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Raghuvansh Mahakavya Dwitiya Sarg in Hindi

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Raghuvansh Mahakavya Dwitiya Sarg in Hindi

॥ श्रीः रघुवंशम् महाकाव्य ॥

कालिदासकृत रघुवंशम् महाकाव्य द्वितीया सर्गः | Raghuvansh Mahakavya Dwitiya Sarg in Hindi

रघुवंशम् महाकाव्य द्वितीय सर्ग (Raghuvansh Mahakavya Dwitiya Sarg in Hindi) राजा दिलीप की गोभक्ति-परायणता प्रस्तुत करता है। राजा पत्नी सुदक्षिणा सहित एकाग्रचित्त से नन्दिनी की सेवा में संलग्न हो जाते हैं। नन्दिनी गौ के द्वारा राजा दिलीप की परीक्षा और पुत्रोत्पत्ति के वर प्राप्ति का वर्णन है। इस लोक में सुख की कामना रखने वाले के लिए यह काव्य हमें गो सेवा की प्रेरणा देता है।

यहां एक क्लिक में पढ़ें ~ रघुवंशम् महाकाव्य प्रथमः सर्गः

अथ प्रजानामधिपः प्रभाते जायाप्रतिग्राहितगन्धमाल्याम् ।
वनाय पीतप्रतिबद्धवत्सा यशोधनो धेनुमृषेर्मुमोच ॥ 1 ॥
अर्थ:
प्रातः काल होने पर यशोधन, प्रजाधिपति राजा दिलीप ने जाया (सुदक्षिणा) के द्वारा गन्धमाला से पूजित ऋषिधेनु नन्दिनी को वन के लिए छोड़ा। उसके बछड़े को दूध पिलाकर बाँध दिया गया था।

तस्याः खुरन्यासपवित्रपांसुमपांसुलानां धुरि कीर्त्तनीया ।
मार्गं मनुष्येश्वरधम्र्म्मपत्नी श्रुतेरिवार्थं स्मृतिरन्वगच्छत् ॥ 2 ॥
अर्थ:
उसके मार्ग पर राजपत्नी सुदक्षिणा वैसे ही चली जैसे श्रुति के अर्थ के पीछे चलती है स्मृति मार्ग की धूलि यदि नन्दिनी के खुर रखने से पवित्र थी तो सुदक्षिणा भी निष्पाप महिलाओं में प्रथम थी।

निवर्त्य राजा दयितां दयालुस्तां सौरभेयीं सुरभिर्यशोभिः ।
पयोधरीभूतचतुःसमुद्रां जुगोप गोरूपधरामिवोर्वीम् ॥ 3 ॥
अर्थ:
दयालु राजा ने पत्नी को लौटाया और लग गया वह उस नन्दिनी गौ की रक्षा में नन्दिनी यदि सुरभि (कामधेनु) की पुत्री थी तो दिलीप स्वयं यश से सुरभि था। वह उस नन्दिनी की रक्षा पृथिवी की रक्षा के समान कर रहा था, मानों पृथिवी ही गौ का रूप धारण किए हुए थी, इसलिए कि पृथिवी पर चार पयोधर (समुद्र) हुआ करते हैं, तो नन्दिनी के भी चार धन थे पयोधर (पय-जल और दूध)

व्रताय तेनानुचरेण धेनोन्यषेधि शेषोऽप्यनुयायिवर्गः ।
न चान्यतस्तस्य शरीररक्षा स्ववीर्यगुप्ता हि मनोः प्रसूतिः ।। 4 ।।
अर्थ:
व्रत के निमित्त धेनु के पीछे चले उस राजा ने अपने अन्य अनुयायियों को भी रोक दिया। उसके शरीर की रक्षा के लिए अन्य किसी की अपेक्षा नहीं थी। मनु के उत्तराधिकारी स्वयं अपने बल से रक्षित रहते हैं।

