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Garga Samhita Vishwajitkhand Chapter 46 to 50

Garga Samhita
Garga Samhita Vishwajitkhand Chapter 46 to 50

॥ श्रीहरिः ॥

ॐ दामोदर हृषीकेश वासुदेव नमोऽस्तु ते

श्रीराधाकृष्णाभ्यां नमः

Garga Samhita Vishwajitkhand Chapter 46 to 50 |
श्री गर्ग संहिता के विश्वजीतखण्ड अध्याय 46 से 50 तक

श्री गर्ग संहिता में विश्वजीतखण्ड (Vishwajitkhand Chapter 46 to 50) के छियालीसवाँ अध्याय में यादवों और गन्धर्वोका युद्ध, बलभद्रजीका प्राकट्य, उनके द्वारा गन्धर्वसेनाका संहार, गन्धर्वराजकी पराजय, वसन्तमालती नगरी का हलद्वारा कर्षण; गन्धर्वराजका भेंट लेकर शरणमें आना और उनपर बलरामजी की कृपा वर्णन है। सैंतालीसवाँ अध्याय में यादव सेना के साथ शक्रसखका युद्ध और उसकी पराजय वर्णन कहा गया है। अड़तालीसवाँ अध्याय में शक्रसखका प्रद्युम्नको भेंट अर्पण, प्रद्युम्नका लीलावतीपुरीके स्वयंवरमें सुन्दरीको प्राप्त करना तथा इलावृतवर्षसे लौटकर भारत एवं द्वारका पुरी में आना कहा है। उनचासवाँ अध्याय राजसूय यज्ञमें ऋषियों, ब्राह्मणों, राजाओं, तीर्थों, क्षेत्रों, देवगणों तथा सुहृद्-सम्बन्धियोंका शुभागमन और पचासवाँ अध्याय में राजसूय यज्ञका मङ्गलमय उत्सव; देवताओं, ब्राह्मणों तथा अतिथियोंका दान-मानसे सत्कार करने का वर्णन कहा गया है।

यहां पढ़ें ~ गर्ग संहिता गोलोक खंड पहले अध्याय से पांचवा अध्याय तक

छियालीसवाँ अध्याय

यादवों और गन्धर्वोका युद्ध, बलभद्रजीका प्राकट्य, उनके द्वारा गन्धर्वसेनाका संहार,
गन्धर्वराजकी पराजय, वसन्तमालती नगरीका हलद्वारा कर्षण; गन्धर्वराजका
भेंट लेकर शरणमें आना और उनपर बलरामजीकी कृपा

नारदजी कहते हैं- राजन् ! भगवान् श्रीकृष्णके द्वारकापुरीको चले जानेपर प्रद्युम्न अपने सैनिकोंके साथ कामदुधनदके समीप गये। वहाँ गन्धवोंकी मनोहारिणी हेमरत्नमयी वसन्तमालती नामकी नगरी है, जिसका विस्तार सौ योजनका है। लवङ्ग-लताओंके समूह, इलायची, केसर, जायफल, जावित्री, श्रीखण्ड चन्दन और पारिजातके वृक्ष उस पुरीकी शोभा बढ़ाते थे। मतवाले भ्रमरोंके गुञ्जारवसे निनादित, विचित्र पक्षियोंके कलरवसे मुखरित तथा गन्धर्वोसे सुशोभित वह नगरी नागोंसे युक्त भोगवतीपुरीके समान शोभा पाती थी ॥१-४॥

वहीं पतंग नामसे प्रसिद्ध महावली गन्धर्वराज राज्य करते थे, जो बड़े पुण्यात्मा थे और जिनका बल-पौरुष देवराज इन्द्रके समान था। उन्होंने सुना कि दिग्विजयके लिये निकले हुए प्रद्युम्न आ रहे हैं, तब उन गन्धर्वराजने उद्भट गन्धर्वोसे युक्त होकर युद्ध करनेका निश्चय किया। रथ, घोड़े, हाथी और पैदल दस करोड़ गन्धर्वोंके साथ राजा पतंग प्रद्युम्रके सामने युद्धके लिये आये। गन्धर्वों और यादवोंमें बड़ा भयंकर युद्ध हुआ। भालों, गदाओं, परिघों, मुद्ररों, तोमरों तथा ऋष्टियोंकी मार होने लगी। बाणोंसे अन्धकार फैल जानेपर अतिरथी बलवान् वीर पतंग धनुषको टंकारते हुए आगे बढ़े और मेघके समान गर्जना करने लगे। बलदेवजीके बलवान् अनुज गदने गदा लेकर गन्धवाँकी सेनाको वैसे ही धराशायी करना आरम्भ किया, जैसे देवराज इन्द्र वज्रसे पर्वतोंको ढहा देते हैं॥५-१०॥

गदकी गदाके प्रहारसे कितने ही गन्धर्व युद्धभूमिमें गिर गये, उनके रथ चूर-चूर हो गये और समस्त हाथियोंके कुम्भस्थल फट गये। कितने ही घुड़सवार वीर भी युद्धके मुहानेपर प्राणशून्य होकर पड़ गये। भुजाएँ कट जानेसे कितने ही गन्धर्व उत्तानमुख और औंधेमुख पड़े दिखायी देते थे। क्षणमात्रमें गन्धवाँकी सेनामें खूनकी नदी बह चली। प्रमथगण भगवान् रुद्रकी मुण्डमाला बनानेके लिये युद्धभूमिमें नरमुण्डोंका संग्रह करने लगे। सिंहपर चढ़ी हुई भद्रकाली सैकड़ों डाकिनियोंके साथ युद्धभूमिमें आकर खप्परमें खून भर-भरकर पीती दिखायी देने लगीं ॥ ११-१४॥

इस तरह गदके द्वारा किये गये युद्धमें जब गन्धर्वगण पलायन करने लगे, तब गन्धर्वोके राजा पतंग एक लाख गजसेनाके साथ वहाँ आ पहुँचे। मिथिलेश्वर । पतंगने आते ही गदकी छातीमें गदा मारी। गदने भी अपनी गदासे पतंगके वक्षपर बलपूर्वक चोट पहुँचायी। उन दोनोंमें दो घड़ीतक गदायुद्ध चलता रहा। उनकी दोनों गदाएँ आगकी चिनगारियाँ बिखेरती हुई चूर-चूर हो गयीं। रणदुर्मद पतंगने लाख भारकी भारी गदा लेकर तुरंत ही गदके मस्तकपर मारी। गदाके उस प्रहारसे गद क्षणभरके लिये मूच्छित हो गये। इस प्रकार महामना पतंगने जब घोर युद्ध किया, तब उसी समय द्वारकापुरीसे एक तेजपुञ्ज आ पहुँचा ॥ १५-१९॥

