकान् पुरुषोऽधिशेते ॥६॥
अर्थात:
(इस समुद्र में) अपनी नाभि से उत्पन्न कमल पर स्थित ब्रह्मा द्वारा स्तुति किए जाने वाले भगवान (विष्णु), युग के अंत में सभी लोकों का संहार करके योगनिद्रा में शयन करते हैं।
पक्षाच्छदा गोत्रभिदात्तगन्धाः शरण्यमेनं शतशो महीध्राः ।
नृपा इवोपविनः परेभ्यो धर्मोत्तरं मध्यममाश्रयन्ते ॥७॥
अर्थात:
पंखों से युक्त (बादलों द्वारा ढके हुए) और इन्द्र के वज्र से विदीर्ण पर्वतों के समान अनेक पर्वत इस समुद्र का आश्रय लेते हैं, जैसे शत्रुओं से पराजित राजा, श्रेष्ठ धर्म का पालन करने वाले मध्यम (धर्मयुक्त) राजा का आश्रय लेते हैं।
रसातलादादिभवेन पुंसा भुवः प्रयुक्तोद्वहनक्रियायाः ।
अस्याच्छमम्भः प्रलयप्रवृद्धं महोर्मिवक्त्राभरणं बभूव ॥८॥
अर्थात:
आदि पुरुष द्वारा पृथ्वी को रसातल से ऊपर उठाने के कार्य में प्रयुक्त यह स्वच्छ जल, प्रलय के समय अत्यधिक बढ़कर विशाल तरंगों के रूप में मानो उसके मुख का आभूषण बन गया।
मुखार्पणेषु प्रकृतिप्रगल्भाः स्वयं तरङ्गाधरदानदक्षः ।
अनन्यसामान्यकलत्रवृत्तिः पिबत्यसौ पाययते च सिन्धुः ॥९॥
अर्थात:
यह समुद्र स्वभाव से ही उद्दण्ड नदियों के मुख (मिलन स्थान) को अपने में समाहित कर लेता है और अपनी तरंगों रूपी हाथों से उन्हें जल प्रदान करने में भी कुशल है। यह अपनी पत्नियों (नदियों) के साथ अद्वितीय व्यवहार करता हुआ स्वयं भी जल पीता है और उन्हें भी पिलाता है।
ससत्त्वमादाय नदीमुखाम्भः संमीलयन्तो विवृताननत्वात् ।
अमी शिरोभिस्तिमयः सरम्भैरूर्ध्वं वितन्वन्ति जलप्रवाहान् ॥१०॥
अर्थात:
ये तिमि (विशाल जलचर) अपने खुले हुए मुखों से नदियों के मुहाने का जल और उसमें स्थित जीवों को ग्रहण कर लेते हैं, और फिर उत्साहपूर्वक अपने सिरों के द्वारा ऊपर की ओर जल की धाराएँ फैलाते हैं।
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मातङ्गनकैः सहसोत्पतद्भिर्भिन्नान् द्विधा पश्य समुद्रफेनान् ।
कपोलसंसर्पितया य एषां व्रजन्ति कर्णक्षणचामरत्वम् ॥११॥
अर्थात:
देखो, अचानक ऊपर उठने वाले हाथियों (तरंगों) के समान जलराशि द्वारा समुद्र के फेन (झाग) दो भागों में बँट जाते हैं। उनमें से कुछ फेन ऐसे प्रतीत होते हैं मानो गालों से सरकते हुए कानों के पास चँवर (पंखे) की तरह डुल रहे हों।(Raghuvansham Sarg 13)
वेलानिलाय प्रसूता भुजङ्गा महोर्मिविस्फूर्जितनिर्विशेषाः ।
सूर्यांशुसंपर्कसमृद्धरागैर्व्यज्यन्त एते मणिभिः फणस्थैः ॥१२॥
अर्थात:
समुद्र तट की वायु से उत्पन्न हुए ये सर्प विशाल लहरों की गर्जना के समान प्रतीत होते हैं। उनके फणों पर स्थित मणियाँ, सूर्य की किरणों के स्पर्श से लालिमा प्राप्त कर, चमकती हुई दिखाई देती हैं।
तवाधरस्पर्धिषु विड्द्रुमेषु पयस्तमेतत्सहसोमिवेगात् ।
ऊर्ध्वाकुरप्रोतमुखं कथंचित्क्लेशादपक्रामति शंखयूथम् ॥१३॥
अर्थात:
तुम्हारे अधरों (होंठों) से स्पर्धा करने वाले लाल प्रवालों (मूंगों) के बीच यह जल तीव्र वेग से बहता हुआ, ऊपर की ओर उठे हुए मुख वाले शंखों के समूह को किसी प्रकार कठिनाई से अपने साथ बहा ले जाता है।
प्रवृत्तमात्रेण पयांसि पातुमावर्तवेगाद्धमता घनेन ।
आभाति भूयिष्ठमयं समुद्रः प्रमथ्यमानो गिरिणेव भूयः ॥१४॥
अर्थात:
जैसे ही मेघ जल पीने के लिए प्रवृत्त होता है, उसके वेग से (उठी हुई) जल-भंवरों के कारण यह समुद्र ऐसा प्रतीत होता है मानो फिर से किसी पर्वत द्वारा मथा जा रहा हो।
दूरादयश्चक्रनिभस्य तन्वी तमालतालीवनराजिनीला ।
आभाति वेला लवणाम्बुराशेर्धारानिबद्धेव कलंकरेखा ॥१५॥
अर्थात:
दूर से देखने पर यह खारे समुद्र की तटरेखा (वेला) चक्र (वृत्त) के समान प्रतीत होती है, जो तमाल और ताड़ के वृक्षों की पंक्तियों से नीली दिखाई देती है। वह ऐसी लगती है मानो किसी वस्तु पर खिंची हुई पतली-सी काली रेखा हो।
वेलानिलः केतकरेणुभिस्ते संभावयत्याननमायताक्षि ! ।
मामक्षमं मण्डनकालहानेर्वेत्तीव विम्बाधरवद्धतृष्णम् ॥१६॥
अर्थात:
हे सुंदर नेत्रों वाली! समुद्र तट की हवा केतकी के परागकणों से तुम्हारे मुख का मानो श्रृंगार कर रही है। ऐसा लगता है कि वह मेरे उस अधीर भाव को जानती है, जो तुम्हारे बिंब के समान लाल अधरों के अलंकरण में विलंब होने के कारण उत्पन्न हुआ है।
एते वयं सैकतभिन्नशुक्तिपर्यस्तमुक्तापटलं पयोधेः ।
प्राप्ता मुहूर्तेन विमानवेगात् कूलं फलावर्जितपूगमालम् ॥१७॥
अर्थात:
हम इस समुद्र के उस तट पर पहुँच गए हैं, जहाँ रेत में टूटी हुई सीपियों से बिखरे हुए मोतियों के समूह फैले हुए हैं। विमान की तीव्र गति से हम थोड़े ही समय में उस किनारे पर आ गए हैं, जो फलों से झुकी हुई सुपारी (पूग) के वृक्षों की पंक्तियों से सुशोभित है।(Raghuvansham Sarg 13)
कुरुष्व तावत्करभोरु ! पश्चान् मार्गे मृगप्रेक्षिणि ! दृष्टिपातम् ।
एषा विदूरीभवतः समुद्रात् सकानना निष्पततीव भूमिः ॥१८॥
अर्थात:
हे सुन्दर जंघाओं वाली! हे मृग के समान नेत्रों वाली! तुम पहले पीछे के मार्ग की ओर देखो। यह भूमि, जो वन सहित है, समुद्र से दूर होती हुई मानो निकलती चली जा रही है।
कचित्पथा संचरते सुराणां कचिद्धनानां पततां कचिच्च ।
यथाविधो मे मनसोऽभिलाषः प्रवर्तते पश्य तथा विमानम् ॥१९॥
अर्थात:
यह (विमान) कभी देवताओं के मार्ग में चलता है, कभी आकाश में उड़ने वाले धन (मेघ आदि) के बीच विचरण करता है। देखो, यह मेरे मन की इच्छा के अनुसार ही हर प्रकार से संचालित हो रहा है।
असौ महेन्द्रद्विपदानमन्धिः त्रिमार्गगाकीचविमर्दशीतः ।
आकाशवायुर्दिनयौवनोत्थानाचामति स्वेदलवान्मुखे ते ॥२०॥
अर्थात:
यह आकाश में बहने वाली वायु, जो समुद्र के जल, गंगा आदि तीन मार्गों के जलकणों से शीतल हो गई है, तथा जो इन्द्र के हाथी (ऐरावत) के स्नान-स्थल से होकर आई है, दिन के ताप से उत्पन्न तुम्हारे मुख के स्वेद (पसीने) की बूंदों को सुखा रही है।
करेण वातायनलम्बितेन स्पृष्टस्त्वया चण्डि ! कुतूहलिन्या ।
आमुञ्चतीवाभरणं द्वितीयमुद्भिन्नविद्युद्वलयो घनस्ते ॥२१॥
अर्थात:
हे चंचल स्वभाव वाली (सीते)! खिड़की से बाहर लटकते हुए तुम्हारे हाथ द्वारा जिज्ञासा से स्पर्श किए जाने पर यह मेघ मानो अपनी चमकती हुई बिजली रूपी कंगन को दूसरा आभूषण बनाकर धारण कर रहा हो।
अमी जनस्थानमपोढविघ्नं मत्वा समारब्धनवोटजानि ।
अध्यासते चीरभृतो यथास्वं चिरोज्झितान्याश्रममण्डलानि ॥२२॥
अर्थात:
ये (ऋषि-मुनि) जनस्थान को विघ्नों से रहित समझकर नए-नए आश्रमों का निर्माण कर रहे हैं और वल्कल वस्त्र धारण करने वाले ये तपस्वी अपने-अपने उन आश्रमों में फिर से निवास कर रहे हैं, जिन्हें उन्होंने बहुत समय पहले छोड़ दिया था।
सैषा स्थली यत्र विचिन्वता त्वां भ्रष्टं मया नूपुरमेकमब्योम् ।
अदृश्यत देवच्चरणारविन्दविश्लेषदः खादिव बद्धमौनम् ॥२३॥
अर्थात:
यह वही स्थान है, जहाँ तुम्हें खोजते समय मुझे तुम्हारा एक नूपुर (पायल) गिरा हुआ मिला था। उस समय तुम्हारे चरण-कमलों से वियोग के कारण मैं ऐसा मौन हो गया था, मानो आकाश भी स्तब्ध हो गया हो।
त्वं रक्षसा भीरु! यतोऽपनीता तं मार्गमेताः कृपया लता मे ।
अदर्शयन् वक्तुमशक्नुवत्यः शाखाभिरावर्जितपल्लवाभिः ॥२४॥
अर्थात:
हे भयभीत (सीते)! जिस मार्ग से तुम्हें राक्षस (रावण) ले गया था, ये लताएँ मुझ पर कृपा करके उसी मार्ग को दिखा रही हैं। वे बोल तो नहीं सकतीं, परंतु अपनी झुकी हुई शाखाओं और पत्तों के द्वारा मानो उस मार्ग का संकेत कर रही हैं।
मृग्यश्च दर्भाङ्कुरनिर्व्यपेक्षास्तवागतिज्ञं समबोधयन्माम् ।
व्यापारयन्त्यो दिशि दक्षिणस्यामुत्पक्ष्मराजीनि विलोचनानि ॥२५॥
अर्थात:
दर्भ के अंकुरों की परवाह किए बिना घूमने वाले हिरणों ने, जो तुम्हारे आगमन को जान गए थे, मुझे संकेत दिया। दक्षिण दिशा की ओर अपनी लंबी पलकें उठाकर वे बार-बार देखने लगे और इस प्रकार उन्होंने मुझे तुम्हारे आने का आभास कराया।
एतद्भिरेर्माल्यवतः पुरस्तादाविर्भवत्यम्बरलेखि शृङ्गम् ।
नवं पयो यन्त्र घनैर्मया च त्वद्विप्रयोगाश्रु समं विसृष्टम् ॥२६॥
अर्थात:
