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Garga Samhita Vishwajitkhand chapter 11 to 15

Garga Samhita
Garga Samhita Vishwajitkhand chapter 11 to 15

॥ श्रीहरिः ॥

ॐ दामोदर हृषीकेश वासुदेव नमोऽस्तु ते

श्रीराधाकृष्णाभ्यां नमः

Garga Samhita Vishwajitkhand Chapter 11 to 15 |
श्री गर्ग संहिता के विश्वजीतखण्ड अध्याय 11 से 15 तक

श्री गर्ग संहिता में विश्वजीतखण्ड (Vishwajitkhand chapter 11 to 15) के ग्यारहवाँ अध्याय में दन्तवक्र की पराजय तथा करूष देश पर यादव सेना का विजय वर्णन है। बारहवाँ अध्याय में उशीनर आदि देशोंपर प्रद्युम्नकी विजय तथा उनकी जिज्ञासापर मुनिवर अगस्त्यद्वारा तत्त्वज्ञानका प्रतिपादन कहा गया है। तेरहवाँ अध्याय में शाल्व आदि देशों तथा द्विविद वानरपर प्रद्युम्नकी विजय; लङ्कासे विभीषणका आना और उन्हें भेंट समर्पित की गई है। चौदहवाँ अध्याय में सह्यपर्वतके निकट दत्तात्रेयका दर्शन और उपदेश तथा महेन्द्रपर्वत पर परशुरामजी के द्वारा यादवसेनाका सत्कार और श्रेष्ठ भक्त के स्वरूप का निरूपण कहा गया है, और पंद्रहवाँ अध्याय में उड्डीश-डामर देशके राजा, वङ्गदेशके अधिपति वीरधन्वा तथा असमके नरेश पुण्ड्रपर यादव सेना की विजय का वर्णन है।

यहां पढ़ें ~ गर्ग संहिता गोलोक खंड पहले अध्याय से पांचवा अध्याय तक

ग्यारहवाँ अध्याय

दन्तवक्र की पराजय तथा करूष देश पर यादव-सेनाकी विजय

श्रीनारदजी कहते हैं- तब श्रीकृष्णके अठारह महारथी पुत्रोंने मिलकर महाबली दन्तवक्रको क्षत विक्षत कर दिया। घायल हुआ दन्तवक्र रक्तधारासे रञ्जित हो उसी प्रकार अत्यन्त शोभा पाने लगा, जैसे महावरके रंगसे रँगा हुआ कोई ऊँचा महल सुशोभित हो रहा हो। उसने शत्रुओंके प्रहारको कुछ भी नहीं गिना। कृतवर्माने समराङ्गणमें उसे बाण-समूहोंद्वारा घायल किया, सात्यकिने तलवारसे चोट पहुँचायी और अक्रूरने उस महाबली वीरपर शक्तिसे प्रहार किया। रोहिणीनन्दन सारणने उसके ऊपर कुठारसे आघात किया। रणदुर्मद दन्तवक्रने भी सात्यकिको गदासे चोट पहुँचायी, कृतवर्माको हाथसे और अक्रूरको लातसे मारा तथा सारणको भुजाओंके वेगसे आहत कर दिया। अक्रूर, वृतवर्मा, सात्यकि और सारण ये चारों वीर आँधीके उखाड़े हुए वृक्षोंकी भाँति मूच्छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़े। तदनन्तर जाम्बवतीकुमार साम्बने उसकी गदा लेकर, गदाके ऊपर अपनी गदा रखकर उससे दन्तवक्रको मारा। दन्तवक्रने गदा फेंक दी और जाम्बवतीकुमार साम्बको पकड़कर दोनों भुजाओंसे रणमण्डलमें गिरा दिया। तब साम्बने भी उठकर उसके दोनों पैर पकड़कर उसे भूपृष्ठपर दे मारा। वह एक अद्भुत-सी बात हुई। दन्तवक्र उठकर उस समय अट्टहास करने लगा। उसकी आवाजसे सात लोकों और पातालोंसहित समूचा ब्रह्माण्ड गूंज उठा। सहस्रों सूर्योके समान तेजस्वी और सहस्र घोड़ोंसे जुते हुए पताका मण्डित दिव्य रथपर आरूढ़ होकर आये हुए धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ प्रद्युम्रकी ओर देखकर दन्तवक्रने यह कठोर बात कही ॥ १-११ ॥

दन्तवक्र बोला- तुम समस्त यादव, वृष्णिवंशी और अन्धकवंशी लोग स्वल्पशक्तिवाले, तुच्छ, रणभूमिसे भागे हुए और युद्धभीरु हो। राजा ययातिके शापसे तुम्हारा तेज भ्रष्ट हो गया है। तुम राज्यभ्रष्ट और निर्लज्ज हो। मैं अकेला हूँ और तुम बहुसंख्यक हो; तथापि अधर्म-मार्गपर चलनेवाले तथा धर्मशास्त्रकी मर्यादाको विलुप्त करनेवाले तुम नराधमोंने मेरे साथ युद्ध किया है। तुम्हारा पिता श्रीकृष्ण पहले नन्दके पशुओंका चरवाहा था। वह ग्वालोंकी जूठन खाता था, किंतु आज वही यादवोंका ईश्वर बना बैठा है। उसने गोपियोंके घरमें माखन, दही, घी, दूध और तक्र आदि गोरसकी चोरी की थी। वह रासमण्डलमें रसिया बनकर नाचता था, किंतु अब जरासंधके भयसे उसने भी समुद्रकी शरण ले ली है। जो कालयवनके सामने डरपोककी तरह भागा था, वही आज ‘यदुनाथ’ बना है। उसके दिये हुए थोड़े से राज्यको पाकर उग्रसेन उस अल्पसारके लिये यज्ञोंमें श्रेष्ठ राजसूय यज्ज्ञ करेगा। कालकी गति दुर्लङ्घय है। अहो! सारा संसार विचित्र हो गया। अत्यन्त दुर्बल सियार, सिंह और व्याघ्रपर शासन करने चला है।॥ १२-१८॥

श्रीप्रद्युम्नने कहा- ओ निन्दक । पहिले कुण्डिन पुरमें तूने यादवोंके बढ़े-चढ़े बलको शायद नहीं देखा था, किंतु आज यहाँ देख लेना। करूषराज ! तुम लोग मेरे सम्बन्धी हो, यह जानकर मैं तुमसे युद्ध नहीं करना चाहता था। किंतु तूने बलपूर्वक युद्ध छेड़ दिया। यह तेरे द्वारा धर्मशास्त्रानुमोदित कार्य ही तो किया गया है। नन्दराज साक्षात् द्रोण नामक वसु हैं, जो गोपकुलमें अवतीर्ण हुए हैं। गोलोकमें जो गोपाल- गण हैं, वे साक्षात् श्रीकृष्णके रोमसे प्रकट हुए हैं और गोपियाँ श्रीराधाके रोमसे उद्भूत हुई हैं। वे सब- की-सब यहाँ व्रजमें उतर आयी हैं। कुछ ऐसी भी गोपाङ्गनाएँ हैं, जो पूर्वकृत पुण्यकर्मों तथा उत्तम वरोंके प्रभावसे श्रीकृष्णको प्राप्त हुई हैं। भगवान् श्रीकृष्ण साक्षात् परिपूर्णतम परमात्मा हैं, असंख्य ब्रह्माण्डोंके अधिपति, गोलोकके स्वामी तथा परात्पर ब्रह्म हैं। जिनके अपने तेजमें सम्पूर्ण तेज विलीन होते हैं, उन्हें ब्रह्मा आदि उत्कृष्ट देवता साक्षात् ‘परिपूर्णतम’ कहते हैं, पूर्वकालमें जो चक्रवर्ती राजा मरुत्त थे, वे ही श्रीकृष्णके वरदानसे यादवराज उग्रसेन हुए हैं। तू निरङ्कुश और महामूर्ख है, जो महान् गुणशाली महापुरुषकी निन्दा करता है। जैसे सिंह गीदड़की आवाजपर ध्यान नहीं देता, उसी प्रकार महाराज उग्रसेन अथवा भगवान् श्रीकृष्ण तेरी बकवासपर कोई विचार नहीं करेंगे ॥ १९-२६ ॥

