
Daridra Dahan Shiv Stotra
दारिद्र्य और दुःखों का नाश करने वाला दिव्य पाठ: दारिद्र्य दहन शिव स्तोत्र
सनातन धर्म में भगवान शिव को करुणा, संहार और कल्याण का देवता माना गया है। वे अपने भक्तों के सभी कष्टों को हरने वाले तथा जीवन में सुख, शांति और समृद्धि प्रदान करने वाले देव हैं। उन्हीं भगवान शिव की कृपा प्राप्त करने के लिए अनेक दिव्य स्तोत्रों की रचना की गई है, जिनमें “दारिद्र्य दहन शिव स्तोत्र (Daridra Dahan Shiv Stotra)” अत्यंत प्रभावशाली और लोकप्रिय माना जाता है। यह पवित्र स्तोत्र ऋषि वशिष्ठ द्वारा रचित माना जाता है और इसमें भगवान शिव के दिव्य स्वरूप, गुणों और कृपा का अत्यंत सुंदर वर्णन मिलता है।
सम्पूर्ण शिव महापुराण हिंदी में
“दारिद्र्य दहन” का अर्थ है — दारिद्र्य अर्थात गरीबी, दुःख और अभाव का नाश करने वाला। इस स्तोत्र में भगवान शिव को ऐसे देव के रूप में प्रणाम किया गया है जो अपने भक्तों के जीवन से केवल आर्थिक अभाव ही नहीं, बल्कि मानसिक पीड़ा, भय, नकारात्मकता और दुखों को भी दूर करते हैं। प्रत्येक श्लोक में भगवान शिव के अलग-अलग दिव्य रूपों और गुणों का वर्णन है, जैसे जटाधारी, गंगाधर, त्रिनेत्रधारी, भस्म-विभूषित और भक्तवत्सल महादेव।
मान्यता है कि जो व्यक्ति श्रद्धा और विश्वास के साथ प्रतिदिन “दारिद्र्य दहन शिव स्तोत्र (Daridra Dahan Shiv Stotra)” का पाठ करता है, उसके जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। यह स्तोत्र मन को शांति प्रदान करता है, आत्मविश्वास बढ़ाता है और भगवान शिव के प्रति भक्ति को गहरा बनाता है। विशेष रूप से प्रातःकाल और संध्या समय इसका पाठ अत्यंत शुभ माना गया है।
“दारिद्र्य दहन शिव स्तोत्र (Daridra Dahan Shiv Stotra)” की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें केवल भौतिक संपत्ति की कामना नहीं की गई, बल्कि आध्यात्मिक उन्नति, मानसिक शांति और मोक्ष का मार्ग भी बताया गया है। इसलिए “दारिद्र्य दहन शिव स्तोत्र” केवल एक प्रार्थना नहीं, बल्कि भगवान शिव की कृपा प्राप्त करने का एक दिव्य माध्यम माना जाता है।
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॥ दारिद्र्य दहन शिव स्तोत्र | Daridra Dahan Shiv Stotra ॥
विश्वेश्वराय नरकार्णवतारणाय कर्णामृताय शशिशेखरधारणाय ।
कर्पूरकान्तिधवलाय जटाधराय दारिद्र्यदुःखदहनाय नमः शिवाय ॥ १॥
अर्थात:
जो सम्पूर्ण विश्व के ईश्वर हैं, जो नरक रूपी भयंकर सागर से जीवों को पार लगाने वाले हैं, जिनकी वाणी कानों को अमृत समान मधुर लगती है, जो अपने मस्तक पर चंद्रमा धारण करते हैं, जो कपूर के समान उज्ज्वल और धवल हैं, जो जटाधारी हैं, और जो दारिद्र्य तथा सभी दुःखों का नाश करने वाले हैं, ऐसे भगवान शिव को मेरा नमस्कार है।
गौरीप्रियाय रजनीशकलाधराय कालान्तकाय भुजगाधिपकङ्कणाय ।
गङ्गाधराय गजराजविमर्दनाय दारिद्र्यदुःखदहनाय नमः शिवाय ॥ २॥
अर्थात:
जो माता गौरी के अत्यंत प्रिय हैं, जो अपने मस्तक पर चंद्रमा की कला धारण करते हैं, जो काल अर्थात मृत्यु का भी अंत करने वाले हैं, जो सर्पराज को कंगन के रूप में धारण करते हैं, जो माँ गंगा को अपने जटाओं में धारण करते हैं, और जिन्होंने गजासुर का संहार किया ऐसे दारिद्र्य और दुःखों का नाश करने वाले भगवान शिव को नमस्कार है।
भक्तिप्रियाय भवरोगभयापहाय उग्राय दुर्गभवसागरतारणाय ।
ज्योतिर्मयाय गुणनामसुनृत्यकाय दारिद्र्यदुःखदहनाय नमः शिवाय ॥ ३॥
अर्थात:
जो अपने भक्तों से अत्यंत प्रेम करते हैं, जो संसार रूपी रोग और उसके भय को दूर करने वाले हैं, जो उग्र स्वरूप वाले होकर भी भक्तों की रक्षा करते हैं, जो इस कठिन भवसागर से जीवों को पार लगाने वाले हैं, जो दिव्य प्रकाश से पूर्ण हैं, और जिनके गुणों तथा नामों पर देवता भी आनंदपूर्वक नृत्य करते हैं, ऐसे दारिद्र्य और दुःखों का नाश करने वाले भगवान शिव को नमस्कार है।
