loader image

Garga Samhita Dwarkakhand Chapter 6 to 10

Garga Samhita
Garga Samhita Dwarkakhand Chapter 6 to 10

॥ श्रीहरिः ॥

ॐ दामोदर हृषीकेश वासुदेव नमोऽस्तु ते

श्रीगणेशाय नमः

Garga Samhita Dwarkakhand Chapter 6 to 10 |
श्री गर्ग संहिता के द्वारकाखण्ड अध्याय 6 से 10 तक

श्री गर्ग संहिता के द्वारकाखण्ड (Dwarkakhand Chapter 6 to 10) छठे अध्याय में श्री कृष्ण द्वारा रुक्मिणी का अपहरण तथा यादव वीरों के साथ युद्धमें विपक्षी राजाओं की पराजय वर्णन है। सातवें अध्याय में श्री कृष्ण के हाथों से रुक्मीकी पराजय तथा द्वारका में रुक्मिणी और श्रीकृष्ण का विवाह होने का कहा गया है। आठवाँ अध्याय में श्री कृष्ण का सोलह हजार एक सौ आठ रानियों के साथ विवाह और उनकी संतति का वर्णन; प्रद्युम्न का प्राकट्य तथा रति और रुक्म-पुत्री के साथ उनका विवाह का वर्णन है। नवाँ अध्याय में द्वारका पुरी के पृथ्वी पर आनेका कारण; राजा आनर्त की तपस्या और उनपर भगवान श्रीकृष्ण की कृपा और दसवाँ अध्याय में द्वारका पुरी, गोमती और चक्रतीर्थ का माहात्म्य; कुबेर के वैष्णव यज्ञ में दुर्वासामुनि द्वारा घण्टानाद और पार्श्वमौलि को शाप का वर्णन कहा गया है।

यहां पढ़ें ~ गर्ग संहिता गोलोक खंड पहले अध्याय से पांचवा अध्याय तक

छठा अध्याय

श्रीकृष्णद्वारा रुक्मिणीका अपहरण तथा यादव-वीरोंके साथ युद्धमें
विपक्षी राजाओंकी पराजय

श्रीनारदजी कहते हैं- राजन् ! इस प्रकार ब्राह्मणपत्नियोंके शुभाशीर्वादसे अभिनन्दित हो रुक्मिणीने पुनः बार-बार देवी तथा विप्र-वधुओंको प्रणाम किया ॥ १ ॥

तत्पश्चात् मौनव्रतका त्याग करके भीष्मकराजकुमारी सखी-सहेलियोंके साथ धीरे-धीरे गिरिजागृहसे बाहर निकली। उस समय करोड़ों चन्द्रमाओंके समान कान्तिमती कमललोचना रुक्मिणीको वीर योद्धाओंने अकस्मात् इस प्रकार देखा, मानो निर्धनोंको सहसा कोई उत्तम निधि मिल गयी हो। घुड़सवार, रथी, हाथीसवार और पैदल जो-जो रक्षक वहाँ आये थे, वे सब रुक्मिणीपर दृष्टि पड़ते ही मोहित हो गये। उसके मुस्कानयुक्त कटाक्ष कामदेवके धनुषसे छूटे हुए तीखे बाणोंके समान थे। उनसे आहत एवं पीड़ित हो समस्त सैनिक अपने अस्त्र त्यागकर पृथ्वीपर गिर पड़े ॥२-५॥

इसी समय घंटियों और मंजीरोंके नादसे मुखरित तथा वैकुण्ठस्थित नैः श्रेयस नामक वनमें उद्भुत अश्वोंसे जुते हुए, फहराती हुई ऊँची पताकासे अलंकृत तथा वायुके समान वेगशाली रथद्वारा दारुक सारथिसहित श्रीहरि अपनी सेनाकी टक्करसे उस रक्षक सेनामें दरार उत्पन्न करके तत्काल वहाँ उसी प्रकार घुस आये, जैसे वायु कमलवनमें बेरोक-टोक प्रविष्ट हो जाती है। शत्रुओंके देखते-देखते शीघ्र ही स्त्री-समुदायके पास पहुँचकर भगवान् श्रीकृष्णने भीष्मकनन्दिनी रुक्मिणीको अपने रथपर चढ़ाकर, जैसे गरुड़ देवताओंके सामनेसे सुधाका कलश उठा ले गये थे, उसी प्रकार उस राजकन्याका अपहरण कर लिया। राजन् ! उस समय वे शस्त्रोंमें उत्तम दिव्य र्शाङ्ग-धनुषको बारंबार टंकार रहे थे। तदनन्तर बड़े वेगसे अपनी सेनाके भीतर श्रीहरिके लौट आनेपर देवताओंकी दुन्दुभियाँ और यादवोंके नगारे एक साथ ही बज उठे। सिद्ध और सिद्धोंकी कन्याएँ तथा देवतालोग हर्षसे भरकर श्रीकृष्णके रथपर नन्दनवनके फूलोंकी वर्षा करने लगे। तब जय-जयकारकी ध्वनिके साथ बलरामसहित श्रीकृष्ण धीरे-धीरे वहाँसे जाने लगे-ठीक उसी प्रकार जैसे सिंह सियारोंके बीचसे अपना भाग लेकर मौजसे चला जाता है॥ ६-१२॥(Dwarkakhand Chapter 6 to 10)

रुक्मिणीका हरण हो जानेपर उस समय बड़ा भारी कोलाहल मचा। रक्षक सैनिक आपसमें ही शस्त्रोंके प्रहारपूर्वक युद्ध करने लगे। जरासंधके वशमें रहनेवाले समस्त मानी नृपश्रेष्ठ इस घटनासे प्राप्त हुए अपने पराभव और सुयशके नाशको नहीं सह सके। वे परस्पर कहने लगे’अहो! हमलोगोंको धिक्कार है। हम धनुर्धर राजाओंके यशको गोपोंने उसी प्रकार हर लिया, जैसे सियारोंने सिंहोंके यशका अपहरण किया हो। इससे बढ़कर हमारी पराजय और क्या हो सकती है?’ यों कहकर सब के सब क्रोधसे भर उठे और द्यूतक्रीड़ा एवं चौपड़ आदि खेलोंको छोड़कर, कवच और सेनासे सुसज्जित हो उन्होंने युद्धके लिये शस्त्र उठा लिये। क्रोधसे भरा हुआ पौण्ड्रक दो अक्षौहिणी सेनाके साथ, महावीर विदूरथ तीन अक्षौहिणी सेनाके साथ, अत्यन्त दारुण दन्तवक्र पाँच अक्षौहिणी सेनाके साथ, राजपुरका स्वामी राजा शाल्व तीन अक्षौहिणी सेनाके साथ तथा महाबली जरासंध दस अक्षौहिणी सेनाके साथ महामनस्वी यादवोंके समक्ष युद्धके लिये आ पहुँचे। चेदिराज शिशुपालके पक्षवाले अन्य सहस्रों योद्धा भी श्रीकृष्णके सामने धनुषको टंकारते हुए युद्धके लिये आ धमके ॥ १३-२० ॥

