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Ramayana And Ramcharitmanas Difference in Hindi

Ramayana And Ramcharitmanas Difference in Hindi

वाल्मीकि रामायण और रामचरितमानस में क्या अंतर है?

महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण और गोस्वामी तुलसीदास कृत रामचरितमानस में कई बड़े अंतर (Ramayana And Ramcharitmanas Difference) हैं। उपलब्ध रामायण के हिंदी अर्थों में भगवान श्रीराम की शिक्षा, सीता स्वयंवर, अहिल्या प्रसंग, केवट प्रसंग, सीता-हरण आदि प्रसंग रामचरितमानस में अंतर दिखाय देता है।

मर्यादा पुरुषोत्‍तम भगवान श्रीराम के जीवन को दर्शाने वाले दो महाकाव्य हैं, एक वाल्‍मीक‍ि द्वारा रचित “रामायण” और गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित “रामचरितमानस”। यह दोनों महाकाव्यों को सटीक ओर प्रमाण‍िक माना गया है। परंतु दोनों ही महाकाव्यों रामायण और श्रीरामचरितमानस में कुछ बातें हैं जो अलग हैं। कुछ बातें ऐसी हैं की जिनका वर्णन केवल वाल्मीकि रामायण में ही म‍िलता है। Ramayana And Ramcharitmanas Difference

रामायण की रचना महर्षि वाल्मीकि द्वारा त्रेता-युग में लगभग 5114 ईसा पूर्व का माना जाता है, जिसमें भगवान विष्णु के अवतार भगवान श्रीराम की लीलाओं का वर्णन है। भगवान श्रीराम के जीवन काल महर्षि वाल्मीकि उपस्थित थे। वाल्मीकि द्वारा रचित ही मूल रामायण हे, जिनके आधार पर कई रामायण लिखी गई है। महर्षि वाल्मीकि द्वारा संस्कृत भाषा में रामायण लिखी गई है।

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रामचरितमानस की रचना तुलसीदासजी द्वारा 16वीं शताब्दी ईस्वी में अवधी भाषा में लिखी गई है। तुलसीदास संस्कृत भाषा के बहुत बड़े विद्वान थे। तुलसीदास जी ने रामचरितमानस को प्राथमिक रूप से ‘चौपाई’ में लिखा गया है। गोस्वामी तुलसीदास ने इसे क्षेत्रीय भाषा में लिखा ताकि स्थानीय लोग इसे समझ सकें और इसका उपयोग कर सकें। रामचरितमानस रामायण की तरह ही सात कांडों में लिखा गया है।

।। Ramayana And Ramcharitmanas Difference ।।

रामायण और रामचरितमानस का अंतर:-

रामायण के दो शब्द हे, राम और अयण का अर्थ शास्त्र, पथ, गमन होता है, रामायण का शाब्दिक अर्थ राम की यात्रा होता है। रामस्य अयनम् चरितान्वितं शास्त्रम् रामायणम्। रामायण को कभी भी कैसे भी नहीं पढ़ा जा सकता, पढ़ने के कुछ नियम हैं, जैसे मंदिर में जाने के नियम होते है।

रामचरितमानस का शाब्दिक अर्थ है राम चरित्र का सरोवर है। रामचरितमानस को पढ़ ने के कोई विशेष नियम नहीं है। रामचरितमानस में एक सरोवर की तरह स्वयं को पवित्र किया जा सकता है।

वाल्मीकि रामायण के मुताबिक महर्षि वाल्मीकि प्रचेता के दसवें पुत्र है। रामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास द्वारा महर्षि वालमीकि को रत्नाकर नाम का डाकू बताया गया है, जो नारदजी के प्रोत्साहन से मरा-मरा जपते-जपते राम-राम बोलने लगे और रामभक्त बन गए हैं।

।। Ramayana And Ramcharitmanas Difference ।।

रामायण और रामचरितमानस दोनों महाकाव्यों में सबसे बड़ा अंतर यह हे की वाल्मीकि रामायण के भगवान श्री राम मानवीय बताया गया है, और श्री राम का चरित्र सरल ही बताया गया है। महर्षि वाल्मीकि के लिए श्री राम मर्यादा पुरुषोत्तम हैं।

तुलसीदासजी ने रामचरितमानस में श्री राम को केवल अवतारी ही नहीं, उससे भी ऊपर परब्रह्म बताया गया है। इसका वर्णन तुलसीदासजी ने इस प्रकार किया हे, जब मनु और शतरूपा तीनो देव ब्रह्मा, विष्णु और शिव से वरदान लेने से मना करते हे, तब परब्रह्म श्रीराम उसे दर्शन देते है। तुलसीदास कहते हैं –

“सुनु सेवक सुरतरु सुरधेनू, बिधि हरि हर बंदित पद रेनू।
सेवत सुलभ सकल सुखदायक, प्रणतपाल सचराचर नायक।।”

अर्थ:
जिनके चरणों की वन्दना स्वयं ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों ही करते है, और जिनके स्वरूप की स्तुति गुणवान और गुणरहित दोनों करते हैं: उनसे वे क्या वर माँगें?