यह सामने माल्यवान पर्वत की वह चोटी दिखाई दे रही है, जो आकाश को छूती हुई प्रतीत होती है। यहाँ बादलों द्वारा बरसाया गया नया जल और मेरे द्वारा तुम्हारे वियोग में बहाए गए आँसू—दोनों समान ही प्रवाहित हुए हैं।
गन्धश्च धाराहतपल्वलानां कादम्बमर्धागतकेसरं च ।
स्निग्धाश्च केकाः शिखिनां बभूवुर्यस्मिन्नसह्यानि विना त्वया ते ॥२७॥
अर्थात:
वर्षा की धाराओं से भरे हुए छोटे-छोटे जलाशयों की सुगंध, तथा आधे खिले हुए कदंब के फूलों की महक, और मोरों की मधुर पुकार—ये सब उस समय तुम्हारे बिना मुझे असहनीय प्रतीत होते थे।(Raghuvansham Sarg 13)
पूर्वानुभूतं स्मरता च यत्र कम्पोत्तरं भीरु! तवोपगूढम् ।
गुहाविसारीण्यतिवाहितानि मया कथंचिद्धनगर्जितानि ॥२८॥
अर्थात:
हे डरपोक (प्रिय)! उस स्थान पर, जहाँ पहले अनुभव की हुई बातों को स्मरण करते हुए, भय के बाद काँपती हुई तुम मेरे पास आकर लिपट गई थीं, वहाँ गुफाओं में गूँजने वाली मेघों की गर्जना को मैंने किसी प्रकार सहन किया था।
आसारसिक्तक्षितिबाष्पयोगान्मामक्षिणोद्यत्र विभिन्नकोशैः ।
विडम्ब्यसाना नवकन्दलैस्ते विवाहधूमारुणलोचनश्रीः ॥२९॥
अर्थात:
जहाँ वर्षा से भीगी हुई पृथ्वी से उठती भाप के कारण और विभिन्न प्रकार के खिले हुए पुष्पों के साथ निकले हुए नए अंकुरों द्वारा, तुम्हारी आँखों की वह लालिमा मानो उपहास करती हुई प्रतीत होती है, जो विवाह के समय धुएँ के कारण उत्पन्न हुई थी।
उपान्तवानीरवनोपगूढान्यालक्ष्यपारिप्लवसारसानि ।
दूरावतीर्णा पिवतीव खेदादमूनि पम्पासलिलानि दृष्टिः ॥३०॥
अर्थात:
किनारे पर स्थित बाँस के वन से आच्छादित, जल में तैरते हुए हंसों से युक्त उन पम्पा नदी के जल को देखकर ऐसा प्रतीत होता है मानो दूर से आई हुई (थकी हुई) दृष्टि भी उस थकान को दूर करने के लिए उन्हें पी रही हो।
अत्रावियुक्तानि रथाङ्गनाम्नामन्योन्यदत्तोत्पलकेसराणि ।
द्वन्द्वानि दूरान्तरवर्तिना ते मया प्रिये ! सस्पृहमीक्षितानि ॥३१॥
अर्थात:
हे प्रिये! यहाँ रथाङ्ग नामक पक्षियों के जोड़े एक-दूसरे को कमल के केसर देते हुए कभी अलग नहीं होते। उन युगलों को, जो एक-दूसरे से सदा जुड़े रहते हैं, मैंने दूर से ही बड़ी इच्छा के साथ देखा है।
इमां तटाशोकलतां च तन्वीं स्तनाभिरामस्तबकाभिनम्राम् ।
त्वत्प्राप्तिबुद्धया परिरब्धुकामः सौमित्रिणा साश्रुरहं निषिद्धः ॥३२॥
अर्थात:
इस तट पर स्थित इस पतली अशोकलता को, जो अपने सुंदर पुष्पों के गुच्छों के कारण झुकी हुई है, तुम्हें प्राप्त करने की इच्छा से मैं उसे आलिंगन करना चाहता था; लेकिन उस समय आँसू भरे नेत्रों वाले सौमित्रि (लक्ष्मण) ने मुझे रोक दिया।
अमूर्विमानान्तरलम्बिनीनां श्रुत्वा स्वनं काञ्चनकिंकिणीनाम् ।
प्रत्युद्वजन्तीव खमुत्पतन्त्यो गोदावरीसारसपङ्क्यस्त्वाम् ॥३३॥
अर्थात:
उन आकाश में चलने वाले विमानों से लटकती हुई स्वर्ण किंकिणियों (घुँघरुओं) की ध्वनि को सुनकर, गोदावरी के सारसों के समूह मानो तुम्हारा स्वागत करने के लिए आकाश की ओर उड़ते हुए प्रतीत हो रहे हैं।
एषा त्वया पेशलमध्ययापि घटाम्बुसंवर्धितवालचूता ।
आनन्दयत्युन्मुखकृष्णसारा दृष्टा चिरात्पञ्चवटी मनो मे ॥३४॥
अर्थात:
यह वही पंचवटी है, जिसे तुमने अपने कोमल हाथों से घड़ों के जल से सींचकर छोटे-छोटे आम के पौधों के रूप में पाला था। अब उन्हें देखकर, और लंबे समय बाद इस स्थान को देखकर, हिरणों से युक्त यह पंचवटी मेरे मन को अत्यंत आनंद दे रही है।
अत्रानुगोदं सृगयानिवृत्तस्तरङ्गवातेन विनीतखेदः ।
रहस्त्वदुत्सङ्गनिषण्णमूर्धा स्मरामि वानीरगृहेषु सुप्तः ॥३५॥
अर्थात:
यहाँ (इस स्थान पर) गंगा के तट पर शिकार से लौटकर, तरंगों से चलने वाली शीतल वायु से थकान दूर करके, एकांत में तुम्हारी गोद में सिर रखकर वट-वृक्षों के कुंजों में सोते हुए मैं उन क्षणों को स्मरण करता हूँ।
भ्रूभेदमात्रेण पदान्मघोनः प्रभ्रंशयं यो नहुषं चकार ।
तस्याविलाम्भः परिशुद्धिहेतोर्भीमो मुनेः स्थानपरिग्रहोऽयम् ॥३६॥
अर्थात:
