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Raghuvansham Pancham Sarg

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Raghuvansham Pancham Sarg

रघुवंशम् महाकाव्य पञ्चम सर्ग | Raghuvansham Pancham Sarg

रघुवंशम् महाकाव्य के पञ्चम सर्ग (Raghuvansham Pancham Sarg) को अजस्वयम्वरसभाभिगमन कहा जाता है। इस सर्ग में राजा रघु ने अपनी सारी संपत्ति विश्वजीत यज्ञ में त्याग करने का वर्णन किया गया है। रघुवंशम् महाकाव्य के पञ्चम सर्ग में रघु ने कुबेर से युद्ध की तैयारी, वरतन्तु का शिष्य कौत्स के पुत्र प्राप्त का आशीर्वाद, रघु की पत्नी प्रभावती ने पुत्र को जन्म, रघु ने अपने पुत्र अज विवाह के लिए स्वयंवर में भेजना आदि का वर्णन मिलता है।

यहां एक क्लिक में पढ़ें ~ रघुवंशम् महाकाव्य प्रथमः सर्गः

॥ कालिदासकृत रघुवंशम् महाकाव्य पञ्चम सर्गः ॥

॥ श्रीः रघुवंशम् ॥

तमध्वरे विश्वजिति क्षितीशं निःशेषविश्राणितकोषजातम् ।
उपात्तविद्यो गुरुदक्षिणार्थी कौत्सः प्रपेदे वरतन्तुशिष्यः॥1॥
अर्थ:
विश्वजित् यज्ञ में राजा रघु ने सारा राजकोष दान में दे डाला। उसी समय महर्षि वरतन्तु का शिष्य ‘कौत्स’ रघु के पास पहुँचा। वह विद्याध्ययन पूर्ण कर चुका था। अब उसे गुरुदक्षिणा देनी थी।

स मृन्मये वीतहिरण्मयत्वात् पात्रे निधायार्घ्यमनर्घशीलः ।
श्रुतप्रकाशं यशसा प्रकाशः प्रत्युज्जगामातिथिमातिथेयः॥2॥
अर्थ:
रघु ने उसकी अगवानी की। हिरण्य न बचने के कारण उसके हाथ में अर्घ्यपात्र मिट्टी का था, वह अमूल्य शील का धनी, यश से प्रकाशित और अतिथिसत्कार में निपुण था। उधर अतिथि कौत्स भी विद्या से प्रकाशवान् था।

तमर्चयित्वा विधिवद् विधिज्ञस्तपोधनं मानधनाग्रयायी ।
विशाम्पतिर्विष्टर भाजमारात् कृताञ्जलिः कृत्यविदित्युवाच॥3॥
अर्थ:
मानधनों में अग्रयायी और विधिज्ञ राजा रघु ने उस तपोधन अतिथि की विधिवत् पूजा की और जब वे आसन पर बैठ गए तो हाथ जोड़ उस कृत्यविद् ने यह कहा।

अप्यग्रणीर्मन्त्रकृतामृषीणां कुशाग्रबुद्धे ! कुशली गुरुस्ते ।
यतस्त्वया ज्ञानमशेषमाप्तं चैतन्यमुग्रादिव दीक्षितेन॥4॥
अर्थ:
‘हे कुशाग्रबुद्धे ! मन्त्रकृत् ऋषियों में अग्रणी आपके गुरु तो सकुशल है, जिनसे आपने अशेष आप्त ज्ञान उसी प्रकार पाया है जिस प्रकार यजमान उग्र (शिव की एक मूर्ति) से चैतन्य पाया करता है।

कायेन वाचा मनसापि शश्वद् यत् संभृतं वासवधैर्यलोपि ।
आपाद्यते न व्ययमन्तरायैः कच्चिन्महर्षेस्त्रिविधं तपस्तत्॥5॥
अर्थ:
मुनि का काय, मन और वाणी से अर्जित वह त्रिविध तप तो विघ्नों द्वारा व्यय नहीं हो रहा, जिससे इन्द्र का भी धैर्य डिग जाता है।

आधारबन्धप्रमुखैः प्रयत्नैः संवर्धितानां सुतनिर्विशेषम् ।
कच्चिन्न वाय्वादिरुपप्लवो वः श्रमच्छिदामाश्रमपादपानाम्॥6॥
अर्थ:
आपके आश्रमवृक्षों में आँधी आदि का उपद्रव तो नहीं है, जो श्रम दूर करते हैं और जिन्हें आप टेको लगा लगाकर बाँध बाँधकर और अन्य उपायों से पुत्रों की भाँति बढ़ाते हैं।

क्रियानिमित्तेष्वपि वत्सलत्वादभग्नकामा मुनिभिः कुशेषु ।
तदङ्कशय्याच्युतनाभिनाला कच्चिन्मृगीणामनघा प्रसूतिः॥7॥
अर्थ:
मृगों के वे छौने तो सकुशल है जिनको वात्सल्य के कारण यज्ञ के लिए सञ्चित कुश चबाने की इच्छा भी तोड़ी नहीं जाती और जिनकी नाल मुनियों की गोद में ही गिरती है।

निर्वर्त्यते यैर्नियमाभिषेको येभ्यो निवापाञ्जलयः पितृणाम् ।
तान्युञ्छषष्ठाङ्कितसैकतानि शिवानि वस्तीर्थजलानि कच्चित्॥8॥
अर्थ:
जिनसे आपका नियमित स्नान संपन्न होता है, जिनसे पितरों के लिए तर्पण की अंजलि दी जाती है और जिनकी बालू में उञ्छ का षष्ठ भाग रखा रहता है, आपके वे तीर्थजल तो शुद्ध और स्वच्छ हैं।(Raghuvansham Pancham Sarg)

नीवारपाकादि कडङ्गरीयैरामृश्यते जानपदैर्न कच्चित् ।
कालोपपन्नातिथिकल्प्यभागं वन्यं शरीरस्थितिसाधनं वः॥9॥
अर्थ:
गाँव के भुसखाने वाले पशु आपके नीवार आदि की वह फसल चर तो नहीं जाते, जिनसे आप समय पर उपस्थित अतिथियों का सत्कार करते और अपना शरीर भी बचाते हैं।