प्रलयकालके महासागरकी भाँति उस विशाल सेनाको देखकर यदुश्रेष्ठ योद्धा उसे पार करनेके लिये श्रीकृष्णके पास आ गये। श्रीकृष्ण ही उनके केवट और जहाज थे। देवता और दानवोंकी भाँति उन स्वकीय एवं परकीय सैनिकोंमें अत्यन्त अद्भुत तथा रोमाञ्चकारी तुमुल युद्ध होने लगा। उस संग्राममें रथी रथियोंके साथ, पैदल पैदलोंके साथ, हाथी- सवार हाथीसवारोंके साथ और घुड़सवार घुड़सवारोंके साथ जूझने लगे। शस्त्रोंकी वर्षासे अन्धकार-सा छा गया। उस समय रुक्मिणीको भयसे विह्वल हुई देख भगवान् श्रीकृष्णने अभय दान देते हुए कहा-‘डरो मत’ ॥ २१-२४ ॥(Dwarkakhand Chapter 6 to 10)

बलदेवजीके छोटे भाई वीरवर गद अपने महान् धनुषको कम्पित करते हुए शत्रुओंकी सेनामें उसी प्रकार घुस गये, जैसे वनमें दावानल। गदके बाणोंसे अङ्गोंके विदीर्ण हो जानेके कारण कितने ही रथी योद्धाओंके कवच कटकर छिन्न-भिन्न हो गये, घोड़े और सारथि मारे गये तथा वे स्वयं भी प्राणशून्य होकर पृथ्वीपर गिर पड़े। पैदल योद्धाओंके पैर कट गये। राजन् ! गदके बाणोंसे व्यथित हो शत्रुयोद्धा आँधीके उखाड़े हुए वृक्षोंकी भाँति धराशायी हो गये। नरेश्वर! घोड़ोंपर चढ़े हुए कितने ही वीर गदके बाणोंसे विदीर्ण हो समराङ्गणमें बृहतीफलकी भाँति घोड़ॉसहित गिर पड़े। इसी प्रकार गदके बाणोंसे कुम्भस्थल फट जानेके कारण बीच-बीचसे विदीर्ण हुए हाथी कुष्माण्डके टुकड़ोंकी भाँति पृथ्वीपर पड़े शोभा पा रहे थे ॥ २५-२९ ॥

तदनन्तर शत्रुओंकी सारी सेना भाग चली। यह देख गदा-युद्ध-विशारद महाबली शाल्वने गदके ऊपर अपनी गदासे आघात किया। गदाकी चोट खाकर गदा-युद्धके प्रभावको जाननेवाले धनुर्धर गद धनुषद्वारा युद्ध करना छोड़कर तत्काल मनसे अत्यन्त व्यथाका अनुभव करते हुए युद्धभूमिमें गिर पड़े। गिरकर भी वे सहसा उठ खड़े हुए और तत्काल बलदेवजीकी दी हुई गदाको गदने अपने हाथमें ले लिया। लाख भार लोहेकी बनी हुई वह भारी गदा कौमोदकीके समान सुदृढ़ थी। उसके द्वारा गदने राजा शाल्वपर उसी प्रकार चोट की, जैसे इन्द्रने वज्रद्वारा किसी पर्वतपर आघात किया हो। गदाके प्रहारसे व्यथित हो राजा शाल्व जब पृथ्वीपर गिर पड़ा, तब पौण्ड्रक, जरासंध, दन्तवक्र और विदूरथ-ये चारों वीर गदके प्रति रोषसे भरे हुए वहाँ आ पहुँचे। महावीर पौण्ड्रकने भी जैसे कोई कटु वचनोंसे मित्रताके सम्बन्धको नष्ट कर देता है, उसी प्रकार दस तीखे बाण मारकर गदके रथपर फहराती हुई पताकाको काट डाला ॥ ३०-३५३ ॥(Dwarkakhand Chapter 6 to 10)

राजेन्द्र ! तत्पश्चात् दन्तवक्रने गदाकी चोटसे गदके सुन्दर रथको भी इस तरह चूर-चूर कर डाला, मानो किसीने डंडेकी मारसे मिट्टीका सुन्दर घड़ा फोड़ डाला हो। विदेहराज! इसी प्रकार जरासंधने उस रथके घोड़े मार डाले और विदूरथने सारथिको तीखे बाणोंसे पृथ्वीपर मार गिराया। तब मुसल हाथमें ले बलवान् बलदेवजी बड़ी तीव्रगतिसे वहाँ आ पहुँचे और उन्होंने दन्तवक्रके विकराल एवं भयानक मुखपर बड़े जोरसे प्रहार किया। समराङ्गणमें युद्ध करते हुए दन्तवक्रके मुखमें मुसलकी चोट पड़नेपर उसके मुखमें जो एक टेढ़ा दाँत बच रहा था, वह भी भूमिपर गिर पड़ा। फिर तो रुक्मिणीसहित दैत्यनाशन श्रीहरि हँसने लगे। इसी समय रोषसे भरे हुए बलदेवजीने अपने मुसलसे शीघ्रतापूर्वक पौण्ड्रक, जरासंध तथा दुष्ट विदूरथको भी चोट पहुँचायी। ये तीनों ही वीर खूनसे लथपथ हो युद्धभूमिमें मूच्छित होकर गिर पड़े ॥ ३६-४१ ॥

इसके बाद वहाँ आयी हुई सारी सेनाको कुपित हुए महाबली बलदेवने हलसे खींचकर मुसलकी मारसे मौतके घाट उतार दिया। उस समराङ्गणमें दस योजन दूरतक हाथी, घोड़े और पैदल सैनिक पिस उठे, चूर-चूर हो गये और धरतीपर सदाके लिये सो गये। तब मरनेसे बचे हुए जरासंध आदि समस्त नरेश मैदान छोड़कर भाग गये और जिसकी उमंग नष्ट हो गयी थी तथा जो अत्यन्त हतोत्साह हो चला था, उस शिशुपालके पास जाकर बोले- ‘पुरुषसिंह ! तुम अपने मनकी इस ग्लानिको त्याग दो। एक विवाह तो क्या, इस भूतलपर तुम्हारे सौ विवाह हो जायेंगे। हमलोग आज ही द्वारकामें चलकर बलराम और श्रीकृष्णको बाँध लेंगे तथा समुद्रकी काञ्ची धारण करनेवाली इस पृथ्वीको यादवोंसे सूनी कर डालेंगे’ ॥ ४२-४६ ॥

इस प्रकार मित्रोंके प्रबोध देनेपर चेदिराज शिशुपाल चन्द्रिकापुरको चला गया और मरनेसे बचे हुए दूसरे समस्त नरेश भी अपने-अपने नगरको पधारे ॥ ४७ ॥

इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें द्वारकाखण्डके अन्तर्गत नारद बहुलाश्व-संवादमें ‘रुक्मिणी-हरण और यदुवंशियोंकी विजय’ नामक छठा अध्याय पूरा हुआ ॥ ६ ॥