वाल्मीकि रामायण में श्री राम को भगवान विष्णु के अवतार सांकेतिक रूप से बताया गया है। रामचरितमानस में स्पष्ट रूप से जोर दिया गया है, और बार-बार कहा गया हे की श्रीराम भगवान विष्णु के अवतार हैं।

वाल्मीकि की रामायण सात कांड हे, जिन्हें बाल कांड, अयोध्या कांड, अरण्य कांड, किष्किन्धा कांड, सुंदर कांड, युद्ध कांड और उत्तर कांड के नाम दिए गये है। इसी तरह रामचरितमानस में सात कांड है। परन्तु गोस्वामी तुलसीदास ने युद्ध कांड का लंका कांड नाम रखा है।

वाल्मीकि रामायण को प्राथमिक रूप से श्लोको में लिखा गया है, और रामचरितमानस को प्राथमिक रूप से ‘चौपाई’ में लिखा गया है।

वाल्मीकि रामायण में राजा दशरथ की 350 पत्नियां थीं, जिनमें से कौशल्या, सुमित्रा और कैकेयी मुख्य पत्नियां थीं। रामचरितमानस अनुसार राजा दशरथ की केवल 3 पत्नि कौशल्या, सुमित्रा और कैकेयी थीं।

वाल्मीकि रामायण में महाराजा जनक ने सीता स्वयंवर आयोजित नहीं किया था। महर्षि विश्वामित्र के साथ श्री राम जनक के पास गए, वहा शिव का धनुष दिखाया गया, जिसे भगवान श्री राम ने सहजता से उठाकर तोड़ दिया था। फिर राजा जनक ने सीता का विवाह श्री राम के साथ कर दिया था। रामचरितमानस के अनुसार सीता के विवाह के लिए राजा जनक ने स्वयंवर का आयोजन किया था।

वाल्मीकि की रामायण के अनुसार युद्ध के मैदान में श्री राम से सामना करने रावण दो बार आया था। रामचरितमानस के अनुसार युद्ध के मैदान में श्री राम से सामना करने रावण एक बार युद्ध के अंत आया था।

वाल्मीकि रामायण काव्य का अंत तब होता हे, जब माता सीता धरती माता में विलीन हो जाती है, और लक्ष्मण सरयू नदी में समाधि लेकर परमधाम को जाते है। भगवान श्री राम ‘सीता और लक्ष्मण की अनुपस्थिति के बाद सरयू नदी में समाधी लेने का निर्णय लेते है। श्री राम सरयू नदी के अंदर गए और विष्णु का अवतार ले लिया और नश्वर शरीर की यात्रा पूरी करते हैं।

गोस्वामी तुलसीदास रचित रामचरितमानस काव्य का अंत श्री राम और माता सीता के जुड़वां बेटों लव और कुश के जन्म के साथ समाप्त होता है। रामचरितमानस में कभी भी लक्ष्मण की मृत्यु और माता सीता के धरती माता में विलीन होनेका का उल्लेख नहीं है।

कुल मिलाकर, रामायण और रामचरितमानस दोनों महत्वपूर्ण धार्मिक ग्रंथ हैं जो हिंदू संस्कृति और श्री राम के जीवन कार्यों में ज्ञानदृष्टि प्रदान करते हैं। हरेक पाठ की अपनी अदभूत प्रणाली और फ़ोकस है, रामायण और रामचरितमानस दोनों को दुनिया भर में व्यापक रूप से पढ़ा और सम्मानित किया जाता है।

 

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2 thoughts on “Ramayana And Ramcharitmanas Difference in Hindi