आस्वादवद्भिः कवलैस्तृणानां कण्डूयनैर्दशनिवारणैश्च ।
अव्याहतः स्वैरगतेः स तस्याः सम्राट् समाराधनतत्परोऽभूत् ॥ 5 ॥
अर्थ:
सम्राट् दिलीप ने उस धेनु का समाराधन दत्तचित्त होकर किया वह उसे घाँस के स्वादु कौर खिलाता, खुजलाता और डाँस दूर रखता। वह जहाँ चाहती वहाँ चरती । उधर वह भी कहीं भी पहुँचने में रुकता नहीं।

स्थितः स्थितामुच्चलितः प्रयातां निषेदुषीमासनबन्धधीरः ।
जलाभिलाषी जलमाददानां छायेव तां भूपतिरन्वगच्छत् ॥ 6 ॥
अर्थ:
वह तब रुकता जब नन्दिनी रुकती, उसके चलते ही वह चल पड़ता, बैठती तो बैठने की इच्छा करता। जल की इच्छा तब करता जब वह जल पी लेती। इस प्रकार राजा (दिलीप) उस (गौ) के पीछे उसकी छाया सा घूमता।

स न्यस्तचिह्नामपि राजलक्ष्मीं तेजोविशेषानुमिता दधानः ।
आसीदनाविष्कृतदानराजिरन्तर्मदावस्थ इव द्विपेन्द्रः ॥ 7 ॥
अर्थ:
दिलीप के साथ राजलक्ष्मी के चिह्न तो नहीं थे, किन्तु इसके विशिष्ट तेज से उसका अनुमान हो रहा था। वह उस गजराज सा लग रहा था, जिसमें मद पर्याप्त मात्रा में बन तो चुका हो, किन्तु उसको धारा न फूटी हो (ऐसा हाथी ‘भद्र’- गज कहा जाता है)।

लताप्रतानोद्ग्रथितैः स केशैरधिज्यधन्वा विचचार दावम् ।
रक्षापदेशान्मुनिहोमधेनोर्वन्यान् विनेष्यन्निव दुष्टसत्त्वान् ॥ 8॥
अर्थ:
धनुष पर प्रत्यज्वा चढ़ाए हुए वह लताओं के प्रतानों से केश बाँधे हुए जंगल में घूम रहा था। गोरक्षा के बहाने वह वस्तुतः जंगल के दुष्ट प्राणियों को विनय की शिक्षा देना चाह रहा था।

विसृष्टपार्श्वानुचरस्य तस्य पार्श्वद्रुमाः पाशभृता समस्य ।
उदीरयामासुरिवोन्मदानामालोकशब्द वयसां विरावैः ॥ 9॥
अर्थ:
वह उसके पाश्र्ववर्ती अनुचरों को छोड़े हुए था तब भी पास के वृक्ष उन पर बैठे उन्मद पक्षियों की ध्वनि में उसका जय जयकार सा कर रहे थे। क्यों न हो, वह वरुण के समान जो था।

मरुत्प्रयुक्ताश्च मरुत्सखाभं तमर्च्यमारादभिवर्त्तमानम् ।
अवाकिरन् बाललता: प्रसूनैराचारलाजैरिव पौरकन्याः ॥ 10 ॥
अर्थ:
अग्नि जैसा तेजस्वी वह पास आता दिखाई देता तो बाललताएँ उस पर पुष्पवर्षा करती, नगर में नगर की कन्याएँ जैसे किया करती थीं आचारपालन हेतु लाजवर्षा।

धनुर्भूतोऽप्यस्य दयार्द्रभावमाख्यातमन्तः– करणैर्विशङ्कः ।
विलोकयन्त्यो वपुरापुरक्ष्णां प्रकामविस्तारफलं हरिण्यः ॥ 11 ॥
अर्थ:
उसके हाथ में धनुष रहता तब भी हिरनियाँ चौकती नहीं और उसे जीभरकर देखती रह जातीं, मानों उन्हें उनके नेत्रों के पर्याप्त विस्तृत होने का फल मिलता जाता। ऐसा इसलिए कि राजा का भाव (वित्त) दयाई था।

