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Garga Samhita Dwarkakhand Chapter 11 to 15

Garga Samhita
Garga Samhita Dwarkakhand Chapter 11 to 15

॥ श्रीहरिः ॥

ॐ दामोदर हृषीकेश वासुदेव नमोऽस्तु ते

श्रीगणेशाय नमः

Garga Samhita Dwarkakhand Chapter 11 to 15
श्री गर्ग संहिता के द्वारकाखण्ड अध्याय 11 से 15 तक

श्री गर्ग संहिता के द्वारकाखण्ड (Dwarkakhand Chapter 11 to 15) ग्यारहवाँ अध्याय में गज और ग्राह बने हुए मन्त्रियों का युद्ध और भगवान विष्णु के द्वारा उनका उद्धार करना। बारहवाँ अध्याय में महामुनि त्रित के शाप से कक्षीवान का शङ्खरूप होकर सरोवर में रहना और श्रीकृष्ण के द्वारा उसका उद्धार होना; शङ्खोद्धार-तीर्थ की महिमा का वर्णन कहा गया है। तेरहवाँ अध्याय में प्रभास, सरस्वती, बोधपिप्पल और गोमती-सिन्धु-संगमका माहात्म्य कहा गया है। चौदहवाँ अध्याय में द्वारका क्षेत्रके समुद्र तथा रैवतक पर्वतका माहात्म्य कहा गया है, और पंद्रहवाँ अध्याय में यज्ञतीर्थ, कपिटङ्कतीर्थ, नृगकूप, गोपीभूमि तथा गोपीचन्दनकी महिमा; द्वारकाकी मिट्टीके स्पर्शसे एक महान् पापीका उद्धार किया है।

यहां पढ़ें ~ गर्ग संहिता गोलोक खंड पहले अध्याय से पांचवा अध्याय तक

ग्यारहवाँ अध्याय

गज और ग्राह बने हुए मन्त्रियोंका युद्ध और भगवान् विष्णुके द्वारा उनका उद्धार

नारदजी कहते हैं- राजन् ! कुबेरके दोनों मन्त्री ब्राह्मणके शापसे मोहित होकर अत्यन्त दीन-दुखी हो गये। उस यज्ञमें साक्षात् भगवान् विष्णु पधारे थे। वे अपनी शरणमें आये हुए उन दोनों मन्त्रियोंसे बोले ॥ १ ॥

श्रीभगवान्ने कहा- मेरी अर्चनासे युक्त इस यज्ञमें तुम दोनोंको दुःख उठाना पड़ा है। ब्राह्मणोंकी कही हुई बातको टाल देने या अन्यथा करनेकी शक्ति मुझमें नहीं है। तुम दोनों ग्राह और हाथी हो जाओ। जब कभी तुम दोनोंमें युद्ध छिड़ जायगा, तब मेरी कृपासे तुम दोनों अपने पूर्ववर्ती स्वरूपको प्राप्त हो जाओगे ॥ २-३ ॥

नारदजी कहते हैं- राजन् ! भगवान् विष्णुके यों कहनेपर राजाधिराज कुबेरके वे दोनों मन्त्री ग्राह और हाथी हो गये, परंतु उन्हें अपने पूर्वजन्मकी बातोंका स्मरण बना रहा। घण्टानाद ग्राह हो गया और सैकड़ों वर्षोंतक गोमतीमें रहा। वह बड़ा विकराल, अत्यन्त भयंकर तथा सदा रौद्ररूप धारण किये रहता था। पार्श्वमौलि रैवतक पर्वतके जंगलमें चार दाँतों- वाला हाथी हुआ। उसके शरीरका रंग काजलके समान काला था। उसके पृष्ठ भागकी ऊँचाई सौ धनुषके बराबर थी। वञ्जुल, कुरब, कुन्द, बदर, बेंत, बाँस, केला, भोजपत्रका पेड़, कचनार, बिजैसार, अर्जुन, मन्दार, बकायन, अशोक, बरगद, आम, चम्पा, चन्दन, कटहल, गूलर, पीपल, खजूर, बिजौरा नींबू, चिरौंजी, आमड़ा, आम्र तथा क्रमुक (पूगीफल) के वृक्षोंसे परिमण्डित रैवतकके विशाल वनमें वह महागजराज विचरा करता था ॥४-९॥(Dwarkakhand Chapter 11 to 15)

एक समय वैशाख मासमें वह गजराज पर्वतीय कन्दरासे निकलकर अपने गणोंके साथ चिग्घाड़ता हुआ गोमती-गङ्गामें स्स्रानके लिये आया। बहुत देरतक जलमें स्नान करके इधर-उधर सूँड़ घुमाते हुए उस गजराजने अपनी सूँड़के जलसे हाथियोंके सभी छोटे- छोटे बच्चोंको नहलाया। वह महाबलिष्ठ महान् ग्राह भी दैवकी प्रेरणासे उसी जलमें विद्यमान था। उसने दैवकी प्रेरणासे रोषसे भरकर उस गजराजका एक पैर पकड़ लिया। वह बलोन्मत्त गजराजको अपने घरमें खींच ले गया। फिर हाथी भी उसे खींचकर जलके बाहर ले आया। तत्पश्चात् उसने पुनः हाथीको खींचा। हथिनियाँ और उसके बच्चे उस गजराजको संकटसे उबारनेमें असमर्थ थे। इस प्रकार युद्ध करते और परस्पर एक-दूसरेको खींचते हुए उन दोनोंके पचपन वर्ष व्यतीत हो गये। सत्पुरुषोंके नेत्रोंके समक्ष यह घटना घटित हो रही थी। इस प्रकार कष्टमें पड़कर कालपाशके वशीभूत हो पूर्वजन्मकी बातोंको स्मरण करनेवाला वह महान् गजराज प्रेमलक्षणा-भक्तिसे श्रीहरिके चरणोंका आश्रय ले उन्हींका चिन्तन करने लगा ॥ १०-१६ ॥