जिस महर्षि ने केवल भौंह के इशारे मात्र से नहुष को इन्द्र के पद से गिरा दिया था, उन्हीं भयंकर मुनि के इस स्थान को (समुद्र ने) उनकी शुद्धि के लिए आश्रय के रूप में ग्रहण किया है।
त्रेताग्निधूमाग्रमनिन्यकीर्तेस्तस्येदमाक्रान्तविमानमार्गम् ।
प्राप्ता हविर्गन्धि रजोविमुक्तः समश्नुते मे लघिमानमात्मा ॥३७॥
अर्थात:
उस (समुद्र) की कीर्ति त्रेता युग के यज्ञों के अग्नि-धुएँ से भी आगे तक पहुँच चुकी है और उसने आकाश में चलने वाले विमानों के मार्ग को भी आच्छादित कर लिया है। वहाँ पहुँचकर, हवन की सुगंध से युक्त और धूल-रहित मेरा शरीर हल्केपन (लाघव) को प्राप्त करता है।(Raghuvansham Sarg 13)
एतन्मुनेर्मानिनि! शातकर्णेः पञ्चाप्सरो नाम विहारवारि ।
आभाति पर्यन्तवनं विदूरान्मेधान्तरालक्ष्यमिवेन्दुविम्बम् ॥३८॥
अर्थात:
हे मानिनी! यह महर्षि शातकर्णि का “पञ्चअप्सर” नामक विहार-स्थल (जलाशय) है। इसके चारों ओर का वन दूर से ऐसा प्रतीत होता है, जैसे मेघों के बीच दिखाई देने वाला चन्द्रमा।
पुरा स दर्भाङ्कुरमात्रवृत्तिश्चरन्मृगैः सार्धमृषिर्मघोना ।
समाधिभीतेन किलोपनीतः पञ्चाप्सरोयौवनकूटबन्धम् ॥३९॥
अर्थात:
प्राचीन काल में वह ऋषि, जो केवल दर्भ (घास) के अंकुरों पर ही जीवन यापन करता था और मृगों के साथ विचरण करता था, उसे इन्द्र ने उसकी तपस्या से भयभीत होकर पाँच अप्सराओं के यौवन-जाल में फँसाने के लिए वहाँ लाकर रखा।
तस्यायमन्तर्हितसौधभाजः प्रसक्तसंगीतमृदङ्गघोषः ।
वियज्ञतः पुष्पकचन्द्रशालाः क्षणं प्रतिश्रुन्मुखराः करोति ॥४०॥
अर्थात:
उस (नगर) के भीतर स्थित भवनों से निरंतर गूँजने वाली संगीत और मृदंग की ध्वनि, आकाश में स्थित पुष्पक विमान की चन्द्रशालाओं (खिड़कियों) को क्षणभर के लिए प्रतिध्वनि से मुखरित कर देती है।
हविर्भुजामेधवता चतुणां मध्यं ललाटतपसप्तसप्तः ।।
असौ तपस्यत्यपरस्तपस्वी नाम्ना सतीक्ष्णशचरितेन दान्तः ॥४१॥
अर्थात:
वह (देव या तपस्वी) चारों भुजाओं के बीच अपने ललाट पर स्थित सात-सात प्रकार की तपस्या के द्वारा अग्नि की भेंट करता है। वह अत्यंत तीव्र और कठोर तपस्वी है, पर अपने संयम और अनुशासन से दयालु और शांत है।
अमुं सहासप्रहितेक्षणानि व्याजार्धसंदर्शितमेखलानि ।
नालं विकर्तुं जनितेन्द्रशङ्क सुरांगनाविभ्रमचेष्टितानि ॥४२॥
अर्थात:
समुद्र की आँखों की चमक और उसकी आभा इतनी विशाल और तेजस्वी है कि उसे देख कर जैसे देवता भी अपनी दृष्टि नहीं स्थिर रख पाते। उसकी तरंगों और घूमती हुई धाराओं को नियंत्रित करना भी असंभव प्रतीत होता है, और यह अद्भुत दृश्य देवताओं और सुरांगनाओं (जलनियों) को भी मोहित कर देता है।
एषोऽक्षमालावलयं मृगाणां कण्डूयितारं कुशसूचिलावम् ।
सभाजने मे भुजमूर्ध्वबाहुः सव्येतरं प्राध्वमितः प्रयुङ्क्ते ॥४३॥
अर्थात:
यह आँखों की माला और मृगों की शोभा लिए हुए, कुश और सूचियों से सुसज्जित बाज़ुओं वाला (भुजमूर्ध्वबाहु) व्यक्तित्व है। लोग सभा में बैठते समय अपनी बाईं और दायीं बाजुओं को उठाकर उसे सम्मानपूर्वक दर्शाते हैं।
वाचं यमत्वात् प्रणतिं मम एष कम्पेन किंचित् प्रतिगृह्य मूर्धः ।
दृष्टिं विमानव्यवधानमुक्तां पुनः सहस्त्रार्चिषि संनिधत्ते ॥४४॥
अर्थात:
मेरी बात को स्वीकार करते हुए, उसने हल्के से अपने सिर को झुकाया। फिर उसकी दृष्टि, विमानों के बीच में बिना किसी रुकावट के, हजारों किरणों के प्रकाश में उज्जवल होकर प्रकट होती है।
अदः शरण्यं शरभङ्गनान्नस्तपोवनं पावनमाहिताग्नेः ।
चिराय संतर्प्य समिद्भिरग्निं यो मन्त्रपूतां तनुमप्यहौषीत् ॥४५॥
अर्थात:
वह (अग्नि) सभी शरणागत जीवों के लिए सुरक्षित आश्रय है। तपस्वियों द्वारा संचित, पवित्र अग्नि को लंबे समय तक लकड़ियों से पोषित करने वाला, जिसने मंत्रों से शुद्ध अपने शरीर को प्रदर्शित किया, वही वास्तविक अग्नि है।
छायाविनीताध्वपरिश्रमेषु भूयिष्ठसंभाव्यफलेष्वमीषु ।
तस्यातिथीनामधुना सपर्या स्थिता सुपुत्रेष्विव पादपेषु ॥४६॥
अर्थात:
इस समुद्र पर जो परिश्रम और श्रम बिना किसी दिखावे के किए जाते हैं, वहाँ प्राप्त होने वाले फल सबसे उत्तम और अधिक प्रभावशाली होते हैं। यहाँ मेहमानों के लिए जो सेवा की जाती है, वह इतनी सहज और स्वाभाविक है कि ऐसा प्रतीत होता है जैसे वह अपने पुत्रों की तरह पेड़ों और पौधों पर टिकी हुई हो।
धारास्वनोद्गारिदरीमुखोऽसौ शृंगाग्रलग्नाम्बुदवप्रपङ्कः ।
बन्नाति से बन्धुरगात्रि ! चक्षुर्हप्तः ककुद्मानिव चित्रकूटः ॥४७॥
अर्थात:
यह (समुद्र) अपने प्रवाह और गर्जन से पहाड़ों के मुख जैसे दिखाई देता है, और उसके शिखर पर जमे हुए जल-मलिन भाग उसे और अधिक भव्य बनाते हैं। उसका रूप, जैसे कि किसी चित्रकूट पर्वत की तरह, आंखों को आनंद और आश्चर्य प्रदान करता है।
एषा प्रसन्नस्तिमितप्रवाहा सरिद्विदूरान्तरभावतन्वी ।
मन्दाकिनी भाति नगोपकण्ठे सुक्तावली कण्ठगतेव भूमेः ॥४८॥
अर्थात:
यह नदी (सरिता) प्रसन्न और शांत बहती हुई, दूर-दूर तक फैली हुई है। यह मृदुल और कोमल प्रवाह वाली है, जैसे मृदु गले में बँधी सुक्तियों की माला पृथ्वी पर चमक रही हो।(Raghuvansham Sarg 13)
अयं सुजातोऽनुगिरं तमालः प्रवालमादाय सुगन्धि यस्य ।
यवांकुरापाण्डुकपोलशोभी मयावतंसः परिकल्पितस्ते ॥४९॥
अर्थात:
यह सुजात (उत्तम) तमाल (सुगंधित पेड़) है, जिसकी शाखाओं में सुगंधित प्रवाल जैसे फूल हैं। इसके वृक्ष की यव के अंकुर और पीले चेहरे जैसी सुंदरता से ऐसा प्रतीत होता है कि मानो यह वृक्ष मय (शराब) से सजाया गया हो।
अनिग्रहत्रासविनीतसत्त्वमपुष्पलिङ्गात्फलवन्धिवृक्षम् ।
वैनं तपःसाधनमेतदत्रेराविष्कृतोदग्रतरप्रभावम् ॥५०॥
अर्थात:
यह वृक्ष बिना किसी बाधा और डर के, सरल और शीलवान स्वरूप वाला है। इसमें फूल नहीं हैं, लेकिन फल और शाखाएँ हैं। यह तप और साधना से उगने वाला वृक्ष है, और इसके प्रभाव से निकटतम क्षेत्रों में भी प्रकट होने वाला तेज और शक्ति अनुभव की जाती है।
अत्राभिषेकाय तपोधनानां सप्तर्षिहस्तोद्धृतहेमपद्माम् ।
प्रवर्तयामास किलानुसूया त्रिस्रोतसं त्र्यम्बकमौलिमालाम् ॥५१॥
अर्थात:
इस स्थान पर राज्याभिषेक के अवसर पर, तपस्वी ऋषियों और सप्तर्षियों के हाथों से उठाए गए सोने के कमल से उन्होंने (श्रीराम ने) त्रिस्रोतस (तीन धारा) और त्र्यम्बक (भोलेनाथ) के प्रतीक माला का संचालन किया।
वीरासनैर्ध्यानजषामृषीणाममी समध्यासितवेदिमध्याः ।
निवातनिष्कम्पतया विभान्ति योगाधिरूढा इंव शाखिनोपि ॥५२॥
अर्थात:
वीरासन में ध्यानस्थ होकर बैठी ऋषियों की संपूर्ण सभा, जो वेदियों के बीच में स्थित हैं, वे शान्त और स्थिर रहते हुए जैसे योग के उच्चस्थान पर पहुँचकर प्रकाशमान शाखाओं के समान दिखाई देते हैं।
त्वया पुरस्तादुपयाचितो यः सोऽयं वटः श्याम इति प्रतीतः ।
राशिर्मणीनामिव गारुडानां सपद्मरागः फलितो विभाति ॥५३॥
अर्थात:
तुम्हारे द्वारा पूर्व में पूजा गया यह पेड़ वह है जिसे श्याम रंग का माना जाता है। यह ऐसा है जैसे गारुडों के रत्नों का समूह हो, और कमल के फूल के समान उसके फल चमकते हुए दिखाई देते हैं।
क्वचित्प्रभालेपिभिरिन्द्रनीलैर्मुक्तामयी यष्टिरिवानुविद्धा ।
अन्यत्र माला सितपंकजानामिन्दीवरैरुत्खचितान्तरेव ॥५४॥
अर्थात:
कहीं-कहीं समुद्र की लहरें नीले रत्नों और मोतियों से सजाए हुए मुकुट जैसी प्रतीत होती हैं, और कहीं-कहीं ये सफेद कस्तूरी जैसे मोतियों की माला के समान हैं।
कंचित्खगानां प्रियमानसानां कादम्बसंसर्गवतीव पंक्तिः ।
अन्यंत्र कालागुरुदत्तपत्रा भक्तिर्भुवश्चन्दनकल्पितेव ॥५५॥
अर्थात:
कहीं-कहीं यह लहरें पक्षियों की प्रिय कतारों की तरह व्यवस्थित हैं, और कहीं-कहीं यह समय से प्राप्त पत्तों या चन्दन की सजावट जैसी प्रतीत होती हैं।
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कचित्प्रभा चान्द्रमसी तमोभिश्छायाविलीनैः शनलीकृतेव ।
अन्यत्र शुत्रा शरदभ्रलेखा रन्ध्रेष्विवालक्ष्यनभःप्रदेशा ॥५६॥
अर्थात:
कहीं-कहीं यह चमक चाँदनी और अंधकार के मिलन से बनी छाया जैसी है, और कहीं-कहीं यह बादलों के बीच बिखरे तारों की तरह प्रतीत होती है।
कचिच्च कृष्णोरगभूषणेव भस्माङ्गरागा तनुरीश्वरस्य ।
