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Garga Samhita Vrindavan Khand Chapter 1 to 5

Garga Samhita
Garga Samhita Vrindavan Khand Chapter 1 to 5

॥ श्रीहरिः ॥

ॐ दामोदर हृषीकेश वासुदेव नमोऽस्तु ते

श्रीराधाकृष्णाभ्यां नमः

श्री गर्ग संहिता वृन्दावनखण्ड | Garga Samhita Vrindavan Khand Chapter 1 to 5

श्री गर्ग संहिता में वृन्दावनखण्ड (Vrindavan Khand Chapter 1 to 5) के प्रथम अध्याय में सन्नन्दका गोपोंको महावनसे वृन्दावनमें चलनेकी सम्मति देना और व्रजमण्डलके सर्वाधिक माहात्यका वर्णन कहा गया है। दूसरे अध्याय में गिरिराज गोवर्धन की उत्पत्ति तथा उसका व्रजमण्डल में आगमन हुआ है। तीसरे अध्याय में श्री यमुना जी का गोलोक से अवतरण और पुनः गोलोकधाम में प्रवेश किया है। चौथे अध्याय में श्रीबलराम और श्री कृष्ण के द्वारा बछड़ों का चराया जाना तथा वत्सासुर का उद्धार, और पांचवे अध्याय में वकासुरका उद्धार किया है।

प्रथम अध्याय

सन्नन्दका गोपोंको महावनसे वृन्दावनमें चलनेकी सम्मति देना और व्रजमण्डलके सर्वाधिक माहात्यका वर्णन करना

यहां पढ़ें ~ गर्ग संहिता पहले अध्याय से पांचवे अध्याय तक

मङ्गलाचरण
कृष्णातीरे कोकिलाकेलिकीरे गुञ्जापुञ्जे देवपुष्पादिकुञ्ज ।
कम्बुग्रीवौ क्षिप्तबाहू चलन्तौ राधाकृष्णौ मङ्गलं मे भवेताम् ॥ १ ॥
श्रीयमुनाजीके तटपर, जहाँ कोकिलाएँ तथा क्रीडाशुक विचरते हैं, गुञ्जापुञ्जसे विलसित देवपुष्प (पारिजात) आदिके कुञ्जमें, शङ्ख-सदृश सुन्दर ग्रीवासे सुशोभित तथा एक-दूसरेके गलेमें बाँह डालकर चलनेवाले प्रिया-प्रियतम श्रीराधा-कृष्ण मेरे लिये मङ्गलमय हों ॥ १ ॥

अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जनशलाकया।
चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥ २ ॥
मैं अज्ञानरूपी रतौंधीसे अंधा हो रहा था; जिन्होंने ज्ञानरूपी अञ्जनकी शलाकासे मेरी आँखें खोल दी हैं, उन श्रीगुरुदेवको नमस्कार है ॥ २ ॥

श्रीनारदजी कहते हैं – राजन् ! एक समयकी बात है- व्रजमें विविध उपद्रव होते देख नन्दराजने अपने सहायक नन्दों, उपनन्दों, वृषभानुओं, वृषभानु- वरों तथा अन्य बड़े-बूढ़े गोपोंको बुलाकर सभामें उनसे कहा ॥ ३ ॥

नन्द बोले – गोपगण ! महावनमें तो बहुत-से उत्पात हो रहे हैं। बताइये, हमलोगोंको इस समय क्या करना चाहिये ॥ ४ ॥(Vrindavan Khand Chapter 1 to 5)

श्रीनारदजी कहते हैं – यह सुनकर उन सबमें विशेष मन्त्रकुशल वृद्ध गोप सन्नन्दने बलराम और श्रीकृष्णको गोदमें लेकर नन्दराजसे कहा ॥ ५ ॥

सन्नन्द बोले – मेरे विचारसे तो हमें अपने समस्त परिकरोंके साथ यहाँसे उठ चलना चाहिये और किसी दूसरे ऐसे स्थानमें जाकर डेरा डालना चाहिये, जहाँ उत्पातकी सम्भावना न हो। तुम्हारा बालक श्रीकृष्ण हम सबको प्राणोंके समान प्रिय है, व्रजवासियोंका जीवन है, व्रजका धन और गोपकुलका दीपक है और अपनी बाललीलासे सबके मनको मोह लेनेवाला है। हाय ! कितने खेदकी बात है कि इस बालकपर पूतना, शकट और तृणावर्तका आक्रमण हुआ, फिर इसके ऊपर वृक्ष गिर पड़े; इन सब संकटोंसे यह किसी प्रकार बचा है, इससे बढ़कर उत्पात और क्या हो सकता है। इसलिये हमलोग अपने बालकोंके साथ वृन्दावनमें चलें और जब उत्पात शान्त हो जायँ, तब फिर यहाँ आयें ॥ ६- ९ ॥

नन्दने पूछा – बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ सन्नन्दजी ! इस व्रजसे वृन्दावन कितनी दूर है? वह वन कितने कोसोंमें फैला हुआ है, उसका लक्षण क्या है और वहाँ कौन-सा सुख सुलभ है ? यह सब बताइये ॥ १० ॥

सन्नन्द बोले- बहिषत्से ईशानकोण, यदुपुरसे दक्षिण और शोणपुरसे पश्चिमकी भूमिको ‘माथुर-मण्डल’ कहते हैं। मथुरामण्डलके भीतर साढ़े बीस योजन विस्तृत भूभागको मनीषी पुरुषोंने ‘दिव्य माथुर-मण्डल’ या ‘व्रज’ बताया है। एक बार मैं मथुरापुरीमें वसुदेवजीके घर ठहरा हुआ था; वहीं श्रीगर्गाचार्यजीके मुखसे मैंने सुना था कि तीर्थराज प्रयागने भी इस दिव्य मथुरा-मण्डलकी पूजा की है। यों तो मथुरा-मण्डलमें बहुत-से वन हैं किंतु उन सबसे श्रेष्ठ ‘वृन्दावन’ नामक वन है, जो परिपूर्णतम भगवान्के भी मनको हरण करनेवाला लीला-क्रीडा- स्थल है। वैकुण्ठसे बढ़कर दूसरा कोई लोक न तो हुआ है और न आगे होगा। केवल एक ‘वृन्दावन’ ही ऐसा है, जो वैकुण्ठकी अपेक्षा भी परात्पर (परम उत्कृष्ट) है। जहाँ ‘गोवर्धन’ नामसे प्रसिद्ध गिरिराज विराजमान है, जहाँ कालिन्दीके तटपर मङ्गलधाम पुलिन है, जहाँ बृहत्सानु (बरसाना) पर्वत है तथा जहाँ नन्दीश्वर गिरि शोभा पाता है, जो चौबीस कोसके विस्तारमें स्थित तथा विशाल काननोंसे आवृत है; जो पशुओंके लिये हितकर, गोप-गोपी और गौओंके लिये सेवन करनेयोग्य तथा लताकुञ्जोंसे आवृत है, उस मनोहर वनको ‘वृन्दावन’ के नामसे स्मरण किया जाता है । ११- १८ ॥

नन्दजीने पूछा – सन्नन्दजी ! तीर्थराज प्रयागने कब इस व्रजकी पूजा की है, मैं यह जानना चाहता हूँ। इसे सुननेके लिये मेरे मनमें बड़ा कौतूहल – बड़ी उत्कण्ठा है ॥ १९ ॥