गजेन्द्र बोला- हे श्रीकृष्ण ! हे कृष्ण (अर्जुन) के सखा तथा हे श्याम शरीर धारण करनेवाले देवेश्वर विष्णुदेव ! आप श्रीकृष्णको मेरा प्रणाम प्राप्त हो। हे पूर्ण प्रभो! हे परमपावन पुण्यकीर्ते! हे परमेश्वर! पापके पाशसे मेरी रक्षा करो, रक्षा करो ॥ १७॥

नारदजी कहते हैं- राजन् ! इस प्रकार ग्राहने जिसका पैर पकड़ लिया था, उस हाथीको अपना स्मरण करता जान, दीनवत्सल श्रीहरि गरुडपर आरूढ़ हो बड़े वेगसे दौड़े आये। उन्होंने स्वयं ही गरुडसे उतरकर दौड़ते हुए उस ग्राहपर चक्र चलाया। चक्रके वहाँ पहुँचनेके पहले ही ग्राहका वह अद्भुत मस्तक उसके धड़से कटकर अलग हो गया, जैसे दीनताके प्राप्त होते ही धन चला जाता है। इसके बाद वह चक्र गोमतीके – कुण्डमें महान् शब्द करता हुआ गिरा। उसने वहाँके समस्त प्रस्तर-समूहोंको चक्रसे चिह्नित कर दिया। उसकी नेमिकी रगड़से वहाँ कल्याणकारी ‘चक्रतीर्थ’ प्रकट हो गया। राजन् ! उस चक्रतीर्थके दर्शनसे ब्रह्म- हत्या छूट जाती है। मस्तक कट जानेसे ग्राहने अपना पूर्वरूप धारण कर लिया और श्रीकृष्णके अनुग्रहसे उस हाथीका दिव्य रूप हो गया ॥ १८-२२॥(Dwarkakhand Chapter 11 to 15)

फिर श्रीहरिकी परिक्रमा, नमस्कार और स्तुति करके हाथ जोड़े हुए वे दोनों कुबेर मन्त्री पुनः अपने स्थानको चले गये। देवतालोग फूल बरसाते हुए जय-जयकार करने लगे। भगवान् प्रकृतिसे परे विद्यमान अपने साक्षात् धाममें चले गये। जो नरश्रेष्ठ चक्रतीर्थकी इस कथाको सुनता है, वह चक्रतीर्थमें स्रान करनेका फल पाता है-इसमें संशय नहीं है। जो एकाग्रचित्त हो गज और ग्राहकी इस पुण्यमयी कथाको सुनता है, उसके बुरे स्वप्न नष्ट हो जाते हैं तथा निश्चय ही उसे अच्छे स्वप्न दिखायी देते हैं॥ २३-२६ ॥

इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें द्वारकाखण्डके अन्तर्गत नारद बहुलाश्व-संवादमें चक्रतीर्थकी उत्पत्तिके प्रसङ्गमें ‘गज और ग्राहका शापसे उद्धार’ नामक ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११॥

यहां एक क्लिक में पढ़ें ~ श्रीमहाभारतम् आदिपर्व प्रथमोऽध्यायः

बारहवाँ अध्याय

महामुनि त्रितके शापसे कक्षीवान का शङ्खरूप होकर सरोवरमें रहना और
श्रीकृष्णके द्वारा उसका उद्धार होना; शङ्खोद्धार-तीर्थकी महिमा

श्रीनारदजी कहते हैं- राजन् ! द्वारकामें जो ‘शङ्खोद्धार’ नामक तीर्थ है, वह सब तीर्थोंमें प्रधान है। जो मनुष्य उस तीर्थमें स्नान करके सुवर्णका दान देता है, वह सम्पूर्ण उपद्रवोंसे रहित विष्णुलोकमें जाता है॥ १॥

एक समय श्रीकृष्णभक्त शान्तचित्त महामुनि त्रित तीर्थयात्राके प्रसङ्गसे आनर्तदेशमें आये। वहाँ एक सुन्दर सरोवर देखकर मुनिने उसमें स्नान करके श्रीहरिकी पूजा की। उस पूजामें सुन्दर लक्षणोंसे युक्त जो महाशङ्ख वे बजाया करते थे, उसे उन्होंके शिष्य कक्षीवान्ने अत्यन्त लोभके कारण चुरा लिया। पूजाका शङ्ख चुराया गया देख मुनिवर त्रित कुपित होकर बोले- ‘जो मेरा शङ्ख ले गया है, वह अवश्य ही शङ्ख हो जाय।’ कक्षीवान् तत्काल शापसे पीड़ित हो शङ्ख हो गया और गुरुके चरणोंमें गिरकर बोला- ‘भगवन् ! मेरी रक्षा कीजिये।’ त्रितमुनि शीघ्र ही शान्त हो गये और बोले- ‘दुर्बुद्धे ! यह तुमने क्या किया ? चोरीके दोषसे जो पाप हुआ है, उसका फल भोग। मेरी बात झूठी नहीं हो सकती। तू यहाँ श्रीकृष्णके चरण कमलोंका चिन्तन करता रह; वे ही तेरा उद्धार करेंगे ॥ २-६: ॥२-६ ॥

राजन् ! यों कहकर जब महामुनि त्रितदेव वहाँसे चले गये, तब शङ्खरूपधारी कक्षीवान् उस सरोवरमें कूद पड़ा और ‘कृष्ण! कृष्ण !!’ पुकारता हुआ सौ वर्षीतक वहीं रहा ॥ ७-८ ॥