यहां एक क्लिक में पढ़ें ~ गायत्री मंत्र का अर्थ हिंदी में

सातवाँ अध्याय

श्रीकृष्णके हाथोंसे रुक्मीकी पराजय तथा द्वारकामें रुक्मिणी और श्रीकृष्णका विवाह

श्रीनारदजी कहते हैं- रुक्मिणीके हरण और मित्रोंकी पराजयका वृत्तान्त सुनकर भीष्मकपुत्र रुक्मीने समस्त भूपालोंके सुनते हुए यह प्रतिज्ञा की ‘राजाओ! मैं आपलोगोंके सामने यह सच्ची प्रतिज्ञा करता हूँ कि युद्धमें श्रीकृष्णको मारकर रुक्मिणीको लौटाये बिना मैं कुण्डिनपुरमें प्रवेश नहीं करूँगा’ ॥१-२॥

यों कहकर उस महा उद्भट वीरने दिव्य कवच धारण किया, जो ठोस एवं श्यामवर्णका था। उसे देखकर ऐसा प्रतीत होता था, मानो वह नील मेघसे निर्मित हुआ हो। फिर उसने सिरपर सिन्धुदेशीय शिरस्त्राण (टोप) रखा; सौवीर देशका बना हुआ सुन्दर धनुष, लाट देशके दो तरकस, म्लेच्छ देशकी तलवार, कुटज देशकी ढाल, येठरकी महाशक्ति, गुजरातकी गदा, बंगालका परिघ और कोङ्कण देशका हस्तत्राण (दस्ताना) धारण करके अङ्गुलियोंमें गोधाके चर्मसे निर्मित अङ्गुलित्राण बाँध लिया और किरीट, रत्नमय कुण्डल तथा सोनेके बाजूबंदसे विभूषित हो रुक्मीने युद्ध करनेका निश्चय किया। फिर चञ्चल घोड़ोंसे युक्त जैत्ररथपर आरूढ़ हो, दो अक्षौहिणी सेना साथ लिये उसने श्रीकृष्णका पीछा किया। शत्रुओंकी सेनाको पुनः आती देख महाबली बलरामने यादवोंकी सेना साथ ले समराङ्गणमें उसका सामना किया। रुक्मी बार-बार धनुष टंकारता और कठोर वचन बोलता हुआ अतिरथी देवेश्वर श्रीकृष्णके पास जा पहुँचा और बोला- ‘अरे! खड़ा रह, खड़ा रह। यदि जीवित रहना चाहता है तो तुरंत मेरी बहिनको छोड़ दे। नहीं तो मैं सेनासहित तुझे इसी समय यमलोकको भेज दूँगा। तेरे कुलपर राजा ययातिका शाप लगा हुआ है और तू ग्वालोंकी जूठन खानेवाला है। जरासंधके भयसे भीत रहता है और कालयवनके आगेसे पीठ दिखाकर भाग चुका है’ ॥ ३-११ ॥(Dwarkakhand Chapter 6 to 10)

यों कहकर उसने अपने तरकससे एक बाण निकालकर धनुषपर चढ़ा दिया और उसे कानतक खींचकर श्रीकृष्णकी छातीको लक्ष्य करके चला दिया। उस बाणसे आहत होनेपर भी भगवान श्रीकृष्णने एक सायकसे उसके धनुषको टंकार करने- वाली प्रत्यञ्चा इस प्रकार काट दी, मानो गरुडने किसी सर्पिणीको छिन्न-भिन्न कर डाला हो। फिर रुक्मीने शीघ्र ही अपने धनुषपर टंकार-ध्वनि करनेवाली दूसरी स्वर्णभूषित प्रत्यञ्चा चढ़ा ली और दस बाणोंद्वारा रणभूमिमें श्रीहरिको घायल कर दिया। तब श्रीकृष्णने एक बाण मारकर रुक्मीके प्रत्यञ्चासहित धनुषको उसी क्षण वैसे ही काट दिया, जैसे ज्ञानके द्वारा त्रिगुणात्मक संसार-बन्धनको काट दिया जाता है। श्रीकृष्णने अपने अमोघ बाणद्वारा बीचसे ही उसके धनुषके दो टुकड़े कर दिये। फिर उन्होंने रुक्मीको सौ बाण मारकर युद्धमें क्षत-विक्षत कर दिया। धनुष कट जानेपर विदर्भराजकुमारने श्रीहरिके ऊपर चमचमाती हुई महाशक्ति उसी प्रकार चलायी, जैसे किसी मुनिने विज्ञानके लिये महाशक्तिका प्रयोग किया हो। गदाधारी भगवान् गदाग्रजने अपनी गदासे उस महाशक्तिपर प्रहार किया, जिससे उसके दो टुकड़े हो गये। उस खण्डित शक्तिने रुक्मीके ही सारथिको मार डाला। भगवान की वेगशालिनी कौमोदकी नामवाली भारी गदाने रुक्मीके रथके ऊपर पड़कर उसे घोड़ोंसहित उसी प्रकार चूर्ण कर दिया, जैसे वज्रके प्रहारसे कोई पर्वत चकनाचूर हो गया हो। तब भीष्मककुमार रुक्मीने भी श्रीहरिपर गदा चलायी, किंतु भगवान्ने उसे पुनः चक्र चलाकर चूर्ण कर दिया। सोनेके बाजूबंदसे विभूषित बलवान् रुक्मीने बंगालका परिघ हाथमें लेकर उसके द्वारा श्रीहरिके कंधेपर प्रहार किया और उस युद्ध-भूमिमें मेघके समान गर्जना करने लगा। परिघसे ताडित होनेपर भी पुष्पमालाके आघातको कुछ भी न गिननेवाले हाथीकी भाँति भगवान् अविचल रहे। उन्होंने उसी परिघसे समराङ्गणमें रुक्मीपर आघात किया। परिघकी चोट खाकर रुक्मी मन-ही-मन कुछ व्याकुल हो उठा। फिर उसने युद्धभूमिमें माधवकी भर्त्सना करते हुए ढाल और तलवार हाथमें ले ली। भगवान्ने भी अपने खड्गका प्रहार करके उसकी ढाल और तलवार काट दी। उस खड्गके अग्रभागसे रुक्मीका शिरस्त्राण और विशाल कवच कटकर गिर पड़े। लगे हाथ उसके दस्ताने भी काट दिये गये। अब उस युद्धमें रुक्मीके हाथमें केवल तलवारकी मुट्ठी रह गयी थी। उस दशामें अपने पास आये हुए रुक्मीको श्रीहरिने भुजदण्डोंसे पकड़कर पृथ्वीपर दे मारा और जैसे मृगके ऊपर सिंह सवार हो जाय, उसी प्रकार वे उसके ऊपर चढ़ गये तथा रोषपूर्वक तीखी धारवाले अपने नन्दक नामके खड्गको हाथमें ले लिया। श्रीकृष्णको अपने भाईके वधके लिये उद्यत देख रुक्मिणी भयसे विह्वल हो उठी और पतिके चरणोंमें गिरकर उस सती साध्वी राजकुमारीने करुणस्वरमें कहा ॥ १२-२७ ॥

श्रीरुक्मिणी बोली- अनन्त ! देवेश्वर ! जगत्रिवास! योगेश्वर ! आपकी शक्ति अचिन्त्य है। आप इस जगत के पालक हैं। अतः करुणासागर ! आपके द्वारा शालके समान विशाल भुजावाले मेरे भाईका वध होना उचित नहीं है॥ २८ ॥