सन्नन्द बोले – नन्दराज ! पूर्वकालमें नैमित्तिक प्रलयके अवसरपर एक महान् दैत्य प्रकट हुआ, जो शङ्खासुरके नामसे प्रसिद्ध था। वह वेदद्रोही दैत्यराज समस्त देवताओंको जीतकर ब्रह्मलोकमें गया और वहाँ सोते हुए ब्रह्माके पाससे वेदोंकी पोथी चुराकर समुद्रमें जा घुसा। वेदोंके जाते ही देवताओंका सारा बल चला गया। तब पूर्ण भगवान् यज्ञेश्वर श्रीहरिने मत्स्यरूप धारण करके नैमित्तिक प्रलयके सागरमें उस शङ्खासुरके साथ युद्ध किया। महाबली दैत्य शङ्खने श्रीहरिके ऊपर शूल चलाया। किंतु साक्षात्श्री हरिने अपने चक्रसे उस शूलके सैकड़ों टुकड़े कर दिये। तब शङ्खने अपने सिर- से भगवान् विष्णुके वक्षःस्थलमें प्रहार किया। किंतु उसके उस प्रहारसे परात्पर श्रीहरि विचलित नहीं हुए। उस समय मत्स्यरूपधारी श्रीहरिने हाथमें गदा लेकर महाबली शङ्खरूपधारी उस दैत्यकी पीठपर आघात किया। गदाके प्रहारसे वह इतना पीड़ित हुआ कि उसका चित्त कुछ व्याकुल हो गया; किंतु पुनः उठकर उसने सर्वेश्वर श्रीहरिको मुक्केसे मारा। तब कमलनयन साक्षात् भगवान् विष्णुने कुपित हो अपने चक्रसे उसके सुदृढ़ मस्तकको सींगसहित काट डाला। व्रजेश्वर ! इस प्रकार शङ्खको जीतकर देवताओंके साथ सर्वव्यापी श्रीहरिने प्रयागमें आकर वे चारों वेद ब्रह्माजीको दे दिये। फिर सम्पूर्ण देवताओंके साथ उन्होंने विधिवत् यज्ञका अनुष्ठान किया और प्रयागतीर्थके अधिष्ठाता देवताको बुलाकर उसे ‘तीर्थराज’ पदपर अभिषिक्त कर दिया। साक्षात् अक्षयवटको तीर्थराजके लिये लीला-छत्र-सा बना दिया। मुनिकन्या गङ्गा तथा सूर्यसुता यमुना अपनी तरङ्गरूपी चामरोंसे उनकी सेवा करने लगीं। उसी समय जम्बूद्वीपके सारे तीर्थ भेंट लेकर बुद्धिमान् तीर्थराजके पास आये और उनकी पूजा और वन्दना करके वे तीर्थ अपने-अपने स्थान- को चले गये । नन्द ! जब देवताओंके साथ श्रीहरि भी चले गये, तब वहीं कलहप्रिय मुनीन्द्र नारदजी आ पहुँचे और सिंहासनपर देदीप्यमान तीर्थराजसे बोले ॥ २०- ३३ ।।(Vrindavan Khand Chapter 1 to 5)

श्रीनारदजीने कहा- महातपस्वी तीर्थराज ! निश्चय ही तुम समस्त तीर्थोद्वारा विशेषरूपसे पूजित हुए हो, तुम्हें सभी मुख्य मुख्य तीर्थोन यहाँ आकर भेंट समर्पित की है; परंतु व्रजके वृन्दावनादि तीर्थ यहाँ तुम्हारे सामने नहीं आये। तुम तीर्थोंक राजाधिराज हो, व्रजके प्रमादी तीर्थोंने यहाँ न आकर तुम्हारा तिरस्कार किया है ।। ३४-३५ ॥

सन्नन्द कहते हैं- यों कहकर साक्षात् देवर्षि- शिरोमणि नारदजी वहाँसे चले गये। तब तीर्थराजके मनमें बड़ा क्रोध हुआ और वे उसी क्षण श्रीहरिके लोकमें गये। श्रीहरिको प्रणाम और उनकी परिक्रमा करके सम्पूर्ण तीर्थोंसे घिरे हुए तीर्थराज हाथ जोड़कर भगवान्के सामने खड़े हुए और उन श्रीनाथसे बोले ।। ३६-३७ ।।

तीर्थराजने कहा- देवदेव ! मैं आपकी सेवामें इसलिये आया हूँ कि आपने तो मुझे ‘तीर्थराज’ बनाया और समस्त तीर्थोन मुझे भेंट दी, किंतु मथुरामण्डलके तीर्थ मेरे पास नहीं आये; उन प्रमादी व्रजतीर्थोन मेरा तिरस्कार किया है। अतः यह बात आपसे कहनेके लिये मैं आपके मन्दिरमें आया हूँ ।। ३८-३९ ॥

श्रीभगवान् बोले- मैंने तुम्हें धरतीके सब तीर्थोंका राजा- ‘तीर्थराज’ अवश्य बनाया है; किंतु अपने घरका भी राजा तुम्हें ही बना दिया हो, ऐसी बात तो नहीं हुई है ! फिर तुम तो मेरे गृहपर भी अधिकार जमानेकी इच्छा लेकर प्रमत्त पुरुषके समान बात कैसे कर रहे हो ? तीर्थराज ! तुम अपने घर जाओ और मेरा यह शुभ वचन सुन लो। मथुरामण्डल मेरा साक्षात् परात्पर धाम है, त्रिलोकीसे परे है। उस दिव्यधामका प्रलयकालमें भी संहार नहीं होता ॥ ४०-४२ ॥

सन्नन्द कहते हैं – यह सुनकर तीर्थराज बड़े विस्मित हुए। उनका सारा अभिमान गल गया। फिर वहाँसे आकर उन्होंने मथुराके व्रजमण्डलका पूजन और उसकी परिक्रमा करके अपने स्थानको पदार्पण किया। पृथ्वीका मानभङ्ग करनेके लिये यह व्रजमण्डल पहले दिखाया गया था। मैंने ये सारी बातें तुम्हारे सामने कहीं, अब और क्या सुनना चाहते हो ।। ४३-४४ ॥

नन्दजीने पूछा – गोपेश्वर ! किसने पहले पृथ्वीका मानभङ्ग करनेके लिये इस व्रजमण्डलको दिखलाया था, यह मुझे बताइये ॥ ४५ ॥

सन्नन्दने कहा- इसी वाराहकल्पमें पहले श्रीहरिने वराहरूप धारण करके अपनी दाढ़पर उठाकर रसातलसे पृथ्वीका उद्धार किया था। उस समय उन प्रभुकी बड़ी शोभा हुई थी। जलमें जाते हुए उन वराहरूपधारी भगवान् रमानाथ जनार्दनसे उनकी दंष्ट्राके अग्रभागपर शोभित हुई पृथ्वी बोली ।। ४६-४७ ॥

पृथ्वीने पूछा- प्रभो ! सारा विश्व पानीसे भरा दिखायी देता है। अतः बताइये, आप किस स्थलपर मेरी स्थापना करेंगे ? ॥ ४८ ॥(Vrindavan Khand Chapter 1 to 5)

भगवान वराह बोले- जब वृक्ष दिखायी देने लगें और जलमें उद्वेगका भाव प्रकट हो, तब उसी स्थानपर तुम्हारी स्थापना होगी। तुम वृक्षोंको देखती चलो ॥ ४९ ॥

पृथ्वीने कहा – भगवन् ! स्थावर वस्तुओंकी रचना तो मेरे ही ऊपर हुई है। क्या कोई दूसरी भी धरणी है ? धारणामयी धरणी तो केवल मैं ही हूँ ।।॥ ५० ॥

सन्नन्दजी कहते हैं- यों कहती हुई पृथ्वीने अपने सामने जलमें मनोहर वृक्ष देखे। उन्हें देखकर पृथ्वीका अभिमान दूर हो गया और वह भगवान्से बोली- ‘देव ! किस स्थलपर ये पल्लवसहित वृक्ष विद्यमान हैं? यह दृश्य मेरे मनमें बड़ा आश्चर्य पैदा कर रहा है। यज्ञपते ! प्रभो! इसका रहस्य बताइये’ ।। ५१-५२ ॥

