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पतंजलि योग दर्शन हिंदी में

योगदर्शन का संक्षिप्त परिचय

 

वैदिक छह दर्शनों में पतंजलि योग दर्शन (Patanjali Yog Darshan in Hindi) का अपना विशिष्ट स्थान है। इस दर्शन में योग का वास्तविक स्वरूप, योग का फल, योग के क्रियात्मक उपाय, योग के भेद और योग में उपस्थित होने वाले बाधकों एवं उनके निवारण का विस्तृत विवेचन किया है।

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वेद के उपाङ्गों में इस दर्शन की गणना की जाती है। पतंजलि योग दर्शन (Patanjali Yog Darshan in Hindi) के रचयिता महर्षि पतञ्जलि जी हैं। इसके सूत्रों की संख्या १९५ है। उन्हें चार पादों में विभाजित किया गया है। प्रथम पाद में ५१ सूत्र है। द्वितीय तथा तृतीय पाद में ५५-५५ सूत्र तथा अन्तिम चतुर्थ पाद में ३४ सूत्र है। प्रथम पाद का नाम समाधि पाद है, द्वितीय का नाम साधन पाद है, तृतीय का नाम विभूति पाद और चतुर्थ पाद का नाम कैवल्य पाद है। इनका संक्षिप्त परिचय निम्नलिखित है –

यहां एक क्लिक में पढ़ें ~ मीमांसा दर्शन (शास्त्र) हिंदी में

(१) समाधिपाद:

इस प्रथम पाद में मुख्य रूप से समाधि तथा उसके भेदों का वर्णन किया गया है, अत एव इसका नाम ‘समाधि पाद’ है। इसमें उच्चकोटि के साधकों के लिये समाधि के वर्णन के साथ-२ अन्य उच्चस्तरीय योग के साधनों का भी वर्णन किया गया है। इस पाद में योग का स्वरूप, उसका फल, वृत्तियों के प्रकार तथा उनका स्वरूप, वैराग्य के भेद तथा स्वरूप, योग के भेद तथा प्रभेद, ईश्वर का स्वरूप, जप अनुष्ठान की विधि, मनोनिरोध हेतु विविध उपायों का वर्णन, समापत्ति का स्वरूप तथा ऋतम्भरा प्रज्ञा के लक्षण आदि का वर्णन किया गया है।

(२) साधनपाद:

इस द्वितीय पाद में प्रारम्भिक साधक के लिये योग के साधनों का वर्णन
किया गया है, अत एव इसका नाम ‘साधन पाद’ है। इस द्वितीय पाद में क्रिया योग और उसका फल अविद्यादि पाँच क्लेश, उनका स्वरूप और उनके नाश के उपाय, क्लेशमूल कर्माशय और उसका फल, विवेकी के लिये दुःख और उनकी हेयता, दृश्य का स्वरूप, योग के आठ अङ्ग और उनके फल, प्राणायाम का लक्षण उसके भेद और फल तथा प्रत्याहार का स्वरूप आदि विषयों पर प्रकाश डाला गया है।

(३) विभूतिपाद:

योग साधनों के अनुष्ठान से प्राप्त होने वाली विविध प्रकार की सिद्धियों = विभूतियों (ऐश्वर्यो) का वर्णन इस तृतीय पाद में मुख्य रूप से किया गया होने से इस पाद का नाम ‘विभूतिपाद’ है। इस पाद में धारणा, ध्यान, समाधि इन तीन योगाङ्गों के लक्षण तथा उनका शास्त्रीय पारिभाषिक नाम उनकी सिद्धि का फल तथा विभिन्न स्तरों में विनियोग, मोक्षप्राप्ति में सभी सिद्धियों की अनिवार्यता का निषेध, चित्त परिणामों के भेद और उनका विवरण, संयम के अनुष्ठान से विविध ऐश्वर्यों की प्राप्ति, विवेकज ज्ञान का प्रादुर्भाव और उसका परिणाम आदि विषयों पर प्रकाश डाला गया है।

(४) कैवल्यपाद:

इस चौथे पाद में कैवल्य मोक्ष के यथार्थ स्वरूप का वर्णन है। अतः इसका नाम ‘कैवल्य पाद’ है। इस पाद में चित्त सिद्धियों के पाँच भेद कर्मों के प्रकार, कर्माशय के रहते हुए मोक्ष सिद्धि संभव नहीं, योगी व अयोगी के कर्मों में अन्तर, स्मृति और संस्कार सदा समान विषयक होते हैं, वासना संग्रह के चार कारण, संसार चक्र छह अरों वाला है, क्षणिकवाद आदि का खण्डन, धर्ममेघ समाधि का स्वरूप, क्रम का स्वरूप आदि विभिन्न विषयों पर भी प्रकाश डाला गया है।

पतंजलि योग दर्शन (Patanjali Yog Darshan in Hindi) अपने आप में पूर्ण, सार्वभौम एवं वैज्ञानिक है। इस ग्रन्थ की व्याख्या का उद्देश्य सामान्य जनों में योग साधना के प्रति रुचि जाग्रत हो तथा वे इसके मार्ग पर चलने को तत्पर हो जायें। इसलिए इसमें शब्दार्थों पर अधिक जोर न देकर उसे पाठ्य-पुस्तक बनाने की अपेक्षा भावों को प्रधानता दी गई है जिससे यह कठिन विषय बोधगम्य हो सके।

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