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Garga Samhita Mathurakhand Chapter 11 to 15

Garga Samhita
Garga Samhita Mathurakhand Chapter 11 to 15

॥ श्रीहरिः ॥

ॐ दामोदर हृषीकेश वासुदेव नमोऽस्तु ते

श्रीगणेशाय नमः

Garga Samhita Mathurakhand Chapter 11 to 15
श्री गर्ग संहिता के श्रीमथुराखण्ड अध्याय 11 से 15 तक

श्री गर्ग संहिता के श्रीमथुराखण्ड (Mathurakhand Chapter 11 to 15) ग्यारहवें अध्याय में कुब्जा और कुवलयापीडके पूर्वजन्मगत वृत्तान्तका वर्णन कहा गया है। बारहवें अध्याय में चाणूर आदि मल्ल, कंसके छोटे भाइयों तथा पञ्चजन दैत्यके पूर्वजन्मगत वृत्तान्तका वर्णन दिया गया है। तेरहवां अध्याय में श्रीकृष्ण की आज्ञा से उद्भव का व्रज में जाना और श्रीदामा आदि सखाओं का उनसे श्रीकृष्ण-विरह के दुःख का वर्णन कहा गया है। चौदहवां अध्याय में उद्धवका श्रीकृष्ण-सखाओंको आश्वासन; नन्द और यशोदासे बातचीत तथा उनकी प्रेम-लक्षणा-भक्तिसे चकित होकर उद्भवका उन्हें श्रीकृष्णके चरित्र सुनाना और पंद्रहवां अध्याय में गोपाङ्गनाओं के साथ उद्भव का कदली-वन में जाना और वहाँ उनकी स्तुति करके श्रीकृष्ण द्वारा भेजे गये पत्र अर्पित करने का वर्णन है।

यहां पढ़ें ~ गर्ग संहिता गोलोक खंड पहले अध्याय से पांचवा अध्याय तक

ग्यारहवाँ अध्याय

कुब्जा और कुवलयापीडके पूर्वजन्मगत वृत्तान्तका वर्णन

श्रीबहुलाश्वने पूछा- देवर्षे ! सैरन्ध्रीने पूर्व- कालमें कौन-सा परम दुष्कर तप किया था, जिससे देवताओंके लिये भी अत्यन्त दुर्लभ भगवान् श्रीकृष्ण उसपर रीझ गये ? ॥१॥

नारदजीने कहा- राजन् ! करोड़ों कामदेवोंके समान सुन्दर श्रीरामचन्द्रजी जब पञ्चवटीमें रहते थे, उस समय शूर्पणखा नामक राक्षसी उन्हें देखकर अत्यन्त मोहित हो गयी। ‘श्रीरघुनाथजी एकपत्नीव्रतके पालनमें तत्पर हैं, अतः इनके मनमें दूसरी किसी स्त्रीके प्रति मोह नहीं है’- यह विचारकर रावणकी बहिन क्रोधसे सीताको खा जानेके लिये दौड़ी। उस समय श्रीरामके छोटे भाई लक्ष्मणने रुष्ट होकर तीखी धार- वाली तलवारसे तत्काल उसकी नाक और कान काट लिये। नाक कट जानेपर उसने लङ्कामें जाकर रावणको यह सब समाचार बता दिया और स्वयं अत्यन्त खिन्न- चित्त होकर वह पुष्कर-तीर्थमें चली गयी। वहाँ जलमें खड़ी हो भगवान् शंकरका ध्यान तथा श्रीरामको पति- रूपमें पानेकी कामना करती हुई शूर्पणखाने दस हजार वर्षोंतक तपस्या की। इससे प्रसन्न हो देवाधिदेव भगवान् उमापति पुष्कर-तीर्थमें आकर बोले- ‘तुम वर माँगो’ ॥ २-७॥

शूर्पणखाने कहा- परम देवदेव ! आप समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेमें समर्थ हैं; अतः मुझे यह वर दीजिये कि सत्पुरुषोंके प्रिय श्रीरामचन्द्रजी मेरे पति हों ॥ ८ ॥

शिवने कहा- राक्षसी! सुनो। यह वर तुम्हारे लिये अभी सफल नहीं होगा। द्वापरके अन्तमें मथुरा- पुरीमें तुम्हारी यह कामना पूरी होगी, इसमें संशय नहीं है ॥९॥

नारदजी कहते हैं- राजन् । महामते। वही इच्छानुसार रूप धारण करनेवाली शूर्पणखा नामक राक्षसी श्रीमथुरापुरीमें ‘कुब्जा’ नामसे प्रसिद्ध हुई थी। महादेवजीके वरसे ही वह श्रीकृष्णकी प्रिया हुई। यह प्रसङ्ग मैंने तुम्हें बताया। अब और क्या सुनना चाहते हो ? ॥ १०-११ ॥(Mathurakhand Chapter 11 to 15)

बहुलाश्व बोले- नारदजी! यह कुवलयापीड पूर्वजन्ममें कौन था? कैसे हाथीकी योनिको प्राप्त हुआ? और किस पुण्यसे भगवान् श्रीकृष्णमें लीन हुआ ? ॥ १२ ॥

नारदजीने कहा- राजा बलिके एक विशालकाय एवं बलवान् पुत्र था, जिसका नाम था मन्दगति। वह समस्त शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ तथा एक लाख हाथियोंके समान बलशाली था। एक समय श्रीरङ्गनाथकी यात्रा- के लिये वह घरसे निकला और जन-समुदायमें सम्मिलित हो गया। मन्दगति मतवाले हाथीके समान वेगसे भुजाएँ हिलाहिलाकर लोगोंको कुचलता जा रहा था। रास्तेमें उसकी भुजाओंके वेगसे बूढ़े त्रित मुनि गिर पड़े। उन्होंने कुपित होकर उस मतवाले बलिष्ठ बलिकुमारको शाप दे दिया ॥ १३-१५॥

त्रितने कहा- ‘दुर्मते! तू हाथीके समान मदोन्मत्त होकर रङ्ग-यात्रामें लोगोंको कुचलता जा रहा है, अतः हाथी हो जा।’ इस प्रकार शाप मिलनेपर वह बलवान् दैत्य मन्दगति तत्काल तेजोभ्रष्ट हो गया और उसका शरीर केंचुलकी भाँति छूटकर नीचे जा गिरा। मुनिके प्रभावको जाननेवाले उस दैत्यने तुरंत ही हाथ जोड़ प्रणाम और परिक्रमा करके त्रित मुनिसे कहा ॥ १६-१८ ॥