तदनन्तर भक्तवत्सल परिपूर्णतम साक्षात् भगवान् श्रीकृष्ण उस सरोवरके तटपर आये और उसे अभय- दान देते हुए बोले- ‘डरो मत।’ मेघ गर्जनाके समान भगवान की वह गम्भीर वाणी सुनकर वह जलचर शङ्ख चीख उठा- ‘देवदेव! जगत्पते !! मेरी रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये।’ तब सर्वसामर्थ्यशाली कृपापरायण भगवान्ने नागराजके शरीरकी भाँति अपने हृष्ट-पुष्ट भुजाके द्वारा उस भक्त शङ्खका उसी प्रकार जलसे उद्धार किया, जैसे किसी समय उन्होंने गजका उद्धार किया था। कक्षीवान् उसी क्षण शङ्खका रूप छोड़कर दिव्यरूपधारी हो गया और हाथ जोड़ श्रीहरिको नमस्कार करके उनकी स्तुति करने लगा ॥ ९-१२॥(Dwarkakhand Chapter 11 to 15)

कक्षीवान्ने कहा- वासुदेव ! आपको नमस्कार है। गोविन्द ! पुरुषोत्तम ! दीनवत्सल ! दीनानाथ ! द्वारकानाथ ! परमेश्वर! आपको मेरा बारंबार प्रणाम है। आपने ही ध्रुवको ध्रुवपद प्रदान किया, प्रह्लादकी पीड़ा हर ली, गजराजका उद्धार किया तथा राजा बलिकी भेंट स्वीकार की; आपको बारंबार नमस्कार है। द्रौपदीका चीर बढ़ाकर उसकी लाज बचाने वाले आप श्रीहरिको नमस्कार है। विष, अग्नि और वनवाससे पाण्डवोंकी रक्षा करनेवाले पाण्डव- सहायक आपको नमस्कार है। यदुकुलके रक्षक तथा इन्द्रके कोपसे व्रजके गोपोंकी रक्षा करनेवाले आपको नमस्कार है। गुरुको, माता देवकीको और ब्राह्मणको उनके मरे हुए पुत्रोंको लाकर देनेवाले श्रीकृष्ण ! आपको बारंबार नमस्कार है। जरासंधकी कैदमें पड़े हुए नरेशोंको वहाँसे छुटकारा दिलानेवाले, राजा नृगका उद्धार करनेवाले तथा सुदामाकी दीनता हर लेनेवाले आप साक्षात् परमेश्वरको नमस्कार है। आप वासुदेव श्रीकृष्णको नमस्कार है। संकर्षण, प्रद्युम्र और अनिरुद्धको भी नमस्कार है। इस प्रकार चतुर्व्यह रूपधारी आप परमेश्वरको मेरा प्रणाम है। देवदेव ! आप ही मेरी माता, आप ही पिता, आप ही बन्धु, आप ही सखा, आप ही विद्या, आप ही धन और आप ही मेरे सब कुछ हैं ॥ १३-१९ ॥

श्रीनारदजी कहते हैं- राजन् ! इस प्रकार श्रीहरिकी स्तुति करके प्रेम-पूरित कक्षीवान् एक श्रेष्ठ विमानपर आरूढ़ हो यादवोंके देखते-देखते, सैकड़ों सूर्योके समान तेजस्वी होकर, दसों दिशाओंको उद्भासित – करता हुआ समस्त उपद्रवोंसे रहित विष्णुधाममें चला गया। मैथिलेश्वर! श्रीहरिने जिस सरोवरके तटपर शङ्खका उद्धार किया था, वह उस घटनाके कारण ही परम पुण्यमय ‘शङ्खोद्धार-तीर्थ’ के नामसे प्रसिद्ध हो – गया। जो श्रेष्ठ मानव शङ्खोद्धारकी इस कथाको सुनता है, वह शङ्खोद्धारतीर्थमें स्नान करनेका फल पा जाता है-इसमें संशय नहीं है॥ २०-२३॥

इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें द्वारकाखण्डके अन्तर्गत नारद बहुलाश्व-संवादमें ‘शङ्खोद्धार-तीर्थका माहात्म्य’ नामक बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२॥

यहां एक क्लिक में पढ़ें ~ श्रीमद भागवत गीता का प्रथम अध्याय

तेरहवाँ अध्याय

प्रभास, सरस्वती, बोधपिप्पल और गोमती-सिन्धु-संगमका माहात्म्य

श्रीनारदजी कहते हैं- महामते! विदेहराज ! प्रभासतीर्थका भी माहात्म्य सुनो, जो सर्वपापापहारी, पुण्यदायक तथा तेजकी वृद्धि करनेवाला है। राजन् ! सिंहराशिमें बृहस्पतिके रहते गोदावरीमें, कुम्भगत बृहस्पतिके होनेपर हरक्षेत्र (हरद्वार) में, सूर्यग्रहणके समय कुरुक्षेत्रमें और चन्द्रग्रहणके अवसरपर काशीमें स्नान और दान करके मनुष्य जिस पुण्यको पाता है, उससे सौगुना पुण्य प्रभासक्षेत्रमें प्रतिदिन स्नान करनेसे प्राप्त होता रहता है। दक्षके शापसे राजयक्ष्मा नामक रोग हो जानेपर नक्षत्रोंके स्वामी चन्द्रमा जहाँ स्नान करके तत्काल शाप-दोषसे मुक्त हो गये और पुनः उनकी कलाओंका उदय हुआ, वही ‘प्रभासतीर्थ’ है ॥ १-४॥