समस्त यादवोंने करोड़ों सूर्योके तुल्य तेजस्वी उस तेजपुञ्जको देखा। उसके भीतरसे गोरे अङ्गवाले महाबली भक्तवत्सल भगवान् बलदेव सहसा प्रकट हो गये। नीलाम्बरधारी बलशाली बलरामने कुपित हो गन्धर्वोकी सारी सेनाको हलसे खींचकर मुसलसे मारना आरम्भ किया। बहुत से रथों, हाथियों और घोड़ोंको उन्होंने कालके गालमें पहुँचा दिया। शस्त्र- धारियोंमें श्रेष्ठ वीर सब के सब चूर-चूर हुए पत्थरोंकी भाँति एक साथ ही भूतलपर बिखर गये। पतंग भी रथहीन हो भारी भयके कारण वहाँसे वसन्तमालती पुरीमें चले गये और पुनः यादवोंसे युद्ध करनेके लिये सेनाका व्यूह बनाने लगे ॥ २०-२४॥

नरेश्वर! सौ योजन विस्तृत गन्धर्वोकी सम्पूर्ण वसन्तमालती नामकी महापुरीको हलसे उपाटकर कुपित हुए बलदेवजीने कामदुघनदमें गिरानेके लिये खींचा। उस नगरीके भवन धड़ाधड़ धराशायी होने लगे। फिर तो तत्काल वहाँ हाहाकार मच गया। अपनी नगरीको टेढ़ी या करवट लेती हुई नौकाकी भाँति डगमगाती देख पतंग सर्वथा पराभूत हो, तत्काल समस्त गन्धवाँके साथ हाथ जोड़, भेंट-सामग्रीके साथ वहाँ आ पहुँचा ॥ २५-२७ ॥(Vishwajitkhand Chapter 46 to 50)

उसने दो लाख ऐसे विमान बलदेवजीको भेंट किये, जो सुवर्णके समान कान्तिवाले तथा विविध रत्नोंसे जटित थे। मोतीकी बंदनवारें उनकी शोभा बढ़ाती थीं। विश्वकर्माने उन विमानोंको दस-दस योजन विस्तृत बनाया था। वे सभी विमान इच्छानुसार चलनेवाले तथा कोटि-कोटि कलशों एवं पताकाओंसे सुशोभित थे। उनसे सहस्रों सूर्योके समान प्रकाश फैल रहा था। चार लाख गौएँ, दस अरब घोड़े, इलाइची, लवङ्ग, केसर और जायफलोंके साथ दिव्य अमृतफलोंसे भरे करोड़ों पात्र उपहारके रूपमें लाकर उन्होंने दिये। फिर वे नमस्कार करके तिरस्कृतकी भौति हाथ जोड़कर बलरामजीसे बोले, उन्हें बलभद्रजीके प्रभावका पूरा परिचय मिल गया था ॥२८-३१॥

पतंगने कहा- राम! महापराक्रमी बलराम ! मैंने आपके पराक्रमको पहले नहीं जाना था, इसलिये अपराध कर बैठा। जिनके एक फनपर सारा भूमण्डल तिलके समान दिखायी देता है, उनके सामने कौन ठहर सकता है। भगवन् । कामपाल ! देवाधिदेव ! आपको नमस्कार है। साक्षात् अनन्त एवं शेषस्वरूप आप बलरामको बारंबार प्रणाम है। अच्युत देव! आपकी जय हो, जय हो। परात्पर! साक्षात् अनन्त ! आपकी कीर्ति दिगन्ततक फैली हुई है। आप समस्त देवताओं, मुनीन्द्रों और फणीन्द्रोंसे श्रेष्ठ हैं। मुसलधारी! आप बलवान् हलधरको नमस्कार है* ॥ ३२-३४ ॥

नारदजी कहते हैं- राजन् ! पतंगके इस प्रकार स्तुति करनेपर महाबली बलभद्रजीका चित्त प्रसन्न हो गया। उन्होंने गन्धर्वको ‘अब तुम मत डरो’-यों कहकर अभयदान दिया। तदनन्तर यादवेश्वर बलदेव अपने चरणोंमें पड़े हुए प्रद्युम्रको सेनाके संचालक पदपर स्थापित करके, यादवोंसे प्रशंसित हो शीघ्र ही द्वारकापुरीको चले गये ॥ ३५-३६ ॥

इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें विश्वजित्खण्डके अन्तर्गत नारद बहुलाश्व संवादमें ‘वसन्तमालती
नगरीका कर्षण’ नामक छियालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४६ ॥

यहां एक क्लिक में पढ़िए ~ कालिदासकृत रघुवंशम् महाकाव्य प्रथमः सर्गः

सैंतालीसवाँ अध्याय

यादव सेना के साथ शक्रसखका युद्ध और उसकी पराजय

नारदजी कहते हैं- राजन् ! तदनन्तर महावीर प्रद्युम्न अपनी विजय-दुन्दुभि बजवाते हुए यादव- सैनिकोंके साथ मधुधारा नदीके तटपर गये। सुवर्ण- गिरिके किनारे कुबेरके सुन्दर वनमें, जो सुनहरे हंसों और काञ्चनी लतिकाओंसे सम्पन्न है, पहुँचे। मिथिलेश्वर ! हिमालयकी गुफाएँ देवताओंके लिये दुर्गका काम देती हैं। वहाँ दानवोंकी पहुँच नहीं हो पाती। वहाँ गङ्गातटवर्ती बेंतकी झाड़ियाँ छायी रहती हैं। कभी-कभी दानवोंसे डरकर स्वर्गसे भागे हुए आठों लोकपालोंकी निधियाँ वहाँ निवास करती हैं॥१-४॥ शक्रसख नामक देव-शिरोमणि उस प्रान्तके अधिपति हैं। प्रद्युम्नका आगमन सुनकर उन्होंने उनके साथ युद्ध करनेका विचार किया। प्रद्युम्नके भेजे हुए बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ साक्षात् उद्धव मार्गदर्शी लोगोंसे रास्ता पूछते हुए शक्रसखकी नगरीमें गये। सभामें पहुँचकर मन्त्रिप्रवर प्रभु उद्धवने राजा इन्द्रसखको नमस्कार करके प्रद्युम्रकी कही हुई बातें विस्तारके साथ कह सुनायीं ॥ ५-७ ॥