नारदजी कहते हैं- राजन् ! प्रद्युम्नकी ऐसी बात सुनकर मदमत्त दन्तवक्र एक भारी गदा लेकर उनके रथपर टूट पड़ा। उसने अपनी गदासे चोट करके उस रथके सहस्र घोड़ोंको गिरा दिया और गर्जना करने लगा। उसका भयंकर रूप देखकर सब घोड़े भाग चले। तब प्रद्युम्रने भी गदा लेकर उसकी छातीमें बड़े जोरसे प्रहार किया। उस प्रहारसे दैत्यराज दन्तवक्र मन- ही-मन कुछ व्याकुल हो उठा। अब उन दोनोंमें गदासे घोर युद्ध होने लगा। गदाओंसे परस्पर प्रहार करते हुए वे दोनों वीर एक-दूसरेको रणभूमिमें रौंदने और गर्जने लगे। राजन् ! उन्हें देखकर ऐसा जान पड़ता था, मानो पर्वतपर दो सिंह आपसमें जूझ रहे हों ॥ २७-३० ॥(Vishwajitkhand chapter 11 to 15)

दन्तवक्रने दोनों हाथोंसे श्रीकृष्णकुमारको पकड़कर भूमिपर उसी प्रकार गिरा दिया, जैसे एक सिंहने दूसरे सिंहको बलपूर्वक पटक दिया हो। प्रद्युम्नने भी उठकर बलपूर्वक उसके दोनों हाथ पकड़ लिये और भुजाओं द्वारा घुमाकर उसे पृथ्वीपर दे मारा। प्रद्युम्नके प्रहारसे वह रक्त वमन करता हुआ पृथ्वीपर गिर पड़ा। उसकी हड्डियाँ चूर-चूर हो गयीं; शरीर शिथिल हो गया। उसे मूर्च्छा आ गयी। वह आकृतिसे घबराया हुआ प्रतीत होने लगा। दन्तवक्र इन्द्रके वज्रसे आहत हुए पर्वतकी भाँति भूपृष्ठपर सुशोभित हो रहा था। उसके शरीरके धक्केसे समुद्रसहित पृथ्वी हिलने लगी, दिग्गज विचलित हो उठे, तारे खिसक गये और समुद्र काँपने लगे। राजेन्द्र ! उसके गिरनेके धमाकेसे तीनों लोकोंके कान बहरे हो गये। उसी समय करूषराज महात्मा वृद्धशर्मा रानी श्रुतदेवाके साथ महारङ्गपुरसे वहाँ आ पहुँचे। वे यादवोंके साथ सुन्दर ढंगसे संधि करना चाहते थे। मिथिलेश्वर ! वे शम्बरशत्रु प्रद्युम्नको भेंट देकर, पुत्रको साथ ले, संधि करके यदुपुंगवोंसे पूजित हो, पुनः महारङ्गपुरको चले गये ॥ ३१-३७ ॥

इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें विश्वजित्खण्डके अन्तर्गत नारद बहुलाश्व-संवादमें ‘दन्तवक्रके साथ युद्धमें करूष देशपर विजय’ नामक ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११ ॥

यहां एक क्लिक में पढ़ें ~ श्री राम चालीसा

बारहवाँ अध्याय

उशीनर आदि देशोंपर प्रद्युम्नकी विजय तथा उनकी जिज्ञासापर मुनिवर
अगस्त्यद्वारा तत्त्वज्ञानका प्रतिपादन

श्रीनारदजी कहते हैं- राजन् ! दक्षिण सागरमें स्नान करके यादवराज प्रद्युम्न वहाँसे सेनासहित उशीनर देशको जीतनेके लिये आये, जहाँ ग्वालोंकी मण्डलीके साथ कोटि-कोटि भव्य मूर्तिवाली गौएँ विचरती और चरती हैं। उशीनर देशके लोग दूध पीते और गोरे रंगके मनोहर रूपवाले होते हैं। वे मक्खनकी भेंट लेकर प्रद्युम्नके सामने गये। उनसे पूजित होकर प्रद्युम्रने प्रसन्नतापूर्वक उन्हें हाथी, घोड़े, रथ, रत्न, वस्त्र और भूषण आदि बहुत धन दिया। उशीनरकी राजधानी चम्पावती नामक पुरी मणि और रनोंसे सम्पन्न थी। वह राजाओंसे उसी प्रकार शोभा पाती थी, जैसे सर्पोंसे भोगवतीपुरी। चम्पावतीके स्वामी वीर राजा हेमाङ्गद शीघ्र ही भेंट लेकर आये। उन्होंने श्रीकृष्णकुमार प्रद्युम्नको प्रणाम किया। उनसे संतुष्ट होकर प्रद्युम्नने उन्हें केसरयुक्त कमलोंकी माला दी और सहस्रदलोंकी शोभासे सम्पन्न एक दिव्य कमल भी अर्पित किया ॥ १-७॥

तदनन्तर महाबाहु प्रद्युम्न धनुष धारण किये तथा बार-बार दुन्दुभि बजवाते हुए अपनी सेनाके साथ विदर्भ देशको गये। कुण्डिनपुरके राजा भीष्मकने वहाँ पधारे हुए रुक्मिणीपुत्रको अपने घर ले आकर बहुत धन दे, सेनासहित उनका पूजन किया। तत्पश्चात् नानाको प्रणाम करके बलवान् यादवेश्वर रुक्मिणीनन्दन कुन्त और दरद देशोंको गये। मार्गमें मलयाचल के चन्दनको स्पर्श करता हुआ समीर उनकी सेवा कर रहा था। श्रीखण्ड और केतकी पुष्पोंकी गन्धसे भरे हुए मलयाचलपर उन्होंने मुनिश्रेष्ठ अगस्त्य का दर्शन किया, जो किसी समय महासागरको पी गये थे। श्रीकृष्ण- कुमार दोनों हाथ जोड़कर उन महामुनिको नमस्कार करके उनकी पर्णशालामें खड़े हो गये। मुनिने शुभा- शीर्वाद देकर उनका अभिनन्दन किया ॥ ८-१२॥

तब श्रीप्रद्युम्नने पूछा- मुनिश्रेष्ठ ! यह जगत् तो दृश्य-पदार्थ होनेके कारण मिथ्या है, फिर सत्यकी भाँति कैसे स्थित है? तथा जीव ब्रह्मका अंश होनेके कारण नित्यमुक्त है, ऐसा होनेपर भी यह गुणोंसे कैसे बंध जाता है? यह मेरा प्रश्न है, आप इसका भलीभाँति निरूपण कीजिये; क्योंकि आप सर्वज्ञ, दिव्यदृष्टिसे सम्पन्न तथा समस्त ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ हैं॥१३-१४॥(Vishwajitkhand chapter 11 to 15)