भगवान वराह बोले- नितम्बिनि ! यह सामने दिव्य ‘माथुर-मण्डल’ दिखायी देता है, जो गोलोककी धरतीसे जुड़ा हुआ है। प्रलयकालमें भी इसका संहार नहीं होता ।। ५३ ।।

सन्नन्द बोले- यह सुनकर पृथ्वीको बड़ा विस्मय हुआ। वह अभिमानशून्य हो गयी। अतः महाबाहु नन्द ! यह व्रजमण्डल समस्त लोकोंसे अधिक महत्त्वशाली है। व्रजका यह माहात्म्य सुनकर मनुष्य जीवन्मुक्त हो जाता है। तुम ‘माथुर-व्रजमण्डल’ को तीर्थराज प्रयागसे भी उत्कृष्ट समझो ।। ५४-५५ ॥

इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें श्रीवृन्दावनखण्डके अन्तर्गत नन्द-सन्नन्द-संवादमें ‘वृन्दावनमें आगमनके उद्योगका वर्णन’ नामक पहला अध्याय पूरा हुआ ॥ १ ॥

यहां पढ़िए श्रीगोविन्दस्तोत्रम्

दूसरा अध्याय

गिरिराज गोवर्धन की उत्पत्ति तथा उसका व्रजमण्डलमें आगमन

नन्दजीने पूछा- महाप्राज्ञ सन्नन्दजी ! आप सर्वज्ञ और बहुश्रुत हैं, मैंने आपके मुखसे ब्रजमण्डल- के माहात्म्यका वर्णन सुना। अब ‘गोवर्धन’ नामसे प्रसिद्ध जो पर्वत है, उसकी उत्पत्ति कैसे हुई- यह मुझे बताइये। इस गिरिश्रेष्ठ गोवर्धनको लोग ‘गिरिराज’ क्यों कहते हैं ? यह साक्षात् यमुना नदी किस लोकसे यहाँ आयी है ? उसका माहात्य भी मुझसे कहिये; क्योंकि आप ज्ञानियोंके शिरोमणि हैं ॥ १-३ ॥

सन्नन्दजी बोले- एक समयकी बात है, हस्तिनापुरमें महाराज पाण्डुने धर्मधारियोंमें श्रेष्ठ श्रीभीष्मजीसे ऐसा ही प्रश्न किया था। उनके उस प्रश्नको और भीष्मजीद्वारा दिये गये उत्तरको अन्य बहुत से लोग भी सुन रहे थे। (उस समय भीष्मजीने जो उत्तर दिया, वही मैं यहाँ सुना रहा हूँ) साक्षात् परिपूर्णतम भगवान् श्रीकृष्ण, जो असंख्य ब्रह्माण्डोंके अधिपति, गोलोकके नाथ और सब कुछ करनेमें समर्थ हैं, जब पृथ्वीका भार उतारनेके लिये स्वयं इस भूतलपर पधारने लगे, तब उन जनार्दन देवने अपनी प्राणवल्लभा राधासे कहा- प्रिये ! तुम मेरे वियोगसे भयभीत रहती हो, अतः भीरु ! तुम भी भूतलपर चलो’ ॥ ४-६ ॥

श्रीराधाजी बोलीं- प्राणनाथ ! जहाँ वृन्दावन नहीं है, जहाँ यह यमुना नदी नहीं है तथा जहाँ गोवर्धन पर्वत नहीं है, वहाँ मेरे मनको सुख नहीं मिल सकता ॥ ७ ॥

सन्नन्दजी कहते हैं- नन्दराज । श्रीराधाकी यह बात सुनकर स्वयं श्रीहरिने अपने धामसे चौरासी कोस विस्तृत भूमि, गोवर्धन पर्वत और यमुना नदीको भूतलपर भेजा। उस समय चौरासी कोस विस्तारवाली गोलोककी सर्वलोकवन्दिता भूमि चौबीस वनोंके साथ यहाँ आयी। गोवर्धन पर्वतने भारतवर्षसे पश्चिम दिशामें शाल्मलीद्वीपके भीतर द्रोणाचलकी पत्नीके गर्भसे जन्म ग्रहण किया। उस अवसरपर देवताओंने गोवर्धनके ऊपर फूल बरसाये। हिमालय और सुमेरु आदि समस्त पर्वतोंने वहाँ आकर प्रणाम और परिक्रमा करके गोवर्धनका विधिवत् पूजन किया। पूजनके पश्चात् उन महान् पर्वतोंने उसकी स्तुति प्रारम्भ की ॥ ८- १२ ॥(Vrindavan Khand Chapter 1 to 5)

पर्वत बोले- तुम साक्षात् परिपूर्णतम भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रके गोलोकधाममें, जहाँ दिव्य गौओंका समुदाय निवास करता है तथा गोपाल एवं गोप- सुन्दरियाँ शोभा पाती है, सुशोभित होते हो। तुम्हीं ‘गोवर्धन’ नामसे वृन्दावनमें विराजते हो, इस समय तुम्हीं हम समस्त पर्वतोंमें ‘गिरिराज’ हो। तुम वृन्दावनकी गोदमें समोद निवास करनेवाले, गोलोकके मुकुटमणि हो तथा पूर्णब्रह्म परमात्मा श्रीकृष्णके हाथोंमें किसी विशिष्ट अवसरपर छत्रके समान शोभा पाते हो। तुम गोवर्धनको हमारा सादर नमस्कार है ॥ १३-१५॥

सन्नन्दजी कहते हैं- नन्दराज ! जब इस प्रकार स्तुति करके सब पर्वत अपने-अपने स्थानपर चले गये, तभीसे यह गिरिश्रेष्ठ गोवर्धन साक्षात् ‘गिरिराज’ कहलाने लगा है। एक समय मुनिश्रेष्ठ पुलस्त्यजी तीर्थयात्राके लिये भूतलपर भ्रमण करने लगे। उन महामुनिने द्रोणाचलके पुत्र श्यामवर्णवाले श्रेष्ठ पर्वत गोवर्धनको देखा, जिसके ऊपर माधवी लताके सुमन सुशोभित हो रहे थे। वहाँके वृक्ष फलोंके भारसे लदे हुए थे। निर्झरेरोंक झर-झर शब्द वहाँ गूँज रहे थे। उस पर्वतपर बड़ी शान्ति विराज रही थी। अपनी कन्दराओंके कारण वह मङ्गलका धाम जान पड़ता था। सैकड़ों शिखरोंसे सुशोभित वह रलमय मनोहर शैल तपस्या करनेके लिये उपयुक्त स्थान था। विविध रंगकी चित्र-विचित्र धातुएँ उस पर्वतके अवयवोंमें विचित्र शोभाका आधान करती थीं। उसकी भूमि ढालू (चढ़ाव-उतारसे युक्त) थी और वहाँ नाना प्रकारके पक्षी सब ओर व्याप्त थे। मृग और बंदर आदि पशु चारों ओर फैले हुए थे। मयूरोंकी केकाध्वनिसे मण्डित गोवर्धन पर्वत मुमुक्षुओंके लिये मोक्षप्रद प्रतीत होता था । १६-२० ॥

मुनिवर पुलस्त्यके मनमें उस पर्वतको प्राप्त करनेकी इच्छा हुई। इसके लिये वे द्रोणाचलके समीप गये। द्रोणगिरिने उनका पूजन-स्वागत-सत्कार किया। इसके बाद पुलस्त्यजी उस पर्वतसे बोले ॥ २१ ॥