स कीचकैर्मारुतपूर्णरन्ध्रः कूजद्भिरापादितवंशकृत्यम् ।
शुश्राव कुञ्जेषु यशः स्वमुच्चैरुद्गीयमानं वनदेवताभिः ॥ 12 ॥
अर्थ:
राजा दिलीप ने कुञ्जों में वनदेवियों द्वारा जोर जोर से गाया जा रहा अपना कीर्त्तिगान सुना, उसमें बाँसुरी की संगति हो रही थी छिद्रित बाँसों के स्वर से, जिनके छेदों से होकर हवा बाहर आ रही थी।

पृक्तस्तुषारैर्गिरिनिर्झराणामनोकहाऽऽकम्पितपुष्पगन्धी ।
तमातपक्लान्तमनातपत्रमाचारपूतं पवनः सिषेवे ॥ 13 ॥
अर्थ:
उस राजा की सेवा पवन भी कर रहा था। पवन, गिरिनिर्झरों की फुहारों से युक्त (अत: शीतल) था और (मन्द भी) वृक्षों के तनिक कम्पित पुष्पों की गन्ध से भरा राजा धूप से क्लान्त था। उस पर छत्र जो नहीं था। पवन पवित्रता भी देता है, किन्तु इस सेवा की आवश्यकता नहीं पड़ी, क्योंकि वह कार्य उसके अपने आचार से हो रहा था।

शशाम वृष्ट्यापि विना दवाग्निरासीद् विशेषा फलपुष्पवृद्धिः ।
ऊनं न सत्त्वेष्वधिको बबाधे तस्मिन् वनं गोप्तरि गाहमाने ॥ 14 ॥
अर्थ:
उस राजा के वन में पहुँचते ही दवाग्नि बिना वृष्टि के ही शान्त हो गई और फल तथा पुष्प की वृद्धि अधिक हो गई। यहाँ तक कि दुर्बल को बलवानों ने पीड़ा देना छोड़ दिया।

सञ्चारपूतानि दिगन्तराणि कृत्वा दिनान्ते निलयाय गन्तुम् ।
प्रचक्रमे पल्लवरागताम्रा प्रभा पतङ्गस्य मुनेश्च धेनुः ॥ 15 ॥
अर्थ:
सायंकाल आसन्न था तो सूर्य की प्रभा और मुनि की धेनु ने निलय (विलय और आश्रम ) के लिए चलना शुरू किया। दोनों की ललोई पल्लवराग सी थी।

यहां एक क्लिक में पढ़ें ~ श्रीमद भागवत गीता का प्रथम अध्याय

तां देवतापित्रतिथिक्रियार्थामन्वग्ययौ मध्यमलोकपालः ।
बभौ च सा तेन सतां मतेन श्रद्धेव साक्षाद् विधिनोपपन्ना ॥ 16 ॥
अर्थ:
मध्यम लोकपाल राजा उसके पीछे चला, वह (गौ) थी देवकार्य, पितृकार्य और अतिथिकार्य में साधन । सत्पुरुषों में समादृत उस राजा से वह गौ इस प्रकार सुशोभित हो रही थी जिस प्रकार विधि से जुड़ी साक्षात् श्रद्धा सुशोभित हुआ करती है।

स पल्वलोत्तीर्ण – वराहयूथान्यावास – वृक्षोन्मुख – बर्हिणानि ।
ययौ मृगाध्यासितशाद्वलानि श्यामायमानानि वनानि पश्यन् ॥17॥
अर्थ:
दिलीप चलते चलते देखते जाते थे कि वन श्यामायमान होते जा रहे हैं, वराहयूथ जलाशयों से बाहर आ रहे हैं, मयूर आवासवृक्ष की ओर लौट रहे हैं तथा मृगसमूह घाँस पर जा बैठा है।

आपीनभारोद्वहनप्रयत्नाद् गृष्टिर् गुरुत्वाद् वपुषो नरेन्द्रः ।
उभावलञ्चक्रतुरञ्चिताभ्यां तपोवनावृत्तिपथं गताभ्याम् ॥ 18 ॥
अर्थ:
राजा दिलीप और नन्दिनी दोनों की गति अञ्चित थी और उससे तपोवन लौटने का मार्ग सुहावना लग रहा था। गी की अञ्चित गति में कारण था उसके ऐन का भार और राजा की गति में अंचित का कारण भरा पूरा शरीर था।

