
Narasimha Stotra
नरसिंह स्तोत्र: भय और नकारात्मक शक्तियों से रक्षा
नरसिंह स्तोत्र (Narasimha Stotra) हिंदू धर्म के सबसे शक्तिशाली और प्रभावशाली स्तोत्रों में से एक माना जाता है, जो भगवान नरसिंह को समर्पित है। यह स्तोत्र केवल एक धार्मिक प्रार्थना नहीं है, बल्कि एक दिव्य ऊर्जा स्रोत की तरह माना जाता है, जो भक्त के जीवन से भय, नकारात्मक शक्तियों, मानसिक तनाव और बाधाओं को दूर करने की क्षमता रखता है। जब कोई व्यक्ति श्रद्धा और विश्वास के साथ इस स्तोत्र का पाठ करता है, तो उसके भीतर साहस, आत्मविश्वास और आध्यात्मिक शक्ति का संचार होने लगता है।
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हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान नरसिंह का अवतार उस समय हुआ जब पृथ्वी पर अधर्म और अत्याचार अपने चरम पर था। हिरण्यकशिपु जैसे दैत्य ने स्वयं को अजेय मान लिया था और देवताओं, मनुष्यों तथा धर्म सभी का विरोध करने लगा था। ऐसे संकटपूर्ण समय में भगवान विष्णु ने आधा मनुष्य और आधा सिंह का रूप धारण कर नरसिंह अवतार लिया और यह सिद्ध किया कि धर्म की रक्षा के लिए ईश्वर किसी भी रूप में प्रकट हो सकते हैं। नरसिंह स्तोत्र (Narasimha Stotra) इसी दिव्य अवतार की महिमा का वर्णन करता है, जिसमें उनके उग्र रूप, शक्ति और करुणा का अद्भुत संतुलन देखने को मिलता है।
इस स्तोत्र की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें भगवान के अत्यंत उग्र स्वरूप का वर्णन होते हुए भी इसका अंतिम उद्देश्य भक्तों की रक्षा और शांति की स्थापना करना है। नरसिंह का क्रोध केवल अधर्म और दुष्ट शक्तियों के विनाश के लिए है, न कि सामान्य जीवों को भयभीत करने के लिए। यही कारण है कि इस स्तोत्र का पाठ करने से भय नहीं, बल्कि सुरक्षा और आत्मबल की भावना उत्पन्न होती है।
नरसिंह स्तोत्र (Narasimha Stotra) का नियमित पाठ विशेष रूप से उन लोगों के लिए लाभकारी माना जाता है जो जीवन में बार-बार आने वाली कठिनाइयों, शत्रु बाधाओं या मानसिक भय से परेशान रहते हैं। ऐसा विश्वास किया जाता है कि इस स्तोत्र के प्रभाव से व्यक्ति के चारों ओर एक अदृश्य सुरक्षा कवच बन जाता है, जो उसे हर प्रकार की नकारात्मक ऊर्जा से बचाता है। इसके साथ ही यह स्तोत्र मन को स्थिर करता है और व्यक्ति के आत्मविश्वास को मजबूत करता है।
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अंततः कहा जा सकता है कि नरसिंह स्तोत्र केवल एक धार्मिक पाठ नहीं है, बल्कि यह जीवन में साहस, सुरक्षा और आध्यात्मिक शक्ति का स्रोत है। यह हमें सिखाता है कि सत्य और धर्म की हमेशा विजय होती है और सच्चे भक्त की रक्षा स्वयं भगवान करते हैं।
नरसिंह स्तोत्र (Narasimha Stotra)
उदयरवि सहस्त्रद्योतितं रूक्षवीक्ष प्रळय जलधिनादं कल्पकृद्वह्नि वनम् ।
सुरपतिरिपु वक्षश्छेद रक्तोक्षिताङ्ग प्रणतभयहरं तं नारसिंहं नमामि ॥
प्रळयरवि कराळाकार रुचक्रवालं विरळय दुरुरोची रोचिताशान्तराल ।
प्रतिभयतम कोपात्त्युत्कटोच्चाट्टहासिन् दह दह नरसिंहासह्यवीर्याहितंमे ॥ १॥
सरस रभसपादा पातभाराभिराव प्रचकितचल सप्तद्वन्द्व लोकस्तुतस्त्त्वम् ।
रिपुरुधिर निषेकेणैव शोणाद्विशालिन् दह दह नरसिंहासह्यवीयाहितंमे ॥ २॥
तव घनघनघोषो घोरमाघ्राय जड्या परिघ मलघु मूरु व्याजतेजो गिरिञ्च ।
घनविघटतमागाद्दत्य जङ्खालसड्डो दह दह नरसिंहासह्यवीयाहितंमे ॥ ३॥