पुलस्त्यने कहा- द्रोण । तुम पर्वतोंक स्वामी हो। समस्त देवता तुम्हारा समादर करते हैं। तुम दिव्य ओषधियोंसे सम्पन्न और मनुष्योंको सदा जीवन देनेवाले हो। मैं काशीका निवासी मुनि हूँ और तुम्हारे निकट याचक होकर आया हूँ। तुम अपने पुत्र गोवर्धनको मुझे दे दो। यहाँ अन्य वस्तुओंसे मेरा कोई प्रयोजन नहीं है। भगवान् विश्वेश्वरकी महानगरी ‘काशी’ नामसे प्रसिद्ध है, जहाँ मरणको प्राप्त हुआ पापी पुरुष भी तत्काल परम मोक्ष प्राप्त कर लेता है, जहाँ गङ्गा नदी प्राप्त होती हैं और जहाँ साक्षात् विश्वनाथ भी विराजमान हैं। मैं वहीं तुम्हारे पुत्रको स्थापित करूँगा, जहाँ दूसरा कोई पर्वत नहीं है। लता-बेलों और वृक्षोंसे व्याप्त जो तुम्हारा पुत्र गोवर्धन है, उसके ऊपर रहकर मैं तपस्या करूँगा- ऐसी अभिलाषा मेरे मनमें जाग्रत् हुई है ।। २२-२६ ।।

सन्नन्दजी कहते हैं- पुलस्त्यजीकी यह बात सुनकर पुत्र-स्नेहसे विह्वल हुए द्रोणाचलके नेत्रोंमें आँसू भर आये। उसने पुलस्त्य मुनिसे कहा ॥ २७ ॥

द्रोणाचल बोला- महामुने ! मैं पुत्र-स्नेहसे आकुल हूँ। यह पुत्र मुझे अत्यन्त प्रिय है, तथापि आपके शापके भयसे भीत होकर मैं इसे आपके हाथोंमें देता हूँ। (फिर वह पुत्रसे बोला ) बेटा ! तुम मुनिके साथ कल्याणमय कर्मक्षेत्र भारतवर्षमें जाओ। वहाँ मनुष्य सत्कर्मोद्वारा धर्म, अर्थ और काम-त्रिवर्ग सुख प्राप्त करते है तथा (निष्काम कर्म एवं ज्ञानयोगद्वारा) क्षणभरमें मोक्ष भी पा लेते हैं ॥ २८-२९ ॥

गोवर्धनने कहा- मुने ! मेरा शरीर आठ योजन लंबा, दो योजन ऊँचा और पाँच योजन चौड़ा है। ऐसी दशामें आप किस प्रकार मुझे ले चलेंगे ॥ ३० ॥

पुलस्त्यजी बोले- बेटा! तुम मेरे हाथपर बैठकर सुखपूर्वक चले चलो। जबतक काशी नहीं आ जाती, तबतक मैं तुम्हें हाथपर ही ढोये चलूँगा ।। ३१ ॥

गोवर्धन ने कहा- मुने । मेरी एक प्रतिज्ञा है। आप जहाँ-कहीं भी भूमिपर मुझे एक बार रख देंगे, वहाँकी भूमिसे मैं पुनः उत्थान नहीं करूँगा ॥ ३२ ॥

पुलस्त्यजी बोले- मैं इस शाल्मलीद्वीपसे लेकर भारतवर्षके कोसलदेशतक तुम्हें कहीं भी रास्ते में नहीं रखूँगा, यह मेरी प्रतिज्ञा है ।। ३३ ।।(Vrindavan Khand Chapter 1 to 5)

सन्नन्दजी कहते हैं- नन्दराज ! तदनन्तर वह महान् पर्वत पिताको प्रणाम करके मुनिकी हथेलीपर आरूढ़ हुआ। उस समय उसके नेत्रोंमें आँसू भर आये। उसे दाहिने हाथपर रखकर पुलस्त्य मुनि लोगोंको अपना तेज दिखाते हुए धीरे-धीरे चले और व्रज-मण्डलमें आ पहुँचे। गोवर्धनपर्वतको अपने पूर्व- जन्मकी बातोंका स्मरण था। व्रजमें आनेपर उसने मार्गमें मन-ही-मन सोचा- ‘यहाँ व्रजमें असंख्य ब्रह्माण्डनायक साक्षात् परिपूर्णतम भगवान् श्रीकृष्ण अवतार लेंगे और ग्वालबालोंके साथ बाललीला तथा कैशोरलीला करेंगे। इतना ही नहीं, वे श्रीहरि यहाँ दानलीला और मानलीला भी करेंगे। अतः मुझे यहाँसे अन्यत्र नहीं जाना चाहिये। यह व्रजभूमि और यह यमुना नदी गोलोकसे यहाँ आयी है। श्रीराधाके साथ भगवान् श्रीकृष्णका भी यहाँ शुभागमन होगा। उनका उत्तम दर्शन पाकर मैं कृतकृत्य हो जाऊँगा।’ मन-ही- मन ऐसा विचार करके गोवर्धनने मुनिकी हथेलीपर अपने शरीरका भार बहुत अधिक बढ़ा लिया। उस समय मुनि अत्यन्त थक गये। उन्हें पहलेकी कही हुई बातकी याद नहीं रही। उन्होंने पर्वतको हाथसे उतारकर व्रजमण्डलमें रख दिया। भारसे पीड़ित तो वे थे ही, लघुशङ्कासे निवृत्त होनेके लिये चले गये। शौच क्रिया करके जलमें स्नान करनेके पश्चात् मुनिवर पुलस्त्यने उत्तम पर्वत गोवर्धनसे कहा-‘अब उठो ।’ अधिक भारसे सम्पन्न होनेके कारण जब वह दोनों हाथोंसे नहीं उठा, तब महामुनि पुलस्त्यने उसे अपने तेज और बलसे उठा लेनेका उपक्रम किया। मुनिने स्नेहसे भीगी वाणीद्वारा द्रोणनन्दन गिरिराजको ग्रहण करनेका सम्पूर्ण शक्तिसे प्रयास किया, किंतु वह एक अंगुल भी टस-से-मस न हुआ ।। ३४-४४ ।।

तब पुलस्त्यजी बोले – गिरिश्रेष्ठ ! चलो, चलो ! भार अधिक न बढ़ाओ, न बढ़ाओ। मैं जान गया, तुम रूठे हुए हो। शीघ्र बताओ, तुम्हारा क्या अभिप्राय है ? ॥ ४५ ॥

गोवर्धन बोला- मुने ! इसमें मेरा दोष नहीं है। आपने ही मुझे यहाँ स्थापित किया है। अब मैं यहाँसे नहीं उलूँगा। अपनी यह प्रतिज्ञा मैंने पहले ही प्रकट कर दी थी ॥ ४६ ॥

सन्नन्दजी कहते हैं- यह उत्तर सुनकर मुनिश्रेष्ठ पुलस्त्यकी सारी इन्द्रियाँ क्रोधसे चञ्चल हो उठीं। उनके ओष्ठ फड़कने लगे। अपना सारा उद्यम व्यर्थ हो जाने- के कारण उन्होंने द्रोणपुत्रको शाप दे दिया ।। ४७ ।।

पुलस्त्यजी बोले- पर्वत ! तू बड़ा ढीठ है। तूने मेरा मनोरथ पूर्ण नहीं किया। इसलिये तू प्रतिदिन तिल-तिलभर क्षीण होता चला जा ॥ ४८ ॥

सन्नन्दजी कहते हैं – नन्द । यों कहकर पुलस्त्य मुनि काशी चले गये। उसी दिनसे यह गोवर्धन पर्वत प्रतिदिन तिल-तिल करके क्षीण होता चला जा रहा है। जबतक भागीरथी गङ्गा और गोवर्धन पर्वत इस भूतलपर विद्यमान हैं, तबतक कलिका प्रभाव कदापि नहीं बढ़ेगा। गोवर्धनका यह प्रकट चरित्र परम पवित्र और मनुष्योंके बड़े-बड़े पापोंका नाश करनेवाला है। यह प्रसङ्ग मैंने तुम्हारे सामने कहा है, जो भूमण्डलमें रुचिर और अद्भुत है। यह उत्तम मोक्ष प्रदान करनेवाला है, इसमें कोई आश्चर्यकी बात नहीं है ॥ ४९-५१ ॥

इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें श्रीवृन्दावनखण्डके अन्तर्गत ‘गिरिराजकी उत्पत्तिका वर्णन’ नामक दूसरा अध्याय पूरा हुआ ।॥ २ ॥

यहां एक क्लिक में पढ़ें ~ सनातन धर्म में कितने शास्त्र-षड्दर्शन हैं।

तीसरा अध्याय

श्रीयमुनाजी का गोलोक से अवतरण और पुनः गोलोकधाम में प्रवेश

सन्नन्दजी कहते हैं- नन्दराज ! गोलोकमें श्रीहरिने जब यमुनाजीको भूतलपर जानेकी आज्ञा दी और सरिताओंमें श्रेष्ठ यमुना जब श्रीकृष्णकी परिक्रमा करके जानेको उद्यत हुईं, उसी समय विरजा तथा ब्रह्मद्रवसे उत्पन्न साक्षात् गङ्गा- ये दोनों नदियाँ आकर यमुनाजीमें लीन हो गयीं। इसीलिये परिपूर्णतमा कृष्णा (यमुना) को परिपूर्णतम श्रीकृष्णकी पटरानीके रूपमें लोग जानते हैं। तदनन्तर सरिताओंमें श्रेष्ठ कालिन्दी अपने महान् वेगसे विरजाके वेगका भेदन करके निकुञ्ज-द्वारसे निकलीं और असंख्य ब्रह्माण्ड- समूहोंका स्पर्श करती हुई ब्रह्मद्रवमें गयीं। फिर उसकी दीर्घ जलराशिका अपने महान् वेगसे भेदन करती हुई वे महानदी श्रीवामनके बायें चरणके अँगूठेके नखसे विदीर्ण हुए ब्रह्माण्डके शिरोभागमें विद्यमान ब्रह्मद्रवयुक्त विवरमें श्रीगङ्गाके साथ ही प्रविष्ट हुई और वहाँसे वे सरिद्वरा यमुना ध्रुवमण्डलमें स्थित भगवान्अ जित विष्णुके धाम वैकुण्ठलोकमें होती हुई ब्रह्मलोकको लाँधकर जब ब्रह्ममण्डलसे नीचे गिरीं, तब देवताओंके सैकड़ों लोकोंमें एक-से-दूसरेके क्रमसे विचरती हुई आगे बढ़ीं। तदनन्तर वे सुमेरुगिरिके शिखरपर बड़े वेगसे गिरीं और अनेक शैल-शृङ्गोंको लाँधकर बड़ी-बड़ी चट्टानोंके तटोंका भेदन करती हुई जब मेरुपर्वतसे दक्षिण दिशाकी ओर जानेको उद्यत हुईं, तब यमुनाजी गङ्गासे अलग हो गयीं। महानदी गङ्गा तो हिमवान् पर्वतपर चली गयीं, किंतु कृष्णा (श्यामसलिला यमुना) कलिन्द-शिखर- पर जा पहुँचीं। वहाँ जाकर उस पर्वतसे प्रकट होनेके कारण उनका नाम ‘कालिन्दी’ हो गया। कलिन्दगिरिके शिखरोंसे टूटकर जो बड़ी-बड़ी चट्टानें पड़ी थीं, उनके सुदृढ़ तटोंको तोड़ती-फोड़ती और भूखण्डपर लोटती हुई वेगवती कृष्णा कालिन्दी अनेक देशोंको पवित्र करती हुई खाण्डववनमें (इन्द्रप्रस्थ या दिल्लीके पास) जा पहुँचीं। यमुनाजी साक्षात् परिपूर्णतम भगवान श्री कृष्णको अपना पति बनाना चाहती थीं, इसलिये वे परम दिव्य देह धारण करके खाण्डववनमें तपस्या करने लगीं। यमुनाके पिता भगवान् सूर्यने जलके भीतर ही एक दिव्य गेहका निर्माण कर दिया था, जिसमें आज भी वे रहा करती हैं। खाण्डववनसे वेगपूर्वक चलकर कालिन्दी ब्रजमण्डलमें श्रीवृन्दावन और मथुराके निकट आ पहुँचीं। महावनके पास सिकतामय रमण- स्थलमें भी प्रवाहित हुईं। श्रीगोकुलमें आनेपर परम सुन्दरी यमुनाने (विशाखा सखीके नामसे) अपने नेतृत्वमें गोप-किशोरियोंका एक यूथ बनाया और श्रीकृष्णचन्द्रके रासमें सम्मिलित होनेके लिये उन्होंने वहीं अपना निवासस्थान निश्चित कर लिया। तदनन्तर वे जब व्रजसे आगे जाने लगीं, तब व्रजभूमिके वियोगसे विह्वल हो, प्रेमानन्दके आँसू बहाती हुई पश्चिम दिशाकी ओर प्रवाहित हुईं ॥ १-१८ ॥(Vrindavan Khand Chapter 1 to 5)

तदनन्तर ब्रजमण्डलकी भूमिको अपने वारि- वेगसे तीन बार प्रणाम करके यमुना अनेक देशोंको पवित्र करती हुई उत्तम तीर्थ प्रयागमें जा पहुँचीं। वहाँ गङ्गाजीके साथ उनका संगम हुआ और वे उन्हें साथ लेकर क्षीरसागरकी ओर गयीं। उस समय देवताओंने उनके ऊपर फूलोंकी वर्षा की और दिग्विजयसूचक जयघोष किया। नदीशिरोमणि कलिन्दनन्दिनी कृष्ण- वर्णा श्रीयमुनाने समुद्रतक पहुँचकर गद्गद वाणीमें श्रीगङ्गासे कहा ॥ १९-२१ ॥

ब्रह्माण्डको पवित्र यमुनाने कहा- समस्त करनेवाली गङ्गे ! तुम धन्य हो। साक्षात श्री कृष्णके चरणारविन्दोंसे तुम्हारा प्रादुर्भाव हुआ है, अतः तुम समस्त लोकोंके लिये एकमात्र वन्दनीया हो। शुभे ! अब मैं यहाँसे ऊपर उठकर श्रीहरिके लोकमें जा रही हूँ तुम्हारी इच्छा हो तो तुम भी मेरे साथ चलो ! तुम्हारे समान दिव्य तीर्थ न तो हुआ है और न आगे होगा ही। गङ्गा (आप) सर्वतीर्थमयी हैं, अतः सुमङ्गले गङ्गे ! मैं तुम्हें प्रणाम करती हूँ। यदि मैंने कभी कोई अनुचित बात कही हो तो उसके लिये मुझे क्षमा कर देना ॥ २२-२४ ॥

गङ्गा बोलीं – कृष्णे ! सम्पूर्ण ब्रह्माण्डको पावन बनानेवाली तो तुम हो, अतः तुम्हीं धन्य हो । श्रीकृष्ण- के वामाङ्गसे तुम्हारा प्रादुर्भाव हुआ है। तुम परमानन्द- स्वरूपिणी हो साक्षात् परिपूर्णतमा हो। समस्त लोकों- के द्वारा एकमात्र वन्दनीया हो। परिपूर्णतम परमात्मा श्रीकृष्णकी भी पटरानी हो। अतः कृष्णे ! तुम सब प्रकारसे उत्कृष्ट हो। तुम कृष्णाको मैं प्रणाम करती हूँ। तुम समस्त तीर्थों और देवताओंके लिये भी दुर्लभ हो । गोलोकमें भी तुम्हारा दर्शन दुष्कर है। मैं तो भगवान श्री कृष्णकी ही आज्ञासे मङ्गलमय पाताललोक में जाऊँगी। यद्यपि तुम्हारे वियोगके भयसे मैं बहुत व्याकुल हूँ, तो भी इस समय तुम्हारे साथ चलनेमें असमर्थ हूँ। व्रजके रासमण्डलमें मैं भी तुम्हारे यूथमें सम्मिलित होकर रहूँगी। हरिप्रिये! मैंने भी यदि कोई अप्रिय बात कह दी हो तो उसके लिये मुझे क्षमा कर देना ।। २५-२९ ॥