पश्यानवद्यांगि ! विभाति गंगा भिन्नप्रवाहा यमुनातरंगैः ॥५७॥
अर्थात:
कहीं-कहीं यह अंधकार में जैसे कृष्ण के आभूषण से सजी छवि जैसी दिखती है। देखो, गंगा और यमुना की तरंगों से विभाजित होकर यह सुंदरता प्रकाशमान होती है।
समुद्रपत्न्योर्जलसंनिपाते पूतात्मनामत्र किलाभिषकात् ।
तत्त्वावबोधेन विनापि भूयस्तनुत्यजां नास्ति शरीरबन्धः ॥५८॥
अर्थात:
समुद्र की पत्नी (लक्ष्मी) जल के सम्मिलन में ही अपने शुद्ध स्वरूप में प्रकट होती है। वास्तविक तत्त्व के ज्ञान से ही शरीर का बंधन समाप्त होता है; बिना उस ज्ञान के, शरीर का बंधन कभी पूरी तरह नहीं टूटता।
पुरं निषादाधिपतेरिदं तद्यस्मिन्मया मौलिमर्माण विहाय
जटासु बद्धास्वरुदत्सुमन्त्रः कैकेयि ! कामाः फलितास्तवेति ॥५९॥
अर्थात:
मैंने निषादों के राजा के नगर में जाकर, अपने कपाल की शक्ति को त्यागते हुए, जटाओं में बंधे स्वर और उत्साह से यह घोषणा की कि हे कैकेयी! तुम्हारे संकल्पित इच्छाएँ और काम पूरे होंगे।
पयोधरैः पुण्यजनांगनानां निर्विष्टहेमाम्बुजरेणु यस्याः
ब्राह्म सरः कारणमाप्तवाचो बुद्धेरिवाव्यक्तमुदाहरन्ति ॥६०॥
अर्थात:
जिसके स्तनों पर पुण्य पुरुषों की कन्याओं के पवित्र जल की बूँदों की तरह सोने के समान चमकते अंश हैं, वही ब्राह्मण-सर और बुद्धि का कारण है, जिसे देख कर वाणी और विचार भी सहज रूप से प्रकट होते हैं।
जलानि या तीरनिखातयूपा वहत्ययोध्यामनु राजधानीम् ।
तुरंगमेधावभृथावतीर्णैरिक्ष्वाकुभिः पुण्यतरीकृतानि ॥ ६१ ॥
अर्थात:
जो राजधानी अयोध्या के पास बहने वाली नदी (सरयू) है, उसके तटों पर यज्ञ-स्तम्भ (यूप) गड़े हुए थे। उन जलों को इक्ष्वाकु वंश के राजाओं ने अश्वमेध यज्ञ के बाद किए गए अवभृथ स्नान से और भी अधिक पवित्र बना दिया था।
यां सैकतोत्संगसुखोचितानां प्राज्यैः पयोभिः परिवर्धितानाम् ।
सामान्यधात्रीमिव मानसं मे संभावयत्युत्तरकोसलानाम् ॥६२॥
अर्थात:
जिस भूमि में रेतिले तटों (नदी-किनारों) के सुख के योग्य लोगों का प्रचुर जल से पालन-पोषण हुआ है, वह उत्तरकोसल देश मेरे मन में ऐसी प्रतीत होती है जैसे वह सभी की समान रूप से पालन करने वाली धात्री (माता / पालनकर्ता) हो।
सेयं मदीया जननाव तेन मान्येन राज्ञा सरयूवियुक्ता ॥
दूरे वसन्तं शिशिरानिलैर्मि तरंगहस्तैरुपगूहतीव ॥ ६३ ॥
अर्थात:
यह मेरी जननी समान सरयू नदी उस माननीय राजा के कारण मुझसे अलग हो गई है। वह दूर रहते हुए भी शीतकालीन पवनों और अपनी तरंगरूपी भुजाओं से मानो मुझे आलिंगन कर रही है।
विरक्तसंध्याकपिशं पुरस्ताद्यतो रजः पार्थिवमुज्जिहीते ॥
शडे हनुमत्कथितप्रवृत्तिः प्रत्युद्गतो मां भरतः ससैन्यः ॥ ६४ ॥
अर्थात:
संध्या के समय के समान कपिश (भूरे) रंग की धूल आगे उठ रही है — इससे जान पड़ता है कि हनुमान द्वारा मेरे आने का समाचार पाकर भरत सेना सहित मेरा स्वागत करने के लिए आगे बढ़ रहे हैं।
अद्धा श्रियंः पालितसंगराय प्रत्यर्पयिष्यत्यनघां स साधुः ॥
हत्वा निवृत्ताय मृधे खरादीन्संरक्षितां त्वामिव लक्ष्मणो मे ॥ ६५॥
अर्थात:
वह साधु और निष्पाप भरत निश्चित ही युद्ध में सुरक्षित रखी गई इस निष्कलंक लक्ष्मी (राज्य-श्री) को मुझे पुनः समर्पित करेगा — जैसे लक्ष्मण ने युद्ध में खर आदि राक्षसों को मारकर तुम्हारी रक्षा की थी।(Raghuvansham Sarg 13)
असौ पुरस्कृत्य गुरुं पदातिः पश्चादवस्थापितवाहिनीकः ॥
वृद्धेरमात्यैः सह चीरवासा मामर्थ्यपाणिर्भरतोऽभ्युपैति ॥ ६६ ॥
अर्थात:
वह भरत गुरु को आगे करके, स्वयं पैदल चलते हुए, पीछे सेना को ठहराकर, वृद्ध मंत्रियों के साथ, वल्कल वस्त्र धारण किए और हाथ जोड़कर मुझे मिलने के लिए आ रहा है।
पित्रा विसृष्टां सदपेक्षया यः श्रियं युवाप्यङ्कगतामभोक्ता ॥
इयन्ति वर्षाणि तया सहोग्रमभ्यस्यतीव व्रतमासिधारम् ॥ ६७ ॥
अर्थात:
जिस भरत ने पिता द्वारा दी गई, गोद में आई हुई राज्य-लक्ष्मी को भी उचित अवसर की प्रतीक्षा करते हुए युवावस्था में नहीं भोगा, वही इन इतने वर्षों से उसके साथ मानो तलवार की धार के समान कठिन व्रत का पालन करता हुआ रहा है।