श्रीनारदजी कहते हैं- राजन् ! डरके मारे विलाप करती हुई रुक्मिणीका मुँह दुःखके कारण सूख गया था। उसका कण्ठ रुँध गया। अपनी प्रिया सती रुक्मिणीकी ऐसी अवस्था देखकर श्रीहरि रुक्मीके वधसे विरत हो गये। फिर उसीके कमरबन्धसे बाँध- कर तीखी धारवाले खड्गसे श्रीहरिने रुक्मीके आधे मुखकी दाढ़ी-मूंछके बाल साफ कर दिये ॥ २९-३० ॥(Dwarkakhand Chapter 6 to 10)

इतने में ही दो अक्षौहिणी सेनाको परास्त करके सैनिकोंसहित बलरामजी वहाँ आ पहुँचे। उन्होंने देखा कि रुक्मी कुरूप और दीन अवस्थामें बँधा पड़ा है। फिर तो उनके हृदयमें दया आ गयी और उसका बन्धन खोलकर बलरामजीने श्रीहरिको फटकारते हुए कहा- ‘कृष्ण! तुमने यह अच्छा नहीं किया, यह लोकनिन्दित कर्म है। अपनी पत्नीके भाइयोंके साथ इस प्रकार परिहास नहीं किया जाता। जिसके बड़े भाईको तुमने विरूप कर दिया, वह रुक्मिणी भाईकी इस दुर्दशासे चिन्तित होकर तुम्हें क्या कहेगी?’ श्रीकृष्णसे यों कहकर वे रुक्मिणीसे बोले- “कल्याणि! तुम शोक न करो। शुचिस्मिते! स्वस्थ हो जाओ। आर्यकुमारी! महामते ! तुम शोक बिलकुल छोड़ दो, मनमें दुःख मत मानो। प्रिय अथवा अप्रिय जो भी प्राप्त होता है, वह सब मैं कालका किया हुआ मानता हूँ। जैसे घनमाला वायुके अधीन होती है, उसी प्रकार यह सारा जगत् कालके वशीभूत है। उस कालको तुम कलना करनेवालोंका स्वामी परमेश्वर एवं विष्णु समझो। ‘मैं’ और ‘मेरा’ यह भाव ही जगत के लिये बन्धनका कारण होता है। अहंता और ममतासे रहित भाव ही ‘मोक्ष’ है, इसमें संशय नहीं है; सुख और दुःख देनेवाला दूसरा कोई नहीं है। यह सब लोगोंका अपना भ्रम ही है। शत्रु, मित्र और उदासीनकी कल्पना संसारी लोगोंद्वारा अज्ञानके कारण की गयी है” ॥ ३१-३८ ॥

इस प्रकार भगवान बलराम के समझाने पर भीष्मक पुत्र रुक्मी वैमनस्य छोड़कर चला गया और रुक्मिणीको भी प्रसन्नता हुई। रुक्मीका मनोरथ व्यर्थ हो चुका था, बलराम और श्रीकृष्णके द्वारा जीवित छोड़ दिये जानेपर अपने विरूपकरणकी घटनाको याद करके उसने तपस्यामें लग जानेका विचार किया। किंतु मुख्य मुख्य मन्त्रियोंके मना करनेपर उसने तपका विचार छोड़ दिया, तथापि कुण्डिनपुरमें फिर पैर नहीं रखा। रुक्मीने अपने निवासके लिये भोजकट नामक एक उत्तम नगरका निर्माण कराया ॥ ३९-४१ ॥

राजन् ! बलराम और यदुवंशी योद्धाओंसे घिरे हुए रुक्मिणीसहित भगवान् गोविन्द अपनी विजय- दुन्दुभि बजवाते हुए द्वारकाको चले गये। वहाँ बड़ा भारी उत्सव मनाया गया। मार्गशीर्ष मासमें साक्षात् श्रीहरिने वैदिकविधिके अनुसार रुचिर मुखवाली रुक्मिणीके साथ विवाह किया। रुक्मिणीपति श्रीहरिका विवाह सम्पन्न हो जानेपर श्रीरुक्मिणी देवी उनके रुक्म- मन्दिर (सुवर्णमय भवन) की शोभा बढ़ाने लगीं। पुण्यवती द्वारकापुरी उस समय देवराज इन्द्रकी अमरावतीके समान सुशोभित हो रही थी। भीष्म- नन्दिनी रुक्मिणीके विवाहकी इस विचित्र कथाको जो भक्तिभावसे सुनता और सुनाता है, वह भक्त इस लोकमें भी वैभवसे सम्पन्न रहता है और देहावसानके पश्चात् वही मोक्षका भागी होता है॥ ४२-४५ ॥

इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें द्वारकाखण्डके अन्तर्गत नारद बहुलाश्व संवादमें ‘श्रीरुक्मिणीका विवाह’ नामक सातवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७॥

यहां एक क्लिक में पढ़ें ~ दस महाव‍िद्याएं कौन कौन सी हैं?

आठवाँ अध्याय

श्रीकृष्णका सोलह हजार एक सौ आठ रानियोंके साथ विवाह और उनकी संततिका वर्णन;
प्रद्युम्नका प्राकट्य तथा रति और रुक्म-पुत्रीके साथ उनका विवाह

श्रीनारदजी कहते हैं- मिथिलेश्वर ! अब श्रीकृष्णकी अन्य पत्नियोंके मङ्गलमय विवाहका वृत्तान्त सुनो, जो समस्त पापोंको हर लेनेवाला, पुण्यदायक तथा आयुकी वृद्धिका सर्वोत्तम साधन है ॥ १॥

सत्राजित नामसे प्रसिद्ध यादवको साक्षात् भगवान सूर्य ने स्यमन्तक मणि दे रखी थी। भगवान श्रीकृष्ण ने राजा उग्रसेन के लिये वह मणि माँगी। मिथिलेश्वर ! सत्राजित ने द्रव्य के लोभ से वह मणि नहीं दी; क्योंकि उस मणिसे प्रतिदिन आठ भार सुवर्ण स्वतः प्राप्त होता रहता था। एक दिन सत्राजित का भाई प्रसेन उस मणि को अपने कण्ठ में बाँधकर सिन्धुदेशीय अश्वपर आरूढ़ हो शिकार खेलने के लिये वन में विचर ने लगा। वहाँ एक सिंहने प्रसेनको मार डाला। फिर उस सिंहको भी जाम्बवान्ने मारा और तत्काल उस मणिको लेकर जाम्बवान् अपनी गुफामें चला गया। सत्राजित लोगोंमें यह प्रचार करने लगा कि ‘मेरा भाई प्रसेन मणिको कण्ठमें धारण करके वनमें गया था, किंतु श्रीकृष्णने वहाँ उसका वध कर दिया; इसीलिये आज सबेरे वह सभाभवनमें नहीं आया’ ॥ २-६॥