अगस्त्यजीने कहा- रुक्मिणीनन्दन ! तुम साक्षात् परिपूर्णतम भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रके पुत्र हो, तथापि मुझसे प्रश्न करते हो! तुम्हारा यह प्रश्न पूछना लीलामात्र है (क्योंकि तुम सर्वज्ञ हो)। प्रभो! जैसे भगवान् श्रीहरि लोक-संग्रहके लिये ही कर्म करते हैं, उसी प्रकार तुम भी मनुष्योंका कल्याण करनेके लिये विचर रहे हो। जैसे सत्य सूर्यका जलमें जो प्रतिबिम्ब दिखायी देता है, वह मिथ्या होनेपर भी सत्य-सा प्रतीत होता है, उसी प्रकार प्रकृति और परमात्माका प्रतिबिम्बस्वरूप यह दृश्य-जगत् असत् होनेपर भी सत्य-सा दृष्टिगोचर होता है। जैसे शीशेमें मुख, रस्सीमें सर्प तथा बालुका-राशिमें जलकी सत्यवत् प्रतीति होती है, उसी प्रकार यह सत् परमात्मा देहगत सत्त्वादि गुणोंसे बद्ध जान पड़ता है- अन्तःकरणरूपी दर्पणमें सत का प्रतिबिम्ब ही जीवरूपमें प्रतीतिगोचर होता है। (शीशेमें मुख आबद्ध न होनेपर भी बद्ध-सा प्रतीत होता है, उसी प्रकार नित्यमुक्त परमात्मा सत्त्वादि गुणमय अन्तःकरणमें प्रतिविम्बित होकर बद्ध-सा जान पड़ता है) ॥ १५-१८ ॥

प्रद्युम्नने पूछा- ब्रह्मज्ञ-शिरोमणे! जिस उपायसे दृढ़ वैराग्य प्राप्त करके देहधारी जीव कथमपि बन्धनमें न पड़े, वह मुझे बताइये ॥ १९ ॥

अगस्त्यजीने कहा- जो विवेकका आश्रय लेकर जगत्को मनोमय (मनके संकल्पमात्रसे प्रकट) मानकर सनातन ब्रह्मका भजन करता है, वह परमपदको प्राप्त होता है। राजन् ! उस परमात्माको जन्म, मृत्यु, शोक, मोह, बाल्य, यौवन, जरा, अहंता, मद, व्याधिका डर, सुख, दुःख, क्षुधा, रति, मानसिक चिन्ता और भय कभी नहीं प्राप्त होते; क्योंकि आत्मा निरीह (चेष्टारहित), निराकार, सर्वथा अहंकारशून्य, शुद्धस्वरूप, गुणोंका आश्रय, साक्षात् परमेश्वर, निष्कल तथा आत्मद्रष्टा है। जिसको मुनीश्वरोंने सदा पूर्ण एवं ज्ञानमय जाना है, उस परब्रह्म परमात्माको जानकर यह जीव सुखपूर्वक विचरे ॥ २०-२३॥

जो पुरुष (आत्मा) इस जगत्के सो जानेपर भी जागता है, सबको देखता है, उस द्रष्टाको यह लोक कभी नहीं देखता, कदापि नहीं जानता। जैसे विभिन्न रंगोंसे स्फटिकमणि कभी लिप्त नहीं होती तथा जैसे आकाश कोठेसे, अग्नि काष्ठसे और वायु उड़ी हुई धूलसे लिप्त नहीं होती, उसी प्रकार ब्रह्म गुणोंसे कभी लिप्त नहीं होता। जो लक्षणाओंसे, व्यञ्जनाद्वारा व्यक्त होनेवाली ध्वनि एवं व्यङ्गचार्थोंसे कभी ज्ञानका विषय नहीं होता, वह लौकिक वाक्योंद्वारा कैसे जाना जा सकता है! उस शब्दार्थातीत परब्रह्मको नमस्कार है। कुछ लोग इस परमात्माको ‘कर्म’ कहते हैं, दूसरे लोग उसे ‘काल’ की संज्ञा देते हैं। अन्य विद्वान् उसे ‘कर्ता’ एवं ‘योग’ कहते हैं, दूसरे विचारक उसको ‘सांख्य’ एवं ‘ब्रह्म’ बताते हैं। कोई ‘परमात्मा’ और ‘वासुदेव’ कहते हैं। प्रत्यक्ष, अनुमान, निगमागम तथा आत्मानुभवसे उस परब्रह्मके स्वरूपका विचार करके इस जगत्में अनासक्तभावसे विचरे। जैसे जलके चञ्चल होनेसे उसमें प्रतिबिम्बित वृक्ष भी चञ्चल- से प्रतीत होते हैं और नेत्रोंके घूमनेसे धरती भी घूमती- सी दिखायी देती है, उसी प्रकार गुणोंके भ्रमणसे मनके भ्रान्त होनेपर उसमें स्थित आत्मा भी भ्रान्त-सा जान पड़ता है॥ २४-३०॥(Vishwajitkhand chapter 11 to 15)

राजन् ! जैसे हाथसे घुमाया जाता हुआ अलात चक्र मण्डलाकार घूमता जान पड़ता है, उसी प्रकार गुणर्णोद्वारा भ्रान्त मनके द्वारा अज्ञानविमोहित जीव ऐसा कहने और मानने लगता है कि ‘मैं करूँगा, मैं कर्ता हूँ, यह मेरा है, वह तुम्हारा है, यह तुम हो, यह मैं हूँ, मैं सुखी हूँ और मैं दुःखी हूँ’ इत्यादि। सत्त्व, रज और तम-ये तीनों प्रकृतिके गुण हैं, आत्मा के नहीं। उन गुणर्णोद्वारा यह सारा जगत् उसी तरह व्याप्त है, जैसे सूतसे वस्त्र ओत-प्रोत होता है। सत्त्वगुणमें स्थित जीव ऊपरको जाते हैं, रजोगुणी जीव मध्यवर्ती लोकमें रहते हैं तथा तमोगुणकी वृत्तिमें स्थित तामसजन नीचे (नरकादिमें) जाते हैं। श्रीकृष्णकुमार! जैसे अँधेरेमें रखी हुई रस्सीमें सर्पबुद्धि होती है, दूरसे मरीचिका (सूर्यकिरण) में जलकी भ्रान्ति होती है, उसी प्रकार अज्ञानमोहित जीव परब्रह्ममें इस जगत् की भ्रान्त धारणा बना लेता है। सुखको उसी तरह आने-जानेवाला समझो, जैसे मण्डलवर्ती राजाओंका राज्य।मनुष्योंका दुःख भी उसी प्रकार है, जैसे नरकवासियोंका। घन माला, देहके गुण तथा दिन और रात जैसे स्थिर नहीं होते, उसी तरह सुख-दुःख भी स्थिर नहीं है। जैसे तीर्थयात्रियों या व्यापारियोंका समुदाय सदा साथ नहीं रहता, उसी तरह यह दृश्य-प्रपञ्च भी शाश्वत नहीं है। कोई भी वस्तु सदा नहीं रहती। जैसे पंख निकल आनेपर पक्षीको घाँसलेसे और नदीके पार चले जानेपर पथिकको नावसे कोई प्रयोजन नहीं रहता, उसी प्रकार ज्ञान प्राप्त हो जानेपर अभिमान उत्पन्न करनेवाले लोकसे क्या प्रयोजन रह जाता है। समदर्शी मुनि इसी प्रकार अपने मार्गका शीघ्र निश्चय करके असङ्गभावसे विचरे। जैसे अनेक जलपात्रोंमें एक ही चन्द्रमा प्रतिबिम्बित होता है और जैसे काष्ठसमूहमें एक अग्नि व्याप्त है, उसी प्रकार एक ही साक्षात् भगवान् परमात्मा सर्वत्र विद्यमान है। जैसे महान् आकाश घट और मठके बाहर तथा भीतर भी अलिप्तभावसे विद्यमान है, उसी प्रकार परमात्मा अपने ही द्वारा उद्भावित देहधारियोंके बाहर-भीतर निर्लिप्तरूपसे विराजमान है। जो भगवान् श्रीकृष्णका शान्तचित्त, ज्ञाननिष्ठ एवं वैराग्यवान् भक्त है, उसे गुण उसी प्रकार नहीं छूते, जैसे जल कमलदलको स्पर्श नहीं करता। ज्ञानी पुरुष सदा आनन्दमग्न हो बालककी भाँति विचरता है। वह अपने शरीरकी ओर उसी प्रकार दृष्टि नहीं रखता, जैसे मदिरा पीकर मतवाला हुआ मनुष्य अपने पहिने हुए वस्त्रकी सँभाल नहीं रखता ॥ ३१-४१ ॥