राजन् ! उस तीर्थमें परम पुण्यमयी पश्चिमवाहिनी सरस्वती प्रवाहित होती हैं। उनके जलमें स्नान करके पापी मनुष्य भी साक्षात् ब्रह्ममय हो जाता है। नरेश्वर! सरस्वतीके तटपर ‘बोधपिप्पल’ नामसे प्रसिद्ध तीर्थ है, जहाँ भगवान् श्रीकृष्णने उद्धवको परम कल्याणमय भागवत-धर्मका उपदेश दिया था। राजन् ! उस बोधपिप्पलकी विधिवत् पूजा करके सिर नवाकर जो उसका स्पर्श करता है और ब्रह्मसम्मित भागवतपुराण- को सुनता है-मनको संयममें रखते हुए मौनभावसे भागवतका आधा श्लोक या चौथाई श्लोक भी सुन लेता है-उसके हाथमें भगवान् विष्णुका परमपद आ जाता है, अर्थात् उसके लिये परमपदकी प्राप्ति निश्चित हो जाती है। जो प्रभासमें भाद्रपद मासकी पूर्णिमा तिथिको सोनेके सिंहासनसे युक्त श्रीमद्भागवतपुराणका दान करता है, वह परमगतिको प्राप्त होता है। जिन्होंने कहीं या कभी श्रीमद्भागवतपुराण नहीं सुना, उन भूमिवासी मनुष्योंका जन्म व्यर्थ चला गया। जिन्होंने भागवतपुराण नहीं सुना, जिनके द्वारा पुराण-पुरुष परमात्माकी आराधना नहीं की गयी तथा जिन लोगोंने भूमिदेवों- ब्राह्मणोंके मुखरूपी अग्निमें उत्तम भोजनकी आहुति नहीं दी, उन मनुष्योंका जन्म व्यर्थ चला गया* ॥५-११॥(Dwarkakhand Chapter 11 to 15)

द्वारकामें गोमती और समुद्रका संगम सब तीर्थों- का राजा है, जिसमें स्नान करके मनुष्य निर्मल वैकुण्ठधामको प्राप्त होता है। गङ्गासागर-संगम- तीर्थमें स्नान करनेसे सौ अश्वमेधयज्ञोंका पुण्यफल प्राप्त होता है। उससे भी सहस्रगुना पुण्य गोमती- सागर-संगममें स्नान करनेसे सुलभ होता है। इसी विषयमें पुराणवेत्ता पुरुष इस पुरातन इतिहासका कथन किया करते हैं, जिसके श्रवणमात्रसे मनुष्य पापतापसे मुक्त हो जाता है॥ १२-१४॥

पूर्वकालमें हस्तिनापुरमें राजमार्गपति नामक एक श्रेष्ठ वैश्य निवास करता था। वह महान् गौरवशाली तथा कुबेरके समान निधिपति था। आगे चलकर वह वैश्य वेश्याओंके प्रसङ्गमें रहने लगा। वह विटों (धूर्तों और लम्पटों) की गोष्ठीमें बड़ा चतुर समझा जाता था। जुआ खेलनेमें उसकी बड़ी आसक्ति थी। वह लोभ, मोह और मदसे उन्मत्त रहता था। वह महादुष्ट वैश्य सदा झूठ बोलता और कुकर्ममें लगा रहता था। उसने ब्राह्मणों, पितरों और देवताओंके निमित्त कभी धनका दान नहीं किया। वह यदि कहीं दूरसे भगवान की कथा-वार्ता होती देख लेता तो कतराकर जल्दी ही और दूर निकल जाता था। उसने माँ-बापकी कभी सेवा नहीं की और अपने पुत्रोंको भी धन नहीं दिया। वह ऐसा दुर्बुद्धि और खल था कि धनाढ्य होनेपर भी अपनी पत्नीको त्यागकर उससे अलग रहने लगा। वेश्याओंके सङ्गमें रहनेसे उसका आधा धन नष्ट हो गया, आधा चोर चुरा ले गये और जो कुछ थोड़ा-सा पृथ्वीमें गड़ा हुआ था, वह स्वतः वहीं विलीन हो गया; क्योंकि पुण्यसे लक्ष्मी बढ़ती है और पापसे निश्चय ही नष्ट हो जाती है॥ १५-२० ॥

इस प्रकार वेश्याओंमें आसक्त हुआ वह महादुष्ट वैश्य निर्धन हो गया और उसी रमणीय नगर हस्तिनापुरमें चोरीका काम करने लगा। उन दिनों वहाँ राजा शंतनु राज्य करते थे। उन्होंने चोरीके कर्ममें लगे हुए उस वैश्यको रस्सियोंसे बाँधकर अपने देशसे बाहर निकलवा दिया। वनमें रहकर वह जीवोंकी हिंसा करने लगा। उन्हीं दिनों वहाँ बहुत वर्षोंतक वर्षा नहीं हुई। तब दुर्भिक्षसे पीड़ित हुआ वह वैश्य पश्चिम दिशाकी ओर चला गया। वहाँ एक वनमें किसी सिंहने अपने पंजेसे उसको मार डाला। उसी समय यमदूत आये और उसे पाशोंमें बाँधकर नीचे मुख करके लटकाये तथा कोड़ोंसे पीटते हुए यमलोकके मार्गपर ले चले। तदनन्तर कोई महान् गृध्र उसकी बाँहका मांस लेकर आकाशमें उड़ गया और अपनी चोंचसे तुरंत ही उसको खाने लगा। अन्य पक्षी जिन्हें मांस नहीं मिला था, वे सब आतुर हो उसीमेंसे अपने लिये भी मांस ग्रहण करने लगे। इस प्रकार चील आदि पक्षियोंका वहाँ महान् कोलाहल होने लगा; तथापि उस गृध्रने अपने मुखसे उस मांसको नहीं छोड़ा। वह उड़ते-उड़ते पश्चिम दिशाकी ओर चला गया। वहाँ उसीके समान शक्तिशाली एक दूसरे गृध्रने उसके मुखपर अपनी तीखी चोंचसे प्रहार किया। तब उसके मुँहसे वह मांस गोमती- सागर-संगममें गिर गया। उस तीर्थमें उसके मांसके डूबते ही यह महापातकी वैश्य यमदूतोंके पाशोंको स्वयं तोड़कर चार भुजाओंसे युक्त देवता हो गया और उन दूतोंके देखते-देखते दिव्य विमानपर आरूढ़ हो सम्पूर्ण दिशाओंको प्रकाशित करता हुआ वह श्रीहरिके परमधाममें चला गया ॥ २१-३१ ॥(Dwarkakhand Chapter 11 to 15)