सन्नन्दजी कहते हैं- इस प्रकार एक-दूसरेको प्रणाम करके दोनों नदियाँ तुरंत अपने-अपने गन्तव्य पथपर चली गयीं। सुरधुनी गङ्गाजी अनेक लोकोंको पवित्र करती हुई पातालमें चली गयीं और वहाँ भोगवती-वनमें जाकर ‘भोगवती गङ्गा’के नामसे प्रसिद्ध हुईं। उन्हींका जल भगवान् शंकर और शेषनाग अपने मस्तकपर धारण करते हैं ।॥ ३०-३१ ॥

इधर कृष्णा अपने वेगसे सप्तसागर- मण्डलका भेदन करके सातों द्वीपोंके भूभागपर लोटती हुई और भी प्रखर वेगसे आगे बढ़ी। सुवर्णमयी भूमिपर पहुँचकर लोकालोक पर्वतपर गयीं। उसके शिखरों तथा गण्डशैलों (टूटी चट्टानों) के तटका भेदन करके कालिन्दी फुहारेकी-सी जलधाराके साथ उछलकर लोकालोक पर्वतके शिखरपर जा पहुँचीं। फिर वहाँसे ऊर्ध्वगमन करती हुई स्वर्गवासियोंके स्वर्गलोकतक जा पहुँचीं। फिर ब्रह्मलोकतकके समस्त लोकोंको लाँधकर श्रीहरिके पदचिह्नसे लाञ्छित श्रीब्रह्मद्रवसे युक्त ब्रह्माण्डविवरसे होती हुई आगे बढ़ गयीं। उस समय समस्त देवता प्रणाम करते हुए उनके ऊपर फूलोंकी वर्षा कर रहे थे। इस तरह सरिताओंमें श्रेष्ठ यमुना पुनः श्रीकृष्णके गोलोकधाममें आरूढ़ हो गयीं। कलिन्दगिरिनन्दिनी यमुनाके इस मङ्गलमय नूतन चरित्रका भूतलपर यदि श्रवण या पठन किया जाय तो वह उत्तम मङ्गलका विस्तार करता है। यदि कोई भी मनुष्य इस चरित्रको मनमें धारण करे और प्रतिदिन पढ़े तो वह भगवान्की निकुञ्जलीलाके द्वारा वरण किये गये उनके परमपद – गोलोकधाममें पहुँच जाता है ॥ ३२- ३७ ॥

इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें श्रीवृन्दावनखण्डके अन्तर्गत नन्द-सन्नन्द-संवादमें ‘कालिन्दीके आगमनका वर्णन’ नामक तीसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ ३ ॥

यहां एक क्लिक में पढ़ें ~ विद्येश्वर संहिता प्रथम अध्याय से दसवें अध्याय तक

चौथा अध्याय

श्रीबलराम और श्रीकृष्णके द्वारा बछड़ोंका चराया जाना तथा वत्सासुरका उद्धार

श्रीनारदजी कहते हैं- राजन् ! सन्नन्दकी बात सुनकर महामना नन्दराज समस्त गोपगणोंके साथ बड़े प्रसन्न हुए और वृन्दावनमें जानेको तैयार हो गये। यशोदा, रोहिणी तथा समस्त गोपाङ्गनाओंके साथ घोड़ों, रथों, वीर पुरुषों तथा विप्रमण्डलीसे मण्डित हो, परम बुद्धिमान् नन्दराज दोनों पुत्र बलराम और श्रीकृष्ण- सहित रथपर आरूढ़ हो वृन्दावनकी ओर चल दिये। उनके साथ गौओंका समुदाय भी था। बूढ़े, बालक और सेवकोंसहित अनेक छकड़े चल रहे थे। यात्राके समय शङ्ख बजे और नगारोंकी ध्वनियाँ हुई। बहुत-से गायक नन्दराजका यशोगान कर रहे थे. ॥ १-४ ॥

गोप वृषभानुवर अपनी पत्नीके साथ हाथीपर बैठकर, पुत्री राधाको अङ्कमें लिये, गायकोंसे यशोगान सुनते हुए, मृदङ्ग, ताल, वीणा और वेणुओंकी मधुर ध्वनिके साथ वृन्दावनको गये। उनके साथ भी बहुतसे गोप और गौओंका समुदाय था। नन्द, उपनन्द और छहों वृषभानु भी अपने समस्त परिकरेंकि साथ वृन्दावनमें गये। समस्त गोपोंने अपने सेवकोंसहित वृन्दावनमें प्रवेश करके अलग-अलग गोष्ठ बनाये और इधर-उधर निवास आरम्भ किया। वृषभानुने अपने लिये वृषभानुपुर (बरसाना) नामक नगरका निर्माण कराया, जो चार योजन विस्तृत दुर्गके आकारमें था। उसके चारों ओर खाइयाँ बनी थीं। उस दुर्गक सात दरवाजे थे। दुर्गक भीतर विशाल सभामण्डप था। अनेक सरोवर उस दुर्गकी शोभा बढ़ा रहे थे। बीच-बीचमें मनोहर राजमार्गका निर्माण कराया गया था। एक सहस्र कुजें उस पुरकी शोभा बढ़ाती थीं ॥ ५-१० ॥(Vrindavan Khand Chapter 1 to 5)

श्रीकृष्ण नन्दनगर (नन्दगाँव) तथा वृषभानुपुर (बरसाने) में बालकोंके साथ क्रीड़ा करते हुए घूमते और गोपाङ्गनाओंकी प्रीति बढ़ाते थे। राजन् ! कुछ दिनों बाद सम्पूर्ण गोपेकि समादर-भाजन मनोहर रूपवाले बलराम और श्रीकृष्ण वृन्दावनमें बछड़े चराने लगे। वे दोनों भाई ग्वाल-बालोंक साथ गाँवकी सीमातक जाकर बछड़े चराते थे। कालिन्दीके निकट उसके पावन पुलिनपर सुशोभित निकुञ्जों और कुञ्जोंमें बलराम और श्रीकृष्ण इधर-उधर लुकाछिपीके खेल खेलते और कहीं-कहीं रेंगते हुए चलकर वनमें सानन्द विचरते थे। उन दोनोंक कटिप्रदेशमें करधनीकी लड़ियाँ शोभा देती थीं। खेलते समय उनके पैरोंके मञ्जीर और नूपुर मधुर झंकार फैलाते थे। बलरामके अङ्गॉपर नीलाम्बर शोभा पाता था और श्रीकृष्णके अङ्गॉपर पीतपट। वे दोनों भाई हार और भुजबंदोंसे भूषित थे। कभी बालकोंके साथ क्षेपणों (बेलवासों) द्वारा ढेले फेंकते और कभी बाँसुरी बजाते थे। कुछ ग्वाल-बाल अपने मुखसे करधनीके घुँघुरुओंकी-सी ध्वनि करते हुए दौड़ते और उनके साथ वे दोनों बन्धु-राम और श्याम भी पक्षियोंकी छायाका अनुसरण करते भागते हुए सुशोभित होते थे। सिरपर मयूरपिच्छ लगाकर फूलों और पल्लवोंके शृङ्गार धारण करते थे । ११ – १७ ।।