उद्धव बोले- यादवोंके इन्द्र, द्वारकापुरीके स्वामी राजाधिराज उग्रसेन जम्बूद्वीपके नरेशोंको जीतकर राजसूय यज्ञ करेंगे। उनके द्वारा दिग्विजयके लिये भेजे गये बलवान् रुक्मिणीनन्दन प्रद्युम्न अपने तेजसे भारत आदि वर्षोंको जीतकर आज ही इलावृतवर्षपर विजय पानेके लिये आये हैं। उन श्रीकृष्णकुमारका बल महान् है। यदि आप अपने कुलकी कुशल चाहते हों तो शीघ्र ही उन्हें भेंट दीजिये। सर्वज्ञोंमें श्रेष्ठ नरेश ! यदि आप भेंट नहीं देंगे तो आपके साथ युद्ध अनिवार्य होगा ॥८-१०३ ॥

शक्रसख बोले- दूत! सुनो। देवतालोग भी सदा मेरी पूजा करते हैं फिर मनुष्योंकी तो बात ही क्या है। मैं सिद्ध हूँ, महावीर हूँ और एक लाख हाथियोंके समान बलवान् हूँ। आठों लोकपालोंके आधिपत्यका रक्षक हूँ। कुबेरके समान कोशसे सम्पन्न तथा इन्द्रके समान उद्भट शक्तिशाली हूँ। उग्रसेनको ही मुझे उत्तम उपायन भेंट करना चाहिये। मैंने पहले कभी किसीको भेंट नहीं दी है, इसलिये मैं तुम्हारे यदुराजको भी भेंट नहीं दूंगा ॥ ११-१३॥

उद्धव बोले- यादवोंके तेजसे जैसे कुबेरको तिरस्कार प्राप्त हुआ है और उन्हें भेंट देनी पड़ी है; जैसे चैत्रदेशके बलवान् राजा शृङ्गारतिलकने भेंट दी है; हरिवर्षके राजा शुभाङ्ग, उत्तराखण्डके स्वामी गुणाकर, दैत्योंके सखा राक्षसराज लङ्कापति संवत्सर, केतुमाल और शकुनि आदि बड़े-बड़े असुरोंने जैसे भेंट दी है, राजन् ! उसी तरह उन्हींकी-सी दुर्दशामें पड़नेपर आप भी प्रद्युम्नको भेंट देंगे ॥ १४-१६ ॥

नारदजी कहते हैं- राजन् ! उद्धवकी उपर्युक्त बात सुनकर बलवान् शक्रसखने कुपित हो उद्भवको इस प्रकार उत्तर दिया- ‘भगवद्भक्त-शिरोमणे ! सुनो। जबतक मैं भेंट दूँ, तबतक तुम यहीं ठहरो। अन्यथा तुम जाने नहीं पाओगे। महामते। मेरी यह बात सत्य है, सत्य है॥ १७-१८ ॥

उद्धव बोले- हम मन्त्रियोंमें श्रेष्ठ और श्रेष्ठ ज्ञान प्रदान करनेवाले हैं। जो हमारी शिक्षा नहीं मानते, उनका मङ्गल नहीं होता ॥ १९ ॥(Vishwajitkhand Chapter 46 to 50)

नारदजी कहते हैं- राजन् ! इस प्रकार शक्रसखने उद्धवको वहाँ नजरबंद कर लिया। उद्धवके नहीं लौटनेसे यदुवंशी लोग चिन्तित हो गये। उन्हें देखे बिना उन सबके कई दिन बीत गये। तब मेरे मुखसे उद्धवजीके अवरोधका समाचार सुनकर भगवान् प्रद्युम्न हरि त्रिपुरासुरको जीतनेके लिये यात्रा करनेवाले महादेवजीके समान शक्रसखपर विजय पानेके लिये चले। उनके साथ समस्त यादव बन्धु और सारी सेना थी। प्रद्युम्नजी सुवर्णादिकी गुफाके द्वारपर जा पहुँचे। दुन्दुभियोंकी ध्वनिसे मिश्रित वीर योद्धाओंके कोदण्डोंकी टंकारों, घोड़ोंके हिनहिनाहटकी आवाजों तथा हाथियोंकी चिग्घाड़ोंसे दसों दिशाएँ गूंज उठीं। सैनिकोंके पैरोंसे उड़ी हुई धूल भी सब ओर व्याप्त हो गयी। शक्रसखकी सेना यादवोंसे युद्ध करने लगी। भयंकर युद्ध होने लगा, व्योममण्डल अस्त्र-शस्त्रोंसे आच्छादित हो गया। नृपेश्वर। यह सब देखकर मेरुपर्वतके निवासी समस्त देवता भयभीत हो उठे ॥ २०-२४॥

इसी समय क्रोधसे भरा और रथपर चढ़ा महाबली शक्रसख दस अक्षौहिणी सेनाके साथ आगे बढ़कर यादवोंके साथ युद्ध करने लगा। देवताओंका यादवोंके साथ तुमुल युद्ध छिड़ गया। राजन् । प्राकृत प्रलयके समय चारों समुद्रोंके टकरानेसे जैसी भीषण ध्वनि होती है, वैसा ही महान् कोलाहल वहाँ होने लगा। अस्त्र-शस्त्रोंसे वहाँ अन्धकार-सा छा गया। उस समय बलदेवके छोटे भाई रोहिणीनन्दन वीर सारण कवच धारण किये, हाथीपर बैठकर, बारंबार धनुषकी टंकार करते हुए सबसे आगे आ गये और अपने कोदण्डसे छूटे हुए बाणोंद्वारा शक्रसखकी सेनाका संहार करने लगे। सारणके बाणसमूहोंसे कितने ही वीरोंके दो-दो टुकड़े हो गये। युद्धभूमिमें बहुत-से रथ करवट लेकर वृक्षोंके समान धराशायी हो गये। उस समय जिनके कुम्भस्थल फट गये थे, उन हाथियोंके मोती इधर-उधर गिर रहे थे, बाणोंके अन्धकारमें वे बिखरे हुए मोती रात्रिकालमें तारागणोंके समान चमकने लगे। कटते हुए घोड़ों, पैदल योद्धाओं तथा हाथियोंसे वह समराङ्गण भूतगणोंसे युक्त भूतनाथके क्रीड़ास्थल महाश्मशान-सा जान पड़ता था। सारणका बल देखकर सब देवता भाग चले। उनके कोदण्ड छिन्न-भिन्न हो गये, कवच चारों ओरसे फट गये ॥ २५-३३ ॥