जो मनुष्य गोमती समुद्र-संगमके इस माहात्म्य- को सुनता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो भगवान् विष्णुके लोकमें जाता है॥ ३२ ॥

इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें द्वारकाखण्डके अन्तर्गत नारद बहुलाश्व-संवादमें ‘प्रभास, सरस्वती, बोधपिप्पल तथा गोमती-सिन्धु-संगमका माहात्म्य’ नामक तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥१३॥

यहां एक क्लिक में पढ़ें ~  नित्य कर्म पूजा प्रकाश हिंदी में

चौदहवाँ अध्याय

द्वारका क्षेत्रके समुद्र तथा रैवतक पर्वतका माहात्म्य

श्रीनारदजी कहते हैं- सबको सम्मान देनेवाले नरेश! अब द्वारावती और समुद्रके माहात्म्यका वर्णन सुनो, जो सब पापोंको हर लेनेवाला, पुण्यदायक तथा उन तीर्थोंमें स्नानका फल देनेवाला है॥ १ ॥

महीपते! जो वैशाख मासकी पूर्णमासीको व्रत रहकर, स्नानपूर्वक नदीपति समुद्रका विधिवत् पूजन और उसे नमस्कार करके रत्नोंका दान करता है, उसके शरीरमें तीनों देवता (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) निवास करते हैं तथा उसके दर्शनमात्रसे मनुष्य कृतार्थ हो जाता है। इतना ही नहीं-उसके शरीरके स्पर्शसे तत्काल ब्रह्महत्या छूट जाती है तथा वह जहाँ-जहाँ जाता है वहाँ-वहाँकी भूमि मङ्गलमयी हो जाती है। जगत का वध करनेवाला पापी मनुष्य भी उसका दर्शन करके मरनेपर अपने पाप-समूहका उच्छेद कर डालता और परम मोक्षको प्राप्त होता है ॥ २-५॥

मानद ! अब रैवत पर्वतका माहात्म्य सुनो, जो समस्त पापोंको दूर करनेवाला, पुण्यदायक तथा भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाला है। गौतमका पुत्र मेधावी बड़ा बुद्धिमान् और विष्णुभक्त था। उसने सौ अयुत (दस लाख) वर्षीतक विन्ध्याचल पर्वतपर तपस्या की। एक दिन साक्षात् अपान्तरतमा नामक मुनि उससे मिलनेके लिये आये, परंतु उत्कट तपस्वी मेधावी अपने आसनसे नहीं उठा। तब अपान्तरतमा रोषसे भर गये और उसे शाप देते हुए बोले- ‘संतोंके प्रति भक्ति न रखनेवाले पापात्मन् ! तुझे अपने तपोबलपर बड़ा गर्व हो गया है। तेरी स्थिति पर्वतके समान है। अतः दुर्मते ! तू यहीं पर्वत हो जा।’ यों कहकर साक्षात् अपान्तरतमामुनि चले गये। मेधावी शैलभावको प्राप्त हो श्रीशैलका पुत्र हुआ। परंतु वह महाबुद्धिमान् तपस्वी तथा विष्णुभक्तिके प्रभावसे पूर्वजन्मकी बातोंका स्मरण करनेवाला हुआ ॥ ६-११॥(Dwarkakhand Chapter 11 to 15)

एक दिन मेरे मुखसे द्वारकापुरीका माहात्म्य सुनकर श्रीशैलके पुत्रने कहा- मुने! आप शीघ्र राजा रैवतके पास जाइये और उनसे मेरी कही हुई प्रार्थना सुना दीजिये; क्योंकि आप बड़े दीनवत्सल हैं। ये महाबली राजा रैवत यदि प्रसन्न हो जायें और मुझे यहाँसे उठा ले चलें, तब मेरा द्वारकापुरीके क्षेत्रमें निवास सम्भव होगा।’ विष्णुभक्तोंको शान्ति प्रदान करना तो मेरा काम ही ठहरा। मैंने उस पर्वतकुमारकी बात सुनकर शीघ्र ही राजा रैवतके पास जा उसकी कही हुई बात सुना दी। राजन् ! मेरी बात सुनकर राजा रैवत बड़े प्रसन्न हुए और बोले- ‘यहाँ कोई पर्वत नहीं है; अतः उस शैलपुत्रको दोनों भुजाओंसे उखाड़कर यहाँ लाऊँगा और द्वारकामें उसकी स्थापना करूंगा।’- ऐसी प्रतिज्ञा उन्होंने की ॥ १२-१६ ॥