मन्दगति बोला- हे मुने! कृपासिन्धो! आप द्विजोंमें श्रेष्ठ योगीन्द्र हैं। इस गज-योनिसे मुझे कब छुटकारा मिलेगा, यह मुझे शीघ्र बताइये। मुने ! आजसे आप-जैसे महात्माओंकी अवहेलना मेरे द्वारा कभी नहीं होगी। ब्रह्मन् ! आप जैसे मुनि वर और शाप-दोनोंको देनेमें समर्थ हैं॥ १९-२० ॥

नारदजी कहते हैं- राजन् ! उस दैत्यद्वारा इस प्रकार प्रसन्न किये जानेपर महामुनि त्रितका क्रोध दूर हो गया। फिर उन कृपालु ब्राह्मण-शिरोमणिने उस दैत्यसे कहा ॥ २१ ॥

त्रित बोले- दैत्यराज ! मेरी बात झूठी नहीं हो सकती, तथापि तुम्हारी भक्तिसे मैं अत्यन्त प्रसन्न हूँ। इसलिये तुम्हें ऐसा दिव्य वर प्रदान करूँगा, जो देवताओंके लिये भी दुर्लभ है। दैत्येन्द्र। शोक न करो। श्रीहरिकी नगरी मथुरामें श्रीकृष्णके हाथसे तुम्हारी मुक्ति होगी, इसमें संशय नहीं है॥ २२-२३॥(Mathurakhand Chapter 11 to 15)

नारदजी कहते हैं- राजन् ! वही यह मन्दगति दैत्य विन्ध्यपर्वतपर कुवलयापीड नामसे विख्यात हाथी हुआ, जो बलमें अकेला ही दस हजार हाथियोंके समान था। उसे मगधराज जरासंधने लाख हाथियोंके द्वारा वनमें पकड़ा। विदेहराज ! फिर उसने कंसको दहेजमें वह हाथी दे दिया। त्रित मुनिके कथनानुसार उसका तेज श्रीकृष्णमें लीन हुआ। यह प्रसङ्ग मैंने तुमसे कहा, अब और क्या सुनना चाहते हो ? ॥ २४-२६ ॥

इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें श्रीमथुराखण्डके अन्तर्गत नारद बहुलाश्व-संवादमें ‘कुब्जा और कुवलयापीडके पूर्वजन्मका वर्णन’ नामक ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥११॥

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बारहवाँ अध्याय

चाणूर आदि मल्ल, कंसके छोटे भाइयों तथा पञ्चजन दैत्यके पूर्वजन्मगत वृत्तान्तका वर्णन

बहुलाश्व बोले- चाणूर आदि जो मल्ल थे, वे पूर्वजन्ममें कौन थे, जो यहाँ मथुरापुरीमें आये थे? अहो! उनका कैसा सौभाग्य है कि साक्षात् श्रीकृष्ण- चन्द्रके साथ उन्हें युद्धका अवसर मिला ॥ १ ॥

पूर्वकालमें अमरावतीपुरीमें उतथ्य नामसे प्रसिद्ध महामुनि निवास करते थे। उनके पाँच पुत्र हुए, जो कामदेवके समान कान्तिमान् थे। उन लोगोंने विद्या, स्वाध्याय और जप छोड़कर मदसे उन्मत्त हो राजा बलिके यहाँ जाकर प्रतिदिन मल्लयुद्धकी शिक्षा लेनी आरम्भ की। अपने पुत्रोंको ब्राह्मणोचित कर्मसे सर्वथा भ्रष्ट, वेदाध्ययनसे रहित तथा मदमत्त हुआ देख मुनिश्रेष्ठ उतथ्यने रोषपूर्वक उनसे कहा ॥ २-४ ॥

नारदजीने कहा- राजन् । उतथ्य बोले- शम, दम, तप, शौच, क्षमा, सरलता, ज्ञान, विज्ञान तथा आस्तिकता-ये ब्राह्मण- के स्वाभाविक कर्म हैं। शौर्य, तेज, धैर्य, दक्षता, युद्धभूमिमें पीठ न दिखाना, दान तथा ऐश्वर्य-ये क्षत्रियके स्वाभाविक कर्म हैं। कृषि, गोरक्षा और वाणिज्य-ये वैश्यके स्वभावजकर्म हैं तथा सेवात्मक कर्म शूद्रके लिये भी स्वाभाविक है। दुर्जनो! तुमलोग ब्राह्मणके पुत्र होकर भी ब्राह्मणोचित कर्मसे दूर रहकर क्षत्रियोचित मल्लयुद्धका कार्य कैसे करते हो? अतः तुमलोग भारतभूमिपर मल्ल हो जाओ और असुरोंके सङ्गसे शीघ्र ही दुर्जन बन जाओ ॥ ५-९ ॥(Mathurakhand Chapter 11 to 15)

नारदजी कहते हैं- राजन् ! वे उतथ्यके पुत्र ही पृथ्वीपर मल्लोंके रूपमें उत्पन्न हुए। नरेश्वर। उन्होंने श्रीकृष्णके शरीरका स्पर्श करनेमात्रसे परम मोक्ष प्राप्त कर लिया। इस प्रकार मैंने चाणूर, मुष्टिक, कूट, शल और तोशल-इन मल्लोंके पूर्वचरित्रका वर्णन किया, अब और क्या सुनना चाहते हो ? ॥ १०-११॥

बहुलाश्वने पूछा- मुने ! कंसके छोटे भाई जो कङ्क, न्यग्रोध आदि आठ योद्धा थे, वे सब – पूर्वजन्ममें कौन थे? जो कि परम मोक्षको प्राप्त हुए, यह बताइये । ॥ १२ ॥