राजन् ! जैसे सूर्योदय होनेपर घरकी वस्तु दिखायी देने लगती है, उसी प्रकार अज्ञानको दूर करके ज्ञानवान्पु रुष ब्रह्मतत्त्वका साक्षात्कार कर लेता है। जैसे पृथक् पृथक् द्वारवाली इन्द्रियोंसे एक ही विषय अनेक गुणोंका आश्रय प्रतीत होता है, उसी प्रकार एक ही ब्रह्म उसके प्रतिपादक शास्त्रमार्गोंसे अनेक-सा जान पड़ता है। नरेश्वर! इस ब्रह्मको कोई परमपद कहते हैं, कोई वैष्णवधाम बताते हैं, कोई व्यापक वैकुण्ठ, कोई शान्त, कोई परम कैवल्य तथा कोई अविनाशी परम धाम कहते हैं। किन्हींके मतमें वह अक्षरपद है, कोई उसे पराकाष्ठा कहते हैं, कोई प्रकृतिसे परे गोलोकधाम बताते हैं और कोई पुराणवेत्ता उसको विशद निकुञ्ज कहते हैं। इस लोकमें रहनेवाला मानव उस पदको ज्ञान, वैराग्य और भक्तिसे प्राप्त करता है, दूसरे किसी साधनसे नहीं। परमपुरुष कैवल्यनाथ परात्पर पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रके पदको मनुष्य उपर्युक्त साधनों द्वारा उन्हींकी कृपासे प्राप्त करता है और उसे प्राप्त करके भक्त पुरुष कभी वहाँसे लौटता नहीं ॥ ४२-४७ ॥(Vishwajitkhand chapter 11 to 15)

श्रीनारदजी कहते हैं- राजन् ! यह भागवत ज्ञान सुनकर श्रीकृष्णकुमार प्रद्युम्नने दोनों हाथ जोड़, भक्ति- भावसे नमस्कार करके महामुनि अगस्त्यजीका पूजन किया ॥ ४८ ॥

इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें विश्वजित्खण्डके अन्तर्गत नारद बहुलाश्व-संवादमें ‘उशीनर, विदर्भ, कुन्त, दरद आदि देशोंपर विजयके प्रसङ्गमें अगस्त्य और प्रद्युम्नकी ज्ञानचर्चा’ नामक बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥१२॥

यहां एक क्लिक में पढ़ें ~ चार वेद की संपूर्ण जानकारी

तेरहवाँ अध्याय

शाल्व आदि देशों तथा द्विविद वानरपर प्रद्युम्नकी विजय; लङ्कासे
विभीषणका आना और उन्हें भेंट समर्पित करना

श्रीनारदजी कहते हैं- राजन् ! कृतमाला और ताम्रपर्णी नदियोंमें स्नान करके श्रीयादवेश्वर प्रद्युम्न अपने यादव सैनिकोंके साथ राजपुरको गये। राजपुर- का स्वामी राजा शाल्व था। वह मेरे मुँहसे यादवोंका आगमन सुनकर शीघ्र ही वानरराज द्विविदके पास गया। वीर द्विविद मित्रकी सहायता करनेके लिये उद्यत हो यादवोंके प्रति मनमें अत्यन्त क्रोध लेकर प्रद्युम्नकी सेनाका सामना करनेके लिये गया। वह अपने पैरोंकी धमकसे पृथ्वीको हिला देता था। द्विविदने अपने नखों और दाँतोंद्वारा पताका और ध्वजपट्टोंको चीर डाला। वे ध्वज कश्मीरी शालोंसे आवृत, मुद्राङ्कित तथा स्वर्णभूषित थे। उसने रथोंको ऊपर उछाल दिया, हाथियोंपर वेगपूर्वक चढ़कर घोड़ोंको भगाया और वह वानरोचित किलकारियोंके साथ भौंहें नचाकर सबको भयभीत करने लगा। इस प्रकार कोलाहल मच जानेपर धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ प्रद्युम्र बारंबार धनुषकी टंकार करते हुए रथपर आरूढ़ हो उसके पास आ गये। मदमत्त द्विविद उस रथके आस- पास उछलने लगा और अपनी पूँछसे घोड़ोंसहित रथ, ध्वज और छत्रको कम्पित करने लगा। प्रद्युम्रने अपने धनुषकी कोटिसे उसका गला पकड़कर खींचा। तब अत्यन्त कुपित हुए उस वानरने उनके ऊपर मुक्केसे प्रहार किया। तदनन्तर प्रद्युम्नने विधिपूर्वक धनुषपर प्रत्यश्चा चढ़ायी और कानतक खींचकर छोड़े गये एक बाणसे द्विविदको बींध दिया। राजेन्द्र ! उस बाणने आकाशमें आधे पहरतक द्विविदको घुमाकर सौ योजन दूर लङ्कामें गिरा दिया। वहाँ दो घड़ीतक राक्षसोंके साथ उसका युद्ध हुआ और उसने राक्षसोंको मार गिराया। राजन् ! इधर यदुकुल-तिलक प्रद्युम्नने दुन्दुभिनाद कराते हुए विजय प्राप्त करके शाल्वसे भेंट ली और दक्षिण-मथुरा (मदुर) का दर्शन करके वे त्रिकूट पर्वतपर जा चढ़े। उधर वानरराज द्विविद त्रिकूटसे मैनाकके शिखरपर गया, मैनाकसे सिंहल जाकर वह पुनः भारतवर्षमें आया। धीरे-धीरे वानरेन्द्र द्विविद हिमालयपर गया और हिमालयके शिखरसे प्राग्ज्योतिषपुरको जा पहुँचा ॥ १-१४॥(Vishwajitkhand chapter 11 to 15)

यादवेश्वर प्रद्युम्न मल्लारदेशके अधिपति रामकृष्णपर विजय पाकर महाक्षेत्र सेतुबन्ध तीर्थमें गये। महावीर श्रीकृष्णकुमार प्रद्युम्न शतयोजनविस्तृत मकरालय समुद्रका दर्शन करके उसके तटपर जाकर ठहर गये। वहाँ साम्ब आदि भाइयों और अक्रूर आदि अपने यादवोंको बुलाकर योगेश्वरेश्वर प्रद्युम्नने सभामें उद्धवसे कहा ॥ १५-१७॥

प्रद्युम्न बोले- भोजकुलतिलक मन्त्रिवर उद्धवजी ! परम तेजस्वी लङ्कापति विभीषण इस द्वीप- का राजा तथा राक्षस-समूहोंका सरदार है। यदि वह शीघ्र भेंट न दे तो बताइये, यहाँ हमें क्या करना चाहिये ? ॥ १८ ॥

उद्धवजीने कहा- प्रभो! आप देवाधिदेव पुरुषोत्तमोत्तम हैं। आप ही परमात्मा श्री कृष्णचन्द्र हैं, तथापि आप साधारण लोगोंकी भाँति मुझसे पूछते हैं! बड़े-बड़े योगीश्वर भी आपकी मायाका पार नहीं पाते। भूमन् ! ब्रह्मा आदि देवता भी सदा पराजित होकर जिनके उत्तम अनुशासनका भार सदा अपने मस्तक- पर ढोते हैं, वही साक्षात् पुरुषोत्तम आप हैं। मैं तो आपका दासानुदास हूँ, फिर मैं आपको क्या सलाह दूँगा ? ॥ १९-२० ॥