अपनी सेनाको पलायन करती देख बलवान् शक्रसख धनुष टंकारता हुआ वहाँ आ पहुँचा और बड़े जोरसे मेघकी भाँति गर्जना करने लगा। वीर धनुर्धर बलवान् शक्रसखने समराङ्गणमें अर्जुनको दस, साम्ब और अनिरुद्धको सौ-सौ, गदको दो सौ तथा सारणको एक सहस्त्र बाण मारे। उसके बाणोंकी मारसे रथी वीर दो-दो घड़ीतक उसी प्रकार चक्कर काटने लगे, जैसे कुम्हारके चाक घूम रहे हों। वह अद्भुत- सी बात हुई। उस तरह चक्कर काटनेसे घोड़े मृत्युके ग्रास बन गये, रथोंके बन्धन ढीले पड़ गये, रथियोंके मनमें खेद होने लगा और सारथि भी युद्धमें मूच्छित हो गये ॥ ३४-३८ ॥

राजेन्द्र ! उस समय जाम्बवतीनन्दन साम्ब दूसरे रथपर आरूढ़ हो बलपूर्वक धनुष टंकारते हुए आये। उन्होंने शक्रसखके धनुषको दस बाणोंसे छिन्न-भिन्न कर डाला। दो बाणोंसे उसके सारथिको और सौ बाणोंसे घोड़ोंको यमलोक भेजकर सहस्र बाणोंद्वारा उसके रथको भी चूर-चूर कर दिया। धनुषके कट जाने तथा घोड़ों और सारथिके मारे जानेपर रथहीन हुए शक्रसखने मतवाले गजराजपर आरूढ़ हो रोषपूर्वक शूल हाथमें ले लिया। बलवान् शक्रसखने उस शूलसे साम्बकी छातीमें चोट की। उस आघातसे साम्बका मन कुछ व्याकुल हो गया ॥ ३९-४२ ॥(Vishwajitkhand Chapter 46 to 50)

शक्रसखका हाथी एक-एक योजनका डग भरता था। उसका रंग कज्जलगिरिके समान काला था उसकी ऊँचाई चार योजनकी थी। उसकी दो दाँत आधे योजनतक आगे निकले हुए थे। वह बड़े जोरसे चिग्धाड़ता था। उसके चार-चार योजन विस्तृत तीन सूँड़ें थीं। उनके द्वारा वह साँकलोंको गिराता, हाथियों और वीरोंको कुचलता तथा रथों और घोड़ोंको इधर-उधर दाँतों और पैरोंसे विनष्ट करता हुआ काल, अन्तक और यमके समान दिखायी देता था। शत्रुसे प्रेरित उस महान् गजराजको आते और विचरते हुए देख यादव सैनिक भयभीत हो युद्धसे भाग चले ॥ ४३-४६ ॥

उस समय बलदेवजीके छोटे भाई बलवान् गदने गदा लेकर उस वज्र सरीखी गदासे उक्त गजराजके कुम्भस्थलपर बड़े जोरसे आघात किया। उस आघातसे उसका कुम्भस्थल फट गया और वह हाथी युद्धस्थलमें पंख कटे हुए पर्वतके समान ढह गया। वह अद्भुत-सी बात हुई ॥ ४७-४८ ॥

तदनन्तर शक्रसखने ज्यों ही रोषपूर्वक गदा उठानेकी चेष्टा की, त्यों ही गदने अपनी गदासे उसकी छातीमें चोट पहुँचायी। उस आघातसे वह हाथीसहित गिर पड़ा और मूच्छित हो गया। फिर उठकर उसने युद्धस्थलमें दोनों हाथोंसे गदा उठायी। गद और शक्रसख दोनों इस प्रकार परस्पर गदायुद्ध करने लगे, जैसे रङ्गशालामें दो मल्ल और जंगलमें दो हाथी लड़ रहे हों। तब बलदेवके छोटे भाई बलवान् गदने अपनी दोनों भुजाओंसे उस वीरको उठा लिया और बलपूर्वक उसे सौ योजन ऊपर उसके नगरमें फेंक दिया। उस समय यादव-सेनामें जय-जयकार होने लगी, विजय- की दुन्दुभियाँ बज उठीं और सब लोग बारंबार गदकी प्रशंसा करने लगे ॥ ४९-५३ ॥

इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें विश्वजित्खण्डके अन्तर्गत नारद बहुलाश्व-संवादमें ‘शक्रसखका
युद्ध’ नामक सैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४७ ॥

यहां एक क्लिक में पढ़ें ~ विनय पत्रिका हिंदी में

अड़तालीसवाँ अध्याय

शक्रसखका प्रद्युम्नको भेंट अर्पण, प्रद्युम्नका लीलावतीपुरीके स्वयंवरमें सुन्दरीको प्राप्त
करना तथा इलावृतवर्षसे लौटकर भारत एवं द्वारकापुरी में आना

श्रीनारदजी कहते हैं- राजन् ! अपने नगरमें गिरकर शक्रसख अत्यन्त मूच्छित हो गया। फिर उस मूर्च्छासे वह उठा। उठनेपर भी एक क्षणतक उसे बड़ी घबराहट रही ॥ १ ॥