नरेश्वर । एक दिन उनके बछड़ोंके झुंडमें कंसका भेजा हुआ वत्सासुर आकर मिल गया। श्रीकृष्णको यह बात विदित हो गयी और वे उसके पास गये। वह दैत्य गोप-बालकोंके बीचमै सब ओर पूँछ उठाकर बार-बार दौड़ता हुआ दिखायी देता था। उसने अचानक आकर अपने पिछले पैरोंसे श्रीकृष्णके कंधोंपर प्रहार किया। अन्य गोप-बालक तो भाग चले, किंतु श्रीकृष्णने उसके दोनों पैर पकड़ लिये और उसे घुमाकर धरतीपर पटक दिया। इसके बाद श्रीहरि- ने फिर उसे हाथोंसे उठाकर कपित्थ वृक्षपर दे मारा। फिर तो वह दैत्य तत्काल मर गया। उसके धक्केसे महान् कपित्थ-वृक्षने स्वयं गिरकर दूसरे दूसरे वृक्षोंको भी धराशायी कर दिया। यह एक अद्भुत-सी बात हुई। समस्त ग्वालबाल आश्चर्यसे चकित हो कन्हैया- को वहाँ साधुवाद देने लगे। देवतालोग आकाशमे खड़े हो जय-जयकार करते हुए फूल बरसाने लगे। उस दैत्यकी विशाल ज्योति श्रीकृष्णमें लीन हो गयी ॥ १८-२३ ॥

बहुलाश्व ने पूछा- मुने । यह तो बड़े आश्चर्यकी बात है। बताइये तो, इस वत्सासुरके रूपमें पहलेका कौन-सा पुण्यात्मा पुरुष प्रकट हो गया था, जो परि- पूर्णतम परमात्मा श्रीकृष्णमें विलीन हुआ ? ॥ २४ ॥

श्रीनारदजी बोले- राजन् । मुरके एक पुत्र था, जो महादैत्य ‘प्रमील’ के नामसे विख्यात था। उसने देवताओंको भी युद्धमें जीत लिया था। एक दिन वह वसिष्ठ मुनिके आश्रमपर गया। वहाँ उसने मुनिकी होमधेनु नन्दिनीको देखा। उसे पानेकी इच्छासे वह ब्राह्मणका रूप धारण करके मुनिके पास गया और उस मनोहर गौके लिये याचना करने लगा। महर्षि दिव्य- दशीं थे; अतः सब कुछ जानकर भी चुप रह गये, कुछ बोले नहीं। तब गौने स्वयं कहा ॥ २५-२६ ॥

श्रीनन्दिनी बोली – दुर्मते। तू मुरका पुत्र दैत्य है, तो भी मुनियोंकी गौका अपहरण करनेके लिये ब्राह्मण बनकर आया है; अतः गायका बछड़ा – हो जा ॥ २७ ॥

श्रीनारदजी कहते हैं- राजन् । नन्दिनीके इतना कहते ही वह मुरपुत्र महान् गोवत्स बन गया। तब उसने मुनिवर वसिष्ठ तथा उस गौकी परिक्रमा एवं प्रणाम करके कहा- ‘मेरी रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये ॥ २८ ॥

गौ बोली- महादैत्य । द्वापरके अन्तमें अब तू श्रीकृष्णके बछड़ोंमें घुस जायगा, उस समय तेरी मुक्ति होगी ॥ २९ ॥(Vrindavan Khand Chapter 1 to 5)

श्रीनारदजी कहते हैं- उसी शाप और वरदानके कारण परिपूर्णतम पतितपावन साक्षात् भगवान् श्रीकृष्णमें दैत्य वत्सासुर विलीन हुआ। इसमें विस्मयकी कोई बात नहीं है ॥ ३० ॥

इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें श्रीवृन्दावनखण्डके अन्तर्गत ‘वत्सासुरका मोक्ष’ नामक चौथा अध्याय पूरा हुआ ॥ ४ ॥

यहां एक क्लिक में पढ़ें ~ श्रीमद भागवत गीता का प्रथम अध्याय

पाँचवाँ अध्याय

वकासुरका उद्धार

श्रीनारदजी कहते हैं – एक दिन बलराम तथा ग्वाल-बालोंके साथ बछड़े चराते हुए श्रीहरिने यमुनाके निकट आये हुए वकासुरको देखा। वह श्वेत पर्वतके समान ऊँचा दिखायी देता था। बड़ी-बड़ी टाँगें और मेघ गर्जनके समान ध्वनि ! उसे देखते ही ग्वाल-बाल डरके मारे भागने लगे। उसकी चोंच वज्रके समान तीखी थी। उसने आते ही श्रीहरिको अपना ग्रास बना लिया। यह देख सब ग्वाल-बाल रोने लगे। रोते-रोते वे निष्प्राण-से हो गये। उस समय हाहाकार करते हुए सब देवता वहाँ आ पहुँचे। इन्द्रने तत्काल वज्र चलाकर उस महान् वकपर प्रहार किया। वज्रकी चोटसे वकासुर धरतीपर गिर पड़ा, किंतु मरा नहीं। वह फिर उठकर खड़ा हो गया। तब ब्रह्माजीने भी कुपित होकर उसे ब्रह्मदण्डसे मारा। उस आघातसे गिरकर वह असुर दो घड़ीतक मूर्च्छित पड़ा रहा। फिर अपने शरीरको कँपाता हुआ जंभाई लेकर वह बड़े वेगसे उठ खड़ा हुआ। उसकी मृत्यु नहीं हुई। वह बलवान् दैत्य मेघके समान गर्जना करने लगा। इसी समय त्रिनेत्रधारी भगवान् शंकरने उस महान् असुरपर त्रिशूलसे प्रहार किया। उस प्रहारसे दैत्यकी एक पाँख कट गयी, तो भी वह महाभंयकर असुर मर न सका। तदनन्तर वायुदेवने वकासुरपर वायव्यास्त्र चलाया; उससे वह कुछ ऊपरकी ओर उठ गया, परंतु पुनः अपने स्थानपर आकर खड़ा हो गया। इसके बाद यमने सामने आकर उसपर यमदण्डसे प्रहार किया, परंतु प्रचण्ड-पराक्रमी वकासुरकी उस दण्डसे भी मृत्यु नहीं हुई। यमराजका वह दण्ड भी टूट गया, किंतु वकासुरको कोई क्षति नहीं पहुँची। इतनेमें ही प्रचण्ड किरणोंवाले चण्डपराक्रमी सूर्यदेव उसके सामने आये। उन्होंने धनुष हाथमें लेकर वकासुरको सौ बाण मारे। वे तीखे बाण उसकी पाँखमें धँस गये, फिर भी वह मर न सका। तब कुबेरने तीखी तलवारसे उसके ऊपर चोट की। इससे उसकी दूसरी पाँख भी कट गयी, किंतु वह दैत्यपुंगव मृत्युको नहीं प्राप्त हुआ। तदनन्तर सोमदेवताने उस महावकपर नीहारास्त्रका प्रयोग किया। उसके प्रहारसे शीतपीड़ित हो वकासुर मूर्च्छित तो हो गया, किंतु मरा नहीं; फिर उठकर खड़ा हो गया । अब अग्निदेवता ने उस महावकपर आग्नेयास्त्र- से प्रहार किया; इससे उसके रोएँ जल गये, परंतु उस महादुष्ट दैत्यकी मृत्यु नहीं हुई। तत्पश्चात् जलके स्वामी वरुणने उसको पारासे बाँधकर धरतीपर घसीटा। घसीटनेसे वह महापापी असुर क्षत-विक्षत हो गया; किंतु मरा नहीं ॥ १-१५ ॥