नारदजीने कहा- राजन् ! पूर्वकालकी बात है, कुबेरकी राजधानी अलकामें ‘देवयक्ष’ नामसे प्रसिद्ध एक यक्ष रहता था। वह ज्ञानी, ज्ञानपरायण, शिव- भक्तिसे सम्मानित तथा महातेजस्वी था। उसके आठ पुत्र हुए, जिनके नाम इस प्रकार हैं- देवकूट, महागिरि, गण्ड, दण्ड, प्रचण्ड, खण्ड, अखण्ड और पृथु। एक दिन शिवपूजाके निमित्त अरुणोदयकी वेलामें एक सहस्र पुण्डरीक पुष्प लानेके लिये देवयक्षकी आज्ञा पाकर वे सब गये। उन्होंने भ्रमरोंके गुञ्जारवसे युक्त सहस्र कमल पुष्प मानसरोवरसे लाकर, उनकी गन्धको लोभसे सूंघकर पिताको अर्पित किये। फूलोंको उच्छिष्ट करनेके दोषसे शिवपूजासे तिरस्कृत हुए वे मूढ़ यक्ष तीन जन्मोंके लिये असुरयोनिको प्राप्त हुए। मिथिलेश्वर ! विदेहराज ! बलदेवजीके कल्याणकारी हाथोंसे मारे जाकर वे दोष- से मुक्त हो गये और परम मोक्षको प्राप्त हुए। नरेश्वर ! कंसके छोटे भाइयोंके पूर्वजन्मका यह वृत्तान्त मैंने कहा, तुम और क्या सुनना चाहते हो ? ॥ १३-१९॥

बहुलाश्वने पूछा- ब्रह्मन् ! यह शङ्खरूपधारी दैत्य पञ्चजन पूर्वजन्ममें कौन था, जिसकी अस्थियों- का शङ्ख भगवान् श्रीकृष्णके करकमलमें सुशोभित हुआ ? ॥ २० ॥

नारदजी कहते हैं- विदेहराज। पूर्वकालसे ही ये चक्र आदि त्रिलोकीनाथ श्रीहरिके उपाङ्ग रहे हैं। वे सब-के-सब उनके तेजसे संगृहीत हुए थे। राजन् ! उनमेंसे पाञ्चजन्य शङ्खको बड़ी ऊँची पदवी प्राप्त हुई। वह श्रीकृष्णके मुँहसे लगकर उनके अधरामृतका पान किया करता था॥ २१-२२ ॥(Mathurakhand Chapter 11 to 15)

एक दिन शङ्खराजने मन-ही-मन मानका अनुभव किया और इस प्रकार कहा- ‘मेरी कान्ति राजहंसके समान श्वेत है। मुझे साक्षात् श्रीहरिने अपने हाथोंसे गृहीत किया है। मैं दक्षिणावर्त शङ्ख हूँ और युद्धमें विजय प्राप्त होनेपर श्रीकृष्ण मुझे बजाया करते हैं। भगवान् श्रीकृष्णका जो अधरामृत क्षीरसागर-कन्या लक्ष्मीके लिये भी दुर्लभ है, उसे मैं दिन-रात पीता रहता हूँ, अतः मैं सबसे श्रेष्ठ हूँ।’ विदेहराज। इस प्रकार मान प्रकट करते हुए पाञ्चजन्य शङ्खको लक्ष्मीने क्रोधपूर्वक शाप दिया- ‘दुर्मते! तू दैत्य हो जा।’ वही शङ्खराज समुद्रमें यह पञ्चजन नामक दैत्य हुआ था, जो वैरभावसे भजनके कारण पुनः देवेश्वर श्रीहरि- को प्राप्त हुआ। उसकी ज्योति देवेश्वर श्रीकृष्णमें लीन हो गयी और अब वह उन्हींके हाथमें शोभा पाता है। उस शङ्खराजका सौभाग्य अद्भुत है, अब तुम और क्या सुनना चाहते हो ? ॥ २३-२७ ॥

इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें श्रीमथुराखण्डके अन्तर्गत श्रीनारद बहुलाश्व-संवादमें ‘चाणूर आदि मल्लों, कंसके भाइयों तथा पञ्चजन दैत्यके पूर्वजन्मका उपाख्यान’ नामक बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२ ॥

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तेरहवाँ अध्याय

श्रीकृष्णकी आज्ञासे उद्भवका व्रजमें जाना और श्रीदामा आदि सखाओंका उनसे श्रीकृष्ण-विरहके दुःखका निवेदन

बहुलाश्वने पूछा- मुनिश्रेष्ठ। अपने कुटुम्बीजनों तथा जाति-भाइयोंको मथुरापुरीमें निवास देकर यदु- कुल-तिलक श्रीकृष्णने आगे चलकर कौन-कौन-सा कार्य किया ? ॥ १॥

नारदजीने कहा- राजन् ! साक्षात् परिपूर्णतम भगवान् भक्तवत्सल श्रीकृष्णने गोपी और गोपगणोंसे भरे हुए दीन-दुःखी गोकुलका स्मरण किया। अतः एक दिन एकान्तमें अपने सखा भक्त उद्धवको बुलाकर भगवान्ने प्रेमगद्द वाणीमें कहा ॥ २-३ ॥