तदनन्तर श्रीकृष्णकुमार प्रद्युम्रको परब्रह्म जानकर शक्रसख बड़ी उतावलीके साथ अपनी भेंट-सामग्री लेकर यादव-सेनाके समीप गया। ऐरावतकुलमें उत्पन्न हुए तीन सूँड़ और चार दाँतवाले श्वेत रंगके एक हजार मदवर्षी हाथी, सुवर्णगिरिपर उत्पन्न हुए दो योजन विस्तृत शरीरवाले तथा दिग्गजोंके समान उन्मत्त पर्वताकार एक करोड़ हाथी, जिनके मुख दिव्य थे और जिनकी गति भी दिव्य थी, करोड़ोंकी संख्यामें उपस्थित किये गये। राजन् ! इन सबके साथ सोनेके बने हुए उत्तम दिव्य रथ भी थे, जिनकी संख्या सौ अरब थी। दस हजार विमान भेंटके लिये लाये गये, जो दो-दो योजन विस्तारसे सुशोभित थे। दस लाख कामधेनु गौएँ और एक हजार पारिजात वृक्ष प्रस्तुत किये गये। तड़ागोंमें परिपुष्ट हुए सीपके मोती, जो यन्त्रपर चढ़ाकर चमकाये गये थे तथा चमेलीके इत्रसे आर्द्र, शिरीष- कुसुमोंसे सज्जित तथा दूधके फेनकी तरह सफेद करोड़ों शय्याएँ लायी गयीं, जिनपर सुन्दर तकिये भी रखे गये थे। हाथीके दाँतकी बनी हुई उनकी पाटियाँ रत्नोंसे जटित थीं और उनके पायोंमें भी सुवर्ण तथा रत्न जड़े गये थे। विचित्र वितान (चंदोवे) और दीवारोंपर लगाये जानेवाले वस्त्र करोड़ोंकी संख्यामें भेंट किये गये। छूनेमें कोमल एवं चितकबरे आसन तथा विश्वकर्माद्वारा रचित बड़े-बड़े तकिये दिये गये, जो मोतियोंके गुच्छों और सुवर्णरत्न आदिके द्वारा खचित थे। वे सब सहस्रोंकी संख्यामें थे। हजारों परदे, करोड़ों पालकियाँ, छत्र, चंवर और दिव्य सिंहासनोंके साथ करोड़ों व्यजन, जो राजलक्ष्मीके भूषण थे, प्रस्तुत किये गये। कोटि द्रोण-अमृत, सुधर्मा सभा, सर्वतोभद्र मण्डल, सहस्रदल कमल, हीरे, पन्ने और मोती दिये गये। कोटि भार गोमेद और नीलम दिये गये, सहस्त्रों भार सूर्यकान्त, चन्द्रकान्त और वैदूर्य मणियोंके थे। कोटि भार स्यमन्तक मणियोंके लाये गये थे। नरेश्वर ! पद्मराग मणिके भारोंकी संख्या एक अरब थी। जाम्बूनद सुवर्ण, हाटक सुवर्ण तथा सुवर्णगिरिसे प्राप्त सुवर्णोंके भी कोटि-कोटि भार प्रस्तुत किये गये ॥ २-१६ ॥(Vishwajitkhand Chapter 46 to 50)

मैथिलेश्वर! आठ लोकपालोंके आधिपत्यकी रक्षा करनेवाला शक्रसख अपना राज्य तथा देवताओंकी सम्पूर्ण निधियोंको भेंटके लिये लेकर उद्धवजीके साथ यादव-सेनाके पास गया और कुशलताके लिये वह अद्भुत भेंट अर्पित करके उसने प्रद्युम्नको हाथ जोड़कर प्रणाम किया। शम्बरशत्रु प्रद्युम्रने संतुष्ट होकर उसे रत्नमाला अर्पित की और उस राज्यपर उसीको पुनः स्थापित कर दिया। राजन् ! सत्पुरुषोंका ऐसा ही स्वभाव होता है॥ १७-१९ ॥

इस प्रकार जिसने प्रद्युम्रको भेंट दी थी, उस शक्रसखको जीतकर वे सेनासहित आगे गये। अब उनके सैनिकोंकी छावनी अरुणोदा नदीके तटपर पड़ी। महामूल्य रत्नोंसे जटित चंदोवे सौ योजनतक तन गये। वहाँ दिव्य पताकाएँ फहराने लगीं और वहाँकी भूमिपर विजय-ध्वजकी स्थापना हो गयी। उन ध्वजा-पताकाओंके कारण वह शिविरसमूह उत्ताल तरंगोंसे युक्त महासागरकी भाँति शोभा पाने लगा ॥ २०-२१॥

राजन् ! इसी समय आकाशसे ऐरावतपर चढ़े हुए देवराज इन्द्र सहसा सेनासहित वहाँ उतर आये। देवताओंकी दुन्दुभियाँ भी उनके साथ-साथ बजती आयीं। यह देख सम्पूर्ण यादव-वीरोंने बड़े वेगसे अपने अस्त्र-शस्त्र उठा लिये। पुनः देवराज इन्द्रको पहचानकर समस्त नरेश बड़े प्रसन्न हुए। उस समय इन्द्रने भरी सभामें प्रद्युम्नसे कहा- “महाबाहु नरेश ! तुम परावरवेत्ताओंमें श्रेष्ठ हो, अतः मेरी बात सुनो। सुवर्णगिरिके शिखरॉपर लीलावती नामसे प्रसिद्ध एक सुन्दर पुरी है। वहाँ विद्याधरोंके राजा सुकृति राज्य करते हैं। उनकी एक सुन्दरी नामवाली कन्या है, जो सौ चन्द्रमाओंके समान रूप लावण्यसे सुशोभित और परम सुन्दरी है। राजन् ! उसके स्वयंवरमें समस्त लोकपाल और देवता दिव्यरूप धारण करके आये हैं; किंतु वह राजकन्या कहती है कि ‘जिसको देखकर मैं मूच्छित हो जाऊँगी, वही मेरा पति होगा।’ यह बात कहकर वह सुन्दर वर पानेकी इच्छा रखती है। तुम उस उत्सवमें भी अपने समस्त भाइयोंके साथ सहसा चलो और देववृन्दसे मण्डित उस सुन्दर स्वयंवरको देखो” ॥ २२-२९ ॥

नारदजी कहते हैं- राजन् ! यह सुनकर भगवान् प्रद्युम्न अपने यदुवंशी भाइयोंसहित देवेन्द्रके साथ सहसा लीलावतीपुरीमें गये। जहाँ स्वयंवर हो रहा था, वहाँका प्राङ्गण बड़ा विशाल था। जड़े गये रत्नोंके कारण उसकी मनोहरता बढ़ गयी थी। उस स्थानपर चन्दन, अगर, कस्तूरी और केसरके द्रवका छिड़काव किया गया था। मोतीकी बंदनवारों, बहुमूल्य वितानों और जाम्बूनद सुवर्णके आसनोंसे वह स्वयंवर-भवन साक्षात् दूसरे इन्द्रलोक-सा शोभा पाता था ॥ ३०-३२॥(Vishwajitkhand Chapter 46 to 50)