राजा रैवत उस पर्वतको चुरा लानेके लिये ज्यों ही प्रस्थित हुए, उनसे भी पहले मैं श्रीशैलके नगरमें जा पहुँचा। मुझे कलह प्रिय लगता है, इसलिये मैंने महात्मा श्रीशैलको राजाका उसके पुत्रकी चोरीसे सम्बन्ध रखनेवाला सारा वृत्तान्त कह सुनाया। श्रीशैलने पुत्रके मोहवश उसको डाँटकर कहा-‘तू कहाँ जा रहा है?’ इसके बाद श्रीशैल गिरिराज सुमेरु और नगेश्वर हिमवान्के पास गया। वह धर्मात्मा पर्वत पुत्र-स्नेहसे बहुत व्याकुल था। उसने उन पर्वतराजोंसे कहा- ‘मुझे दैवने यही एक पुत्र दिया है, मेरे बहुत-से पुत्र नहीं हैं; उस एकको भी यहाँसे हर ले जानेके लिये महाबली राजा रैवत आये हैं। इन महात्मा राजाके कारण मेरा पुत्र विदेश चला जा रहा है। मैं पुत्र-स्नेहसे विकल होकर आप दोनोंकी शरणमें आया हूँ। आप- लोग राजा रैवतको जीतकर शीघ्र ही मुझे मेरा पुत्र दिला दें ॥ १७-२२॥

जातिके प्रति पक्षपात होनेके कारण वे दोनों पर्वत, सुमेरु और हिमालय, लाखों दूसरे पर्वतोंसे घिरे हुए तुरंत ही युद्धके लिये आये। उधर हनुमान जीने जैसे द्रोणगिरिको उखाड़ लिया था, उसी प्रकार रैवतने अपनी दोनों भुजाओंसे उस पर्वतको उखाड़कर बल- पूर्वक ऊपर उठा लिया और ज्यों ही वहाँसे चलनेका विचार किया, त्यों ही अस्त्र-शस्त्र धारण किये बहुत-से पर्वतोंको वहाँ उपस्थित देखा। उन्हें देखकर राजाने उच्चस्वरसे अट्टहास किया, मानो विद्युत्पातकी गड़गड़ाहट हुई हो। उनके उस सिंहनादसे सातों लोकों और सातों पातालोंके साथ सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड गूंज उठा। उसी समय उन समस्त योद्धाओंके हाथोंसे सारे अस्त्र- शस्त्र स्वतः गिर गये। जब वे पर्वत निःशस्त्र हो गये, तब बार-बार कोलाहल करते हुए मार्गमें पर्वत- सहित जाते हुए रैवतको मुक्कों और घुटनोंसे उसी प्रकार मारने लगे, जैसे पूर्वकालमें द्रोणाचलके रक्षक महाबली हनुमान्जीके पीछे उन्हें मार गिरानेके लिये ये कुछ दूरतक गये थे। उन पर्वतोंके चोट करनेपर भी राजा रैवतने अपने हाथसे उक्त पर्वतको नहीं छोड़ा ॥ २३-२८ ॥

इधर मेरे ही मुखसे राजा रैवतके ऊपर पर्वतोंका आक्रमण सुनकर भक्तवत्सल भगवान् श्रीकृष्ण अपने भक्तकी सहायताके लिये तत्काल आकाशमार्गसे आ गये और राजाको अपना उत्कृष्ट तेज देकर ‘डरो मत’- यों कहकर, अभयदान दे, तुरंत वहीं अन्तर्धान हो गये। भगवान के चले जानेपर उन्हींके तेजसे सम्पन्न हो राजा रैवतने एक हाथपर उस पर्वतको रख लिया और वज्रको भी चूर कर देनेवाले अपने मुक्केसे सुमेरु पर्वतको इस प्रकार मारा, मानो महाबली वज्रधारी इन्द्रने किसी पर्वतपर वज्रसे प्रहार किया हो। उनके मुक्केकी मारसे मेरु पर्वत व्याकुल होकर गिर पड़ा। फिर हिमवान को भी अपने बाहुवेगसे धराशायी करके उस रणदुर्मद नरेशने विन्ध्य आदि अन्य पर्वतोंको अपने पैरोंसे रौंद डाला ॥ २९-३३॥

विन्ध्य आदि सभी पर्वत उनके पैरोंके आघातसे कुचले जानेके कारण भयभीत हो युद्धका मैदान छोड़- कर दसों दिशाओंमें भाग चले। इस प्रकार पर्वतोंके समुदायपर विजय पाकर पर्वतके समान सुदृढ़ शरीर- वाले राजा रैवतने उस पर्वतको विजय-गर्जनाके साथ ले जाकर आनर्त्तदेशमें स्थापित कर दिया ॥ ३४-३५॥(Dwarkakhand Chapter 11 to 15)

राजन्। वह पर्वत राजा रैवतके ही नामपर ‘रैवतकाचल’ के रूपमें विख्यात हुआ। भगवान्के प्रति भक्तिभावसे युक्त वह श्रेष्ठ पर्वत आज भी द्वारका क्षेत्रमें विराजमान है। उसके दर्शनमात्रसे ब्रह्महत्याका पाप छूट जाता है। उसके स्पर्शमात्रसे मनुष्य सौ यज्ञोंका फल प्राप्त कर लेता है। उस पर्वतकी यात्रा और परिक्रमा करके नतमस्तक हो जो मनुष्य ब्राह्मणको भोजन देता है, वह भगवान् विष्णुके परमपदको प्राप्त कर लेता है॥ ३६-३८ ॥

इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें द्वारकाखण्डके अन्तर्गत नारद बहुलाश्व-संवादमें ‘समुद्र और रैवतकाचलका माहात्म्य’ नामक चौदहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १४॥

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पंद्रहवाँ अध्याय

यज्ञतीर्थ, कपिटङ्कतीर्थ, नृगकूप, गोपीभूमि तथा गोपीचन्दनकी महिमा;
द्वारकाकी मिट्टीके स्पर्शसे एक महान् पापीका उद्धार