वसिष्ठधेनोरनुयायिनं तमावर्त्तमानं वनिता वनान्तात् ।
पपौ निमेषालसपक्ष्मपङ्क्तिरुपोषिताभ्यामिव लोचनाभ्याम् ॥ 19 ॥
अर्थ:
रानी सुदक्षिणा ने देखा कि उसका प्रिय वसिष्ठधेनु के पीछे आश्रम लौट रहा है तो उसे टकटकी लगाकर अपलक, मानों उपासे नेत्रों से पिया हो।

पुरस्कृता वर्त्मनि पार्थिवेन प्रत्युद्गता पार्थिवधर्मपत्न्या ।
तदन्तरे सा विरराज धेनुर्दिनक्षपामध्यगतेव सन्ध्या ॥ 20 ॥
अर्थ:
नन्दिनी गुलाबी रंग की उसके पीछे राजा और आगे रानी सुदक्षिणा। इनकी छवि उसी संध्याकाल सी थी लाल लाल सन्ध्या बीच में, पीछे दिन और – आगे रात्रि ।

प्रदक्षिणीकृत्य पयस्विनीं तां सुदक्षिणा साक्षतपात्रहस्ता ।
प्रणम्य चानर्च विशालमस्याः शृङ्गान्तरं द्वारमिवार्थसिद्धेः ॥ 21 ॥
अर्थ:
रानी सुदक्षिणा के हाथ में अक्षतयुक्त पात्र था। उसने उस पयस्विनी नन्दिनी की प्रदक्षिणा की और उसको प्रणाम कर उसके भाल की पूजा की भाल दोनों सींगों के बीच फैला और चौड़ा था। वह मानों अर्थसिद्धि का आगमनद्वार था।

वत्सोत्सुकापि स्तिमिता सपर्या प्रत्यग्रहीत् सेति ननन्दतुस्तौ ।
भक्त्योपपत्रेषु हि तद्विधानां प्रसादचिह्नानि पुर:- फलानि ॥ 22 ॥
अर्थ:
नन्दिनी भी रुकी और उसने रानी की पूजा ग्रहण की, यद्यपि वह भी उत्सुक थी अपने बछड़े के लिए। इससे वे दोनों पतिपत्नी प्रसन्न हुए। भावी सिद्धि का पहला चिह्न प्रसाद ही तो होता है।

गुरोः सदारस्य निपीड्य पादौ समाप्य सान्ध्यं च विधिं दिलीपः ।
दोषा हावसाने पुनरेव दोग्ध्रीं भेजे भुजोच्छिन्नरिपुर्निषण्णाम् ॥ 23 ॥
अर्थ:
भुजाओं से उच्छिन्न कर चुके थे शत्रुओं को दिलीप वे निश्चिन्त थे आश्रम आने पर उन्होंने गुरुजी और गुरुपत्नी के चरण पलौटे, सान्ध्य विधि संपन्न की और दुहने के बाद बैठ चुकी दुधारू नन्दिनी की पुनः सेवा की।

तामन्तिकन्यस्तबलिप्रदीपामन्वास्य गोप्ता गृहिणीसहायः ।
क्रमेण सुप्तामनु संविवेश सुप्तोत्थितां प्रातरुदन्वतिष्ठत् ॥ 24 ॥
अर्थ:
पत्नी के साथ राजा दिलीप ने नन्दिनी के समीप पूजादीप रखा और जब वह सो गई तो सोकर उसके जागने के पूर्व ही प्रातः काल उठ खड़े हुए। (अनु-बाद, साथ ‘उदन्वतिष्ठत्’ भोजसम्म पाठ द्र. भू.प्र. 18158)(Raghuvansh Mahakavya Dwitiya Sarg in Hindi)