अपि प्रसन्नेन महर्षिणा त्वं सम्यग् विनीयानुमतो गृहाय ।
कालो ह्ययं संक्रमितुं द्वितीयं सर्वोपकारक्षममाश्रमं ते॥10॥
अर्थ:
क्या ठीक से पढ़ा कर महर्षि ने आपको गृहस्थ आश्रम के लिए अनुमति दे दी है आपका यह वह वय है जब आपको सभी के उपकार में समर्थ द्वितीय (गृहस्थ) आश्रम में प्रवेश कर लेना है।

तवार्हतो नाभिगमेन तृप्तं मनो नियोगक्रिययोत्सुकं मे ।
अप्याज्ञया शासितुरात्मना वा प्राप्तोऽसि संभावयितुं वनान्माम्॥11॥
अर्थ:
आप पूज्य हैं। आप पधारे, बड़ा भाग्य, परन्तु इतने भर से मेरा चित्त संतुष्ट नहीं है। वह आज्ञा के लिए उत्सुक है। आप वन से मेरे पास पधारे क्या कोई गुरुजी की आज्ञा है या मुझे मान देने हेतु आप स्वयं पधारे हैं।’

इत्यर्घ्यपात्रानुमितव्ययस्य रघोरुदारामपि गां निशम्य ।
स्वार्थोपपत्तिं प्रति दुर्बलाशस्तमित्यवोचद् वरतन्तुशिष्यः॥12॥
अर्थ:
रघु की बात बड़ी उदार थी। उसे सुनकर और रघु के (मिट्टी के) अर्घ्य पात्रों को देखकर कौत्स के मन में कार्यसिद्धि की आशा क्षीण हो गई और वरतन्तु के वे शिष्य बोले।

सर्वत्र नो वार्त्तमवेहि राजन् नाथे कुतस्त्वय्यशुभं प्रजानाम् ।
सूर्ये तपत्यावरणाय दृष्टेः कल्पेत लोकस्य कथं तमिस्त्रा॥13॥
अर्थ:
‘राजन् ! सर्वत्र कुशल ही कुशल है हमारा। जब स्वामी आप है तब प्रजा का अशुभ हो ही कैसे सकता है? सूर्य के तपते रात्रि लोक में आँखों को ढँक कैसे सकती है।(Raghuvansham Pancham Sarg)

भक्तिः प्रतीक्ष्येषु कुलोचिता ते पूर्वान् महाभाग तयातिशेषे ।
व्यतीतकालस्त्वहमभ्युपेतस्त्वामर्थिभावादिति मे विषादः॥14॥
अर्थ:
राजन् ! पूज्यों के प्रति भक्ति आपमें अपने कुल के अनुरूप है, प्रत्युत उसमें आप अपने पूर्वजों से आगे हैं। मुझे खेद है कि मैं समय बिताकर आपके पास याचक के रूप में आया ।

शरीरमात्रेण नरेन्द्र ! तिष्ठन्नाभासि तीर्थप्रतिपादितर्द्धिः ।
आरण्यकोपात्तफलप्रसूतिः स्तम्बेन नीवार इवाऽवशिष्टः॥15॥
अर्थ:
राजन् आप अपना संपूर्ण कोष सत्पात्रों में बाँट चुके हैं और केवल शरीर से राजा है। आपकी स्थिति धान के उस पौधे जैसी है जिसकी बाल तो चुन ले गए हों आरण्यक और जिसमें बचा हुआ हो केवल तना।

स्थाने भवानेकनराधिपः सन्नकिश्चनत्वं मखजं व्यनक्ति ।
पर्यायपीतस्य सुरैर्हिमांशोः कलाक्षयः श्लाघ्यतरो हि वृद्धेः॥16॥
अर्थ:
राजा होते हुए भी आप यज्ञ के कारण दिखाई दे रहे हैं अकिञ्चन। यह भी आपके अनुरूप ही है। चन्द्रमा की कलाएँ देवजन एक एककर खाते जाते हैं तब एक कला के रूप में बचे चन्द्रमा का कलाक्षय ही कलावृद्धि से प्रशंसनीय होता है।

तदन्यतस्तावदनन्यकार्यों गुर्वर्थमाहर्तुमहं यतिष्ये ।
स्वस्त्यस्तु ते निर्गलिताम्बुगर्भ शरद्वनं नाद्दति चातकोऽपि॥17॥
अर्थ:
सो मैं गुरुदक्षिणा का द्रव्य अन्य किसी से प्राप्त करने का यत्ल करूंगा। आपका कल्याण हो। चातक भी शरत्काल के मेघ से प्रार्थना नहीं करता।’

यहां एक क्लिक में पढ़ें ~ श्रीमहाभारतम् आदिपर्व प्रथमोऽध्यायः

एतावदुक्त्वा प्रतियातुकामं शिष्यं महर्षेर्नृपतिर्निषिध्य ।
किं वस्तु विद्वन् गुरवे प्रदेयं त्वया कियद् वेति तमन्वयुक्त॥18॥
अर्थ:
इतना कहकर वरतन्तु के शिष्य ने लौटना चाहा। उसे राजा रघु ने रोका और पूछा ‘विद्वन् ! बतलाएँ तो कि गुरुजी को कौन सी वस्तु देनी है और कितनी मात्रा में।’

ततो यथावद् विहिताध्वराय तस्मै स्मयावेशविवर्जिताय ।
वर्णाश्रमाणां गुरवे स वर्णी विचक्षणः प्रस्तुतमाचचक्षे॥19॥
अर्थ:
तब उस विद्वान् ब्रह्मचारी ने वर्ण और आश्रम के मान्य, गर्व और आवेश से रहित और विधिवत् यज्ञ करके निपटे उस (रघु) से अपेक्षित बात कहना शुरू किया।

समाप्तविद्येन मया महर्षिर्विज्ञापितोऽभूद् गुरुदक्षिणायै ।
स मे चिरायास्खलितोपचारां तां भक्तिमेवागणयत् पुरस्तात्॥20॥
अर्थ:
‘भगवन्! मैं जब विद्याध्ययन पूर्ण कर चुका तो मैंने महर्षि से गुरुदक्षिणा पूछी। उत्तर में उन्होंने मेरी चिरकाल तक विधिवत् संपादित सेवा से व्यक्त भक्ति को ही प्रथम स्थान दिया।