भगवान्पर कलङ्कका टीका लग गया। वे कुछ नागरिकोंको साथ ले वनमें गये। महामते। वहाँ उन्होंने पहले घोड़ेसहित मरे हुए प्रसेनके और किसी दूसरेके द्वारा मारे गये सिंहके शवको पड़ा देखा। यह देखकर पदचिह्नसे पता लगाते हुए वे ऋक्षराज जाम्बवान्‌की गुफातक पहुँच गये। फिर वहाँसे मणि लानेके लिये साक्षात् श्रीहरिने गुफाके भीतर प्रवेश करके अट्ठाईस दिनोंतक युद्ध किया तथा ऋक्षराज जाम्बवान्पर विजय पायी। राजेन्द्र ! जाम्बवान्ने अपनी सुन्दरी कन्या जाम्बवतीको उस मणिके साथ श्रीहरिके हाथमें दे दिया। उसे लेकर भगवान् द्वारकामें लौटे। उन्होंने सत्राजितको मणि दे दी और स्वयं कलङ्कसे मुक्त हुए। सत्राजितको अपने कृत्यपर बड़ी लज्जा आयी और वे मुँह नीचे किये भयभीत से रहने लगे। मिथिलेश्वर! उन्होंने यादव परिवारमें शान्ति रखनेके लिये अपनी पुत्री सत्यभामा तथा उस मणिको भी भगवान्‌के चरणोंमें अर्पित कर दिया ॥ ७-११॥

तदनन्तर बन्धुवत्सल भगवान् श्रीकृष्ण पाण्डवोंकी सहायताके लिये इन्द्रप्रस्थ (दिल्ली) गये। उन्होंने वर्षाके चार महीने वहीं व्यतीत किये। एक दिन गाण्डीवधारी अर्जुनके साथ रथपर आरूढ़ हो श्रीहरि निर्मल नीरसे भरी हुई यमुनाके तीरपर शिकार खेलनेके लिये विचरने लगे। वहाँ साक्षात् कालिन्दी देवी भगवान् श्रीकृष्णको पतिरूपमें प्राप्त करनेकी इच्छासे तपस्या कर रही थीं। पाण्डव अर्जुनने उन्हें श्रीकृष्णको दिखाया। फिर वे भगवान् उन्हें साथ लेकर इन्द्रप्रस्थ आये। वहाँसे द्वारकामें पहुँचकर उन्होंने मनोहराङ्गी सूर्यकन्या कालिन्दीके साथ विधिपूर्वक विवाह किया। उस समय परम मङ्गलमय उत्सवका विस्तारके साथ आयोजन किया गया था ॥ १२-१५॥(Dwarkakhand Chapter 6 to 10)

अवन्तीके नरेशकी एक पुत्री थी, जो रूप-लावण्यसे मनको हर लेनेवाली थी। उसका नाम था मित्रविन्दा। भगवान् श्रीकृष्ण रुक्मिणीकी ही भौति मित्रविन्दाको भी स्वयंवरसे हर लाये ॥ १६ ॥

राजा नग्ग्रजित्के एक पुत्री थी, जो लोगोंमें सत्याके नामसे विख्यात थी। उसके विवाहके लिये राजाने यह प्रतिज्ञा की थी कि ‘सात साँड़ोंको जो एक साथ ही नाथ देगा, उसी वीरको मैं अपनी पुत्री दूँगा।’ भगवान् श्रीकृष्णने सब लोगोंके देखते-देखते उन सातों साँड़ोंको नाथकर सत्याके साथ विवाह किया ॥ १७ ॥

केकयराजकुमारी भद्राको भी भगवान् श्रीहरि उसकी इच्छाके अनुसार अपने घर ले आये। वहाँ कालिन्दीकी ही भाँति भद्राके साथ उन्होंने विधिपूर्वक विवाह किया ॥ १८ ॥

राजन् ! राजा बृहत्सेनके एक पुत्री थी, जिसे लोग लक्ष्मणा कहते थे। वह समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न थी। उसके यहाँ स्वयंवरमें मत्स्यवेधकी शर्त रखी गयी थी। भगवान्ने उस मत्स्यका भेदन किया और अपने ऊपर आक्रमण करनेवाले शत्रुओंको परास्त करके लक्ष्मणाका हाथ पकड़ा ॥ १९ ॥

सोलह हजार एक सौ राजकुमारियाँ भौमासुरके कारागारमें बंद थीं। भगवान्ने भौमासुरका वध करके उसकी कैदसे उनको छुड़ाया। उन चारुदर्शना युवतियों- की इच्छा देखकर वे उन्हें अपने साथ ले आये ॥ २० ॥

एक ही मुहूर्तमें विभिन्न भवनोंमें रहती हुई उन युवतियोंके साथ अपनी मायासे उतने ही रूप धारण करके भगवान्ने उन सबका विधिपूर्वक पाणिग्रहण किया। इस प्रकार सोलह हजार एक सौ आठ रानियों- मेंसे प्रत्येकने श्रीकृष्णके दस-दस पुत्र उत्पन्न किये। वे सभी गुणोंमें पिताके समान थे ॥ २१-२२॥(Dwarkakhand Chapter 6 to 10)

भीष्मककन्या रुक्मिणीके गर्भसे सबसे पहले प्रद्युम्र प्रकट हुए। वे कामदेवके अवतार थे और पिताकी ही भाँति समस्त शुभलक्षणोंसे विभूषित थे। निर्दयी शम्बरासुरने दस दिनोंके भीतर ही उन्हें सूतिकागारसे उठाकर समुद्रमें फेंक दिया। वहाँ उन्हें एक मत्स्य निगल गया, तथापि वे श्रीकृष्णकुमार मत्स्यके उदरमें मरे नहीं। वह मत्स्य शम्बरासुरके पाकालयमें चीरा गया तो उसमेंसे प्रद्युम्न निकले। वहाँ उनकी पूर्वपत्नी रतिने उनका पालन किया। जब वे बड़े हुए और युवावस्था प्रारम्भ हुई, तब उन्हें अपने शत्रुकी करतूतका पता चला। राजन् ! फिर अपने शत्रु शम्बरासुरका वध करके वे दिव्य भार्या रतिके साथ द्वारकामें आये। उनका वह कर्म बड़ा ही विचित्र एवं अद्भुत था ॥ २३-२६ ॥

राजन् ! महारथी श्रीकृष्णपुत्र प्रद्युम्न रुक्मीकी बेटीको भोजकट नगरके स्वयंवरस्थलसे हर लाये और द्वारकामें उसके साथ उनका विवाह हुआ। प्रद्युम्नसे अनिरुद्ध नामक पुत्रका जन्म हुआ, जिसमें दस हजार हाथियोंका बल था। वे ब्रह्माजीके अवतार समझे जाते थे। उनकी कान्ति शरत्कालके प्रफुल्ल नील कमलके समान श्याम थी ॥ २७-२८ ॥

इस प्रकार मैंने परिपूर्णतम भगवान के चतुव्यूहावतारका तथा उनके विवाह सम्बन्धी परम मङ्गलमय विचित्र चरित्रका तुमसे वर्णन किया है, जो समस्त पापोंको हर लेनेवाला, पुण्यदायक तथा आयुकी वृद्धिका उत्तम साधन है। राजन् ! अब तुम पुनः क्या सुनना चाहते हो ? ॥ २९-३० ॥

इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें द्वारकाखण्डके अन्तर्गत नारद बहुलाश्व-संवादमें ‘श्रीकृष्णकी समस्त रानियोंके विवाहका वर्णन’ नामक आठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥८॥

यहां एक क्लिक में पढ़ें ~ श्री ललितासहस्रनाम स्तॊत्रम्

नवाँ अध्याय

द्वारकापुरीके पृथ्वीपर आनेका कारण; राजा आनर्तकी तपस्या और
उनपर भगवान् श्रीकृष्णकी कृपा

बहुलाश्व बोले- मुने ! तीनों लोकोंमें विख्यात द्वारकापुरी धन्य है, जहाँ साक्षात् परिपूर्णतम भगवान् श्रीकृष्ण निवास करते हैं। आपके मुखसे सुना है कि द्वारकापुरी साक्षात् श्रीकृष्णके अङ्गसे प्रकट हुई है; प्रभो! ब्रह्मन् ! किस कालमें वह पुरी यहाँ आयी, यह मुझे बताइये ॥ १-२ ॥

श्रीनारदजीने कहा- राजन् ! तुम्हें साधुवाद है। तुमने बहुत अच्छा किया, जो द्वारकाके यहाँ आगमनका कारण पूछा, जिसे सुनकर लोकघाती पातकी भी शुद्ध हो जाता है॥ ३॥

मनुके पुत्र शर्याति नामक एक राजा हुए, जो चक्रवर्ती सम्राट् थे। उन्होंने दस हजार वर्षोंतक इस भूतलपर धर्मपूर्वक राज्य किया। उनके तीन पुत्र हुए, जो समस्त धर्मज्ञ पुरुषोंमें श्रेष्ठ थे। उनके नाम थे- उत्तानबर्हि, आनर्त और भूरिषेण। राजा शर्यातिने उत्तानबर्हिको पूर्व दिशा, भूरिषेणको दक्षिण दिशा और आनर्तको सारी पश्चिम दिशाका राज्य दिया। फिर वे पुत्रोंसे बोले- ‘यह सारी पृथ्वी मेरी है। मैंने धर्मपूर्वक इसका पालन किया है तथा बलिष्ठ होकर बलपूर्वक इसका अर्जन किया है; अतः तुमलोग इसका पालन करो।’ पिताकी यह बात सुनकर मझले पुत्र ज्ञानी आनर्तने मानो हँसते हुए यह ज्ञानमय वचन कहा ॥४-८॥(Dwarkakhand Chapter 6 to 10)

आनर्त बोले- राजन् ! यह सारी पृथ्वी आपकी नहीं है। न आपने कभी इसका पालन किया है और न आपके बलसे इसका अर्जन हुआ है। राजन् ! बलिष्ठ तो भगवान् श्रीकृष्ण ही हैं, अतः यह पृथ्वी श्रीकृष्णदेवकी है। उन्होंने इसका पालन किया और उन्हींके तेजसे इस सम्पूर्ण वसुंधराका अर्जन हुआ है। भगवान् श्रीहरिके समान बलिष्ठ दूसरा कोई नहीं है। वे ही भगवान् अपने द्वारा प्रकट किये गये इस जगत्की सृष्टि, पालन और संहार करते हैं। वे ही परब्रह्म परमात्मा हैं और वे ही भगवान् कलना करनेवालोंके स्वामी ‘काल’ हैं। जो सम्पूर्ण भूतोंके भीतर प्रवेश करके सबका आश्रय है, वह विश्वसंज्ञक अधियज्ञ साक्षात् परिपूर्णतम श्रीहरि ही हैं। जिनके भयसे हवा चलती है, जिनके भयसे सूर्य तपते हैं, जिनके भयसे पर्जन्यदेव वर्षा करते हैं और जिनके भयसे मृत्यु घूमती रहती है, राजन् ! उन साक्षात् परिपूर्णतम परमेश्वर श्रीकृष्णका सम्पूर्ण हृदयसे अहंकारशून्य होकर भजन कीजिये ॥ ९-१४ ॥

नारदजी कहते हैं- मिथिलेश्वर ! राजा शर्याति ज्ञानको प्राप्त होकर भी पुत्रके वाग्बाणोंसे आहत हो, – रोषसे फड़कते हुए अधरोंद्वारा अपने मध्यम पुत्र – आनर्तसे बोले ॥ १५ ॥

शर्यातिने कहा- ओ खोटी बुद्धिवाले बालक ! दूर हट जाओ। गुरुकी भाँति उपदेश कैसे कर रहे हो ? जहाँतक मेरा राज्य है, वहाँतककी भूमिपर तुम निवास मत करो। तुमने जिन सर्वसहायक श्रीकृष्णकी आराधना की है, वे भगवान् भी क्या तुम्हारे लिये कोई नयी पृथ्वी दे देंगे ? ॥ १६-१७ ॥

नारदजी कहते हैं- मिथिलेश्वर ! उनके यों कहनेपर दूसरोंको मान देनेवाले आनर्तने राजासे कहा-‘जहाँतक पृथ्वीपर आपका राज्य है, वहाँतक मेरा निवास नहीं होगा ?’ ॥ १८ ॥

पिता राजा शर्यातिद्वारा निकाले गये आनर्त उनसे विदा ले समुद्रके तटपर चले गये और समुद्रकी वेलामें पहुँचकर दस हजार वर्षांतक तपस्या करते रहे। आनर्तकी प्रेमलक्षणा-भक्तिसे प्रसन्न हो भगवान् श्रीहरिने उन्हें अपने स्वरूपका दर्शन कराया और वर माँगनेके लिये कहा। आनर्त दोनों हाथ जोड़कर शीघ्रतापूर्वक उठे और रोमाञ्चयुक्त तथा प्रेमसे विह्वल हो उन्होंने भगवान् श्रीकृष्णके चरणारविन्दों में प्रणाम किया ॥ १९-२१ ॥(Dwarkakhand Chapter 6 to 10)

आनर्त बोले – सबके हृदयमें वास करनेवाले आप वासुदेवको नमस्कार है। आकर्षण-शक्तिके अधिष्ठातृ-देवता आप संकर्षणको नमस्कार है। कामावतार प्रद्युम्र और ब्रह्मावतार अनिरुद्धको भी नमस्कार है। भगवन्! आप साधु-संतोंके प्रतिपालक हैं, आपको बारंबार नमस्कार है। देव। मेरे पिताने मुझे राज्यसे बाहर निकाल दिया है, अतः मैं आपकी शरणमें आया हूँ। मुझे दूसरी कोई भूमि दीजिये, जहाँ मेरा निवास हो सके। ध्रुव भी जिनके कृपा- प्रसादसे सर्वोत्तम पदको प्राप्त हुए, प्रणतजनोंका क्लेश दूर करनेवाले उन भगवान् (आप) को मेरा नमस्कार है* ॥ २२-२४॥

श्रीनारदजी कहते हैं- राजन् ! आनर्तको आनत एवं दीन जानकर दीनवत्सल भगवान ने प्रसन्न हो मेघके समान गम्भीर वाणीमें श्रीमुखसे कहा ॥ २५ ॥