श्रीनारदजी कहते हैं- राजन् ! उस पर्वत- पर पूर्वकालमें राजा रैवतने यज्ञतीर्थका निर्माण किया, जहाँ एक यज्ञ करके मनुष्य कोटियज्ञोंका फल पाता है। वहीं ‘कपिटङ्क’ नामक तीर्थ है, जो एक कपिके मार गिराये जानेसे प्रकट हुआ था। राजन् ! रैवतक गिरिपर वह तीर्थ सब पापोंका नाश करने- वाला है॥ १-२॥

भौमासुरका सखा एक द्विविद नामक वानर था, जो बड़ा ही दुष्ट था। उसे बलरामजीने वज्रके समान चोट करनेवाले मुक्केसे जहाँ मारा था, वही स्थान ‘कपिटङ्क- तीर्थ’ है। वह वानर सत्पुरुषोंकी अवहेलना करनेवाला था, तो भी वहाँ मारे जानेसे तत्काल मुक्त हो गया। नरेश्वर! उस तीर्थमें स्नान करनेके लिये सदा देवता- लोग आया करते हैं। ‘कलविङ्कतीर्थ’ की यात्रा करने- पर कोटि गोदानका फल प्राप्त होता है। इससे दूना पुण्य शुभ दण्डकारण्यकी यात्रा करनेपर मिलता है। उससे भी चौगुना पुण्य सैन्धव नामक विशाल वनकी यात्रा करनेपर सुलभ होता है। उसकी अपेक्षा भी पाँच गुना अधिक पुण्य जम्बूमार्गकी यात्रा करनेसे मनुष्यको मिल जाता है। पुष्करतीर्थके वनमें उससे भी दस गुना पुण्य प्राप्त होता है। उससे दसगुना पुण्य ‘उत्पलावर्त- तीर्थ’ की यात्रासे सुलभ होता है। उसकी अपेक्षा भी दसगुना पुण्य ‘नैमिषारण्यतीर्थ’ में बताया गया है। विदेहराज ! नैमिषारण्य से भी सौगुना पुण्य ‘कपिटङ्क- तीर्थ’ में स्नान करनेसे प्राप्त होता है॥ ३-८॥(Dwarkakhand Chapter 11 to 15)

द्वारकामें एक ‘नृगकूप’ है, जो तीर्थोंमें सर्वोत्तम तीर्थ है। उसके दर्शनमात्रसे ब्रह्महत्याका पाप छूट जाता है। राजा नृगने अनजानमें एक ब्राह्मणकी गायको दूसरे ब्राह्मणके हाथमें दे दिया था। उसी पापसे उन्हें गिरगिटका शरीर धारण करके कूपमें रहना पड़ा। दानियोंमें सर्वश्रेष्ठ राजा नृग भी एक छोटे-से पापके कारण अन्धकूपमें गिरे और चार युगोंतक उसीमें रहे। फिर सत्पुरुषोंके देखते-देखते भगवान् श्रीकृष्णने उनका उद्धार किया। महीपते। उसी दिनसे ‘नृगकूप’ तीर्थस्वरूप हो गया। कार्तिककी पूर्णिमा को उस कूपके जलसे स्नान करना चाहिये। ऐसा करनेवाला मनुष्य कोटिजन्मों के किये हुए पापसे छुटकारा पा जाता है, इसमें संशय नहीं है। वहाँ विधिपूर्वक जो एक भी गोदान करता है, वह निस्संदेह कोटि गोदानके पुण्यफलका भागी होता है॥९-१३॥

राजन् ! अब ‘गोपीभूमि’ का माहात्म्य सुनो, जो पापहारी उत्तम तीर्थ है। उसके श्रवणमात्रसे कर्म- बन्धनसे छुटकारा मिल जाता है। जहाँ गोपियोंने निवास किया था, उस निवासके कारण ही वह स्थान ‘गोपीभूमि’ के नामसे प्रसिद्ध हुआ। वहाँ गोपियोंके अङ्गरागसे उत्पन्न उत्तम गोपीचन्दन उपलब्ध होता है। जो अपने अङ्गोंमें गोपीचन्दन लगाता है, उसे गङ्गा- स्नानका फल मिलता है। जो सदा गोपीचन्दनकी मुद्राओंसे मुद्रित होता है, अर्थात् गोपीचन्दनका छापा- तिलक लगाता है, उसे प्रतिदिन महानदियोंमें स्नान करनेका पुण्यफल प्राप्त होता है। उसने सहस्र अश्वमेध और सौ राजसूय यज्ञ कर लिये। सब तीर्थोंका सेवन, दान और व्रतोंका अनुष्ठान भी कर लिया। निस्संदेह वह नित्य गोपीचन्दन लगानेमात्रसे कृतार्थ हो जाता है। गङ्गाकी मिट्टीसे दुगुना पुण्य चित्रकूटकी रजका माना गया है, उससे भी दसगुना पुण्य पञ्चवटीकी रजका है, उसकी अपेक्षा भी सौगुना पुण्य गोपीचन्दन रजका है। गोपीचन्दनको तुम वृन्दावनकी रजके समान समझो। जिसके शरीरमें गोपीचन्दन लगा हो, वह सैकड़ों पापोंसे युक्त हो तो भी उसे यमराज भी अपने साथ नहीं ले जा सकते, फिर यमदूतोंकी तो बात ही क्या है। पापी होनेपर भी जो पुरुष प्रतिदिन गोपीचन्दनका तिलक धारण करता है, वह श्रीहरिके गोलोकधाममें जाता है, जहाँ प्राकृत गुणोंका प्रवेश नहीं है॥ १४-२२॥