निर्बन्धसञ्जातरुषाऽर्थकायमचिन्तयित्वा गुरुणाहमुक्तः ।
वित्तस्य विद्यापरिसंख्यया मे कोटीश्चतस्रो दश चाहरेति॥21॥
अर्थ:
किन्तु जब मैंने बारम्बार पूछा तो गुरुजी गुस्से में आ गए और मेरी गरीबी पर ध्यान न देकर कह बैठे ‘विद्या की संख्या का चौदह करोड़ वित्त (निष्क) ला दो’।

सोऽहं सपर्याविधिभाजनेन मत्वा भवन्तं प्रभुशब्दशेषम् ।
अभ्युत्सहे संप्रति नोपरोद्धमल्पेतरत्वाच्छुतनिष्क्रयस्य॥22॥
अर्थ:
मैं देख रहा हूँ कि आपके पास शेष है केवल ‘प्रभु’ शब्द। यह स्पष्ट है आपके इन मिट्टी के पूजापात्रों से। उधर गुरुदक्षिणा की राशि छोटी नहीं है, अतः जुटा नहीं पा रहा हूँ उत्साह आपको कष्ट देने का।'(Raghuvansham Pancham Sarg)

इत्थं द्विजेन द्विजराजकान्तिरावेदितो वेदविदां वरेण ।
एनोनिवृत्तेन्द्रियवृत्तिरेनं जगाद भूयो जगदेकनाथः॥23॥
अर्थ:
चन्द्र सी कान्ति वाले राजा रघु से जब उस उत्कृष्ट वेदज्ञ द्विज (कौत्स) ने इस प्रकार निवेदन किया तो निष्पाप इन्द्रियवृत्ति वाले सारे जगत् के प्रमुख स्वामी उस रघु ने फिर कहा।

गुर्वर्थमर्थी श्रुतपारदृच्चा रघोः सकाशादनवाप्य कामम् ।
गतो वदान्यान्तरमित्ययं मे मा भूत् परीवाद-नवावतारः॥24॥
अर्थ:
‘मैं नहीं चाहता कि ‘गुरु के लिए याचक बने वेद के एक पारदृश्वा विद्वान् को रघु के पास से निराश हो कर अन्य दाता के पास जाना पड़ा’ इस अपयश को नया जन्म मिले।

स त्वं प्रशस्ते महितो मदीये वसँञ्श्चतुर्थोऽग्निरिवाग्न्यगारे ।
द्वित्राण्यहान्यर्हसि सोढुमर्हन् यावद् यते साधयितुं त्वदर्थम्॥25॥
अर्थ:
तो आप ऐसा कीजिए कि मेरे प्रशस्त अग्न्यगार में चतुर्थ अग्नि बनकर दो तीन दिन रुकिए, जब तक मैं आपका प्रयोजन पूरा करने का यत्न करता हूँ। आप तो स्वयं पूज्य हैं।’

तथेति तस्यावितथं प्रतीतः प्रत्यग्रहीत् संगरमग्रजन्मा ।
गामात्तसारां रघुरप्यवेक्ष्य निष्क्रष्टुमर्थं चकमे कुबेरात्॥26॥
अर्थ:
ब्राह्मण वर्णी ने रघु का अनुरोध ‘तथा’ कहकर स्वीकार किया और रघु ने भी पृथिवी को धनहीन देख कुबेर से अर्थ प्राप्त करने का संकल्प किया।(Raghuvansham Pancham Sarg)

वसिष्ठमन्त्रोक्षणजात् प्रभावादुदन्वदाकाशमहीधरेषु ।
मरुत्सखस्येव बलाहकस्य गतिर्विजघ्ने न हि तद्रथस्य॥27॥
अर्थ:
महर्षि वसिष्ठ के मन्त्रोच्चारण कर अभ्युक्षण करने का था यह प्रभाव कि रघु के रथ की गति न समुद्र में रुकती थी, न आकाश में और न पर्वतों पर, चलती हवा पर सवार मेघ के समान।

अथाधिशिश्ये प्रयतः प्रदोषे रथं रघुः कल्पितमस्त्रगर्भम् ।
सामन्तसंभावनयैव धीरः कैलासनाथं तरसा जिगीषुः॥28॥
अर्थ:
रघु ने अपना रथ तैयार किया। उसमें अस्त्र रखे और रात को उसी में किया शयन। वह (लोकपाल) कुबेर को सामन्त सा मानकर उसे जबरन जीतना चाह रहा था।

प्रातः प्रयाणाभिमुखाय तस्मै सविस्मयाः कोषगृहे नियुक्ताः ।
हिरण्मयीं कोषगृहस्य मध्ये वृष्टिं शशंसुः पतितां नभस्तः॥29॥
अर्थ:
प्रात: ज्योंही वह कूच करने वाला था कि कोषागार में नियुक्त विस्मित सेवक दौड़े आए और सूचना दी-‘कोषागार के बीच आकाश से हिरण्य (सुवर्ण) वृष्टि हुई है’।

तं भूपतिर्भासुरहेमराशिं लब्धं कुबेरादभियास्यमानात् ।
दिदेश कौत्सस्य समस्तमेव शृङ्ग सुमेरोरिव वज्रभिन्नम्॥30॥
अर्थ:
राजा रघु ने समझ लिया कि ‘यह सुवर्णवृष्टि कुबेर ने की है जिस पर मैं चढ़ाई करने जा रहा था। उसका दूसरा कदम यह था कि उस पूरी की पूरी सुवर्णराशि को कौत्स की ओर बढ़ा दिया। वह राशि तो एक प्रकार से वज्र से टूटा सुमेरु का शृङ्ग ही था।

यहां एक क्लिक में पढ़ें ~ नवधा भक्ति

जनस्य साकेतनिवासिनस्तौ द्वावप्यभूतामभिनन्द्यसत्त्वौ ।
गुरुप्रदेयाधिकनि:स्पृहोऽर्थी नृपोऽर्थिकामादधिकप्रदश्च॥31॥
अर्थ:
साकेत निवासी प्रत्येक व्यक्ति दोनों की मानसिक उच्चता (सत्त्व) की प्रशंसा कर रहा था- याचक की भी जो गुरुदक्षिणा से अधिक अर्थ के प्रति निस्स्पृह था और दाता की भी जो याचित राशि से कई गुना अधिक द्रव्य दे रहा था।