इत्थं व्रतं धारयतः प्रजार्थं समं महिष्या महनीयकीर्तेः ।
सप्त व्यतीयुस्त्रिगुणानि तस्य दिनानि दीनोद्धरणोचितस्य ॥ 25 ॥
अर्थ:
राजा दिलीप की कीर्त्ति महनीय थी तदनुरूप उसके, नन्दिनी की सेवा का व्रत पालन करते करते इस प्रकार, 21 दिन बीत गए। उसे अभ्यास था दीनों को उबारने का।(Raghuvansh Mahakavya Dwitiya Sarg in Hindi)

अन्येद्युरात्मानुचरस्य भावं जिज्ञासमाना मुनिहोमधेनुः ।
गङ्गाप्रपातान्तविरूढशष्पं गौरीगुरोर्गह्वरमाविवेश ॥ 26 ॥
अर्थ:
अगले (बाईसवें दिन मुनि की होमधेनु (नन्दिनी) ने अपने सेवक (दिलीप) का हृदय जानना चाहा और वह हिमालय की एक गुफा में घुस गई। गुफा के बाहर गंगा का प्रपात था और घनी घाँस जम चुकी थी।

सा दुष्प्रधर्षा मनसापि हिंखैरित्यद्रिशोभाप्रहितेक्षणेन ।
अलक्षिताभ्युत्पतनो नृपेण प्रसह्य सिंहः किल तां चकर्ष ॥ 27 ॥
अर्थ:
राजा को विश्वास था कि नन्दिनी का कोई भी हिंसक प्राणी कुछ भी बिगाड़ नहीं सकता, अतः उसका ध्यान पर्वत की शोभा देखने में बँट गया और एक सिंह ने नन्दिनी को दबोच लिया, जिसे वह देख नहीं पाया।

तदीयमाक्रन्दितमार्त्त – साधोर्गुहा – निबद्ध प्रतिशब्द- दीर्घम् ।
रश्मिष्विवादाय नगेन्द्रसक्तां निवर्त्तयामास नृपस्य दृष्टिम् ॥ 28 ॥
अर्थ:
उसकी दृष्टि उधर खिंची नन्दिनी के आर्त आक्रन्दन से गुहा की प्रतिध्वनि से जिसमें अधिक गंभीरता आ गई थी। उसने राजा की नगेन्द्र पर सटी दृष्टि को मानो रस्सियों में बाँध कर अपनी ओर खींच लिया।

स पाटलायां गवि तस्थिवांसं धनुर्धरः केसरिणं ददर्श ।
अधित्यकायामिव धातुमय्यां लोध्रद्रुमं सानुमतः प्रफुल्लम् ॥ 29 ॥
अर्थ:
उसे दिखाई दिया कि उस गुलाबी गाय पर एक सिंह चढ़ा हुआ है। गेरू की चोटी पर खिले लोन वृक्ष सा लग रहा था वह राजा धनुष लिए था।

ततो मृगेन्द्रस्य मृगेन्द्रगामी वधाय वध्यस्य शरं शरण्यः ।
जाताभिषङ्गो नृपतिर्निषङ्गादुद्धर्तुमैच्छत् प्रसभोद्धृतारिः ॥ 30 ॥
अर्थ:
राजा ने तरकश से बाण खींचना चाहा और चाहा उस मृगेन्द्र का वध करना। वह वध्य था ही। राजा भी मृगेन्द्रगामी भी था और रक्षाव्रती भी शत्रुओं को वह जबरन उखाड़ता आया था और उसको देखना पड़ गया अभिषङ्ग/पराभव।

वामेतरस्तस्य कर: प्रहर्तुर्नखप्रभाभूषितकङ्कपत्रे ।
सक्ताङ्गुलिः सायकपुङ्ख एव चित्रार्पितारम्भ इवावतस्थे ॥ 31 ॥
अर्थ:
परन्तु हुआ यह कि प्रहार करने हेतु उद्यत उसका दाहिना हाथ बाण के पुख में ही सटा रह गया। उसकी नखप्रभा से पुंख में लगे कंकपत्र चमक उठे। उस मुद्रा में वह लग रहा था, जैसे उसका चित्र हो।