श्रीनारदजी कहते हैं- मैथिलेश्वर! उद्धवके यों कहनेपर श्रीहरिस्वरूप भगवान् प्रद्युम्नने एक ताड़पत्र लेकर उसपर अपना संदेश लिखा- ‘राक्षसराज ! तुम भोजराज उग्रसेनके लिये भेंट दो; यदि बलाभिमानवश तुम मेरी बात नहीं सुनोगे तो मैं धनुषसे छोड़े गये बाणोंद्वारा समुद्रपर सेतु बाँधकर सैन्यसमूहके साथ लङ्कापर चढ़ाई करूँगा।’ यह लिखकर प्रचण्ड-पराक्रमी प्रद्युम्रने कोदण्ड हाथमें लिया और अपने पत्रको बाणमें लगाकर उस बाणको कानतक खींचा और छोड़ दिया। उस धनुषकी प्रत्यञ्चाको खींचनेसे बिजलीकी गड़गड़ाहटके समान टंकारध्वनि प्रकट हुई। उस नादसे पातालों तथा सातों लोकोंसहित सारा ब्रह्माण्ड गूंज उठा। प्रद्युम्नके धनुषसे छूटा हुआ बाण सम्पूर्ण दिशाओंको प्रकाशित करता हुआ विद्युत् के समान तड़तड़ाकर विभीषणकी सभामें गिरा। उसके गिरते ही सब राक्षस चकित-से होकर उठकर खड़े हो गये। उन दुष्टोंने बड़े वेगसे अपने कवच और शस्त्र ग्रहण कर लिये। महाबली राक्षसराज विभीषण बाणसे पत्रको खींचकर पढ़ गये। सभामें वह पत्र पढ़कर उन्हें बड़ा विस्मय हुआ। उसी समय उस राजसभामें शुक्राचार्य आ पहुँचे। विभीषणने पाद्य आदि उपचारोंद्वारा उनका पूजन किया और हाथ जोड़, प्रणाम करके कहा ॥ २१-२८ ॥(Vishwajitkhand chapter 11 to 15)

विभीषण बोले- भगवन् । यह किसका बाण है? भूतलपर भोजराज कौन हैं और उनका बल क्या है, यह मुझे बताइये; क्योंकि आप साक्षात् दिव्य- दृष्टिवाले हैं ॥ २९ ॥

श्रीशुक्रने कहा- राक्षसराज! इस विषयमें पुराणवेत्ता विद्वान् इस प्राचीन इतिहासका वर्णन किया करते हैं, जिसके सुननेमात्रसे पापोंका नाश हो जाता है। पूर्वकालमें ब्रह्माजीके पुत्र सनक आदि चार मुनि तीनों लोकोंमें भ्रमण करते हुए भगवान् विष्णुके दिव्यलोकमें गये। वे नंगे बालकके रूपमें थे। उन्हें शिशु जानकर जय और विजय नामक द्वारपालोंने, जो अन्तःपुरमें पहरेदार थे, बेंतकी छड़ीसे रोक दिया। वे श्रीहरिके दर्शनकी लालसा लेकर आये थे। रोके जानेपर उन्हें क्रोध हुआ और उन्होंने उन दोनों द्वारपालोंको शाप देते हुए कहा-‘तुम दोनों दुष्ट हो; इसलिये असुर हो जाओ। तीन जन्मोंके पश्चात् शुद्ध होओगे।’ इस प्रकार शाप प्राप्त करके वे दोनों अपने भवनसे गिरे और भूमण्डलमें आकर दैत्यों तथा दानवोंसे पूजित दिति- पुत्र हुए। उनमेंसे ज्येष्ठका नाम हिरण्यकशिपु था और छोटेका नाम हिरण्याक्ष। प्रलयके जलसे पृथ्वीका उद्धार करनेके लिये भगवान् श्रीहरि यज्ञ वाराहके रूपमें प्रकट हुए। उन्होंने महाबली हिरण्याक्ष नामक दैत्यको मुक्केसे मार डाला और साक्षात् चण्ड-पराक्रमी नृसिंह होकर कयाधू कुमार प्रह्लादकी सहायता करते हुए हिरण्यकशिपुका उदर विदीर्ण कर दिया। वे ही दोनों भाई फिर केशिनीके गर्भसे विश्रवाके पुत्र होकर उत्पन्न हुए, जो सम्पूर्ण लोकोंको एक मात्र ताप देनेवाले रावण और कुम्भकरण कहलाये। श्रीरामचन्द्रजीके सायकोंसे घायल होकर वे दोनों युद्धभूमिमें सदा के लिये सो गये। वे महान् वेगशाली राक्षसराज रावण और कुम्भकर्ण तुम्हारी आँखोंके सामने मारे गये थे। अब उनका तीसरा जन्म हुआ। इस जन्ममें वे क्षत्रिय कुलमें उत्पन्न हुए हैं। उनका नाम शिशुपाल और दन्तवक्र है। वे इस युगमें भी बड़े बलवान् हैं। उन दोनोंके वधके लिये साक्षात् परिपूर्णतम भगवान् असंख्य-ब्रह्माण्डपति परात्पर गोलोकनाथ श्रीकृष्ण यदुकुलमें अवतीर्ण हुए हैं। वे यादवेन्द्र बहुत-सी लीलाएँ करते हुए इस समय द्वारकामें विराजमान हैं। युधिष्ठिरके महायज्ञमें शाल्वके साथ होनेवाले युद्धमें माधव शिशुपाल और दन्तवक्रका वध कर डालेंगे, इसमें संशय नहीं है। उन्हींके पुत्र शम्बरसूदन प्रद्युम्न दिग्विजयके लिये निकले हैं। वे जम्बूद्वीपके समस्त राजाओंपर विजय प्राप्त करेंगे। उन सबके जीत लिये जानेपर यदुकुल-तिलक भोजराज उग्रसेन द्वारकामें राजसूय यज्ञ करेंगे। उन्हींके धनुषसे बलपूर्वक छूटा हुआ यह प्रचण्ड वेगशाली बाण यहाँ आया है। इसपर उनके नामका चिह्न है। यह विद्युत्की गड़गड़ाहटसे भी अधिक आवाज करनेवाला है। राक्षसराज ! यह बाण समस्त दिङ्मण्डलको उद्भासित करता हुआ यहाँतक आ पहुँचा है॥ ३०-४५॥

नारदजी कहते हैं- नरेश्वर! राक्षसोंके सरदार श्रीरामभक्त विभीषणने यह जानकर कि भगवान् श्रीकृष्ण साक्षात् श्रीरामचन्द्रजी ही हैं, भेंट-सामग्री लेकर प्रद्युम्नकी सेनाके पास गये। उस समय शीघ्र ही आकाशसे उतरकर मेघके समान श्यामकान्तिसे प्रकाशित होनेवाले विशालकाय विजयदर्शी विभीषण श्रीकृष्णकुमार प्रद्युम्नकी परिक्रमा करके हाथ जोड़ उनके सामने खड़े हो गये ॥ ४६-४७ ॥