अथोष्ट्रवामीशतवाहितार्थ प्रजेश्वरं प्रीतमना महर्षिः ।
स्पृशन् करेणानतपूर्वकायं संप्रस्थितो वाचमुवाच कौत्सः॥32॥
अर्थ:
रघु ने सैकड़ों ऊँटों और सैकड़ों घोड़ियों पर लदवा दिया वह सोना। तब प्रसन्न महर्षि चलने लगे। उस समय रघु ने उन्हें झुककर प्रणाम किया तो कौत्स ने कहा।

किमत्र चित्रं यदि कामसूर्भुवृत्ते स्थितस्याधिपतेः प्रजानाम् ।
अचिन्तनीयस्तु तव प्रभावो मनीषितं द्यौरपि येन दुग्धा॥33॥
अर्थ:
जो राजा हो और राजवृत्त का पालन करता हो उसकी कामना यदि पृथ्वी पूर्ण करती हो तो इसमें क्या आश्चर्य। अचिन्तनीय तो प्रभाव आपका है जिसने आपका अभीष्ट द्युलोक तक से दुह लिया। (राजवृत्त- ‘न्याय से अर्थार्जन, वृद्धि, रक्षा और सत्पात्र में विनियोग’ कामन्दक)

आशास्यमन्यत् पुनरुक्तभूतं श्रेयासि सर्वाण्यधिजग्मुषस्ते ।
पुत्रं लभस्वात्मगुणानुरूपं भवन्तमीड्यो भवतः पितेव॥34॥
अर्थ:
आप सभी श्रेय प्राप्त कर चुके हैं, अतः अन्य किसी वस्तु का आशीर्वाद पुनरुक्ति होगा। हाँ! आपको पुत्र प्राप्त हो आपके पूज्य पिता को आपके समान।’

इत्थं प्रयुज्याशिषमग्रजन्मा राज्ञे प्रतीयाय गुरोः सकाशम् ।
राजापि लेभे सुतमाशु तस्मादालोकमक्कादिव जीवलोकः॥35॥
अर्थ:
अग्रजन्मा कौत्स ऐसा आशीर्वाद कर गुरुजी के पास चले गए। उनके आशीर्वाद से राजा रघु को भी शीघ्र ही पुत्र प्राप्त हुआ जैसे सूर्य से जीवलोक को प्राप्त होता है आलोक।

ब्राह्मचे मुहूर्ते किल तस्य देवी कुमारकल्पं सुषुवे कुमारम् ।
अतः पिता ब्रह्मण एव नाम्ना तमात्मजन्मानमजं चकार॥36॥
अर्थ:
रघु की पट्टमहिषी (प्रभावती) ने पुत्र को जन्म दिया ब्रह्माजी के मुहूर्त (अभिजित) में (जो मध्याह्न में आता है), अत: पिता रघु ने उस आत्मजन्मा (पुत्र) को ब्रह्माजी के ही नाम पर ‘अज’ नाम दिया।(Raghuvansham Pancham Sarg)

रूपं तदोजस्वि तदेव वीर्य तदेव नैसर्गिकमुन्नतत्वम् ।
न कारणात् स्वाद् बिभिदे कुमारः प्रवर्त्तितो दीप इव प्रदीपात्॥37॥
अर्थ:
वह कुमार (अज) अपने कारण (पिता) से तनिक भी भिन्न नहीं लगा, वही ओजस्वी रूप, वही बल और वही स्वाभाविक उन्नतत्व (ऊँचा कद, ऊँची मानसिकता)। ऐसा लगा जैसे दीप प्रदीप से सुलगा दिया गया हो।

उपात्तविद्यं विधिवद् गुरुभ्यस्तं यौवनोद्भदविशेषकान्तम् ।
श्रीर्गन्तुकामाऽपि गुरोरनुज्ञां धीरेव कन्या पितुराचकाङ्क्ष॥38॥
अर्थ:
गुरुओं से विधिवत् विद्या प्राप्त कर लेने पर जब वह यौवन से विशेष कान्त हो गया तब राजलक्ष्मी उसकी होने के लिए उत्सुक हो गई, किन्तु पिता की आज्ञा धीर कन्या के समान चाह रही थी।

अथेश्वरेण क्रथकैशिकानां स्वयम्वरार्थ स्वसुरिन्दुमत्याः ।
आप्तः कुमारानयनोत्सुकेन भोजेन दूतो रघवे विसृष्टः॥39॥
अर्थ:
इस बीच विदर्भराज भोज ने अपनी बहिन इन्दुमती के स्वयंवर के लिए कुमार को लाने हेतु एक विश्वसनीय दूत रघु के पास भेज।

तं श्लाघ्यसंबन्धमसौ विचिन्त्य दारक्रियायोग्यदशं च पुत्रम् ।
प्रस्थापयामास ससैन्यमेनमृद्धां विदर्भाधिपराजधानीम्॥40॥
अर्थ:
रघु ने देखा कि वह सम्बन्ध श्लाघनीय है और पुत्र भी इस योग्य हो चुका है कि वह दारक्रिया कर सके तो अज को सेना के साथ विदर्भराज की राजधानी भेज दिया।

तस्योपकार्यारचितोपचारा वन्ध्येतरा जानपदोपदाभिः ।
मार्गे निवेशा मनुजेन्द्रसूनोर्बभूवुरुद्यानविहारकल्पाः॥41॥
अर्थ:
उस राजसूनु के लिए मार्ग में स्थान स्थान पर तम्बू तने पड़ाव बनाए गए, जो जनपदीय उपहारों से परिपूर्ण थे, ऐसा लगता था जैसे उद्यानगृह हों।