बाहुप्रतिष्टम्भविवृद्धमन्युरभ्यर्णमागस्कृतमस्पृशद्भिः।
राजा स्वतेजोभिरदह्यतान्तर्भोगीव मन्त्रौषधिरुद्धवीर्यः ॥ 32 ॥
अर्थ:
बाहु का हो गया प्रतिष्टम्भ (स्तम्भन) तो उसका क्रोध भड़क उठा। इसलिए और कि अपराधी बिलकुल पास और उसे छूना असंभव। इस स्थिति में राजा स्वयं ही अपने तेज से, भीतर ही भीतर जल रहा था, उस सर्प के समान जिसको मन्त्र या औषधि से कीलित कर दिया गया हो।

तमार्यगृह्यं निगृहीतधेनुर्मनुष्यवाचा मनुवंशकेतुम् ।
विस्माययन् विस्मितमात्मवृत्तौ सिंहोरुसत्त्वं निजगाद सिंहः ॥ 33 ॥
अर्थ:
इसी समय राजा के विस्मय का ठिकना नहीं रहा जब सिंह मनुष्य की भाषा में उससे बोला वे (दिलीप) मनुवंश केतु भी थे आर्यों के पक्षधर भी थे और सिंह के समान बलशाली भी।

अलं महीपाल तव श्रमेण प्रयुक्तमप्यस्त्रमितो वृथा स्यात् ।
न पादपोन्मूलनशक्ति रहः शिलोच्चये मूर्च्छति मारुतस्य ॥ 34 ॥
अर्थ:
रहने दो महीपाल ! तुम्हारी मेहनत व्यर्थ होगी। छोड़ भी दोगे तो तुम्हारा अस्त्र मोघ ठहरेगा। वायु का वेग पेड़ तो उखाड़ सकता है, पर पर्वत पर उसकी नहीं चलती थी।

कैलासगौर वृषमारुरुक्षोः पादार्पणानुग्रहपूतपृष्ठम् ।
अवेहि मां किङ्करमष्टमूर्तेः कुम्भोदरं नाम निकुम्भमित्रम् ॥ 35 ॥
अर्थ:
मैं हूँ भगवान् अष्टमूर्ति शिव का किंकर और निकुम्भ (कीर्तिकेय जी) का मित्र ‘कुम्भोदर’ भगवान् शिव जब कैलाश जैसे धवल वृषभ पर चढ़ना चाहते हैं तो वे मेरी ही पीठ को अपने पादार्पण के अनुग्रह से पवित्र करते हैं।

अमुं पुरः पश्यसि देवदारुं पुत्रीकृतोऽसौ यं वृषभध्वजेन ।
यो हेमकुम्भस्तननिःसृतानां स्कन्दस्य मातुः पयसां रसज्ञः ॥ 36 ॥
अर्थ:
यह देखो, सामने रहा देवदारु भगवान् वृषभध्वज शिव ने इसे पुत्र माना है। कार्तिकेय की माता के हेमकुम्भरूपी स्तनों से इसने निस्सृत पय का रस लिया है।

कण्डूयमानेन कटं कदाचिद् वन्यद्विपेनोन्मथिता त्वगस्य ।
अथैनमद्रेस्तनया शुशोच सेनान्यमालीढमिवासुरास्त्रैः ॥ 37 ॥
अर्थ:
एक बार जंगली हाथी ने इससे अपना गण्डस्थल खुजला दिया और इसकी छाल उखाड़ दी, तो माता पार्वती को उतना ही दुःख हुआ जितना हुआ था पुत्र कार्त्तिकेय को असुरों के अस्त्रों से घायल देखकर।

तदाप्रभृत्येव वनद्विपानां त्रासार्थमस्मिन्नहमद्रिकुक्षौ ।
व्यापारित: शूलभृता विधाय सिंहत्वमङ्कागतसत्त्ववृत्ति ॥ 38 ॥
अर्थ:
तभी से शूलधारी भगवान् शंकर ने यहाँ जंगली हाथियों को डराने के लिए मुझे नियुक्त कर रखा है, मेरा वेतन है पास आया प्राणी।