श्रीभगवान बोले- नरेश्वर! इस लोकमें दूसरी कोई पृथ्वी तो है नहीं, फिर मैं क्या करूँ? परंतप ! तुम्हारी भक्तिसे मैं संतुष्ट हूँ, अतः अपनी बात सत्य करनेके लिये तुम्हें अपने दिव्यलोक वैकुण्ठधामका सौ योजन लंबा-चौड़ा भूखण्ड लाकर देता हूँ। वह अत्यन्त निर्मल तथा शुभद है॥ २६-२७॥

श्रीनारदजी कहते हैं- विदेहराज! आनर्त- नरेशसे यों कहकर भक्तवत्सल भगवान् श्रीकृष्णने वैकुण्ठसे सौ योजन विशाल भूखण्ड उखाड़ मँगाया और भयंकर शब्द करनेवाले समुद्रमें सुदर्शन चक्रकी नींव बनाकर उसीके ऊपर उस भूखण्डको स्थापित किया। राजा आनर्तने एक लाख वर्षीतक पुत्र-पौत्रों- से सम्पन्न हो वहाँ राज्य किया। उस राज्यमें वैकुण्ठका वैभव भरा हुआ था। आनर्तके पिता शर्यातिने जब यह समाचार सुना, तब उन्हें बड़ा विस्मय हुआ। आनर्तके प्रसादसे ही ‘आनर्त’ नामक देश प्रकट हुआ। आनर्तके रेवत नामका पुत्र हुआ। पूर्वकालमें श्रीशैल नामक पर्वतका एक पुत्र था। आनर्तने उसे अपने हाथोंसे उखाड़कर आनर्त देशमें स्थापित किया। रेवतके द्वारा लाये जानेसे उन्होंके नामपर वह पर्वत ‘रैवतक’ नामसे विख्यात हुआ। राजा रेवत कुशस्थलीपुरी का निर्माण कराके वहाँ दीर्घकालतक राज्य करनेके पश्चात् अपनी कन्या रेवतीको साथ ले ब्रह्मलोकमें गये, यह सब कथा मेरे द्वारा बलदेव-विवाहके प्रसङ्गमें कही जा चुकी है। इसी कारण पुण्यमयी द्वारकापुरीको देवताओंने ‘मोक्षका द्वार’ माना है॥ २८-३५ ॥

इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें द्वारकाखण्डके अन्तर्गत नारद बहुलाश्व-संवादमें ‘द्वारकापुरीके पृथ्वीपर आनेका कारण’ नामक नवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥९॥

यहां एक क्लिक में पढ़ें ~ श्री गायत्री कवचम्

दसवाँ अध्याय

द्वारकापुरी, गोमती और चक्रतीर्थका माहात्म्य; कुबेरके वैष्णवयज्ञमें दुर्वासामुनि द्वारा घण्टानाद और पार्श्वमौलिको शाप

श्रीनारदजी कहते हैं- राजन् ! इस प्रकार मैंने तुमसे द्वारकाके आगमनका कारण बताया, जो समस्त पापोंको हर लेनेवाला और पुण्यदायक है; अब तुम और क्या सुनना चाहते हो ॥ १॥

बहुलाश्वने पूछा- मुनिश्रेष्ठ ! कल्याणस्वरूपा द्वारकासे द्वारकानगरीकी भूमि सर्वतीर्थमयी है, अतः वहाँके मुख्य मुख्य तीर्थोंको मुझे बताइये ॥ २ ॥

श्रीनारदजी कहते हैं- राजन् ! द्वारकासे प्रभास तककी सीमा बनाकर जो तीर्थमयी यज्ञभूमि है, वही मोक्षदायिनी ‘द्वारका’ है। उसका विस्तार सौ योजन है। द्वारकानगरीका दर्शन करके नर नारायण हो जाता है। द्वारकामें कोई गधा भी मर जाय तो वह चतुर्भुज होकर वैकुण्ठलोकमें जाता है। जो द्वारकाका दर्शन करता है, उसकी कथा सुनता है तथा कभी ‘द्वारका’ इस नामका उच्चारण करता है, अथवा वहाँ दर्शन-स्नान करके तिनकेका भी दान करता है वह मृत्युके पश्चात् परमगतिको प्राप्त होता है॥३-५॥(Dwarkakhand Chapter 6 to 10)

एक समय भक्त रेवतको प्रेमानन्दमें आकुल देख ब्रीहरिने उसे अपने स्वरूपका दर्शन कराया। उस समय उनके मुँहपर अश्रुधारा बह चली थी। भगवान्‌के नेत्रबिन्दुओंसे महानदी गोमती प्रकट हुई, जिसके दर्शनमात्रसे ब्रह्महत्या जैसे पातकोंसे छुटकारा मिल जाता है। जो मनुष्य गोमती-तटकी पवित्र रज लेकर अपने सिरपर धारण करता है, वह सौ जन्मोंके किये हुए पापसे तत्काल मुक्त हो जाता है- इसमें संशय नहीं है। मनुष्य कहीं भी स्नान करते समय यदि ‘गोमती’ इस नामका उच्चारण कर लेता है तो उसे निस्संदेह गोमतीमें स्नान करनेका पुण्यफल प्राप्त हो जाता है। विदेहराज। जो मकर राशिमें सूर्यके स्थित रहते समय माघ मासमें प्रयागकी त्रिवेणीमें स्त्रान करता है, वह सौ अश्वमेध यज्ञोंका पुण्यफल पा लेता है; परंतु यदि वह सूर्यके मकरगत होनेपर गोमतीमें स्नान कर ले तो उसे प्रयागस्त्रानकी अपेक्षा सहस्त्रगुना अधिक पुण्य प्राप्त होता है। गोमतीका माहात्म्य बतानेमें चार मुखोंवाले ब्रह्मा भी समर्थ नही हैं। गोमतीके ‘चक्रतीर्थ ‘में जो-जो पाषाण हैं, वे सब- के-सब चक्रभावको प्राप्त होते हैं; अतः उनकी यत्नपूर्वक पूजा करनी चाहिये। जो चक्रके चिह्नसे युक्त चक्रतीर्थमें द्वादशीको स्नान करता है, वह पाप-भाजन होनेपर भी चक्रपाणिके पदको प्रास होता है। करोड़ों जन्मोंके संचित पापोंसे पतित हुआ पातकी मनुष्य भी चक्रतीर्थकी सीढ़ियोंतक पहुँचकर मोक्ष-पदपर आरूढ़ हो जाता है॥ ६-१४॥

बहुलाश्वने पूछा- महामते ! महानदी गोमतीमें जो चक्रतीर्थ है, वह शुभ अर्थको देनेवाला तथा लोगोंके लिये अधिक माननीय कैसे हो गया? यह मुझे बताइये ॥ १५ ॥

श्रीनारदजीने कहा- राजन् ! इसी विषयमें विज्ञजन इस प्राचीन इतिहासका वर्णन किया करते हैं, जिसके श्रवणमात्रसे सर्वथा पापोंकी हानि हो जाती है ॥ १६ ॥

