गायत्री महाविज्ञान हिंदी में
भारतीय संस्कृति केवल कर्मकांडों का संकलन नहीं, बल्कि चेतना, विज्ञान और आत्म-विकास की एक अत्यंत समृद्ध परंपरा है। इसी परंपरा की एक अनुपम कृति है “गायत्री महाविज्ञान (Gayatri Mahavigyan in Hindi)” जिसे युगद्रष्टा, वेदमूर्ति और तपोनिष्ठ पं० श्रीराम शर्मा आचार्य ने रचा। यह ग्रंथ गायत्री मंत्र को केवल एक जप-मंत्र के रूप में नहीं, बल्कि जीवन-विज्ञान के रूप में प्रस्तुत करता है। यही कारण है कि यह पुस्तक साधकों, विचारकों, जिज्ञासुओं और आत्म-विकास की खोज में लगे प्रत्येक व्यक्ति के लिए समान रूप से उपयोगी है।
गायत्री महाविज्ञान का मूल उद्देश्य है—मनुष्य के अंतःकरण में सद्बुद्धि, सत्प्रेरणा और आत्मबल का जागरण। आचार्य श्री ने अपने दीर्घकालीन साधना-अनुभव और शास्त्रीय अध्ययन के आधार पर यह स्पष्ट किया है कि गायत्री कोई सीमित धार्मिक अवधारणा नहीं, बल्कि सार्वभौमिक चेतना-शक्ति है, जो मन, बुद्धि और जीवन के प्रत्येक क्षेत्र को आलोकित कर सकती है।
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शास्त्रों में गायत्री को वेदमाता कहा गया है। ऋक्, यजु, साम और अथर्व—चारों वेदों की चेतना का मूल स्रोत गायत्री ही मानी गई है। परंतु गायत्री महाविज्ञान इस पारंपरिक मान्यता से एक कदम आगे बढ़कर यह बताता है कि गायत्री मंत्र के चौबीस अक्षर मानव चेतना के चौबीस शक्तिकेंद्रों से जुड़े हैं। इन अक्षरों का वैज्ञानिक, मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक विश्लेषण इस ग्रंथ की विशेषता है।
यह पुस्तक स्पष्ट करती है कि जैसे भौतिक विज्ञान बाह्य जगत के नियमों को समझाता है, वैसे ही अध्यात्म विज्ञान अंतर्जगत की शक्तियों को पहचानने का मार्ग दिखाता है। गायत्री साधना इसी अध्यात्म विज्ञान की केन्द्रीय धुरी है।
गायत्री महाविज्ञान (Gayatri Mahavigyan in Hindi) का संयुक्त संस्करण तीन प्रमुख भागों में विभाजित है, जो इसे एक सम्पूर्ण साधना-ग्रंथ बनाते हैं।
प्रथम भाग में गायत्री की उत्पत्ति, उसकी सूक्ष्म शक्तियाँ, साधना का उद्देश्य, स्त्री-पुरुष समान अधिकार, मानसिक शुद्धि, चरित्र निर्माण और जीवन-परिष्कार जैसे विषयों पर गहन विवेचन मिलता है। यह खंड विशेष रूप से उन पाठकों के लिए उपयोगी है जो गायत्री को समझना चाहते हैं—सिर्फ मानना नहीं।
द्वितीय भाग शास्त्रीय आधार प्रस्तुत करता है। इसमें गायत्री उपनिषद, गायत्री गीता, गायत्री सहस्रनाम, कवच, स्तोत्र, हवन, तर्पण आदि का समावेश है। यह भाग साधकों को शास्त्रसम्मत विधि और परंपरा से जोड़ता है, जिससे साधना में संतुलन और प्रामाणिकता बनी रहती है।
तृतीय भाग गायत्री साधना के गूढ़ रहस्यों को उजागर करता है—पंचकोश साधना (अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनंदमय कोश), नाद, बिंदु, स्वर योग और आत्मानुभूति जैसे विषयों के माध्यम से। यह खंड गंभीर साधकों और अध्यात्म के विद्यार्थियों के लिए अत्यंत मूल्यवान है।
गायत्री महाविज्ञान (Gayatri Mahavigyan in Hindi) की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह चमत्कारों का लोभ नहीं, चरित्र का निर्माण सिखाती है। आचार्य श्री बार-बार यह स्पष्ट करते हैं कि गायत्री साधना का वास्तविक फल है—सद्बुद्धि का विकास। जब बुद्धि शुद्ध होती है, तो कर्म अपने-आप सही दिशा में प्रवाहित होने लगते हैं, और जीवन में सुख-शांति का स्वाभाविक उदय होता है।
यह ग्रंथ बताता है कि संसार के तीन मूल दुःख—अज्ञान, अशक्ति और अभाव—गायत्री की तीन धाराओं (सरस्वती, लक्ष्मी और काली) के संतुलित साधन से दूर किए जा सकते हैं। इस प्रकार यह पुस्तक आध्यात्मिक होने के साथ-साथ व्यावहारिक जीवन मार्गदर्शिका भी बन जाती है।
आज के तनावपूर्ण, असंतुलित और तेज़ गति वाले जीवन में गायत्री महाविज्ञान पहले से अधिक प्रासंगिक हो गया है। यह न तो पलायन सिखाता है और न ही अंधविश्वास, बल्कि विवेक, आत्मसंयम और आंतरिक शक्ति को जाग्रत करने का मार्ग दिखाता है। विद्यार्थी, गृहस्थ, साधक, शिक्षक, समाजसेवी—हर वर्ग का पाठक इसमें अपने लिए उपयोगी सूत्र पा सकता है।
यहां एक क्लिक में पढ़िए ~ गायत्री चालीसा हिंदी में
गायत्री महाविज्ञान उन दुर्लभ ग्रंथों में से है जो ज्ञान, विज्ञान, भक्ति और साधना—चारों को एक सूत्र में पिरो देता है। यह पुस्तक पाठक को बाहरी संसार से भीतर की यात्रा पर ले जाती है, जहाँ आत्मबल, शांति और उद्देश्य का साक्षात्कार होता है। महाकाव्य साइट पर इसका प्रकाशन न केवल एक पुस्तक का जोड़ है, बल्कि एक जागृत परंपरा का आमंत्रण है।


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