एतावदुक्तवति दाशरथौ तदीया मिच्छां विमानमधिदेवतया विदित्वा ॥
ज्योतिष्पथादवततार सविस्मयाभि रुद्वीक्षितं प्रकृतिभिर्भरतानुगाभिः ॥ ६८ ॥
अर्थात:
जब दाशरथि (श्रीराम) इतना कह चुके, तब उस विमान की अधिष्ठात्री देवता ने उनकी इच्छा जान ली। तत्पश्चात वह विमान आकाशमार्ग से नीचे उतर आया, जिसे भरत के साथ आई हुई प्रजा ने बड़े आश्चर्य के साथ ऊपर देखकर निहारा।
तस्मात्पुरःसरविभीषणदर्शितेन सेवाविचक्षणहरीश्वरदत्तहस्तः ॥
यानादवातरददूरमहीतलेन मार्गेण भङ्गिरचितस्फटिकेन रामः ॥ ६९ ॥
अर्थात:
तब आगे-आगे चलकर मार्ग दिखाते हुए विभीषण के साथ, सेवा में निपुण वानरराज द्वारा हाथ पकड़कर सहारा दिए जाने पर राम उस विमान से उतरे और दूर तक फैले हुए, विविध आकृतियों से सुसज्जित स्फटिक-सदृश (चमकदार) मार्ग से पृथ्वी पर अवतरित हुए।(Raghuvansham Sarg 13)
इक्ष्वाकुवंशगुरवे प्रयतः प्रणम्य स भ्रातरं भरतमर्ध्यपरिग्रहान्ते ॥
पर्यश्रुरस्वजत मूर्धनि चोपजत्रौ तद्भक्त्यपोढ पितृराज्यमहाभिषेके ॥ ७० ॥
अर्थात:
इक्ष्वाकु वंश के गुरु (वसिष्ठ) को आदरपूर्वक प्रणाम करके और उनके द्वारा अर्घ्य ग्रहण करने के बाद, राम ने अपने भाई भरत को आँसुओं से भरे नेत्रों के साथ गले लगा लिया तथा उसके सिर और कंधों को स्नेह से स्पर्श किया। भरत की उसी भक्ति के कारण, राम के पिता के राज्य के महान् अभिषेक (राज्याभिषेक) का कार्य सम्पन्न हुआ।
श्मश्रुप्रवृद्धिजनिताकृतिविक्रियांश्च पौरान् प्ररोहजटिलानिव मन्त्रिवृद्धान् ॥
अन्वग्रहीत् प्रणमतः शुभदृष्टिपातैर्वार्तानुयोगमधुराक्षरया च वाचा ॥ ७१ ॥
अर्थात:
दाढ़ी-मूँछ बढ़ जाने से जिनकी आकृति बदल गई थी और जो अंकुरों की तरह जटाएँ बढ़ाए हुए वृद्ध मंत्रियों के समान दिखाई दे रहे थे, ऐसे नगरवासियों को जो उन्हें प्रणाम कर रहे थे, उन्होंने शुभ दृष्टि से देखकर और कुशल-क्षेम पूछने वाली मधुर वाणी से सम्मानपूर्वक स्वीकार किया।(Raghuvansham Sarg 13)
दुर्जातबन्धुरयमृक्षहरीश्वरो मे पौलस्त्य एष समरेषु पुरः प्रहर्ता ॥
इत्यादृतेन कथितौ रघुनन्दनेन व्युत्क्रम्य लक्ष्मणमुझौ भरतो ववन्दे ॥७२॥
अर्थात:
“यह वानरों और भालुओं का राजा मेरा प्रिय मित्र है, और यह पुलस्त्यवंशी (विभीषण) युद्धों में मेरे आगे-आगे प्रहार करने वाला वीर है” — इस प्रकार रघुनन्दन (राम) द्वारा आदरपूर्वक परिचय कराए जाने पर भरत ने लक्ष्मण को पीछे छोड़कर उन दोनों (सुग्रीव और विभीषण) को प्रणाम किया।
सौमित्रिणा तदनु संससृजे स चैनम् उत्थाप्य नम्रशिरसं भृशमालिलिङ्ग ॥
रूढेन्द्रजित्प्रहरणत्रणकर्कशेन क्लिश्यन्निवास्य भुजमध्यमुरःस्थलेन ॥ ७३ ॥
अर्थात:
तत्पश्चात् सौमित्र (लक्ष्मण) ने भी उन्हें (भरत को) आलिंगन किया। फिर भरत ने झुके हुए सिर वाले लक्ष्मण को उठाकर अत्यन्त प्रेम से गले लगाया। इन्द्रजित के अस्त्रों के आघात से कठोर हो चुके अपने भुजाओं और वक्षस्थल के बीच उन्हें इस प्रकार दबाया, मानो वे (लक्ष्मण) उस कठोर स्पर्श से कष्ट अनुभव कर रहे हों।
रामाज्ञया हरिचमूपतयस्तदानीं कृत्वा मनुष्यवपुरारुरुहुर्गजेन्द्रान् ॥
तेषु क्षरत्सु बहुधा मदवारिधाराः शैलाधिरोहणसुखान्युपलेभिरे ते ॥ ७४ ॥
अर्थात:
उस समय राम की आज्ञा से वानर-सेना के प्रमुखों ने मनुष्य का रूप धारण करके विशाल हाथियों पर आरूढ़ हुए। उन हाथियों से अनेक प्रकार की मदजल की धाराएँ बह रही थीं, और उन पर चढ़कर वे मानो पर्वत पर चढ़ने जैसा सुख अनुभव कर रहे थे।
सानुप्लवः प्रभुरपि क्षणदाचराणां भेजे रथान्दशरथप्रभवानुशिष्टः ॥
मायाविकल्परचितैरपि ये तदीयैर्न स्यन्दनैस्तुलितकृत्रिमभक्तिशोभाः ॥ ७५ ॥
अर्थात:
रात्रि में विचरण करने वाले राक्षसों का स्वामी (रावण) भी दशरथपुत्र राम द्वारा सिखाए गए (युद्ध-कौशल के कारण) रथों का सहारा लेने लगा। उसके द्वारा माया से रचे गए रथ भी राम के वास्तविक रथों की स्वाभाविक, सच्ची और शोभायुक्त शक्ति तथा भव्यता की बराबरी नहीं कर सके।
भूयस्ततो रघुपतिर्विलसत्पताक-मध्यास्त कामगति सावरजो विमानम् ॥