श्रीभगवान् बोले- हे सखे। लता-कुओंके समुदाय आदिसे अलंकृत सुन्दर व्रजमण्डलमें शीघ्र ही जाओ। गोवर्धन और यमुनाकी शोभासे मनोहर वृन्दावनमें तथा गोप-गोपियोंसे भरे हुए गोकुलमें भी पधारो। मित्र! मेरा एक पत्र तो नन्दबाबाको देना और दूसरा यशोदा मैयाके हाथमें देना। सखे! तीसरा पत्र श्रीराधिकाको उनके सुन्दर मन्दिरमें जाकर देना और चौथा मेरे सखा ग्वालबालोंको मेरा शुभ कुशल- • समाचार निवेदन करते हुए देना। इसी प्रकार अत्यन्त मोहित हुई गोपाङ्गनाओंके सैकड़ों यूथोंको पृथक् पृथक् पत्र देने हैं। मेरे पिता नन्दराज बड़े दयालु हैं। उनका मन मुझमें ही लगा रहता है और मेरी मैया यशोदा शीघ्र ही अपने पास बुलानेके लिये मेरा स्मरण करती हैं। तुम तो नीतिशास्त्रके विद्वान् हो; सुन्दर-सुन्दर बातें सुनाकर उन दोनोंके हृदयमें मेरी परम प्रीति धारण कराना। मेरी प्राणवटल्लभा राधिका मेरे वियोगसे आतुर है और मेरे बिना मोहवश सारे जगत्को सूना समझती है। उन सबको मेरे वियोगके कारण जो मानसिक व्यथा हो रही है, उसे मेरे संदेश वचनोंद्वारा शान्त करो; क्योंकि तुम बातचीत करनेमें बड़े कुशल हो। सुदामा आदि ग्वाल-बाल मेरे प्रिय सखा हैं। मुझ अपने मित्रके बिना वे भी मोहसे आतुर हैं, तुम उन्हें भी मित्रकी तरह सुख देना। मैं थोड़े ही समयमें श्रीव्रज- धाममें आऊँगा। गोपाङ्गनाएँ मेरे वियोगकी व्यथाके वेगसे व्याकुल हैं। उनका मन मुझमें ही लगा हुआ है। उनके शरीर और प्राण भी मुझमें ही स्थित हैं। मन्त्रि- प्रवर! जिन्होंने मेरे लिये अपने लोक-परलोक सब त्याग दिये हैं, उन अबलाओंका भरण-पोषण मैं स्वतः कैसे नहीं करूँगा। उद्धव ! वे मेरे आते समय प्राण त्याग देनेको उद्यत थीं। वे आज भी बड़ी कठिनाईसे प्राण धारण करती हैं। मेरे वियोगसे उत्पन्न उनकी मानसिक व्यथाको तुम मेरे संदेश वचनोंके द्वारा शान्त करो; क्योंकि वार्तालापकी कलामें तुम परम कुशल हो। सखे ! मैं पहले जिस रथपर आरूढ़ होकर व्रजसे आया था, उसी रथको, उन्हीं घोड़ों, सारथि और बजती हुई घण्टिकाओंसे सुसज्जित करके अपने साथ ले जाओ। मेरे समान ही रूप बना लो। अभी पीताम्बर, वैजयन्ती माला, सहस्त्रदल कमल, दिव्य रत्नोंकी प्रभासे मण्डित कुण्डल तथा कोटि बालरवियोंके समान उद्दीप्त कौस्तुभमणि भी धारण कर लो। मेरी उच्चस्वरसे बजनेवाली मनोहर बाँसुरी तथा फूलोंसे सजी हुई जगन्मोहिनी यष्टि (छड़ी) भी ले लो। उद्धव! मेरे ही समान दिव्य सुगन्धसे आवृत सुन्दर चन्दन, मोरपंख और बजते हुए नूपुरोंसे युक्त नटवर-वेष धारण कर लो। इसी तरह मेरा ही मोरपंखका मुकुट तथा दोनों बाजूबंद धारण करके मेरे आदेशसे अभी यथासम्भव शीघ्र जाओ, जाओ ॥ ४-१४॥(Mathurakhand Chapter 11 to 15)

नारदजी कहते हैं- राजन् ! श्रीकृष्णके यों कहनेपर उद्धवने शीघ्र ही हाथ जोड़कर उनको नमस्कार किया और उनकी परिक्रमा करके रथपर आरूढ़ हो वे व्रजकी ओर चल दिये, जहाँ कोटि-कोटि मनोहर गौएँ दिव्य भूषणोंसे विभूषित हो श्वेत पर्वत के समान दिखायी देती थीं। वे सब-की-सब दूध देनेवाली तरुणी (कलोर), सुशीला, सुरूपा और सगुणवती थीं। उनके साथ बछड़े भी थे। उनकी पूँछके बाल पीले थे। चलते समय उनकी मूर्तियाँ बड़ी भव्य दिखायी देती थीं। गलेके घंटों और पैरोंके मञ्जीरोंका झंकार होता रहता था। वे किङ्किणियों (क्षुद्र-घण्टिकाओं) के जालसे मण्डित थे। कितनी ही गौएँ सुवर्णके समान रंगवाली थीं। उनके सींगोंमें सोना मढ़ा गया था तथा नाना प्रकारके हारों और मालाओंसे अलंकृत हुई उन गौओंकी प्रभा सब ओर छिटक रही थी। कोई लाल, कोई हरी, कोई ताँबेके रंगवाली, कोई पीली, कोई श्यामा और कोई चितकबरी थी। उस व्रजमें धूम्रवर्ण और कोयलके- से काले रंगकी भी गौएँ दृष्टिगोचर होती थीं। तात्पर्य यह कि उस व्रजभूमिमें अनेकानेक रंगवाली गौएँ परिलक्षित होती थीं। वे समुद्रकी तरह अथाह दूध देनेवाली थीं। उनके अङ्गॉपर तरुणी स्त्रियोंके हाथोंके छापे लगे हुए थे हिरनकी भाँति चौकड़ी भरनेवाले बछड़े उन सुन्दर गौओंकी शोभा बढ़ा रहे थे। उन गौओंके झुंडमें बड़े-बड़े साँड़ इधर-उधर चलते दिखायी देते थे, उनके कंधे और सींग बड़े-बड़े थे। वे सब के सब धर्मधुरंधर थे। गोपगण हाथोंमें बेंतकी छड़ी और बाँसुरी लिये हुए थे। उनकी अङ्गकान्ति श्याम दिखायी देती थी। वे कामदेवोंको भी मोहित करनेवाली रागोंमें श्रीकृष्ण लीलाओंका उच्चस्वरसे गान कर रहे थे। उद्धवको दूरसे आते देख, उन्हें कृष्ण समझकर व्रजके बालक श्रीकृष्णदर्शनकी लालसासे परस्पर इस प्रकार कहने लगे ॥ १५-२३ ॥

गोप बोले- मित्र! ये नन्दनन्दन आ रहे हैं, जो हमारे प्रिय सखा हैं; निस्संदेह वे ही हैं। मेघके समान श्यामकान्ति, शरीरपर पीताम्बर, गलेमें वैजयन्ती माला तथा कानोंमें रत्नमय कुण्डल इनकी शोभा बढ़ाते हैं। वक्षःस्थलपर कौस्तुभमणि, हाथोंमें गोल-गोल कड़े शोभा दे रहे हैं। हाथमें सहस्रदल कमल धारण करके माथेपर वही मुकुट पहने हुए हैं, जो करोड़ों मार्तण्डोंके तेजको तिरस्कृत कर देता है। वे ही घोड़े और वही किङ्किणीजालसे मण्डित रथ है। इस रथपर बलदेवजी नहीं हैं, अकेले नन्दनन्दन ही दिखायी देते हैं॥ २४-२६ ॥(Mathurakhand Chapter 11 to 15)