कटकि कटकराजद्धाट्ट काग्र्यस्थलाभा प्रकट पट तटित्ते सत्कटिस्थातिपट्टी ।
कटुक कटुक दुष्टाटोप दृष्टिप्रमुष्टौ दह दह नरसिंहासह्यवीर्याहितंमे ॥ ४॥
प्रखर नखर वज्रोत्खात रोक्षारिवक्षः शिखरि शिखर रक्त्यराक्तसंदोह देह ।
सुवलिभ शुभ कुक्षे भद्र गम्भीरनाभे दह दह नरसिंहासह्यवीर्याहितंमे ॥ ५॥
स्फुरयति तव साक्षात्सैव नक्षत्रमाला क्षपित दितिज वक्षो व्याप्तनक्षत्रमार्गम् ।
अरिदरधर जान्वासक्त हस्तद्वयाहो दह दह नरसिंहासह्यवीर्याहितंमे ॥ ६॥
कटुविकट सटौघोद्धट्टनाद्धष्टभूयो घनपटल विशालाकाश लब्धावकाशम् ।
करपरिघ विमर्द प्रोद्यमं ध्यायतस्ते दह दह नरसिंहासह्यवीर्याहितंमे ॥ ७॥
हठलुठ दल घिष्टोत्कण्ठदष्टोष्ठ विद्युत् सटशठ कठिनोरः पीठभित्सुष्ठुनिष्ठाम् ।
पठतिनुतव कण्ठाधिष्ठ घोरान्त्रमाला दह दह नरसिंहासह्यवीर्याहितंमे ॥ ८॥
हृत बहुमिहि राभासह्यसंहाररंहो हुतवह बहुहेति हेपिकानन्त हेति ।
अहित विहित मोहं संवहन् सेंहमास्यं दह दह नरसिंहासह्यवीर्याहितंमे ॥ ९॥
गुरुगुरुगिरिराजत्कन्दरान्तर्गतव दिनमणि मणिशृङ्गे वन्तवह्निप्रदीप्ते ।
दधति कटुदंष्ये भीषणोज्जिह्व वने दह दह नरसिंहासह्यवीर्याहितंमे ॥ १० ॥
अधरित विबुधाब्धि ध्यानधैर्य विदीध्य द्विविध विबुधधी श्रद्धापितेन्द्रारिनाशम् ।
विदधदति कटाहोद्धट्टनेद्धाट्टहासं दह दह नरसिंहासह्यवीर्याहितंमे ॥ ११ ॥
त्रिभुवन तृणमात्र त्राण तृष्णन्तु नेत्र-त्रयमति लधितार्चिर्विष्ट पाविष्टपादम् ।
नवतर रवि ताघ्रं धारयन् रूक्षवीक्ष दह दह नरसिंहासह्यवीर्याहितंमे ॥ १२॥
भ्रमद भिभव भूभृद्धरिभूभारसद्भिद्-भिदनभिनव विदभ्रू विभ्र मादद्ध शुभ्र ।
ऋभुभव भय भेत्तर्भासि भो भो विभोऽभि-र्दह दह नरसिंहासह्यवीर्याहितंमे ॥ १३॥
श्रवण खचित चञ्चत्कुण्ड लोच्चण्डगण्ड भ्रुकुटि कटुललाट श्रेष्ठनासारुणोष्ठ ।
वरद सुरद राजत्केसरोत्सारि तारे दह दह नरसिंहासह्यवीर्याहितंमे ॥ १४॥
प्रविकच कचराजद्रन कोटीरशालिन् गलगत गलदुस्त्रोदार रत्नाङ्गदाढ्य ।
कनक कटक काञ्ची शिञ्जिनी मुद्रिकावन् दह दह नरसिंहासह्यवीर्याहितंमे ॥ १५॥
अरिदरमसि खेटौ बाणचापे गदां सन्-मुसलमपि दधानः पाशवर्याङ्कशौ च ।
करयुगल धृतान्त्रस्त्रग्विभिन्नारिवक्षो दह दह नरसिंहासह्यवीर्याहितंमे ॥ १६ ॥
चट चट चट दूरं मोहय भ्रामयारिन् कडि कडि कडि कायं ज्वारय स्फोटयस्व ।
जहि जहि जहि वेगं शात्रवं सानुबन्धं दह दह नरसिंहासह्यवीयाहितंमे ॥ १७॥
विधिभव विबुधेश भ्रामकाग्नि स्फुलिङ्ग प्रसवि विकट दंष्पोज्जिह्ववन त्रिनेत्र ।
कल कल कलकामं पाहिमां ते सुभक्तं दह दह नरसिंहासह्यवीर्याहितंमे ॥ १८ ॥
कुरु कुरु करुणां तां साङ्कुरां दैत्यपोते दिश दिश विशदांमे शाश्वतीं देवदृष्टिम् ।
जय जय जय मुर्तेऽनार्त जेतव्य पक्ष दह दह नरसिंहासह्यवीर्याहितंमे ॥ १९॥
स्तुतिरिहमहितघ्नी सेवितानारसिंही तनुरिवपरिशान्ता मालिनी साऽभितोऽलम् ।
तदखिल गुरुमाच्य श्रीधरूपालसद्भिः सुनिय मनय कृत्यैः सद्गुणैर्नित्ययुक्ताः ॥ २०॥
लिकुचतिलकसूनुस्सद्धितार्थानुसारी नरहरि नुतिमेतां शत्रुसंहार हेतुम् ।
अकृत सकल पापध्वंसिनीं यः पठेत्तां व्रजति नृहरिलोकं कामलोभाद्यसक्तः ॥ २१॥
अथवा इति कविकुलतिलक श्री त्रिविक्रमपण्डिताचार्यसुत नारायणपण्डिताचार्य विरचितम् श्रीनरसिंहस्तोत्रं सम्पूर्णम् ।
॥ भारतीरमणमुख्यप्राणान्तर्गत श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥

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