तदनन्तर वेगशालिनी भद्रकालीने आकर उसपर गदासे प्रहार किया। गदाके प्रहारसे मूर्च्छित हो वकासुर अत्यन्त वेदनाके कारण सुध-बुध खो बैठा। उसके मस्तकपर चोट पहुँची थी, तथापि वह अपने शरीरको कँपाता और फड़फड़ाता हुआ फिर उठकर खड़ा हो गया और वह महादुष्ट दैत्य धीरतापूर्वक समराङ्गणमें स्थित हो मेघोंकी भाँति गर्जना करने लगा। उस समय शक्तिधारी स्कन्दने बड़ी उतावलीके साथ उसके ऊपर अपनी शक्ति चलायी। उसके प्रहारसे उस पक्षिप्रवर असुरकी एक टाँग टूट गयी, किंतु वह मर न सका। तदनन्तर विद्युत्की गड़गड़ाहटके समान गर्जना करते हुए उस दैत्यने सहसा क्रोधपूर्वक धावा किया और अपनी तीखी चोंचसे मार-मारकर सब देवताओंको खदेड़ दिया। आकाशमें आगे-आगे देवता भाग रहे थे और पीछेसे वकासुर उन्हें खदेड़ रहा था। इसके बाद वह दैत्य पुनः वहीं लौट आया और समस्त दिङ्मण्डलको अपने सिंहनादसे निनादित करने लगा ॥ १६-२० ।।(Vrindavan Khand Chapter 1 to 5)

उस समय समस्त देवर्षियों, ब्रह्मर्षियों तथा द्विजोंने श्रीनन्दनन्दनको शीघ्र ही सफल आशीर्वाद प्रदान किया। उसी समय श्रीकृष्णने वकासुरके शरीरके भीतर अपने ज्योतिर्मय दिव्य देहको बढ़ाकर विस्तृत कर लिया। फिर तो उस महावकका कण्ठ फटने लगा और उसने सहसा श्रीकृष्णको उगल दिया। फिर तीखी चोंचसे श्रीकृष्णको पकड़नेके लिये जब वह पास आया, तब श्रीकृष्णने झपटकर उसकी पूँछ पकड़ ली और उसे पृथ्वीपर दे मारा; किंतु वह पुनः उठकर चोंच फैलाये उनके सामने खड़ा हो गया। तब श्रीकृष्णने दोनों हाथोंसे उसकी दोनों चोंचें पकड़ लीं और जैसे हाथी किसी वृक्षकी शाखाको चीर डाले, उसी तरह उसे विदीर्ण कर दिया ॥ २१-२४ ॥

उस समय मृत्युको प्राप्त हुए दैत्यकी देहसे एक ज्योति निकली और श्रीकृष्णमें समा गयी। फिर तो देवता जय-जयकार करते हुए दिव्य पुष्पोंकी वर्षा करने लगे। तब समस्त ग्वाल-बाल आश्चर्यचकित हो, सब ओरसे आकर श्रीकृष्णसे लिपट गये और बोले- ‘सखे ! आज तो तुम मौतके मुखसे कुशलपूर्वक निकल आये’ ।। २५-२६ ॥

इस प्रकार वकासुरको मारनेके पश्चात् बछड़ोंको आगे करके श्रीकृष्ण बलराम और ग्वाल-बालोंके साथ गीत गाते हुए सहर्ष राजभवनमें लौट आये। परिपूर्णतम परमात्मा श्रीकृष्णके इस पराक्रमपूर्ण चरित्रका घर लौटे हुए ग्वाल-बालोंने विस्तारपूर्वक वर्णन किया। उसे सुनकर समस्त गोप अत्यन्त विस्मित हुए । २७-२८ ॥

बहुलाश्वने पूछा – देवर्षे ! यह वकासुर पूर्वकालमें कौन था और किस कारणसे उसको बगुलेका शरीर प्राप्त हुआ था? वह पूर्णब्रह्म सर्वेश्वर श्रीकृष्णमें लीन हुआ, यह कितने सौभाग्य- की बात है ! ॥ २९ ॥

श्रीनारदजीने कहा- नरेश्वर ! ‘हयग्रीव’ नामक दैत्यके एक पुत्र था, जो ‘उत्कल’ नामसे प्रसिद्ध हुआ। उसने समराङ्गणमें देवताओंको परास्त करके देवराज इन्द्रके छत्रको छीन लिया था। उस महाबली दैत्यने और भी बहुत-से मनुष्यों तथा नरेशोंकी राज्य-सम्पत्तिका अपहरण करके सौ वर्षों- तक सर्ववैभवसम्पन्न राज्यका उपभोग किया। एक दिन इधर-उधर विचरता हुआ दैत्य उत्कल गङ्गा- सागरसंगमपर सिद्ध मुनि जाजलिकी पर्णशालाके समीप गया और पानीमें बंसी डालकर बारंबार मछलियोंको पकड़ने लगा। यद्यपि मुनिने मना किया, तथापि उस दुर्बुद्धिने उनकी बात नहीं मानी। मुनिश्रेष्ठ जाजलि सिद्ध महात्मा थे, उन्होंने उत्कलको शाप देते हुए कहा – ‘दुर्मते ! तू बगुलेकी भाँति मछली पकड़ता और खाता है, इसलिये बगुला ही हो जा।’ फिर क्या था ? उत्कल उसी क्षण बगुलेके रूपमें परिणत हो गया। तेजोभ्रष्ट हो जानेके कारण उसका सारा गर्व गल गया। उसने हाथ जोड़कर मुनिको प्रणाम किया और उनके दोनों चरणोंमें पड़कर कहा ।। ३०-३५॥(Vrindavan Khand Chapter 1 to 5)

उत्कल बोला- मुने ! मैं आपके प्रचण्ड तपोबलको नहीं जानता था। जाजलिजी ! मेरी रक्षा कीजिये । आप-जैसे साधु-महात्माओंका सङ्ग तो उत्तम मोक्षका द्वार माना गया है। जो शत्रु और मित्रमें, मान और अपमानमें, सुवर्ण और मिट्टीके ढेलेमें तथा सुख और दुःखमें भी समभाव रखते हैं, वे आप-जैसे महात्मा ही सच्चे साधु हैं। मुने ! इस भूतलपर महात्माओंके दर्शनसे मनुष्योंका कौन-कौन मनोरथ नहीं पूरा हुआ ? ब्रह्मपद, इन्द्रपद, सम्राट्का पद तथा योगसिद्धि- सब कुछ संतोंकी कृपासे सुलभ हो सकते हैं। मुनिश्रेष्ठ जाजले ! आप-जैसे महात्माओंसे लोगोंको धर्म, अर्थ और कामकी प्राप्ति हुई तो क्या हुई ? साधुपुरुषोंकी कृपासे तो साक्षात् पूर्णब्रह्म परमात्मा भी मिल जाता है ॥ ३६-३९ ॥

श्रीनारदजी कहते हैं – नरेश्वर ! उस समय उत्कलकी विनययुक्त बात सुनकर वे जाजलि मुनि प्रसन्न हो गये। इन्होंने साठ हजार वर्षोंतक तपस्या की थी। उन्होंने उत्कलसे कहा ॥ ४० ॥

जाजलि बोले- वैवस्वत मन्वन्तर प्राप्त होनेपर जब अट्ठाईसवें द्वापरका अन्तिम समय बीतता होगा, उस समय भारतवर्षके माथुर जनपदमें स्थित व्रजमण्डलके भीतर साक्षात् परिपूर्णतम भगवान् श्रीकृष्ण वृन्दावनमें गोवत्स चराते हुए विचरेंगे। उन्हीं दिनों तुम भगवान् श्रीकृष्णमें लीन हो जाओगे, इसमें संशय नहीं है। हिरण्याक्ष आदि दैत्य भगवान्के प्रति वैरभाव रखनेपर भी उनके परमपदको प्राप्त हो गये हैं ॥ ४१- ४३ ॥

श्रीनारदजी कहते हैं- इस प्रकार वकासुरके रूपमें परिणत हुआ उत्कल दैत्य जाजलिके वरदानसे भगवान् श्रीकृष्णमें लयको प्राप्त हुआ। संतोंके सङ्गसे क्या नहीं सुलभ हो सकता ? ॥ ४४ ॥

इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें श्रीवृन्दावनखण्डके अन्तर्गत ‘वकासुरका मोक्ष’ नामक पाँचवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५ ॥

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