एक समयकी बात है, अलकापुरीके स्वामी राजाधिराज धर्मात्मा निधिपति भगवान् कुबेरने कैलासके उत्तर तटकी भूमिपर वैष्णवयज्ञ आरम्भ किया। उनके उस यज्ञमें स्वयं भगवान् विष्णु अपने धामसे उतर आये थे। ब्रह्मा, शिव, जम्भभेदी इन्द्र, जल-जन्तुओंके अधिपति वरुण, वायु, यम, सूर्य, सोम, सर्वजनेश्वरी पृथ्वी, गन्धर्व, अप्सरा और सिद्ध-सभी उस यज्ञमें वहाँ पधारे थे ॥ १७-१९॥

नरेश्वर! समस्त देवर्षि और ब्रह्मर्षि भी वहाँ आये। उस समय कुबेरका पुत्र नलकूबर धनाध्यक्ष था। यज्ञकी रक्षामें वीरभद्रको नियुक्त किया गया था। सत्पुरुषोंकी सेवाका भार गजानन गणपतिके ऊपर था। समस्त मरुद्रण रसोई परोसनेका कार्य करते थे। स्वामिकार्तिकेय धर्मपरायण रहकर सभामण्डपमें समागत अतिथिजनोंकी पूजा-सत्कार करते थे तथा घण्टानाद और पार्श्वमौलि ये दोनों कुबेरके मन्त्री, जो सम्पूर्ण शास्त्रवेत्ताओंमें श्रेष्ठ थे, दानाध्यक्ष बनाये गये थे। इस प्रकार महान् उत्सवसे परिपूर्ण उस यज्ञका विधिपूर्वक अनुष्ठान सम्पन्न हुआ ॥ २०-२३ ॥(Dwarkakhand Chapter 6 to 10)

यज्ञान्तका अवभृथ स्रान करके महामनस्वी राजराज कुबेरने देवताओंको उनका उत्तम भाग दिया और ब्राह्मणोंको पर्याप्त दक्षिणा दी। इस प्रकार उस श्रेष्ठ यज्ञके परिपूर्ण होनेपर जब समस्त देवर्षिगण संतुष्ट हो गये, तब दण्ड, छत्र और जटा धारण किये महर्षि दुर्वासा वहाँ आ पहुंचे। वे स्वभावसे ही क्रोधी और कृशकाय थे। उनके चरणोंमें खड़ाऊँ शोभा पाती थो। दाढ़ी-मूँछके बाल बढ़े हुए थे। पेट सूखकर सट गया था। कुशासन, समिधा, जलपात्र और मृगचर्म धारण किये वे श्रेष्ठ मुनि वहाँ पधारे। वहाँ पधारे हुए उन महर्षिके पास जाकर उनकी विधिपूर्वक पूजा करके भयभीत हुए कुबेरने परिक्रमापूर्वक उनके चरणोंमें प्रणाम किया और कहा- ‘ब्रह्मन् ! आपके पदार्पण करनेसे आज मेरा जन्म सफल हो गया, भवन सार्थक हो गया और यह मेरा यज्ञ भी सफल हो गया’ ॥ २४-२८ ॥

इस तरह उनके संतोष देनेपर भगवान् दुर्वासा मुनि जोर-जोरसे हँसते हुए उन मनुष्यधर्मा देवता कुबेरसे बोले- ‘तुम राजराज, धर्मात्मा, दानी और ब्राह्मण- भक्त हो। तुमने भगवान् विष्णुको संतुष्ट करनेवाले वैष्णव-यज्ञका अनुष्ठान किया है। प्रभो! वैश्रवण ! मैंने कहीं कभी भी तुमसे कुछ नहीं माँगा है, परंतु आज तुम्हें दानिशिरोमणि समझकर मैं याचना करूँगा। यदि तुमने मेरी याचना सफल कर दी तो मैं तुम्हें उत्तम वर दूंगा; नहीं तो अत्यन्त भयंकर शाप देकर तुम्हें भस्म कर डालूँगा। त्रिलोकीकी सारी-नवों निधियाँ तुम्हारे घरमें मौजूद हैं, उन सबको मुझे दे दो; तुम्हारा भला हो। मैं उन निधियोंके लिये ही यहाँ आया हूँ ॥ २९-३३॥

नारदजी कहते हैं- राजन्! यह सुनकर दान- शील, उदारचेता, गुह्यकोंके स्वामी राजराजने उनसे कहा- ‘बहुत अच्छा, आप मेरा प्रतिग्रह स्वीकार करें।’ इस प्रकार निधियोंको दे डालनेकी चेष्टा करते हुए निधिपति कुबेरसे उनके दानाध्यक्ष मन्त्री घण्टानाद और पार्श्वमौलि लोभसे मोहित होकर बोले ॥ ३४-३५ ॥

उन दोनोंने कहा- यह लोभी ब्राह्मण अकेला ही तो है, सारी निधियाँ लेकर क्या करेगा? इसे एक लाख दिव्य दीनार दे दीजिये, बाकी अपने पास रखिये। अपनी वृत्तिकी तथा इस उत्तर दिशाकी रक्षा कीजिये ॥ ३६ ॥

नारदजी कहते हैं- राजन् ! उन मन्त्रियोंका वह कठोर वचन सुनकर दुर्वासा रोषसे आग बबूला हो उठे। उनकी भौंहें टेढ़ी हो गयीं तथा उनके नेत्र लाल हो गये। सारा ब्रह्माण्ड बटलोईकी तरह दो निमेषतक हिलता रहा। कुबेरको अपने चरणोंमें पड़ा देख मुनिने उन दोनों मन्त्रियोंको शाप दे दिया ॥ ३७-३८ ॥

मुनिने कहा- महादुष्ट घण्टानाद ! तेरी बुद्धि पापमें ही लगी रहनेवाली है। तू अत्यन्त लोभी है, ग्राहकी भाँति धनग्राही है; अतः हे महाखल । तू ग्राह हो जा। पापपूर्ण विचार रखनेवाले पार्श्वमौले ! तू भी धनके लोभ और मदसे भरा हुआ है और हाथीकी भाँति प्रेरणा दे रहा है; अतः दुर्बुद्धे! तू हाथी हो जा ॥ ३९-४० ॥

श्रीनारदजी कहते हैं- राजन् ! उन दोनोंको शाप दे कुबेरसे निधि लेकर मुनिवर दुर्वासाने पुनः कुबेरको अत्यन्त दुर्लभ वर प्रदान किया- ‘कुबेर ! इस दानसे तुम्हारे पास नौ निधियाँ द्विगुणित होकर आ जायें।’ यों कहकर वे निधियोंके साथ वहाँसे चल दिये। अहा! परम तेजस्वी महर्षियोंका बल कैसा अद्भुत है।॥ ४१-४२ ॥

इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें द्वारकाखण्डके अन्तर्गत नारद बहुलाश्व-संवादमें गोमतीके उपाख्यानके प्रसङ्गमें ‘चक्रतीर्थका माहात्म्य’ नामक दसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥१०॥

यह भी पढ़े

चार वेद की संपूर्ण जानकारी

108-उपनिषद हिंदी में

शिव पंचाक्षर स्तोत्र

महाकाल लोक उज्जैन

श्री सत्यनाराण व्रत कथा

विष्णुपुराण हिंदी में

अंत्यकर्म श्राद्ध हिंदी में

Share
0

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Share
Share