नारदजी कहते हैं- विदेहराज! इस प्रकार बातें करते हुए श्रीदामा आदि गोपाल कृष्णकी ही आकृति धारण करनेवाले कृष्ण-सखा उद्धवके पास रथके चारों ओरसे आ गये। निकट आनेपर वे बोले- ‘श्रीकृष्ण तो नहीं हैं; किंतु साक्षात् उनके ही समान आकृतिवाला यह पुरुष कौन है?’ इस तरह बोलते हुए उन गो-पालोंको नमस्कार करके उद्धवने उन सबको हृदयसे लगाया और अपने स्वामी श्यामसुन्दर- की चर्चा आरम्भ की ॥ २७-२८ ॥

उद्धव बोले- श्रीदामन् । यह तुम्हारे सखा श्रीकृष्णका दिया हुआ पत्र है, इसमें संशय नहीं है; तुम इसे ग्रहण करो। ग्वाल-बालोंसहित तुम शोक न करो। साक्षात् श्रीहरि सकुशल हैं। वे भगवान् यादवों- का महान् कार्य सिद्ध करके बलरामजीके साथ थोड़े ही दिनोंमें यहाँ आयेंगे ॥ २९-३० ॥

नारदजी कहते हैं- राजन्। उनके हाथके दिये हुए पत्रको पढ़कर श्रीदामा आदि व्रजके बालक बहुत आँसू बहाते हुए गद्गद वाणीमें बोले ॥ ३१ ॥

गोपोंने कहा- हे पधिक। निर्मोही नन्दनन्दन में ही हमारा तन, वैभव, धन, बल और समस्त अन्तः- करण लगा हुआ है। श्रीकृष्णके बिना हमारा व्रज ही नहीं शून्य हुआ है, हमारे लिये सारा संसार सूना हो गया है। महामते! श्रीहरिके बिना उनके वियोगके दुःखसे हम ब्रजवासियोंके लिये एक-एक क्षण युगके समान, एक-एक घड़ी मन्वन्तरके तुल्य, एक-एक प्रहर कल्पके समान तथा एक-एक दिन द्विपरार्धके सदृश हो गया है। उद्धव! हम दिन-रात उसे भुला नहीं पाते। हमारे जीवनमें वह कैसी दुष्ट घड़ी आयी थी, जिसमें श्यामसुन्दर यहाँसे चले गये। यद्यपि हम मित्रताके नाते सदा उनका अपराध करते रहे हैं, तथापि हम वनवासियोंके मनको उन्होंने सदाके लिये हर लिया ॥ ३२-३४ ॥

इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें श्रीमथुराखण्डके अन्तर्गत नारद बहुलाश्व-संवादमें ‘उद्धवका आगमन’ नामक तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥१३॥

यहां एक क्लिक में पढ़ें ~ श्री राधा कृपा कटाक्ष स्त्रोत्र

चौदहवाँ अध्याय

उद्धवका श्रीकृष्ण-सखाओंको आश्वासन; नन्द और यशोदासे बातचीत तथा उनकी प्रेम-लक्षणा-भक्तिसे चकित होकर उद्भवका उन्हें श्रीकृष्णके चरित्र सुनाना

श्रीनारदजी कहते हैं- राजन् ! इस प्रकार प्रेमभरे गोपोंसे, जो श्रीकृष्णके विरहसे व्याकुल थे, प्रेमी भक्त उद्धवने विस्मयरहित होकर कहा ॥ १॥

उद्धव बोले- व्रजवासियो! मैं श्रीकृष्णका दास हूँ- उनका प्रेमपात्र तथा एकान्त सेवक हूँ। श्रीहरिने बड़ी उतावलीके साथ आपलोगोंका कुशल-मङ्गल जाननेके लिये मुझे यहाँ भेजा है। यहाँसे मथुरापुरीको लौटकर श्रीहरिसे आपलोगोंकी विरह-वेदना निवेदित करके अपने नेत्रोंके जलसे उनके चरण पखारकर उन्हें प्रसन्न करूँगा और उन्हें साथ लेकर शीघ्र ही आपलोगोंके समीप आऊँगा यह मेरी प्रतिज्ञा है, यह कभी झूठी नहीं होगी। गोपालगण! आपलोग प्रसन्न हों, शोक न करें। आप इस व्रजमें शीघ्र ही श्रीवल्लभ श्रीहरिका दर्शन करेंगे ॥ २-५॥(Mathurakhand Chapter 11 to 15)

नारदजी कहते हैं- राजन् ! इस प्रकार ग्वालोंको आश्वासन दे, रथपर बैठे हुए यदुनन्दन उद्धव श्रीदामा आदि गोपोंके साथ हर्षसे भरकर नन्दगाँवमें प्रविष्ट हुए। उस समय सूर्य समुद्रमें डूब चुके थे। उद्धवका आगमन सुनकर परम बुद्धिमान् नन्दराजने शीघ्र आकर उन्हें प्रसन्नतापूर्वक हृदयसे लगाया और बड़े हर्षसे उनका पूजन-स्वागत-सत्कार किया। जब उद्धवजी भोजन करके शान्तभावसे शय्यापर आसीन हुए, तब नन्दराजने भी शय्यापर स्थित हो गद्गद वाणीमें कहा ॥ ६-८ ॥

नन्द बोले- महामते उद्धव ! क्या मेरे मित्र वसुदेव मथुरापुरीमें अपने पुत्रोंके साथ सकुशल हैं? सखे ! कंसके मर जानेपर यादव शिरोमणियोंको इस भूतलपर परम सुख-सुविधाकी प्राप्ति हुई है। क्या कभी बलरामसहित माधव अपनी माता यशोदाको भी याद करते हैं? यहाँके ग्वाल, गोवर्धन पर्वत, गौओंके समुदाय और व्रज, वृन्दावन, यमुना-पुलिन अथवा यमुना नदीका भी कभी स्मरण करते हैं? हा दैव! अब मैं किस समय बिम्बफलके समान लाल ओठ- वाले अपने पुत्र कमल-नयन श्यामसुन्दरको बलराम और ग्वाल-बालोंके साथ बार-बार घरके आँगन और चबूतरोंपर लोटते देखूँगा? कुञ्ज, निकुञ्ज, महानदी यमुना, गिरिराज गोवर्धन, यह वृन्दावन तथा दूसरे दूसरे वन, गृह, लता, वृक्ष और गौओंके समुदाय तथा इनके साथ ही यह सारा संसार मुकुन्दके बिना विषतुल्य प्रतीत हो रहा है। कमलदलके समान विशाल नेत्रवाले श्रीकृष्णके बिना मेरे जीवन, शयन और भोजनको भी धिक्कार है। इस भूतलपर चन्द्रमासे बिछुड़े हुए चकोरकी भाँति मैं उनके आगमनकी बहुत अधिक आशासे ही जीवन धारण कर रहा हूँ। महामते ! मैं श्रीकृष्ण और बलरामको परात्पर परमेश्वर ही मानता हूँ। देवताओंके अत्यन्त प्रार्थना करनेपर वे पूर्णतम भगवान् भूमिका भार उतारनेके लिये स्वेच्छासे अवतीर्ण हुए हैं और अब संतोंकी रक्षामें तत्पर हैं॥ ९-१४॥