सिन्धुदेशका एक राजा था, जिसका नाम दीर्घबाहु था। वह अन्यायपूर्ण जीवन बितानेवाला, दुष्टात्मा और सदा वेश्यासङ्गमें रत रहनेवाला था। उसने भारतवर्षमें सैकड़ों ब्रह्महत्याएँ की थीं। उस दुरात्माने दस गर्भवती स्त्रियोंका वध किया था। उसने शिकार खेलते समय अपने बाण-समूहोंसे कपिला गौओंकी हत्या की थी। एक दिन वह सिंधी घोड़ेपर चढ़कर मृगयाके लिये वनमें गया। वहाँ उसके कुपित मन्त्रीने राज्यके लोभसे उस महाखल नरेशको तीखी धारवाली तलवारसे उस वनमें ही मार डाला। उसको पृथ्वीपर पड़ा और मृत्युको प्राप्त हुआ देख यमके सेवक बाँधकर परस्पर हर्ष प्रकट करते हुए उसे यमपुरी ले गये। उस पापीको सामने खड़ा देख बलवान् यमराजने तुरंत ही चित्रगुप्तसे पूछा- ‘इसके योग्य कौन-सी यातना है?’ ॥ २३-२८ ॥

चित्रगुप्तने कहा- महाराज! निस्संदेह इसे चौरासी लाख नरकोंमें बारी-बारीसे गिराया जाय और जबतक चन्द्रमा और सूर्य विद्यमान हैं, तबतक यह नरकका कष्ट भोगता रहे। इसने भारतवर्षमें जन्म लेकर एक क्षण भी कभी पुण्य-कर्म नहीं किया है। इसने दस गर्भवती स्त्रियोंकी और असंख्य कपिला गौओंकी हत्या की है। इसके सिवा वन्य पशुओंकी हत्या तो इसने हजारोंकी संख्यामें की है। इसलिये देवता और ब्राह्मणोंकी निन्दा करनेवाला यह महान् पापी है॥ २९-३१ ॥

नारदजी कहते हैं- राजन् ! उस समय यमकी आज्ञासे यमदूत उस पापात्माको लेकर कुम्भीपाक नरकमें ले गये, जिसका दीर्घ विस्तार एक सहस्त्र योजनका था। वहाँ विशाल कड़ाहमें तपाया हुआ तेल भरा था। उस खौलते हुए तेलमें फेन उठ रहे थे। यमदूतोंने उस पापीको उसी कुम्भीपाकमें गिरा दिया। उसके गिरते ही वहाँकी प्रलयाग्निके समान प्रज्वलित अग्नि तत्काल शीतल हो गयी। विदेहराज ! जैसे प्रह्लादको खौलते हुए तेलमें फेंकनेपर वह शीतल हो गया था, उसी प्रकार उस पापीको नरकमें गिरानेसे वहाँकी ज्वाला शान्त हो गयी। यमदूतोंने उसी समय यह विचित्र घटना महात्मा यमको बतायी। चित्रगुप्तके साथ धर्मराज बड़ी चिन्तामें पड़े और सोचने लगे- ‘इसने तो भूतलपर क्षणभर भी कभी कोई पुण्य नहीं किया है।’ नरेश्वर। इसी समय धर्मराजको सभामें व्यासजी पधारे। उनकी विधिपूर्वक पूजा करके परम बुद्धिमान् धर्मात्मा धर्मराजने उन्हें प्रणाम करके पूछा ॥ ३२-३६ ॥

यम बोले- भगवन् ! इस पापीने पहले कभी कहीं कोई सुकृत नहीं किया है। इसलिये जिसमें फेन उठ रहा था, ऐसे खौलते हुए तेलसे भरे कुम्भीपाकके महान् कड़ाहमें इसको फेंका गया था। इसके डालते ही वहाँकी आग तत्काल शीतल हो गयी। इस संदेहके कारण मेरे चित्तमें निश्चय ही बड़ा खेद है॥ ३७-३८ ॥

श्रीव्यासजीने कहा- महाराज! पाप-पुण्यकी गति उसी प्रकार बड़ी सूक्ष्म होती है, जैसे सम्पूर्ण शास्त्रोंके विद्वानोंमें श्रेष्ठ प्रज्ञावान् पुरुषोंने ब्रह्मकी गति सूक्ष्म बतायी है। दैवयोगसे इसको स्वयं ही प्रत्यक्ष एवं सार्थक पुण्य प्राप्त हो गया है। महामते। जिस पुण्यसे वह शुद्ध हुआ है, उसे बताता हूँ; सुनो। जहाँ किसीके हाथसे द्वारकाकी मिट्टी पड़ी हुई थी, वहीं इस पापीकी मृत्यु हुई है। उस मृत्तिकाके प्रभावसे ही यह पापी शुद्ध हो गया है। जिसके अङ्गमें गोपीचन्दनका लेप हो, वह ‘नर’ से ‘नारायण’ हो जाता है। उसके दर्शनमात्रसे तत्काल ब्रह्महत्या छूट जाती है॥ ३९-४२ ॥(Dwarkakhand Chapter 11 to 15)

नारदजी कहते हैं- राजन् ! यह सुनकर धर्मराज उसे ले आये और इच्छानुसार चलनेवाले एक विशेष विमानपर उसे बैठाकर उन्होंने प्रकृतिसे परे वैकुण्ठधामको भेज दिया। गोपीचन्दनके सुयश (प्रताप) का ज्ञान उनको अकस्मात् उसी समय हुआ। राजन् ! इस प्रकार मैंने तुम्हें गोपीचन्दनकी महिमा बतायी। जो श्रेष्ठ मनुष्य गोपीचन्दनके इस माहात्म्यको सुनता ह, वह महात्मा श्रीकृष्णके परमधाममें जाता है॥ ४३-४४ ॥

इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें द्वारकाखण्डके अन्तर्गत नारद-व्यास-संवादमें ‘कपिटङ्क, नृगकूप तथा गोपीभूमिकी महिमाका वर्णन’ नामक पंद्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५॥

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