चर्मम्बराय शवभस्मविलेपनाय भालेक्षणाय मणिकुण्डलमण्डिताय ।
मञ्जीरपादयुगलाय जटाधराय दारिद्र्यदुःखदहनाय नमः शिवाय ॥ ४॥
अर्थात:
जो पशुचर्म को वस्त्र के रूप में धारण करते हैं, जो शरीर पर श्मशान की भस्म लगाए रहते हैं, जिनके मस्तक पर दिव्य नेत्र सुशोभित है, जो मणियों से बने कुण्डलों से अलंकृत हैं, जिनके दोनों चरणों में सुंदर नूपुर शोभा देते हैं, और जो जटाधारी हैं ऐसे दारिद्र्य और दुःखों का नाश करने वाले भगवान शिव को नमस्कार है।
पञ्चाननाय फणिराजविभूषणाय हेमांशुकाय भुवनत्रयमण्डिताय ।
आनन्दभूमिवरदाय तमोमयाय दारिद्र्यदुःखदहनाय नमः शिवाय ॥ ५॥
अर्थात:
जो पाँच मुखों वाले दिव्य स्वरूपधारी हैं, जो सर्पराज को आभूषण के रूप में धारण करते हैं, जो स्वर्ण के समान तेजस्वी वस्त्र धारण करते हैं, जो तीनों लोकों में पूजित और शोभायमान हैं, जो आनंद और मोक्ष प्रदान करने वाले हैं, और जो अज्ञानरूपी अंधकार का नाश करने वाले हैं, ऐसे दारिद्र्य और दुःखों का नाश करने वाले भगवान शिव को नमस्कार है।
यहां एक क्लिक में पढ़ें ~ भूतनाथ अष्टकम्:
भानुप्रियाय भवसागरतारणाय कालान्तकाय कमलासनपूजिताय ।
नेत्रत्रयाय शुभलक्षणलक्षिताय दारिद्र्यदुःखदहनाय नमः शिवाय ॥ ६॥
अर्थात:
जो सूर्यदेव के प्रिय हैं, जो संसार रूपी भवसागर से जीवों को पार लगाने वाले हैं, जो काल अर्थात मृत्यु का भी अंत करने वाले हैं, जिनकी पूजा कमलासन पर विराजमान ब्रह्माजी भी करते हैं, जिनके तीन नेत्र हैं, और जो शुभ लक्षणों से युक्त दिव्य स्वरूप वाले हैं, ऐसे दारिद्र्य और दुःखों का नाश करने वाले भगवान शिव को नमस्कार है।
रामप्रियाय रघुनाथवरप्रदाय नागप्रियाय नरकार्णवतारणाय ।
पुण्येषु पुण्यभरिताय सुरार्चिताय दारिद्र्यदुःखदहनाय नमः शिवाय ॥ ७॥
अर्थात:
जो भगवान राम के प्रिय हैं, जिन्होंने रघुनाथ अर्थात श्रीराम को वरदान प्रदान किया, जो नागों को प्रिय मानते हैं, जो नरक रूपी भयानक सागर से जीवों को पार लगाने वाले हैं, जो समस्त पुण्यों में श्रेष्ठ और पुण्यस्वरूप हैं, और जिनकी देवता भी पूजा करते हैं, ऐसे दारिद्र्य और दुःखों का नाश करने वाले भगवान शिव को नमस्कार है।
मुक्तेश्वराय फलदाय गणेश्वराय गीतप्रियाय वृषभेश्वरवाहनाय ।
मातङ्गचर्मवसनाय महेश्वराय दारिद्र्यदुःखदहनाय नमः शिवाय ॥ ८॥
अर्थात:
जो मोक्ष के स्वामी हैं, जो भक्तों को उनके कर्मों का फल प्रदान करते हैं, जो समस्त गणों के ईश्वर हैं, जो भक्ति-गीत और स्तुति को प्रिय मानते हैं, जिनका वाहन श्रेष्ठ वृषभ अर्थात नंदी है, जो हाथी के चर्म को वस्त्र के रूप में धारण करते हैं, और जो महान ईश्वर महेश्वर हैं, ऐसे दारिद्र्य और दुःखों का नाश करने वाले भगवान शिव को नमस्कार है।
वसिष्ठेन कृतं स्तोत्रं सर्वरोगनिवारणम् ।
सर्वसम्पत्करं शीघ्रं पुत्रपौत्रादिवर्धनम् ।
त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नित्यं स हि स्वर्गमवाप्नुयात् ॥ ९॥
अर्थात:
ऋषि वशिष्ठ द्वारा रचित यह स्तोत्र सभी रोगों और कष्टों को दूर करने वाला है। यह शीघ्र ही धन, समृद्धि और सुख प्रदान करता है तथा पुत्र, पौत्र आदि वंश की वृद्धि करने वाला माना गया है। जो व्यक्ति प्रतिदिन तीनों संध्या (प्रातः, दोपहर और सायंकाल) में इसका पाठ करता है, वह अंततः उत्तम लोक अर्थात स्वर्ग को प्राप्त करता है।
॥ इति श्रीवसिष्ठविरचितं दारिद्र्यदहनशिवस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥
इस प्रकार ऋषि वशिष्ठ द्वारा रचित “दारिद्र्य दहन शिव स्तोत्र” पूर्ण हुआ ॥

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