नारदजी कहते हैं- राजन् ! परमेश्वर श्रीहरिका बार-बार स्मरण करके नवनन्दराज तकियेपर सिर रखकर चुप हो गये। उनका अङ्ग अङ्ग उत्कण्ठाके कारण रोमाञ्चयुक्त और विह्वल हो रहा था। राजन् ! उस समय श्रीकृष्णसखा उद्भवके देखते-देखते श्रीनन्दराजके नेत्र-कमलोंसे निकलती हुई अनुधारा बिस्तर और तकियेसहित शय्याको भिगोकर आँगनमें बह चली ॥ १५-१६ ॥

मथुरापुरीसे उद्धवजीका आना सुनकर सती यशोदा तुरंत दरवाजेके किवाड़ोंके पास चली आयी और अपने पुत्रकी चर्चा सुनने लगीं। उस समय स्नेहवश उनके स्तनोंसे दूध झरने लगा और नेत्र-कमलोंसे आँसुओंकी धारा बह चली। फिर वे लाज छोड़कर पुत्रस्नेहसे उद्धवके पास चली आर्यों और सारा कुशल- मङ्गल स्वयं पूछने लगीं। नेत्रोंसे बहती हुई अश्रुधाराको आँचलसे पोंछकर, हरिकी भावनासे विह्वल नन्दजीकी उपस्थितिमें वे बोलीं ॥ १७-१८ ॥(Mathurakhand Chapter 11 to 15)

महामते ! इसी प्रकार मथुरामें भी उन्होंने विचित्र पराक्रम प्रकट किया। कंसका रजक बड़ा डींग हाँकता था, किंतु श्रीहरिने एक ही हाथकी चोटसे उसका काम तमाम कर दिया। सब लोगोंके देखते-देखते कंसके प्रचण्ड धनुर्दण्डको बीचसे ही खण्डित कर दिया-ठीक उसी तरह, जैसे हाथी ईखके डंडेको तोड़ डालता है। कुवलयापीड नामक हाथी बलमें दस हजार हाथियोंकी समानता करता था, किंतु भगवान्ने उसकी सूँड़ पकड़कर उसे भूतलपर दे मारा। चाणूर, मुष्टिक, कूट, शल और तोशलको माधवने मल्लयुद्ध करके भूपृष्ठपर मार गिराया। मदमत्त दैत्य कंस एक लाख हाथियोंके समान बलशाली था; परंतु उसे श्रीकृष्णने मञ्चसे उठाकर भुजाओंके वेगसे घुमाते हुए पृथ्वीपर उसी तरह पटक दिया, जैसे कोई बालक कमण्डलुको गिरा दे। फिर जैसे हाथीपर सिंह कूदे, उसी प्रकार वे कंसपर कूद पड़े। कंसके कङ्क आदि छोटे भाइयोंका महाबली बलदेवने मुद्गरसे ही तुरंत उसी प्रकार कचूमर निकाल दिया, जैसे किसी सिंहने बहुत-से मृगोंको मौतके घाट उतार दिया हो। अपने गुरुको दक्षिणा देनेके लिये महासागरमें कूदकर स्वयं श्रीहरिने शङ्खरूपधारी पञ्चजन नामक असुरका संहार कर डाला। महानन्द! ये अद्भुत चरित्र भगवान् श्रीकृष्णके बिना कौन कर सकता है? उन श्रीहरिको नमस्कार है॥ ४५-५३॥

इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें श्रीमथुराखण्डके अन्तर्गत नारद बहुलाश्व-संवादमें ‘नन्दराज और उद्धवका मिलन’ नामक चौदहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १४॥

यहां एक क्लिक में पढ़ें ~ श्री राम चालीसा

पंद्रहवाँ अध्याय

गोपाङ्गनाओंके साथ उद्भवका कदली-वनमें जाना और वहाँ उनकी स्तुति करके श्रीकृष्णद्वारा भेजे गये पत्र अर्पित करना

नारदजी कहते हैं- राजन् ! इस प्रकार श्रीहरिकी चर्चा करते हुए नन्द और उद्धवकी वह रात एक क्षणके समान व्यतीत हो गयी, उनके हर्षको बढ़ानेवाली होनेके कारण उसका ‘क्षणदा’ (आनन्ददायिनी) नाम चरितार्थ हो गया। जब ब्राह्ममुहूर्त आया, तब सारी गोपाङ्गनाओंने उठकर अपने-अपने द्वारकी देहली एवं आँगन लीपकर वहाँ प्रज्वलित दीप रख दिये। फिर हाथ-पैर धोकर मथानीसे रस्सी लगाकर वे स्रहयुक्त दहीको सब ओरसे मथने लगीं। मथानीकी रस्सी खींचनेसे चञ्चल हुए हार और हाथोंके कंगन बज रहे थे। उनकी वेणियोंसे फूल झर-झरकर गिर रहे थे और चमकते हुए कुण्डल उनके कानोंकी शोभा बढ़ा रहे थे। वे सब-की-सब चन्द्रमुखी, कमलनयनी तथा विचित्र वर्णकि वस्त्र धारण करनेके कारण अत्यन्त मनोहर थीं। श्रीकृष्ण और बलदेवके मङ्गलमय चरित्रोंका घर-घरमें जहाँ-तहाँ प्रेमपूर्वक गान कर रही थीं। प्रत्येक गोष्ठमें सुन्दर गौएँ इधर-उधर रँभा रही थीं। गली-गलीमें सर्वत्र दही मथनेके शब्दसे मिश्रित गोपाङ्गनाओंका गीत सुनकर विस्मित हुए उद्धव इस प्रकार बोल उठे- ‘अहो! इस नन्द नगरमें तो भक्तिदेवी यत्र-तत्र-सर्वत्र नृत्य कर रही हैं।’ यों कहते हुए वे गाँव- से बाहर यमुना नदीमें स्नान करनेके लिये गये ॥१-८ ॥(Mathurakhand Chapter 11 to 15)