नरेश्वर। प्रद्युम्न उस स्वयंवरमें गये और सिंह जैसे किसी पर्वतके शिखरपर बैठता है, उसी प्रकार सबके देखते-देखते एक दिव्य आसनपर विराजमान हुए। मैथिल ! वहाँ जितने प्रजापति, मुनि, देवता, रुद्रगण, मरुद्रण, आदित्यगण, वसुगण, अग्रि दोनों अश्विनी- कुमार, यम, वरुण, सोम, कुबेर, इन्द्र, सिद्ध, विद्याधर, गन्धर्व, किंनर तथा अन्यान्य सभी समागत एवं रत्नाभरणोंसे विभूषित देव थे, उन्होंने प्रद्युम्नको आया देख अपने विवाहकी आशा छोड़ दी ॥ ३३-३६ ॥

इसी समय सुन्दरी हाथमें रत्नमाला लिये अपने रूपलावण्यसे रति और रम्भाको भी तिरस्कृत करती हुई-सी निकली। वह वराङ्गी अङ्गना सरस्वती, लक्ष्मी तथा रूपवती शचीकी विडम्बना करती हुई-सी जान पड़ती थी। मैथिल ! जिसे देखकर सब ओर समस्त सभासद् मोहको प्राप्त हो गये, वह लक्ष्मीके समान राजकुमारी सुन्दरी सब लोगोंके सामने अपने लिये योग्य वरकी इस प्रकार खोज करने लगी, मानो चपला नूतन जलधरको ढूँढ़ रही हो ॥ ३७-३८ ॥

दिव्याम्बरधारी तथा प्रफुल्ल कमलदलके समान विशाल लोचनवाले नरलोकसुन्दर वीर प्रद्युम्नके पास पहुँचकर वह सुन्दरी विद्याधरी मूच्छित हो गयी। फिर थोड़ी ही देरमें उसे चेत हुआ। वह उठी और आनन्द- विभोर होकर प्रद्युम्नके गलेमें सुन्दर माला डालकर खड़ी रह गयी। मिथिलेश्वर! विद्याधरोंके राजा सुकृतिने अपनी पुत्री सुन्दरीको प्रद्युम्नके हाथमें दे दिया। सब ओर माङ्गलिक वाद्य वज उठे, किंतु इस वैवाहिक मङ्गलको देखकर देवतालोग सहन न कर सके। उन लोगोंने उस स्वयंवरको चारों ओरसे उसी प्रकार घेर लिया, जैसे प्रचण्ड मेघोंने सूर्यदेवको आच्छादित कर लिया हो। उन देवताओंको क्रोधके वशीभूत हो धनुष उठाये और युद्धके मदसे उद्धत हुए देख साक्षात् प्रद्युम्न हरिने भगवान् श्रीकृष्णके दिये हुए बाणसहित श्रेष्ठ धनुषको हाथमें लेकर यादवोंके साथ सिंहनाद किया। मिथिलेश्वर ! उनके धनुषसे छूटे हुए चमकीले बाणोंद्वारा देवताओंके अस्त्र-शस्त्र छिन्न-भिन्न हो गये, उनके कवचोंकी धज्जियाँ उड़ गयीं। जैसे सूर्यकी किरणोंसे कुहासेके बादल फट जाते हैं, उसी प्रकार वे देवता दसों दिशाओंमें भाग खड़े हुए ॥ ३९-४३ ॥

इस प्रकार साक्षात् भगवान् प्रद्युम्न स्वयंवर जीतकर और इलावृतखण्डपर विजय पाकर भारतवर्षको जानेके लिये उद्यत हुए। भाइयों, यादवों, सैनिकों तथा समस्त मन्त्रीजनोंके साथ विजय-दुन्दुभि बजवाते हुए वे भारत- खण्डमें आये। अनेक देशोंको देखते हुए जम्बूद्वीप विजयी बलवान् वीर श्रीकृष्णकुमार क्रमशः आनर्त- प्रदेशमें और द्वारकाके देशोंमें आये। प्रद्युम्नके द्वारा भेजे गये बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ साक्षात् उद्धवने राजसभामें पहुँचकर राजा उग्रसेनको तथा भगवान् श्रीकृष्णको प्रणाम किया। प्रत्येक वर्षमें क्या-क्या हुआ और जम्बूद्वीपपर किस तरह विजय मिली, वह सारा वृत्तान्त उद्धवजीने यथोचित रूपसे कह सुनाया ॥ ४४-४८ ॥

तब राजा उग्रसेन श्रीकृष्ण बलदेव एवं सम्पूर्ण वृद्धजनोंके साथ प्रद्युम्नको लानेके लिये निकले। गीतवाद्योंकी ध्वनि तथा वेद-मन्त्रोंके गम्भीर घोषके साथ मोतियों, खीलों और फूलोंकी वर्षापूर्वक मङ्गल- पाठ करते हुए लोग उनकी अगवानीके लिये आये। नरेश्वर! एक गजराजको आगे करके सोनेके कलश, गन्धर्व, अप्सराएँ, शङ्ख, दुन्दुभि, वेणु, गन्ध, अक्षत, सोनेके पात्र, फूल, धूप तथा जौके अङ्कुर साथ लिये राजा उग्रसेन प्रद्युम्रके सम्मुख आये ॥ ४९-५२॥(Vishwajitkhand Chapter 46 to 50)

मैथिल ! श्रीकृष्णकुमारने यादव बन्धुओंके साथ खड्ग ले जाकर महाराज उग्रसेनके सामने रख दिया और हाथ जोड़कर प्रणाम किया। मीन-केतन प्रद्युम्नने श्रीकृष्ण-बलरामको मस्तक झुकाकर समस्त वृद्धजनों- को प्रणाम करनेके अनन्तर शीघ्र जाकर श्रीगर्गाचार्यके चरणोंमें नमस्कार किया। राजा उग्रसेन भूरि-भूरि प्रशंसा करके, वैदिकमन्त्रों तथा ब्राह्मणोंके सहयोगसे विधिवत् पूजन करके, प्रद्युम्रको हाथीपर बिठाकर द्वारकापुरीमें गये। द्वारकामें सर्वत्र घर-घरमें मङ्गल उत्सव हुआ। नरेश्वर ! इस प्रकार मैंने तुम्हारी पूछी हुई सब बातें कहीं, अब और क्या सुनना चाहते हो ? ॥ ५३-५६ ॥

इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें विश्वजित्खण्डके अन्तर्गत नारद बहुलाश्व-संवादमें ‘प्रद्युम्नका
द्वारका-गमन’ नामक अड़तालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४८ ॥