दोषातनं बुधबृहस्पतियोगदृश्य-स्तारापतिस्तरलविद्युदिवाभ्रवृन्दम् ॥ ७६ ॥
अर्थात:
इसके बाद रघुपति (श्रीराम) अपने अनुज (लक्ष्मण) सहित उस विमान में बैठे, जो चमकती हुई पताकाओं से सुशोभित था और इच्छा के अनुसार गति करने वाला था। वह विमान ऐसे प्रतीत हो रहा था जैसे रात्रि के अंधकार को दूर करने वाला चन्द्रमा, जो बुध और बृहस्पति के योग में ताराओं के स्वामी के समान, चंचल विद्युत् से युक्त मेघसमूह के बीच दिखाई देता है।
तत्रेश्वरेण जगतां प्रलयादिवोवी वर्षात्ययेन रुचमभ्रघनादिवेन्दोः ॥
रामेण मैथिलसुतां दशकण्ठकृच्छ्रात् प्रत्युदतां धृतिमतीं भरतो ववन्दे ॥ ७७ ॥
अर्थात:
वहाँ भरत ने धैर्यवान राम को प्रणाम किया — जिन्होंने जगत के ईश्वर की भाँति प्रलय के बाद (जगत को) पुनः प्रकाश देने वाले सूर्य के समान, और वर्षा ऋतु के बाद मेघों से मुक्त हुए चन्द्रमा की तरह अपनी शोभा प्राप्त की थी; तथा जिन्होंने दशानन (रावण) के कष्ट से मैथिली (सीता) को मुक्त कराया था।(Raghuvansham Sarg 13)
लंकेश्वरप्रणतिभङ्गदृढव्रतं तद्वन्द्यं युगं चरणयोर्जनकात्मजायाः ॥
ज्येष्ठानुवृत्तिजटिलं च शिरोऽस्य साधोरन्योन्यपावनमभूद् भयम् समेत्य ॥ ७८ ॥
अर्थात:
लंकेश्वर (रावण) की प्रणति (विनय) को अस्वीकार करने के दृढ़ व्रत से युक्त जनकनन्दिनी सीता के वे दोनों चरण वंदनीय थे। और ज्येष्ठ भाई की सेवा के कारण जटाओं से युक्त उस साधु (राम) का मस्तक — ये दोनों (सीता के चरण और राम का मस्तक) परस्पर मिलकर एक-दूसरे को पवित्र करने वाले बन गए।
क्रोशार्धं प्रकृतिपुरःसरेण गत्वा काकुत्स्थः स्तिमितजवेन पुष्पकेण ॥
शत्रुप्तप्रतिविहितोपकार्यमार्यः साकेतोपवनसुदारमध्युवास ॥ ७९ ॥
अर्थात:
काकुत्स्थ (श्रीराम) अपनी प्रजा को आगे करके, मन्द गति से चलने वाले पुष्पक विमान द्वारा आधा क्रोश दूरी तक जाकर — शत्रुओं का नाश करके और आवश्यक कर्तव्यों को पूरा कर — अयोध्या (साकेत) के सुन्दर उपवनों के बीच ठहरे।
इति श्रीमहाकविकालिदासविरचिते रघुवंशे महाकाव्ये त्रयोदशः सर्गः ॥ १३॥
अर्थात:
इस प्रकार महाकवि कालिदास द्वारा रचित रघुवंश महाकाव्य के तेरहवें सर्ग का समापन होता है।
यहां एक क्लिक में पढ़ें ~ नवग्रह स्तोत्र
रघुवंशम् – सर्ग 13 की कथा:
तेरहवाँ सर्ग श्रीराम के अयोध्या लौटने और रामराज्य की स्थापना का चित्रण करता है। पुष्पक विमान से यात्रा करते हुए श्रीराम अपनी पत्नी सीता को उन सभी स्थलों और आश्रमों का दर्शन कराते हैं, जहाँ वे वनवास में रुके थे। वे बताते हैं कि किस स्थान पर उन्हें दुःख हुआ, कहाँ उन्होंने तपस्या की और किन पवित्र स्थलों पर उन्होंने सुख और शांति का अनुभव किया।(Raghuvansham Sarg 13)
इस यात्रा में श्रीराम ने कई पवित्र स्थलों का वर्णन किया, जैसे पंपासर, पंचवटी, गोदावरी और अगस्त्य आश्रम। उन्होंने चित्रकूट में वटवृक्ष और गंगा-यमुना संगम जैसी पवित्र जगहों का दर्शन कराया, जहाँ स्नान और पूजा से मोक्ष की प्राप्ति मानी जाती है। इसके माध्यम से कालिदास ने वनवास की कठिनाइयों और पवित्र स्थलों की महिमा को दर्शाया है।
अयोध्या की ओर बढ़ते हुए, श्रीराम ने नदी सरयू की सुंदरता और नगर की शोभा देखी। इस समय उनके स्वागत के लिए भरत, गुरुमंत्रियों और अन्य गणमान्य लोग तैयार थे। श्रीराम ने पुष्पक विमान से पृथ्वी पर उतरकर उनका स्वागत किया और अयोध्या के उपवनों में डेरा डाला।
सर्ग में यह भी दिखाया गया है कि रामराज्य केवल शक्ति या अधिकार का राज्य नहीं था, बल्कि धर्म, न्याय, करुणा और भाईचारे का आदर्श राज्य था। भरत का आगमन और उनका राम के प्रति भक्ति और सम्मान इस आदर्श को और मजबूत करता है।(Raghuvansham Sarg 13)
इस प्रकार सर्ग 13 में श्रीराम और सीता का पुनर्मिलन, नगर और नदियों की शोभा, तथा आदर्श शासन का चित्रण अत्यंत काव्यात्मक और प्रेरणादायक रूप में प्रस्तुत किया गया है। यह सर्ग रामराज्य के आदर्श और मानव मूल्यों का अमूल्य प्रतीक है।


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