तस्यालमेषा क्षुधितस्य तृप्त्यै प्रदिष्ट निर्दिष्टकाला परमेश्वरेण ।
उपस्थिता शोणितपारणा में सुरद्विषश्चान्द्रमसी सुधेव कलेव ॥ 39 ॥
अर्थ:
इस गौ को समय से स्वयं भगवान् परमेश्वर ने शोणितपारणा के रूप में भेजा है। मुझे भी भूख लगी है और इससे मेरी भूख मिट भी सकती है, चन्द्रसुधा से राहु की भूख के समान है।(Raghuvansh Mahakavya Dwitiya Sarg in Hindi)

स त्वं निवर्त्तस्व विहाय लज्जां गुरोर्भवान् दर्शितशिष्य भक्तिः ।
शस्त्रेण रक्ष्यं यदशक्यरक्षं न तद् यशः शस्त्रभृतां क्षिणोति ॥ 40 ॥
अर्थ:
तो, अब आप लौट जाएँ, लज्जा छोड़ें, आप गुरुभक्ति दिखला ही चुके हैं। शस्त्र की पहुँच से परे रक्ष्य की रक्षा कोई शस्त्रधारी न कर सके तो उससे उसका अपयश नहीं होता।

इति प्रगल्भं पुरुषाधिराजो मृगाधिराजस्य वचो निशम्य ।
प्रत्याहतास्त्रो गिरिशप्रभावादात्मन्यवज्ञां शिथिलीचकार ॥ 41 ॥
अर्थ:
पुरुषाधिराज दिलीप ने जब मृगाधिराज सिंह की यह बात सुनी तो उसकी आत्मग्लानि यह जानकर शिथिल हुई कि उसका अस्त्र भगवान् शिव के प्रभाव से रुका है।

प्रत्यब्रवीच्चैनमिषुप्रयोगे तत्पूर्वसङ्गे वितथप्रयत्नः ।
जडीकृतस्त्र्यम्बकवीक्षणेन वज्रं मुमुक्षन्निव वज्रपाणिः ॥ 42 ॥
अर्थ:
और उसने सिंह को उत्तर दिया, उसके बाणप्रयोग में हाथ सटने की घटना पहली बार घटी थी और पहली बार हुआ था उनका प्रयत्न विफल ऐसे ही वज्रप्रहार के लिए उद्यत इन्द्र भगवान् शिव के दृष्टिपात से जड़ हो गया था।

संरुद्धचेष्टस्य मृगेन्द्र ! कामं हास्यं वचस्तद् यदहं विवक्षुः ।
अन्तर्गतं प्राणभृतां हि वेद सर्वं भवान् भावमतोऽभिधास्ये ॥ 43 ॥
अर्थ:
‘हे मृगराज मैं तो कर दिया गया निश्चेष्ट, अतः मेरा कुछ भी कहना उपहसनीय ही होगा परन्तु आप तो सभी प्राणियों के मन की सभी बातें जानते ही हैं, अतः कुछ कह भी देना चाहता हूँ।

मान्यः स मे स्थावरजङ्गमानां सर्गस्थितिप्रत्यवहारहेतुः ।
गुरोरपीदं धनमाहिताग्नेर्नश्यत् पुरस्तादनुपेक्षणीयम् ॥ 44 ॥
अर्थ:
वे भगवान् शिव तो मेरे लिए भी मान्य हैं। वे तो कारण बनते हैं जड़ और जगम सबकी सृष्टि, स्थिति और संहार में किन्तु, आहिताग्नि गुरु का, आँखो के सामने ही नष्ट हो रहा यह धन (नन्दिनी गौ), भी तो उपेक्षणीय नहीं है।