यहां एक क्लिक में पढ़ें ~ श्री शनि स्तोत्र

उनचासवाँ अध्याय

राजसूय यज्ञमें ऋषियों, ब्राह्मणों, राजाओं, तीर्थों, क्षेत्रों, देवगणों
तथा सुहृद्-सम्बन्धियोंका शुभागमन

बहुलाश्वने पूछा- विप्रवर! आप परावर- वेत्ताओंमें श्रेष्ठ हैं; अतः मुझे यह बताइये कि राजा उग्रसेनने किस प्रकार राजसूय यज्ञका विधिपूर्वक अनुष्ठान किया ॥ १ ॥

नारदजीने कहा- राजन् ! तदनन्तर समस्त धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ राजा उग्रसेनने भगवान् श्रीकृष्णकी सहायतासे क्रतुराज राजसूयका सम्पादन किया। यदुकुलके आचार्य गर्गजीसे यत्नपूर्वक मुहूर्त पूछकर भाई-बन्धुओं तथा सुहदोंको निमन्त्रण दिया। अत्यन्त भक्ति-भावसे बुलाये जानेपर ऋषि, मुनि तथा ब्राह्मण- सब लोग अपने पुत्रों और शिष्योंके साथ द्वारकामें आये ॥ २-४ ॥(Vishwajitkhand Chapter 46 to 50)

राजन् ! साक्षात् वेदव्यास, शुकदेव, पराशर, मैत्रेय, पैल, सुमन्तु, दुर्वासा, वैशम्पायन, जैमिनि, भार्गव परशुराम, दत्तात्रेय, असित, अङ्गिरा, वामदेव, अत्रि, वसिष्ठ, कण्व, विश्वामित्र, शतानन्द, भारद्वाज, गौतम, कपिल, सनकादि, विभाण्ड, पतञ्जलि, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, प्राविपाक, मुनिश्रेष्ठ शाण्डिल्य तथा दूसरे दूसरे मुनि वहाँ शिष्योंसहित पधारे। ब्रह्मा, शिव, इन्द्र, देवगण, रुद्रगण, आदित्यगण, मरुद्रण, समस्त वसुगण, अग्नि, दोनों अश्विनीकुमार, यम, वरुण, सोम, कुबेर, गणेश, सिद्ध, विद्याधर, गन्धर्व तथा किंनर आदिका शुभागमन हुआ। गन्धर्व-सुन्दरियाँ, अप्सराएँ और समस्त विद्याधरियाँ वहाँ आयीं। वेताल, दानव, दैत्य, प्रह्लाद, बलि, भीषण राक्षसोंके साथ लङ्कापति विभीषण तथा समस्त वानरोंके साथ वायुनन्दन हनुमान् पधारे। ऋक्षों और दाढ़वाले वन्य पशुओंके साथ बलवान् ऋक्षराज जाम्बवान का आगमन हुआ। समस्त पक्षियोंके साथ बलवान् पक्षिराज गरुड आये। समस्त सर्पगणोंको साथ लिये बलवान् नागराज वासुकि पधारे। सम्पूर्ण कामधेनुओंके साथ गोरूपधारिणी पृथ्वीका आगमन हुआ। समस्त मूर्तिमान् पर्वतोंके साथ मेरु और हिमालय पधारे। गुल्मों, वृक्षों और लताओंके साथ प्रयागके वृक्षराज अक्षयवटका शुभागमन हुआ ॥ ५-१५ ॥

महानदियोंके साथ श्रीगङ्गा और यमुना नदी आर्यों। रत्नोंकी भेंटके साथ सातों समुद्र पधारे। ये सब-के-सब उग्रसेनके राजसूय यज्ञमें सहर्ष आये। सात स्वर, तीन ग्राम, नौ अरण्य, महीतलमें नौ ऊसर, विख्यात चौदह गुह्य, तीर्थराज प्रयाग, पुष्कर, बदरिकाश्रम, सिद्धाश्रम, कुण्डों और समस्त सरोवरोंसहित विनशन (कुरुक्षेत्र), समस्त उपवनोंके साथ दण्डक आदि वन-ये सब के सब समग्र विमल क्षेत्रोंके साथ वहाँ उपस्थित हुए ॥ १६-१९॥(Vishwajitkhand Chapter 46 to 50)

व्रजसे श्रीमान् गिरिराज गोवर्धन, वृन्दावन, दूसरे- दूसरे वन, सरोवर तथा कुण्ड भी पधारे। रानी कीर्तिदा और गोपियोंके साथ गोपिकेश्वरी यशोदा साक्षात् पधारों। अपने करोड़ों सखी-समूहोंके साथ शिबिकारुढ़ा श्रीराधाका भी शुभागमन हुआ। गोपियोंके सौ यूथ भी द्वारकामें सानन्द पधारे ॥ २०-२२॥

जहाँ आजकल गोपी-भूमि है, वहीं उन्हें ठहराया गया। उन्हींके अङ्गरागसे वहाँ गोपीचन्दन प्रकट हुआ। जिसके अङ्गमें गोपीचन्दन लग जाता है, वह मनुष्य नरसे नारायण हो जाता है ॥ २३ ॥

चारों वर्णोंके सभी लोग उस यज्ञमें उपस्थित हुए थे। प्रज्ञाचक्षु धृतराष्ट्र, कलिका अवतार साक्षात् दुर्योधन, शाल्व, भीष्म, कर्ण, कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव, दमघोष, वृद्धशर्मा, महाराज जयसेन, धृष्टकेतु, भीष्मक, कोसलराज नग्नजित्, बृहत्सेन तथा तुम्हारे पितामह, साक्षात् मिथिलेश्वर धृति तथा अन्य राजा, सुहृद्-सम्बन्धी, बन्धु बान्धव अपनी रानियों तथा पुत्र-पौत्रोंके साथ उस यज्ञमें पधारे थे ॥ २४-२८॥

इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें विश्वजित्खण्डके अन्तर्गत नारद बहुलाश्व-संवादमें
‘स्वजन-शुभागमन’ नामक उनचासवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४९॥