स नर्मदारोधसि सीकराद्रैर्मरुद्भिरानर्त्तितनक्तमाले ।
निवेशयामास विलङ्घिताध्वा क्लान्तं रजोधूसरकेतु सैन्यम्॥42॥
अर्थ:
अज का एक पड़ाव हुआ नर्मदातट पर। नर्मदा की फुहारों से आर्द्र हवा के झोकों से कंजी के पेड़ वहाँ खूब नचाए जा रहे थे। उधर लम्बा रास्ता पार करते करते सेना भी थक गई थी। उसके ध्वज धूलिधूसरित दिख रहे थे। अज ने वहीं डाला पड़ाव।

अथोपरिष्टाद् भ्रमरैभ्रमन्द्भिः प्राक्सूचिताऽन्तः सलिलप्रवेशः ।
निर्घोतदानामलगण्डभित्तिर्वन्यः सरित्तो गज उन्ममज्ज॥43॥
अर्थ:
वहाँ नर्मदा जल के ऊपर भौर टूट रहे थे, उनसे जिसके प्रवेश की सूचना मिल रही थी ऐसा एक जंगली हाथी नर्मदा के प्रवाह से ऊपर आया। उसके गण्डस्थल का पूरा मद घुला हुआ था, अतः उसकी गण्डभित्तियाँ अमल हो गई थीं।

निःशेषविक्षालितधातुनाऽपि वप्रक्रियामृक्षवतस्तटेषु ।
नीलोध्र्ध्वरेखाशबलेन शंसन् दन्तद्वयेनाश्मविकुण्ठितेन॥44॥
अर्थ:
उसके दोनों दाँत बतला रहे थे कि वह ऋक्षवान् पर्वत के तट पर वप्रक्रिया करके आया है, क्योंकि वे पत्थर की टक्कर से कुण्ठित हो गए थे और नीले रंग की ऊर्ध्वरेखा से चित्रित भी दिख रहे थे यद्यपि उनमें लगी धातु तो पूरी तरह घुल चुकी थी।

संहारविक्षेपलघुक्रियेण हस्तेन तीराभिमुखः सशब्दम् ।
बभौ स भिन्दन् बृहतस्तरङ्गान् वार्यर्गलाभङ्ग इव प्रवृत्तः॥45॥
अर्थ:
सूँढ़ को चटाचट सिकोड़ता फैलाता, चिंघाड़ता और बड़ी बड़ी तरंगों को चीरता हुआ तोर की ओर बढ़ रहा वह ऐसा लग रहा था जैसे कोशिश में हो अपनी बन्धन शृङ्खला को तोड़ने की।

शैलोपमः शैवलमञ्जरीणां जालानि कर्षनुरसा स पश्चात् ।
पूर्वं तदुत्पीडितवारिराशिः सरित्प्रवाहस्तटमुत्ससर्प॥46॥
अर्थ:
पहाड़ जैसा वह हाथी तो शैवालमञ्जरी जाल को छाती से खींचता तट पर पहुँचा बाद में, पहले जा पहुँचा उससे उत्पीड़ित वारिराशि वाला नदी का प्रवाह।

तस्यैकनागस्य कपोलभित्त्योर्हदावगाह क्षणमात्रशान्ता ।
वन्येतराऽनेकपदर्शनेन पुनर्दिदीपे मदुर्दिनश्रीः॥47॥
अर्थ:
वह हाथी ऊँची जाति का हाथी था। उसके दोनों गण्डों से बहा मद पानी से कुछ देर के लिए धुल तो चुका था, परन्तु पालतू हाथी दिखाई देते ही वह फिर से फूट पड़ा और लगा दी उसने झड़ी।(Raghuvansham Pancham Sarg)

सप्तच्छदक्षीरकटुप्रवाहमसह्यमाघ्राय मदं तदीयम् ।
विलङ्घिताधोरणतीव्रयत्नाः सेनागजेन्द्रा विमुखीबभूवुः॥48॥
अर्थ:
उसके मदज्ल की गंध छितवन के दूध सी कटु थी। उसका वह असह्य मदप्रवाह सूंघा तो सेना के गजेन्द्र विमुख हो गए, पीलवानों ने तीव्र प्रयत्न किए, किन्तु वे उन्हें भी लाँघते गए।

यहां एक क्लिक में पढ़ें ~ मुहूर्त चिन्तामणि हिंदी में

स च्छिन्नबन्धद्रुतयुग्यशून्यं भग्नाक्षपर्यस्तरथं क्षणेन ।
रामापरित्राणविहस्तयोघं सेनानिवेशं तुमुलं चकार॥49॥
अर्थ:
उस हाथी ने सेना का पूरा पड़ाव क्षण भर में तहस नहस कर डाला। घोड़े बन्धन तुड़ा कर भाग खड़े हुए, जूआ टूट जाने से रथ ढह गए, सैनिक बचाने में लगे हुए थे स्त्रियों को।

तमापतन्तं नृपतेरवध्यो वन्यः करीति श्रुतवान् कुमारः ।
निवर्त्तयिष्यन् विशिखेन कुम्भे जघान नात्यायतकृष्टशाङ्गः॥50॥
अर्थ:
उस हाथी को अपनी ओर टूटते देख कुमार अज ने लौटाने के लिए धनुष को कुछ खींच कर बाण मारा। बाण उसके कुम्भ पर लगा। कुमार को यह मर्यादा विदित थी कि वन्य हाथी को जान से नहीं मारना चाहिए।

स विद्धमात्रः किल नागरूपमुत्सृज्य तद्विस्मितसैन्यदृष्टः ।
स्फुरत्प्रभामण्डलमध्यवर्त्ति कान्तं वपुयोंमचरं प्रपेदे॥51॥
अर्थ:
बाण ज्योंही लगा त्योंही वह हाथी का शरीर छोड़कर विस्मित सैन्य की आँखों के सामने देखते ही देखते स्फुरित प्रभामण्डल के मध्य अवस्थित आकाशचारी कान्तिमान् रूप में बदल गया।

अथ प्रभावोपनतैः कुमारं कल्पद्रुमोत्थैरवकीर्य पुष्यैः।
उवाच वाग्मी दशनप्रभाभिः संवर्धितोर:स्थलतारहारः॥52॥
अर्थ:
इसके बाद उसने प्रभाव से प्राप्त कल्पद्रुम के पुष्पों की कुमार अज पर बरसा की और कहना शुरू किया। वह वाग्मी था और दन्तकान्ति से वक्षःस्थल के लम्बे हार को उसने और अधिक लम्बा कर दिया था।