उस समय उद्धवके रथको देखकर गोपियाँ बोलीं- सखियो! आज यहाँ किसका रथ आ पहुँचा है? अथवा वह क्रूर अक्रूर ही तो फिर नहीं आया है, जो नूतन-कमल-दल-लोचन श्रीनन्दनन्दनको महापुरी मथुरामें लिवा ले गया था? जैसे कद्रूने जगत्‌के लोगोंको मारने या डॅसवानेके लिये ही इधर-उधर विषधर नागौंको उत्पन्न किया है, उसी प्रकार स्नेही सत्पुरुषोंको तीव्र ताप देनेके लिये ही न जाने उसकी माताने उसे किस कुसमयमें जन्म दिया था? जो कंसका स्वार्थसाधक तथा कंसका ही अत्यन्त निर्दय सखा है, वह इस व्रजमण्डलमें फिर क्यों आया है? अपने मरे हुए स्वामीकी पारलौकिक क्रिया क्या आज वह हमलोगोंके प्राणोंसे ही सम्पन्न करेगा ? ॥ ९-११॥

नारदजी कहते हैं- राजन् ! इस प्रकार बातचीत करती हुई व्रजकी गोपाङ्गनाएँ सारथिके मुखको दो अङ्गुलियोंसे ठोककर निकटसे पूछने लगीं- ‘ जल्दी बताओ, यह किसका रथ है?’ बेचारा सारथि आर्त- भावसे हक्का-बक्का-सा होकर देखने लगा। इतनेमें उन्हें उद्धवजी आते दिखायी दिये। उनकी कान्ति मेघके समान श्याम थी। नेत्र प्रफुल्ल कमलदलके समान विशाल थे। आकार भी श्रीकृष्णसे मिलता- जुलता था। वे करोड़ों कामदेवोंको मोह लेनेवाले जान पड़ते थे। उनके शरीरपर पीताम्बर सुशोभित था। उन्होंने गलेमें नूतन वैजयन्ती माला धारण कर रखी थी, जिसपर झुंड-के-झुंड भ्रमर टूटे पड़ते थे। उनके हाथमें सहस्रदल कमल सुशोभित था। उन्होंने हाथोंमें बाँसुरी और बेंतकी छड़ी ले रखी थी। उनका वेष बड़ा मनोहर था। करोड़ों बालरवियोंकी कान्तिसे युक्त मुकुट उनके मस्तकको मण्डित कर रहा था। वक्षः स्थलमें कौस्तुभ नामक महामणि प्रकाशमान थी और रत्नमय कुण्डल उनके कपोलमण्डलकी कान्ति बढ़ा रहे थे। नरेश्वर। चाल- ढाल, आकृति, शोभा, शरीर, हास और मधुरस्वर-सभी दृष्टियोंसे श्रीकृष्णका सारूप्य धारण करनेवाले उन उद्धवको देखकर समस्त गोपियाँ चकित हो गयीं और उन्हें गोविन्दका सखा जानकर उनके सामने आयीं ॥ १२-१५ ॥

यह जानकर कि ये भगवान् श्रीहरिका संदेश लेकर आये हैं, वे नीतियुक्त सुन्दर वचन बोलकर उनके प्रति आदर दिखाने लगीं तथा संतोंके स्वामी गोविन्दकी गूढ़ कुशल पूछनेके लिये उन उद्धवजीको साथ लेकर वे कदलीवनमें गयीं, जहाँ वृषभानुनन्दिनी श्रीराधा यमुनाके तटपर मनोहर निकुञ्जमन्दिरमें भगवान्के विरहसे आतुर होकर बैठी थीं और उन श्रीहरिके बिना सारे जगत्‌को सर्वथा सूना मानती थीं। जो पहले केलोंके पत्तोंसे और घिसे हुए चन्दनके पक्क्से शीतल मेघमन्दिर-सा प्रतीत होता था तथा यमुनाकी चञ्चल चारु तरंगोंकी फुहार पड़नेसे जहाँ ऐसा प्रतीत होता था कि साक्षात् सुधाकिरण चन्द्रमाकी सुधाराशि स्वतः गल रही है, ऐसा कदली-वन सारा-का-सारा श्रीराधाकी वियोगाग्निके तेजसे अत्यन्त झुलस गया था। केवल श्रीकृष्णके शुभागमनकी आशासे श्रीराधा अपने शरीरकी रक्षा कर रही थीं। श्रीकृष्णके सखा उद्धवका आगमन सुनकर श्रीराधाने अपनी सखियोंके द्वारा अन्न, पान और मधुपर्क आदि माङ्गलिक वस्तुएँ अर्पितकर उनका बड़ा आदर-सत्कार किया। उस समय वे बारंबार ‘श्रीकृष्ण-कृष्ण’ का उच्चारण करती थीं। गोविन्दके वियोगसे खिन्न हुई राधा अमावास्यामें प्रविष्ट चन्द्रकलाकी भाँति क्षीण हो रही थीं। उस समय उद्धवने नताङ्गी एवं कृशाङ्गी राधाको हाथ जोड़कर प्रणाम किया और उनकी परिक्रमा करके वे हर्षपूर्वक बोले ॥ १६-२१ ॥(Mathurakhand Chapter 11 to 15)