विभीषण बोले- प्रभो! आप साक्षात् भगवान् वासुदेव तथा सबके स्रष्टा हैं, आपको नमस्कार है। आप ही संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध हैं; आपको प्रणाम है। मत्स्य, कूर्म और वराहावतार धारण करनेवाले आप परमेश्वरको बारंबार नमस्कार है। श्रीरामचन्द्रको नमस्कार है। भृगुकुलभूषण परशु- रामजीको बारंबार नमस्कार है। आप भगवान् वामनको नमस्कार है। आप ही साक्षात् नरसिंह हैं, आपको बारंबार नमस्कार है। आप शुद्ध बुद्धदेवको नमस्कार है। सबकी पीड़ा हर लेनेवाले कल्किरूप आप भगवान को मेरा नमस्कार है ॥४८-५० ॥(Vishwajitkhand chapter 11 to 15)

श्रीनारदजी कहते हैं- राजन् ! यों कहकर दूसरोंको मान देनेवाले विभीषणने श्रीहरिके पुत्र प्रद्युम्नका बड़े भक्तिभावसे सोलह उपचारों द्वारा पूजन किया। उस समय उनकी वाणी गद्गद हो रही थी। फिर परम संतुष्ट हुए प्रद्युम्नने उनको वैराग्यपूर्ण ज्ञान, शान्तिदायिनी भक्ति तथा प्रेमलक्षणा परानुरक्ति प्रदान की। साथ ही ब्रह्माजीकी दी हुई परम दिव्य पद्मरागनिर्मित मस्तकमणि तथा पुलस्त्यपौत्र कुबेरद्वारा पूर्वकालमें दी हुई रत्नोंकी दीप्तिमती माला प्रदान की। फिर चन्द्रमाकी दी हुई चन्द्रकान्तमणि तथा उत्तम पीताम्बर परम प्रभु प्रद्युम्नने उन्हें अर्पित किये। तदनन्तर महाबली राक्षसराज विभीषण प्रद्युम्न को प्रणाम करके उन्हें भेंट देकर अपने पार्षदगणोंके साथ लङ्कापुरीको लौट गये ॥ ५१-५५ ॥

इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें विश्वजित्खण्डके अन्तर्गत नारद बहुलाश्व-संवादमें ‘शाल्व, मल्लार एवं लङ्कापर विजय’ नामक तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३॥

यहां एक क्लिक में पढ़ें ~ उपनिषद की जानकारी

चौदहवाँ अध्याय

सह्यपर्वतके निकट दत्तात्रेयका दर्शन और उपदेश तथा महेन्द्रपर्वतपर
परशुरामजीके द्वारा यादवसेनाका सत्कार और
श्रेष्ठ भक्तके स्वरूपका निरूपण

श्रीनारदजी कहते हैं- राजन् ! तदनन्तर श्रीकृष्णकुमार कामदेवस्वरूप प्रद्युम्न ऋषभ पर्वतका दर्शन करके श्रीरङ्गक्षेत्रमें गये। फिर काञ्जीपुरी एवं सरिताओंमें श्रेष्ठ प्राचीका दर्शन करके, काबेरी नदीके पार जाकर सहागिरिके समीपवर्ती देशोंमें गये। भगवान्प्र द्युम्न हरिके साथ यादवोंकी विशाल सेना भी थी। मैथिलेश्वर ! उन्होंने देखा कि उनके सैन्य शिविरकी ओर एक खुले केशवाला दिगम्बर अवधूत भागता चला आ रहा है।उसका शरीर हृष्ट-पुष्ट है और उसपर धूल पड़ी हुई है। बालक उसके पीछे दौड़ रहे हैं और इधर-उधरसे तालियाँ पीट रहे हैं, कोलाहल करते हैं और हँसते हैं। उस अवधूतको देखकर बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ श्रीकृष्णकुमार प्रद्युम्न उद्धवसे बोले ॥ १-४३ ॥

प्रद्युम्नने कहा- यह हृष्ट-पुष्ट शरीरवाला कौन पुरुष बालक, उन्मत्त और पिशाचकी भाँति भागा आ रहा है? यह लोगोंसे तिरस्कृत होनेपर भी हँसता है और अत्यन्त आनन्दित होता है॥ ५-६ ॥

उद्धव बोले- ये परमहंस अवधूत श्रीहरिके कलावतार साक्षात् महामुनि दत्तात्रेय हैं, जो सदा आनन्दमय देखे जाते हैं। इन्हींके प्रसादसे पूर्ववर्ती उत्कृष्ट नरेश सहस्त्रार्जुन आदि तथा यदु एवं प्रह्लाद आदिने परम सिद्धि प्राप्त की है॥ ७-८ ॥

श्रीनारदजी कहते हैं- राजन् ! यह सुनकर यदु- कुल-तिलक प्रद्युम्नने मुनिकी पूजा और वन्दना करके दिव्य आसनपर बिठाकर उनसे प्रश्न किया ॥ ९॥

प्रद्युम्न बोले- भगवन् ! मेरे हृदयमें एक संदेह है, प्रभो! उसका नाश कीजिये। जगत् का स्वरूप क्या है, ब्रह्मके मार्ग कौन हैं तथा तत्त्व क्या है? यह सब ठीक-ठीक बताइये ॥ १० ॥(Vishwajitkhand chapter 11 to 15)

दत्तात्रेयने कहा- जबतक अन्धकारके कारण वस्तु दिखायी नहीं देती, तभीतक उल्का या मशालकी आवश्यकता होती है। जब महानन्द वशमें हो जाय, तव उल्काका क्या प्रयोजन है। साधो! जगत् तभीतक टिका रहता है, जबतक तत्त्वका ज्ञान नहीं होता। परब्रह्म परमात्माके ज्ञात या प्राप्त हो जानेपर जगत् का क्या प्रयोजन है। जैसे मुखका प्रतिबिम्ब दर्पणमें दिखायी देता है, परंतु वास्तविक शरीर उससे भिन्न है, उसी प्रकार प्रधान अर्थात् प्रकृतिमें प्रतिविम्बित चैतन्य जीव है, परंतु ज्ञानके आलोकमें वह परात्पर परमात्मा सिद्ध होता है। जैसे सूर्योदय होनेपर सारी वस्तुएँ नेत्रसे दिखायी देती हैं, उसी प्रकार ज्ञानोदय होनेपर ब्रह्मतत्त्वका साक्षात्कार होता है। फिर जीव कहीं नहीं दृष्टिगोचर होता है॥ ११-१४॥