मतङ्गशापादवलेपमूलादवाप्तवानस्मि मतङ्गजत्वम् ।
अवेहि गन्धर्व्वपतेस्तनूजं प्रियम्वदं मां प्रियदर्शनस्य॥53॥
अर्थ:
‘भगवन्! मैं मतङ्ग ऋषि के मेरी ही नासमझी से मिले शाप से हाथी बन गया था। हूँ मैं प्रियदर्शन गन्धर्वपति का प्रियंवद नामक प्रिय पुत्र।

स चानुनीतः प्रणतेन पश्चान्मया महर्षिर्मृदुतामगच्छत् ।
उष्णत्वमग्न्यातपसंप्रयोगाच्छेत्यं हि यत् सा प्रकृतिर्जलस्य॥54॥
अर्थ:
उन महर्षि का प्रणाम करके अनुनय किया तो वे कुछ पिघले। बात यह है कि पानी में ऊष्मा अग्नि के संसर्ग से ही आती है, अपने आप में तो वह शीतल ही होता है।

इक्ष्वाकुवंशप्रभवो यदा ते भेत्स्यत्यजः कुम्भमयोमुखेन ।
संयोक्ष्यसे स्वेन वपुर्महिम्ना तदेत्यवोचत् स तपोनिधिर्माम्॥55॥
अर्थ:
तब उन महर्षि जी ने मुझसे कहा ‘तुम्हें अपने शरीर की महिमा तब पुनः मिल जाएगी जब इक्ष्वाकु वंश में उत्पन्न अज तुम्हारे कुम्भ को लोहे के फल वाले बाण से घायल करेंगे।’

संमोचितः सत्त्ववता त्वयाऽहं शापाच्चिरप्रार्थितदर्शनेन ।
प्रतिप्रियं चेद् भवतो न कुर्यां वृथा हि मे स्यात् स्वपदोपलब्धिः॥56॥
अर्थ:
आप सत्त्वशाली है। आपने मुझे शाप से मुक्ति दिला दी। आपके दर्शन की प्रार्थना मैं लम्बे समय से कर रहा था। अब मेरी बारी है। यदि मैं आपका प्रतिप्रिय न करूँ तो व्यर्थ होगी मेरी अपने पद की प्राप्ति।

संमोहनं नाम सखे ! ममास्त्रं प्रयोगसंहारविभक्तमन्त्रम् ।
गान्धर्व्वमादत्स्व यतः प्रयोक्तुर्न चारिहिंसा विजयश्च हस्ते॥57॥
अर्थ:
आप मेरे सखा हैं। आप मेरा यह संमोहन’ नामक अस्त्र स्वीकार करें। इसके प्रयोग का मन्त्र अलग है और संहार का अलग। यह गान्धर्व अस्व है इससे अरिहिंसा भी नहीं होती और विजय हाथ में उपस्थित रहती है।

अलं हिया, मां प्रति यन्मुहूर्तं दयापरोऽभूः प्रहरन्नपि त्वम् ।
तस्मादुपच्छन्दयति प्रयोज्यं मयि त्वया न प्रतिषेधरौक्ष्यम्॥58॥
अर्थ:
लज्जा न करें। अरे आपने प्रहार करते समय भी दयालुता से काम लिया। अतः मेरी इस भेंट को अस्वीकार करने की बेरुखी न दिखलाएँ।'(Raghuvansham Pancham Sarg)

तथेत्युपस्पृश्य पयः पवित्रं सोमोद्भवायाः सरितो नृसोमः ।
उदङ्मुखः सोऽस्त्रवदस्त्रमन्त्रं जग्राह तस्मान्निगृहीतशापात्॥59॥
अर्थ:
अज ने कहा ‘ठीक है’ और नर्मदा के पवित्र जल से आचमन कर उत्तर मुख बैठकर अस्त्र के ही समान अस्त्रमन्त्र शापमुक्त प्रियंवद से ग्रहण कर लिया। नर्मदा ‘सोम’ से उत्पन्न है और अज भी नृसोम था। (सोम उमासहित शिव।)

एवं तयोरध्वनि दैवयोगादासेदुषोः सख्यमचिन्त्यहेतु ।
एको ययौ चैत्ररथप्रदेशान् सौराज्यरम्यानपरो विदर्भान्॥60॥
अर्थ:
इस प्रकार दैवयोग से मार्ग में अकल्पित सख्य को प्राप्त उन दोनों में से एक (प्रियंवद) तो चला गया कुबेरधाम और अन्य चल पड़ा सौराज्य से रम्य विदर्भजनपद की ओर।

तं तस्थिवांसं नगरोपकण्ठे तदागमारूढगुरुप्रहर्षः ।
प्रत्युज्जगाम क्रथकैशिकेन्द्रश्चन्द्रं प्रवृद्धोम्र्मिरिवोर्मिमाली॥61॥
अर्थ:
अज नगर के पास पहुँचा तो उसके आगमन से अत्यधिक प्रसन्न विदर्भराज भोज अगवानी में आए, चन्द्र की अगवानी में तरङ्गित्त समुद्र के समान।

प्रवेश्य चैनं पुरमग्रयायी नीचैस्तथोपाचरदर्पितश्रीः ।
मेने यथा तत्र जनः समेतो वैदर्भमागन्तुमजं गृहेशम्॥62॥
अर्थ:
विदर्भराज ने अज को नगर में प्रवेश कराया और बड़ी नम्रता के साथ उनका ऐसा सत्कार किया कि देखने वालों को अज ही गृहपति लगा और भोज ही आगन्तुक।

तत्राधिकारपुरुषैः प्रणतैः प्रदिष्टां प्राग्द्वारवेदिविनिवेशितपूर्णकुम्भाम् ।
रम्यां रघुप्रतिनिधिः स नवोपकार्यां बाल्यात् परामिव दशां मदनोऽध्युवास॥63॥
अर्थ:
अज विदर्भराज के नम्र अधिकारियों द्वारा बतलाई नई उपकार्या (पटमण्डप) में जाकर ठहर गए। उसके पूर्वद्वार पर पूर्णकुम्भ रखा हुआ था। देखने में भी वह रम्य थी। रघु का प्रतिनिधि अज उसमें वैसे ही आ जमा जैसे काम बाल्य के बाद की दशा में आ जमता है।