यहां एक क्लिक में पढ़ें- श्रीमद भागवत गीता का प्रथम अध्याय

पचासवाँ अध्याय

राजसूय यज्ञका मङ्गलमय उत्सव; देवताओं, ब्राह्मणों तथा
अतिथियोंका दान-मानसे सत्कार

नारदजी कहते हैं- राजन् ! अर्थसिद्धिके द्वारभूत पिण्डारक क्षेत्रमें, जो रैवतक पर्वत और समुद्रके बीचमें स्थित है, यज्ञका आरम्भ हुआ। उस यज्ञमें जो कुण्ड बना, उसका विस्तार पाँच योजनका था। ब्रह्मकुण्ड एक योजनका और पाँच कुण्ड दो कोसमें बनाये गये। वे सभी कुण्ड मेखला, गर्त, विस्तार और वेदियोंके साथ सुन्दर ढंगसे निर्मित हुए थे। वहाँका महान् यज्ञस्तम्भ एक हजार हाथ ऊँचा था। सुवर्णमय यज्ञमण्डपका विस्तार पाँच योजन था, जो चंदोवों और बंदनवारोंसे सुशोभित था। केलेके खंभे उसकी शोभा बढ़ाते थे ॥१-४॥

भोज, वृष्णि, अन्धक, मधु, शूरसेन तथा दशार्ह वंशके यादवोंसे घिरे हुए राजा उग्रसेन देवताओंसे युक्त इन्द्रकी भाँति उस यज्ञमण्डपमें शोभा पाते थे। जैसे परमात्मा अपनी विभूतियोंसे शोभा पाता है, उसी प्रकार परिपूर्णतम भगवान् यज्ञावतार श्रीकृष्ण उस यज्ञमें अपने पुत्रों और पौत्रोंसे सुशोभित होते थे ॥ ५-६ ॥(Vishwajitkhand Chapter 46 to 50)

महान् सम्भारका संचय करके, गर्गाचार्यको गुरु बनाकर यदुराज उग्रसेनने क्रतुश्रेष्ठ राजसूय यज्ञकी दीक्षा ली। मैथिल! उस यज्ञमें दस लाख होता, दस लाख दीक्षित अध्वर्यु और पाँच लाख उद्गाता थे। अग्निकुण्डमें हाथीकी सूँड़के सामन मोटी घृतकी धारा गिरायी जाती थी, जिसे खा-पीकर अग्निदेवता अजीर्ण- रोगके शिकार हो गये। उन दिनों तीनों लोकोंमें कोई भी जीव भूखे नहीं रह गये। सब देवता सोमपान करके अजीर्णके रोगी हो गये ॥ ७-१०॥

अपनी धर्मपत्नी रुचिमतीके साथ बलवान् यादव- राज उग्रसेनने पिण्डार तीर्थमें यज्ञका अवभृथ-स्नान किया। वे व्यास आदि मुनीश्वरोंके साथ वेद-मन्त्रोंके द्वारा विधिपूर्वक नहाये। जैसे दक्षिणासे यज्ञकी शोभा होती है, उसी तरह रानी रुचिमतीके साथ राजा उग्रसेनकी शोभा हुई। देवताओं तथा मनुष्योंकी दुन्दुभियाँ बजने लगीं और देवता उग्रसेनके ऊपर फूल बरसाने लगे। सोनेके हारसे विभूषित चौदह लाख हाथी उग्रसेनने दान किये। सौ अरब घोड़े उन्होंने यज्ञान्तमें दक्षिणाके रूपमें दिये। बहुमूल्य हारों और वस्त्रोंके साथ करोड़ों नवरत्न मुनिवर गर्गाचार्यको भेंट किये। साथ ही उन्हें घर-गृहस्थीके उपकरण भी अर्पित किये। महामनस्वी यादवेन्द्र राजा उग्रसेनने उस यज्ञमें एक हजार हाथी, दस हजार घोड़े और बीस भार सुवर्ण ब्रह्मा बने हुए ब्राह्मणको दिये। जैसे राजा मरुत्तके यज्ञमें ब्राह्मणलोग दक्षिणासे इतने संतुष्ट हुए थे कि अपने-अपने सुवर्णमय पात्र भी छोड़कर चल दिये थे, उसी प्रकार महाराज उग्रसेनके इस यज्ञमें भी ब्राह्मण संतुष्ट तथा हर्षोत्फुल्ल होकर अपने घर लौटे। अपने- अपने भागको पाकर संतुष्ट हुए सब देवता स्वर्गलोकको चले गये। वंदीजनोंको भी बहुत द्रव्य दिया गया, जिससे जय-जयकार करते हुए वे अपने घर गये। राक्षस, दैत्य, वानर, दाढ़वाले पशु तथा पक्षी भी संतुष्ट होकर गये। समस्त नाग भी संतुष्टचित्त होकर अपने- अपने घर पधारे। गौएँ, पर्वत, वृक्ष-समुदाय, नदियाँ, तीर्थ तथा समुद्र-सबको अपना-अपना भाग प्राप्त हुआ और वे सब संतुष्ट होकर अपने-अपने स्थानको पधारे। जो राजा आमन्त्रित किये गये थे, उन्हें भी बहुत भेंट देकर दान-मानके द्वारा उनकी पूजा की गयी और वे सब संतुष्ट होकर अपने-अपने घर गये। नन्द आदि मुख्य मुख्य गोपोंका पूजन स्वयं श्रीकृष्णने किया। वे सब लोग प्रेम और दानसे प्रसन्न हो व्रजको लौटे ॥११-२२॥(Vishwajitkhand Chapter 46 to 50)

राजन् ! इस प्रकार मैंने तुमसे राजसूय महायज्ञके मङ्गलमय उत्सवका वर्णन किया। जहाँ साक्षात् भगवान् श्रीकृष्ण हैं, वहाँ कौन-सा कार्य सफल नहीं होगा? जो मनुष्य सदा इस कथाको पढ़ते और सुनते हैं, उन्हें धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों पदार्थोंकी प्राप्ति होती है। भगवान् श्रीकृष्ण पूर्ण परेश, परमेश्वर और पुराणपुरुष हैं; वे तुमको पवित्र करें। जो मनुष्य उनकी इस विचित्र कथाको सुनते हैं, वे अपने कुलको पवित्र कर देते हैं। विदेहराज! परमेश्वर श्रीहरिने यज्ञके बहाने समस्त भूतलका भार उतार दिया। जो यदुकुलमें चतुर्व्यहरूप धारण करके प्रकट हुए, उन अनन्त-गुणशाली भुवनपालक परमेश्वरको नमस्कार है॥ २३-२७॥

इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें विश्वजित्खण्डके अन्तर्गत नारद बहुलाश्व संवादमें उग्रसेनके महान् अभ्युदयके
प्रसङ्गमें ‘राजसूय यज्ञोत्सवका वर्णन’ नामक पचासवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥५०॥

॥ विश्वजित्खण्ड सम्पूर्ण ॥

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