नारदजी कहते हैं- राजन् ! इस प्रकार उपदेश सुनकर यादवराज प्रद्युम्रने उनको नमस्कार किया और सेनाके साथ वे द्रविड़ देशमें वैकुण्ठाचल (वेङ्कटाचल) के पास गये। द्रविड़ देशके स्वामी धर्मतत्त्वज्ञ राजर्षि सत्यवाक् ने बड़ी भक्तिसे प्रद्युम्नका आदर सत्कार किया। फिर श्रीशैलका दर्शन करके वहाँके अद्भुत शिवालय तथा स्कन्दस्वामीका दर्शन प्राप्तकर वे पम्पा सरोवरपर गये। तदनन्तर श्रीद्वारका नाथ प्रद्युम्न गोदावरी और भीमरथी आदि भगवत् तीर्थोंका दर्शन करते हुए महेन्द्राचलपर गये। उस पर्वतपर क्षत्रियोंका अन्त करनेवाले भृगुवंशी परशुरामजी विराजमान थे। उन्हें नमस्कार और उनकी परिक्रमा करके श्रीकृष्णनन्दन वहाँ खड़े हो गये। राजेन्द्र ! परशुरामजीने उन्हें आशीर्वाद देकर यादवोंकी चतुरङ्गिणी सेनाका योगशक्तिसे सत्कार किया। दाल, भात, चटनी, दहीमें भिगोयी हुई भाजीकी पकौड़ियाँ, सिखरन, अवलेह (सिरका या अचार), पालकका साग, इक्षुभिक्षिका (राब और चीनीका बना हुआ भोज्य पदार्थ-विशेष), शक्करके मेलसे बना हुआ त्रिकोणाकार मिष्टान्न (गुझिया, समोसा आदि), बड़ा, मधुशीर्षक (मधुपर्क या घेवर आदि मिष्टान-विशेष), फेणिका (फेनी), उपरिष्ट (पूड़ी या पूआ आदि), छिद्रयुक्त शतपत्र (एक प्रकारको मिठाई), चक्राभचिह्निका (चक्राकार चिह्नवाली मिठाई, इमिरती आदि), सुधाकुण्डलिका (जलेबी), घृतपूर (घीकी बनी हुई पूड़ी), वायुपूर (मालपुआ), चन्द्रकला, दधिस्थूली (दहीमें भीगकर फूली हुई बड़ी), कपूरसे – वासित खाँडकी बनी मिठाई, गोधूमपरिखा (खाजा), इनके साथ सुन्दर-सुन्दर फल, उत्तम दधि, मोदक (लड्डू आदि), शाक-सौधान (विविध शाकोंके समुदाय), मण्ड (दूधकी मलाई या झाग), खीर, दही, गायका घी, ताजा मक्खन, मण्डूरी (सागका रसा), कुम्हड़ा, पापड़, शक्तिका (शक्तिवर्धक पेय, द्राक्षासव आदि), लस्सी, सुवीराम्ल (खट्टी काँजी), सुधारस (शहद या मीठा शर्बत), उत्तमोत्तम फल, मिश्री, नाना प्रकारके फल, मोहनभोग, (हलुआ), नमकीन पदार्थ, कसैले, मीठे, तीते, कड़वे और खट्टे अनेक प्रकारके भोज्य पदार्थ- इन सबको छप्पन भोग कहा गया है। भृगुकुल-भूषण परशुरामजीने अपने योगबलसे इन सब पदार्थोंक पर्वत- जैसे ढेर लगा दिये। सारी सेना भोजन कर चुकी, तब भी वहाँ वे खाद्य पदार्थोंके पर्वत हाथभर भी छोटे नहीं हुए। परशुरामजीका यह वैभव देखकर सब लोग अत्यन्त आश्चर्यचकित हो गये। राजन् ! यादवों सहित श्रीकृष्णकुमार प्रद्युम्नने उस समय परशुरामजीको नमस्कार करके सबके सामने इस प्रकार पूछा ॥ १५-३० ॥(Vishwajitkhand chapter 11 to 15)

प्रद्युम्न बोले- भगवन् ! आपने हम सब लोगोंको अत्यन्त उत्तम भोजन प्रदान किया। प्रभो! सारी समृद्धियाँ और सिद्धियाँ आपके चरणोंमें लोटती हैं। अब मैं यह जानना चाहता हूँ कि समस्त हरिभक्तोंमें श्रीहरिका प्रिय भक्त कौन है? विप्रेन्द्र ! यह मुझे बताइये; क्योंकि आप परावरवेत्ताओंमें सबसे श्रेष्ठ हैं॥ ३१-३२ ॥

परशुरामजीने कहा- प्रभो! आप क्या नहीं जानते, तो भी साधारण लोगोंकी भाँति पूछते हैं। लोगोंको शिक्षा देनेके लिये ही आप इस तरह सत्सङ्ग करते हुए भूतलपर विचरते हैं। जो अकिंचन है जिसके पास कोई संग्रह-परिग्रह नहीं है, जो केवल श्रीहरिके चरणारविन्दों के परागपर ही लुब्ध है, श्रीहरिकी सुन्दर कथाके श्रवणकीर्तनमें ही तत्पर रहता है तथा जिसका चित्त भगवान् के रूपसिन्धुकी लहरों में ही डूबा रहता है, वही श्रीकृष्णचन्द्र का प्रिय भक्त कहा गया है। परमेश्वर! जिस महापुरुषने अपने मन और इन्द्रियोंको वशमें कर रखा है, जो समस्त जंगम प्राणियोंके प्रति स्नेह एवं दयाका भाव रखता है, जो शान्त, सहनशील, अत्यन्त कारुणिक, सबका सुहृद एवं सत्पुरुष है, वही भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रका प्रिय भक्त कहा गया है। वह अपने चरणोंकी धूलिसे सम्पूर्ण जगत्को पवित्र करता है। जो निरन्तर परमेश्वर श्रीहरिके चरणोंकी धूलिका आश्रय ले, सम्पूर्ण ब्रह्म- पद, इन्द्रपद, चक्रवर्ती सम्राट् के पद, रसातलके आधिपत्य, योगसिद्धि और मोक्षकी भी कभी इच्छा नहीं करता, वही भगवान् का श्रेष्ठ भक्त है। जो अकिंचन हैं, जिनको अपने किये हुए कर्मोंके फलसे विरक्ति है तथा जो श्रीहरिकी चरणरजमें ही आसक्त हैं, वे महामुनि भगवदीय भक्तजन ही भगवान् के उस परमपदका सेवन करते हैं; अन्य लोग उस नैरपेक्ष्य सुखका अनुभव नहीं कर पाते। भगवान् पुरुषोत्तमको अपने भक्तसे बढ़कर प्रिय कोई नहीं जान पड़ता। न शिव, न ब्रह्मा, न लक्ष्मी और न रोहिणी नन्दन बलराम- जी ही उन्हें भक्तसे अधिक प्रिय हैं। भक्तोंने उनके मनको बाँध रखा है, अतः सकल लोकजनोंके चूड़ामणि भगवान् श्रीकृष्ण सदा भक्तोंके पीछे-पीछे चलते हैं। अपने भक्तजनोंके पीछे चलते हुए भगवान् परमात्मा श्रीकृष्ण उनके प्रति अपनी रुचि-अपना अनुराग सूचित करते हैं और समस्त लोकोंको पवित्र करते हैं। इसीलिये भगवान् मुकुन्द अतिशय भजन करनेवाले लोगोंको मोक्ष तो दे देते हैं, परंतु उत्तम भक्तियोग कदापि नहीं देते ॥ ३३-३९ ॥(Vishwajitkhand chapter 11 to 15)

श्रीनारदजी कहते हैं- राजन् ! यह उपदेश सुन- कर यादवेन्द्र प्रद्युम्नने श्रीभार्गव कुलभूषण परशुरामजी- को नमस्कार किया और वहाँसे पूर्व दिशामें विद्यमान गङ्गासागर-संगमकी ओर प्रस्थान किया ॥ ४० ॥

इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें विश्वजित्खण्डके अन्तर्गत नारद बहुलाश्व-संवादमें ‘द्रविड़ देशपर विजय’ नामक चौदहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १४॥

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पंद्रहवाँ अध्याय

उड्डीश-डामर देशके राजा, वङ्गदेशके अधिपति वीरधन्वा तथा
असमके नरेश पुण्ड्रपर यादव-सेनाकी विजय

श्रीनारदजी कहते हैं- राजन् ! दिग्विजयके बहाने भूभार-हरण करनेवाले साक्षात् भगवान् प्रद्युम्न अङ्गदेशको गये। अङ्गदेशका स्वामी केवल अन्तःपुर- का अधिपति होकर वनमें विहार करता था। वहाँ यादवोंने उसे जा पकड़ा, तब उसने महात्मा प्रद्युम्नको पर्याप्त भेंट दी ॥१-२॥