तत्र स्वयम्वरसमाहृतराजलोकं कन्याललाम कमनीयमजस्य लिप्सोः ।
भावावबोधकलुषा दयितेव रात्रौ निद्रा चिरेण नयनाभिमुखीबभूव॥64॥
अर्थ:
उसमें, अज की आँखों में रात को नींद देरी से आई। अज के मन में तो जाग रही थी उस कन्यारत्न की लिप्सा जिसके स्वयंवर ने राजा लोगों को खींच रखा था। नींद भाँप गई और इसीलिए रूठ भी गई थी पूर्व प्रेयसी के समान।

तं कर्णभूषणनिपीडितपीवरांसं शय्योत्तरच्छद-विमर्दकृशाङ्गरागम् ।
वैतालिका ललितबन्धमनोहराभिः प्राबोधयन्नुषसि वाग्भिरुदारवाचः॥65॥
अर्थ:
सबेरा हुआ तो उदारवाक् वैतालिकों ने ललितबन्ध से मनोहर उक्तियों से अज का प्रबोध मङ्गल करना आरम्भ किया। वैतालिक समवयस्क थे। अज के पीवर स्कन्ध कर्णाभूषणों से पीड़ित थे। शय्या के उत्तरच्छद में रगड़ा कर उसका अंगराग भी पुछ गया।

रात्रिर्गता मतिमतां वर! मुञ्च शय्यां धात्रा द्विधैव ननु धूर्जगतो विभक्ता ।
तामेकतस्तव बिभर्ति गुरुर्विनिद्रस्तस्या भवानपरधुर्यपदावलम्बी॥66॥
अर्थ:
हे मतिमतांवर ! रात्रि बीत चुकी है, अब शय्या छोड़िये। विधाता ने संसार का भार दो भागों में बाँट रखा है। उनमें से एक को तो आपके पिता धारण करने में जागरूक हैं। अन्य भाग के लिए अधिकृत आप किए गए हैं।

यहां एक क्लिक में पढ़ें ~ सूर्य सिद्धांत हिंदी में

निद्रावशेन भवताप्यनवेक्ष्यमाणा पर्युत्सुकत्वमबला निशि खण्डितेव ।
लक्ष्मीर्विनोदयति येन दिगन्तलम्बी सोऽपि त्वदाननरुचिं विजहाति चन्द्रः॥67॥
अर्थ:
लक्ष्मी रात भर पर्युत्सुक बनी रही, क्योंकि आप निद्रा के वश में थे, अतः उसे देख नहीं पाए। वह बेचारी जिसे देख देख दिल बहला रही थी वह चन्द्र भी अब दिगन्त में लटक कर आपके मुख की कान्ति छोड़ता जा रहा हैं ।

तद् वल्गुना युगपदुन्मिषितेन तावत् सद्यः परस्परतुलामधिरोहतां द्वे ।
प्रस्पन्दमान-परुषेतर-तारमन्तश्चक्षुस्तव प्रचलितभ्रमरं च पद्मम्॥68॥
अर्थ:
तो एक साथ सुन्दरता के साथ खिलकर दो (वस्तुएँ) एक दूसरे की तुलना पा लें, आपका तरल और कोमल पुतली वाला नेत्र और भ्रमरसंचार से युक्त कमल।(Raghuvansham Pancham Sarg)

वृन्तश्लथं हरति पुष्पमनोकहानां संसृज्यते सरसिजैररुणांशुभिन्नैः ।
स्वाभाविकं परगुणेन विभातवायुः सौरभ्यमीप्सुरिव ते मुखमारुतस्य॥69॥
अर्थ:
यह जो प्रभातपवन है यह एक प्रकार से चाह रहा है आपके मुख से निकलती साँस की स्वाभाविक सुगन्ध का अनुकरण करना। वह एक बार तो वृन्त पर श्लथ पड़े पुष्प को उड़ाता है, और एक बार मिलता है, अरुणोदय वेला में खिले कमलों से, परन्तु हैं तो ये परगुण।

ताम्रोदरेषु पतितं द्रुमपल्लवेषु निर्धोतहारगुलिकाविशदं हिमाम्भः ।
आभाति लब्धपरभागतयाऽधरोष्ठे लीलास्मितं सदशनार्चिरिव त्वदीयम्॥70॥
अर्थ:
ताम्रवर्ण के तरुपल्लवों पर अटकी यह बड़े हार के स्वच्छ मोती सी ओस की बूँद ऐसी लग रही है जैसी लगती है आपके अधरोष्ठ पर उछली आपकी दन्तकान्ति। दोनों के मिलन से एक तीसरी ही छवि निष्पन्न हो रही है (उसी की संज्ञा है ‘परभाग)।

यावत् प्रतापनिधिराक्रमते न भानुरह्नाय तावदरुणेन तमो निरस्तम् ।
आयोधनाग्रसरतां त्वयि वीर! याते किं वा रिपूँस्तव गुरुः स्वयमुच्छिनत्ति॥71॥
अर्थ:
जब तक प्रतापनिधि भगवान् सूर्य आकाश में आरूढ़ नहीं तभी तक, देखिए तो अरुण ने ही रात्रि का अन्धकार दूर कर दि । युद्ध में जब आप आगे बढ़ जाते हैं तब क्या रिपुओं को आपके पिताजी स्वयं मारते हैं?