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      रामायण, महाभारत और अन्य हिंदू धर्मग्रंथों में वर्णित मुख्य पात्र, जैसे कि राम, सीता, रावण, कृष्ण, पांडव, कौरव, द्रोण, द्रौपदी, शबरी और अन्य, वास्तविक जीवित मनुष्य के रूप में इस पृथ्वी पर कभी भी अस्तित्व में नहीं थे। इसका मुख्य कारण यह है कि इन पात्रों का जन्म सामान्य प्राकृतिक तरीकों से नहीं हुआ था, बल्कि असामान्य और अलौकिक घटनाओं के माध्यम से हुआ था। हिंदू शास्त्रों में इन असामान्य जन्मों का विस्तृत वर्णन मिलता है, जो वास्तविक जैविक और वैज्ञानिक वास्तविकता के अनुरूप नहीं हैं। उदाहरण के लिए, राम और उनके सभी भाइयों का जन्म खीर खाने के बाद एक चमत्कारिक घटना के रूप में वर्णित है, जो कि मानव जन्म की सामान्य प्रक्रिया से बिल्कुल अलग है। इसी प्रकार, द्रौपदी का जन्म अग्नि से हुआ माना जाता है, द्रोण का जन्म एक मटके से हुआ था, गांधारी के 100 पुत्रों का जन्म मांस के एक ढेर से हुआ था, और कुंती ने अपने पति के बिना ही कर्ण को जन्म दिया था। ये सभी घटनाएं सामान्य मानव जन्म की प्रक्रियाओं से परे हैं और वास्तविक जैविक सिद्धांतों के विपरीत हैं। इसलिए, यह माना जाता है कि ये सभी कहानियाँ और घटनाएँ केवल साहित्यिक शैलियाँ हैं, जो कहानियों, कविताओं और लिखित परंपराओं तक ही सीमित हैं। इन पात्रों और घटनाओं का कोई ठोस, प्रमाणित ऐतिहासिक अस्तित्व सिद्ध नहीं हुआ है। ये केवल धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व रखते हैं, लेकिन इन्हें ऐतिहासिक रूप से सत्य नहीं माना जा सकता। इनका उद्देश्य संभवतः धार्मिक और नैतिक शिक्षा प्रदान करना था, न कि वास्तविक ऐतिहासिक घटनाओं का वर्णन करना। इन कथाओं को प्रतीकात्मक रूप से समझा जाना चाहिए, न कि शाब्दिक रूप से।

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        भारतीय परंपरा, सनातन धर्म और अनेक प्राचीन ग्रंथों के अनुसार रामायण और महाभारत केवल कथाएँ नहीं, बल्कि वास्तविक घटनाओं पर आधारित महाग्रंथ माने जाते हैं।
        इन्हीं ग्रंथों में वर्णित भगवान श्रीराम, श्रीकृष्ण, पांडव, द्रौपदी, रावण, हनुमान आदि पात्रों को करोड़ों लोग वास्तविक ऐतिहासिक और आध्यात्मिक व्यक्तित्व मानते हैं।

        इन ग्रंथों के समर्थन में समय-समय पर कई ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और पुरातात्त्विक संदर्भ भी सामने आए हैं। उदाहरण के लिए —

        🔹 अयोध्या को भगवान श्रीराम की जन्मभूमि माना जाता है, जहाँ प्राचीन अवशेष और ऐतिहासिक संदर्भ प्राप्त हुए हैं।

        🔹 रामसेतु (Adam’s Bridge) भारत और श्रीलंका के बीच स्थित वह संरचना है, जिसका उल्लेख रामायण में मिलता है। इसे लेकर अनेक शोध और चर्चाएँ हुई हैं।

        🔹 द्वारका नगरी, जिसे भगवान श्रीकृष्ण की नगरी माना जाता है, समुद्र के भीतर मिले प्राचीन अवशेषों के कारण विशेष चर्चा में रही है।

        🔹 कुरुक्षेत्र, जहाँ महाभारत का युद्ध हुआ माना जाता है, आज भी ऐतिहासिक और धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है।

        🔹 महाभारत और रामायण में वर्णित अनेक नदियाँ, नगर, पर्वत और स्थान आज भी भारत में मौजूद हैं, जो इन ग्रंथों की प्राचीनता और सांस्कृतिक निरंतरता को दर्शाते हैं।

        हालाँकि आधुनिक इतिहास और विज्ञान के कुछ विद्वान इन घटनाओं को अलग दृष्टिकोण से देखते हैं, फिर भी भारतीय संस्कृति में इन ग्रंथों का स्थान अत्यंत महान और सम्माननीय है।
        ये केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि धर्म, सत्य, कर्तव्य, भक्ति, त्याग, नीति और आदर्श जीवन की अमूल्य शिक्षाएँ देने वाले ग्रंथ हैं।

        करोड़ों लोगों की आस्था, परंपरा और हजारों वर्षों से चली आ रही सांस्कृतिक स्मृतियाँ इन महाग्रंथों से जुड़ी हुई हैं।

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