उड्डीश-डामर (उड़ीसा) देशके राजा महाबली बृहद्वाहुने प्रद्युम्नको भेंट नहीं दी। वह अपने बलके अभिमानसे मत्त रहता था। प्रद्युम्रने जाम्बवती-कुमार वीरवर साम्बको उसे वशमें करनेके लिये भेजा। साम्ब सूर्यतुल्य तेजस्वी रथपर आरूढ़ हो, धनुष हाथमें ले अकेले ही गये। नरेश्वर! उन्होंने बाण-समूहोंसे डामर नगरको उसी प्रकार आच्छादित कर दिया, जैसे मेघ तुषारराशिसे किसी पर्वतको चारों ओरसे ढक देता है। इस प्रकार धर्षित एवं पराजित होकर डामराधीशने तत्काल हाथ जोड़ लिये और महात्मा प्रद्युम्नको नमस्कार करके भेंट अर्पित की ॥ ३-६ ॥

तत्पश्चात् वङ्गदेशके अधिपति मदमत्त एवं वीर राजा वीरधन्वा एक अक्षौहिणी सेनाके साथ युद्धके लिये यादव-सेनाके सम्मुख आये। वे बड़े बलवान् थे। यादवोंकी ओरसे श्रीहरिके पुत्र चन्द्रभानुने प्रद्युम्नके देखते-देखते वीरधन्वाकी उस सेनाको बाणोंद्वारा उसी प्रकार विदीर्ण कर दिया, जैसे कोई कटु वचनोंद्वारा मित्रताका भेदन कर दे। उनके बाणोंसे विदीर्ण हुए हाथियोंके मस्तकसे चमकते हुए मोती भूमिपर इस प्रकार गिरने लगे, मानो रातमें आकाशसे तारे बिखर रहे हों अनेक रथी वीर धराशायी हो गये। हाथी-घोड़े और पैदल सैनिक उनके बाणोंसे मस्तक कट जानेके कारण कुम्हड़ेके टुकड़ों-जैसे इधर-उधर गिरे दिखायी देते थे। क्षणभरमें वीरधन्वाकी सेना रक्तकी नदीके रूपमें परिणत हो गयी, जो मनस्वी वीरोंका हर्ष बढ़ाती और डरपोकोंको भयभीत करती थी ॥ ७-११॥(Vishwajitkhand chapter 11 to 15)

कटे हुए मस्तक और धड़ किरीट, कुण्डल, केयूर, कंगन और अस्त्र-शस्त्रोंसहित दौड़ रहे थे। उनके कारण वहाँकी भूमि महामारी-सी प्रतीत होती थी। कूष्माण्ड, उन्माद, वेताल, भैरव तथा ब्रह्मराक्षस बड़े वेगसे आकर शंकरजीके गलेकी मुण्डमाला बनानेके लिये वहाँपर गिरे हुए मस्तकोंको उठा लेते थे। इस तरह जब सारी सेना मार गिरायी गयी, तब वीरधन्वा सामने आये, उन्होंने तुरंत ही वज्र-सरीखी गदासे चन्द्रभानुपर चोट की। उस गदाके भारी प्रहारसे श्रीकृष्णकुमार चन्द्रभानु विचलित नहीं हुए; उन्होंने गदा लेकर तत्काल वीरधन्वाकी छातीपर दे मारी। उस गदाके प्रहारसे पीड़ित एवं मूच्छित हो मुँहसे रक्त वमन करते हुए वीरधन्वा कटे हुए वृक्षकी भाँति भूतलपर गिर पड़े। दो घड़ीमें उनको फिर चेतना हुई, तब उन वङ्गदेशके नरेशने महात्मा प्रद्युम्रकी शरण ली ॥ १२-१७॥

राजन् ! जब भेंट देकर वीरधन्वा अपने नगरको चले गये, तब अमित-पराक्रमी प्रद्युम्न ब्रह्मपुत्र नद पार करके असम देशमें गये। वहाँके राजा बिम्बको पकड़- कर यादवेश्वर प्रद्युम्रने भेंट ली और यादवोंके साथ कामरूप देशमें गये। कामरूप देशके राजा पुण्ड्र इन्द्रजालकी विद्या (जादू) में बड़े निपुण थे। वे अपनी सेनाके साथ प्रद्युम्नके सामने युद्धके लिये निकले। उस समय असमियों और यादवोंमें घोर युद्ध हुआ। बाण, कुठार, परिष, शूल, खड्ग, ऋष्टि तथा शक्तियोंसे प्रहार किया गया। मैथिलेश्वर ! तदनन्तर राजा पुण्ड्रने पिशाच, नाग तथा राक्षसोंकी माया प्रकट की; फिर तो सब ओर गुह्यक, गन्धर्व तथा कच्चे मांस चबानेवाले पिशाच रणभूमिमें दौड़ने तथा बारंबार कोटि-कोटि अङ्गारोंकी वृष्टि करने लगे। एक ही क्षणमें यादवोंकी सेनापर मुँहसे विष वमन करते और फुंकारते हुए सर्प टूट पड़े। गधेपर बैठे हुए टेढ़े-मेढ़े दाँत और लपलपाती हुई जीभवाले भयंकर राक्षस युद्धमें मनुष्योंको चबाते तथा भागते दिखायी देने लगे। सिंहके समान मुखवाले यक्ष तथा अश्वमुख किंनर हाथोंमें शूल लिये ‘मारो-काटो’ कहते हुए इधर-उधर विचरने लगे। क्षणभरमें सारा आकाश मेघोंकी घटासे आच्छादित हो गया। राजन् ! वायुके वेगसे उड़ी हुई धूलके कारण सब ओर अन्धकार छा गया। भोज, वृष्णि, अन्धक, मधु, शूरसेन तथा दशार्ह वंशके योद्धा उस महायुद्धमें भयभीत हो गये। यदुश्रेष्ठ! वीरोंने अपने अस्त्र-शस्त्र नीचे डाल दिये ॥ १८-२८ ॥(Vishwajitkhand chapter 11 to 15)

मैथिल ! तब इस भयके निवारणका उपाय जानने- वाले श्रीकृष्णकुमार प्रद्युम्नने पिताके दिये हुए धनुषको हाथमें लेकर बाणोंद्वारा सात्त्विक महाविद्याका प्रयोग किया। फिर जैसे सूर्य अपनी किरणोंसे कुहासे तथा बादलोंको छिन्न-भिन्न कर डालते हैं, उसी प्रकार प्रद्युम्नने वाणर्णोद्वारा पिशाचों, नागों, यक्षों, राक्षसों तथा गन्धर्वोके घने अन्धकारको नष्ट कर दिया। जैसे हवा कमलको उड़ाकर पृथ्वीपर फेंक देती है, उसी प्रकार प्रद्युम्नने बाणोंद्वारा रथ और वाहनसहित शत्रु राजा पुण्डूको दो घड़ीतक आकाशमें घुमाकर रणभूमिमें पटक दिया। राजाकी मूर्च्छा दूर होनेपर वे पराजित हो प्रद्युम्नकी शरणमें गये और तत्काल भेंटके रूपमें एक लाख घोड़े और दस हजार हाथी देकर उन्होंने श्री कृष्ण कुमार को प्रणाम किया। वहाँसे अपनी सेनाद्वारा शोणनद और विपाशा (व्यास) नदी पार करते हुए यदुकुलनन्दन धनुर्धर वीर प्रद्युम्न केकय देशमें आ पहुँचे। केकय देशके राजा महाबली धृतकेतु वसुदेवकी बहिन साक्षात् श्रुतकीर्तिके महान् पति थे। उन्होंने यादवोंसहित प्रद्युम्रका बड़े भक्ति भावसे पूजन किया। राजन् ! वे श्रीकृष्णके प्रभावको जानते थे ॥ २९-३५ ॥

इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें विश्वजितखण्डके अन्तर्गत नारद बहुलाश्व-संवादमें ‘केकय देशपर विजय’ नामक पंद्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५ ॥

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