शय्यां जहत्युभयपक्षविनीतनिद्राः स्तम्बेरमा मुखरशृङ्खलकर्षिणस्ते ।
येषां विभान्ति तरुणारुणरागयोगाद् भिन्नाद्रिगैरिकतटा इव दन्तकोषाः॥72॥
अर्थ:
देखिए! ये सेनागज भी दोनों करवट सोकर शय्या छोड़ रहे हैं। इनकी खिंचती शृङ्खलाएँ बज रही हैं, और इनके दन्तकोषों पर तरुण अरुण की ललॉई पड़ रही है तो ऐसा लग रहा है कि ये गैरिकतटों को तोड़कर आए है (वप्रक्रीडा)।

दीर्घेष्वमी नियमिताः पटमण्डपेषु निद्रां विहाय वनजाक्ष ! वनायुदेश्याः ।
वक्त्रोष्मणा मलिनयन्ति पुरोगतानि लेह्यानि सैन्धवशिलाशकलानि वाहाः॥73॥
अर्थ:
लम्बे-लम्बे तम्बुओं में बँधे ये अरबी घोड़े (वनायु देशी) भी नींद छोड़कर, हे कमलाक्ष! मुख की भाप से चाटने हेतु सामने पड़ी नमक की शिलाएँ मटमैली कर रहे है।

भवति विरलभक्तिम्निपुष्पोपहारः स्वकिरणपरिवेषोद्भेदशून्याः प्रदीपाः ।
अयमपि च गिरं नस्त्वत्प्रबोधप्रयुक्तामनुवदति शुकस्ते मनुवाक् पञ्जरस्थः॥74॥
अर्थ:
ये जो फर्श पर पड़ी फूल की लड़ी (उपहार) हैं ये म्लान हैं अतः इनकी जो रचना थी (भाँति) वह भी विरल पड़ती जा रही है। दीपक की किरणें अब दिखाई नहीं पड़ रही है। और पिंजरे में बैठा मधुरवाणी वाला यह शुक भी आपकी स्तुति में उच्चरित हमारे शब्दों का अनुवाद करने लगा है।

इति विरचितवाग्भिर्वन्दिपुत्रैः कुमारः सपदि विगतनिद्रस्तल्पमुज्झाञ्चकार ।
मदपटुनिनदद्भिर्बोधितो राजहंसैः सुरगज इव गाङ्ग सैकतं सुप्रतीकः॥75॥
अर्थ:
वन्दिपुत्रों ने इस प्रकार काव्यमयी (विरचित) वाणी सुनाई तो जागा अज चट से तल्प से अलग हो गया, जिस प्रकार मद से उच्च और मधुर स्वरों में बोल बोल कर राजहंसों द्वारा जगाया ‘सुप्रतीक’ नामक दिग्गज गङ्गा की बालू को छोड़ देता है।

अथ विधिमवसाय्य शास्त्रदृष्टं दिवसमुखोचितमञ्चिताक्षिपक्ष्मा ।
कुशल-विरचिता-उनुरूपवेषः क्षितिपसमाजमगात् स्वयम्वरस्थम्॥76॥
अर्थ:
जागकर अज ने दिन उगते समय की शास्त्रोक्त विधि पूरी की। सुन्दर बरौनियों वाले उस अज को कुशल जनों ने समयोचित वेष पहनाया और वह स्वयम्वर में इकट्ठे राजसमाज पहुँचा।

पञ्चम सर्ग (Raghuvansham Pancham Sarg) कथा:

उस अवधि के दौरान जब महाराजा रघु ने उदारतापूर्वक अपनी सारी संपत्ति दान करके तपस्वी जीवन अपनाया, वरतंतु के एक शिष्य कौत्स ऋषि एक अनुरोध के साथ उनके पास पहुंचे। उन्होंने महाराजा रघु की स्पष्ट गरीबी पर निराशा व्यक्त की और चतुर्दश विद्या (ज्ञान की चौदह शाखाएँ) में महारत हासिल करने के बाद गुरु को 14 कोटि धन देने की परंपरा का उल्लेख किया। महाराज रघु ने कौत्स की चिंताओं के जवाब में, उन्हें अपने यज्ञशाला (यज्ञ कक्ष) में रहने के लिए आमंत्रित किया और उन्हें आश्वासन दिया कि वह वांछित दान को पूरा करने के लिए प्रयास करेंगे।(Raghuvansham Pancham Sarg)

अपने वादे को पूरा करने के लिए, महाराज रघु ने भगवान कुबेर से धन मांगने के इरादे से, ग्रंथों को एक रथ पर रखा और उस पर सोकर रात बिताई। सुबह महाराजा रघु के जागने से पहले मंत्री ने उन्हें राजकोष में अप्रत्याशित धन वर्षा की सूचना दी। इस समाचार से प्रसन्न होकर महाराजा रघु ने कौत्स को बुलाया और उदारतापूर्वक उसे आवश्यक धनराशि प्रदान की।

अत्यंत प्रसन्न होकर, कौत्स ने अपना आभार व्यक्त किया और उन्होंने महाराजा रघु को एक पुत्र प्राप्त को ऐसा आशीर्वाद दिया जो उनकी छवि का प्रतिबिंब हो। महाराजा रघु ने कौत्स की सलाह का पालन किया और उनके पुत्र का नाम ‘अज’ रखा गया।

जैसे-जैसे अज बड़ा हुआ, उसने विभिन्न कौशल और ज्ञान हासिल कर लिया। अपने पिता की शिक्षाओं से प्रेरित होकर, वह एक यात्रा पर निकल पड़े। रस्ते में एक जंगली हाथी से बचाने के लिए अपने तीरंदाजी कौशल का उपयोग करना पड़ा। प्रियंवद नाम के जंगली हाथी ने खुलासा किया कि वह एक गंधर्व था और एक ऋषि ने उसे श्राप दिया था। अज के तीर ने उन्हें श्राप से मुक्ति दिला दी थी और कृतज्ञता स्वरूप उन्होंने अज को एक गंधर्व हथियार प्रदान किया था।

अज ने इस दिव्य हथियार से लैस होकर अपनी यात्रा जारी रखी और अंततः राजा भोज की राजधानी तक पहुंच गये। अज के आगमन की जानकारी मिलने पर, राजा भोज और उनके सेवकों ने महाराजा रघु के पुत्र के प्रति बहुत सम्मान दिखाते हुए, उनका स्वागत किया।(Raghuvansham Pancham Sarg)

इति रघुवंशे महाकाव्ये कविकालिदासकृतौ स्वयम्वराभिगमनो नाम पञ्चमः सर्गः॥5॥
अर्थ:
इस प्रकार पूर्ण हुआ महाकवि कालिदास की कृति रघुवंश महाकाव्य में अजस्वयम्वरसभाभिगमन नामक पञ्चम सर्ग॥5॥

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