उद्धवने कहा- श्रीराधे! श्रीकृष्ण सदा परि- पूर्णतम भगवान् हैं और आप सदा परिपूर्णतमा भगवती हैं। श्रीकृष्णचन्द्र नित्यलीलापरायण हैं और आप नित्यलीलाका सम्पादन करनेवाली नित्यलीलावती हैं। श्रीकृष्ण भूमा हैं और आप इन्दिरा हैं। श्रीकृष्ण नित्य सनातन ब्रह्मा हैं और आप सदा उनकी शक्ति सरस्वती हैं। श्रीकृष्ण शिव हैं और आप कल्याणस्वरूपा शिवा हैं। भगवान् श्रीकृष्ण विष्णु हैं और आप निश्चय ही उनकी पराशक्ति वैष्णवी हैं। आदिदेवता श्रीहरि कौमारसर्गी- सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमार हैं तथा आप ज्ञानमयी शुभा स्मृति हैं। श्रीहरि प्रलयकालके जलमें क्रीड़ा करनेवाले यज्ञवराह हैं और आप ही वसुधा हैं। श्रीहरि मनसे जब देवर्षिवर्य नारद बनते हैं, तब साक्षात् आप ही उनके हाथकी वीणा होती हैं। श्रीहरि जब धर्मनन्दन नर और नारायण होते हैं, तब आप ही जगत्में शान्ति स्थापित करनेवाली साक्षात् शान्तिरूपिणी होती हैं। श्रीकृष्ण ही साक्षात् महाप्रभु कपिल हैं और आप ही सिद्धसेविता सिद्धि। राधे! श्रीकृष्ण महामुनीश्वर दत्तात्रेय हैं और आप ही नित्यज्ञानमयी सिद्धि। श्रीहरि यज्ञ हैं और आप दक्षिणा। वे उरुक्रम वामन हैं तो आप सदा उनकी शक्ति जयन्ती हैं। श्रीहरि जब समस्त राजाओंके अधिराज पृथु होते हैं, तब आप उन महाराजकी पटरानी अर्चिर्देवीके रूपमें प्रकट होती हैं। शङ्खासुरका वध करनेके लिये जब श्रीहरिने मत्स्यावतार ग्रहण किया, तब आप श्रुतिरूपा हुई। मन्दराचलद्वारा समुद्र- मन्थनके समय श्रीहरि कच्छप रूपमें प्रकट हुए, तब आप वासुकिनागमें शुभदायिनी नेती शक्तिरूपसे प्रकट हुईं। शुभे। परमेश्वर श्रीहरि जब पीड़ाहारी धन्वन्तरिके रूपमें आविर्भूत हुए, तब आप दिव्य सुधामयी ओषधिके रूपमें दृष्टिगोचर हुई। श्रीकृष्णचन्द्र जब मोहिनीरूपमें सामने आये, तब आप उनके भीतर विश्व-विमोहिनी मोहिनीके रूपमें अभिव्यक्त हुईं। श्रीहरि जब नृसिंहरूप धारण करके नृसिंहलीला करने लगे, तब आप निज- भक्तवत्सला लीलाके रूपमें सामने आयीं। जब श्रीकृष्णने वामनरूप धारण किया, तब आप अपने भक्तजनों द्वारा कीर्तित कीर्तिरूपिणी हुईं। जब श्रीहरि भृगुनन्दन परशुरामका रूप धारण करके सामने आये, तब आप ही उनके कुठारकी धारा बनीं। श्रीकृष्णचन्द्र जब रघुकुलचन्द्र श्रीराम हुए, तब आप ही उनकी धर्मपत्नी जनकनन्दिनी सीता थीं। जब शार्ङ्गधन्वा श्रीहरि बादरायणमुनि व्यासके रूपमें प्रकट होते हैं, तब आप वेदान्ततत्त्वको प्रकट करनेवाली देववाणीके रूपमें आविर्भूत होती हैं। वृष्णि- कुल-तिलक माधव ही जब संकर्षणरूप होते हैं, तब आप ही ब्रह्मभवा रेवतीके रूपमें उनकी सेवामें विराजमान होती हैं। श्रीहरि जब असुरोंको मोहित करनेवाले बुद्धके रूपमें प्रकट होते हैं, तब आप विश्वजनमोहिनी बुद्धि होती हैं। जब श्रीहरि धर्मपालक कल्किके रूपमें प्रकट होंगे, तब आप कृतिरूपिणी होंगी ॥ २२-३३॥

चन्द्रमुखी राधे ! चन्द्रमण्डलमें श्रीकृष्ण ही चन्द्र- रूप हैं और आप ही सदा चन्द्रिकारूपिणी हैं। आकाशगत सूर्यमण्डलमें श्रीकृष्ण ही सूर्य हैं और आप ही उनकी प्रभामयी परिधिके रूपमें प्रतिष्ठित हैं। राधे। निश्चय ही यादवेन्द्र श्रीहरि सदा देवराज इन्द्रके रूपमें विराजते हैं और आप वहीं शचीश्वरी शचीके रूपमें निवास करती हैं। परमेश्वर श्रीहरि ही हिरण्यरेता अग्रि हैं और आप ही सदा हिरण्मयी पराज्योति हैं। श्रीकृष्ण ही राजराज कुबेरके रूपमें विराजते हैं और आप ही उनकी निधिमें निधीश्वरी होकर शोभा पाती हैं। साक्षात् श्रीहरि ही क्षीरसागर हैं और आप ही तरंगित होनेवाली श्वेत रेशमके समान शुकूवर्णा तरङ्ग माला हैं। सर्वेश्वर श्रीहरि जब-जब कोई शरीर धारण करते हैं, तब-तब आप उनके अनुरूप शक्तिके रूपमें प्रसिद्ध होती हैं। स्वयं श्रीहरि जगत्स्वरूप तथा ब्रह्मरूप हैं और आप ही जगन्मयी एवं ब्रह्ममयी चैतन्यशक्ति हैं। राधे! आज भी वे ही ये श्रीहरि व्रजराजनन्दन हैं और आप उनकी प्रिया वृषभानुनन्दिनी हैं। आप दोनोंने जगत् में सुख-शान्तिकी स्थापनाके लिये नाना प्रकारके क्रीडामय चरित्रोंद्वारा ललित आदि लीलाओंके रूपमें सत्त्वमयी लीला प्रकट की है। पुराण-पुरुष श्रीकृष्ण स्वयं परब्रह्म हैं और आप ही उनकी इच्छारूपिणी लीलाशक्ति हैं। आप दोनोंके श्रीविग्रह सदा परस्पर संयुक्त हैं। ऐसे आप दोनों श्रीराधा-कृष्णको मेरा नमस्कार है। राधिके! आप शोक न करें और अपने प्राणनाथका दिया हुआ यह पत्र लें। उन्होंने यह संदेश दिया है कि मैं कुछ ही दिनोंमें यहाँके कार्योंका सम्पादन करके वहाँ आऊँगा। गोपाङ्गनाओ! आज ही भगवान् श्रीकृष्णके दिये हुए ये परम मङ्गलमय सैकड़ों पत्र आपलोग ग्रहण करें। श्रीकृष्णकी प्रियतमा व्रजसुन्दरियोंके शत-शत यूथोंके लिये ये पत्र अर्पित किये गये हैं॥ ३४-४१ ॥

इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें श्रीमथुराखण्डके अन्तर्गत नारद बहुलाश्व-संवादमें ‘उद्धवद्वारा श्रीराधाका दर्शन’ नामक पंद्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५ ॥

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