स त्वं मदीयेन शरीरवृत्तिं देहेन निर्वर्त्तयितुं प्रसीद ।
दिनावसानोत्सुकबालवत्सा विमुच्यतां धेनुरियं महर्षेः ॥ 45 ॥
अर्थ:
ऐसा कीजिए कि आप कृपाकर अपने शरीर के लिए आवश्यक भोजन मेरे देह को बना लीजिए और महर्षि की इस धेनु को छोड़ दीजिए, शाम को इसका छोटा सा बछड़ा भी इसके लिए उत्सुक होगा। मैं भी तो आपकी सीमा में आ ही गया हूँ।

अथान्धकारं गिरिगह्वराणां दंष्ट्रामयूखैः शकलानि कुर्वन् ।
भूयः स भूतेश्वरपार्श्ववर्ती किञ्चिद् विहस्यार्थपतिं बभाषे ॥ 46 ॥
अर्थ:
इतना सुनकर वह सिंह कुछ मुसकुराते हुए राजा से फिर बोला। उस समय उसकी दाढ़ की चमक से गुफा की अँधियारी टुकड़े टुकड़े हो रही थी।

यहां एक क्लिक में पढ़िए ~ रामायण मनका 108

एकातपत्रं जगतः प्रभुत्वं नवं वयः कान्तमिदं वपुश्च ।
अल्पस्य हेतोर्बहु हातुमिच्छन् विचारमूढः प्रतिभासि मे त्वम् ॥ 47 ॥
अर्थ:
‘मुझे लगता है तुम विचार-मूढ हो। तुम्हें विचार करना आता नहीं) अरे तुम पृथिवी के एकच्छत्र राजा, नई तुम्हारी उमर और तुम्हारा यह कान्तिमान् शरीर अदना सी चीज के लिए/ थोड़े के लिए बहुत को तिलाञ्जलि।

भूतानुकम्पा तव चेदियं गौरेका भवेत् स्वस्तिमती त्वदन्ते ।
जीवन् पुनः शश्वदुपप्लवेभ्यः प्रजाः प्रजानाथ! पितेव पासि ॥ 48 ॥
अर्थ:
रही बात भूतानुकम्पा की तो तुम्हारे अन्त से रक्षा होगी केवल इस एक गौ की जीवित रहोगे तो तुम सुदीर्घकाल तक अपनी समूची प्रजा की रक्षा पिता के समान कर सकोगे।

अथैकधेनोरपराधचण्डाद् गुरोः कृशानुप्रतिमाद् बिभेषि ।
शक्योऽस्य मन्युर्भवता विनेतुं गाः कोटिशः स्पर्शयता घटोनीः ॥ 49 ॥
अर्थ:
जहाँ तक प्रश्न है इस भय का कि इस एक धेनु के अपराध पर अग्नितुल्य गुरुजी बिगड़ उठेंगे और शाप दे देंगे इस विचार से तो तुम उनके क्षोभ का शमन करने हेतु कोटि कोटि दुधारू गौ उन्हें दे देना, वे शान्त हो जाएँगे।

तद् रक्ष कल्याणपरम्पराणां भोक्तारमूर्जस्वलमात्मदेहम् ।
महीतलस्पर्शनमात्रभिन्नमृद्ध हि राज्यं पदमैन्द्रमाहुः ॥ 50॥
अर्थ:
इसलिए बचाओ अपना शरीर इसे कल्याण की परम्पराओं का भोग सुलभ है और यह ऊर्जस्वल भी है। समृद्ध राज्य ऐन्द्र पद कहा जाता है, इतना ही अन्तर है केवल कि उसमें पृथिवीतल स्पर्श रहता है।

एतावदुक्त्वा विरते मृगेन्द्रे प्रतिस्वनेनास्य गुहागतेन ।
शिलोच्चयोऽपि क्षितिपालमुच्चैः प्रीत्या तमेवार्थमभाषतेव ॥ 51 ॥
अर्थ:
इतना कहकर जब सिंह चुप हो गया तो उसके स्वर की गुफा में हुई प्रतिध्वनि के द्वारा पर्वत ने भी प्रेम से राजा के समक्ष उसी बात को दुहराया सा।

निशम्य देवानुचरस्य वाचं मनुष्यदेवः पुनरप्युवाच ।
धेन्वा तदध्यासितकातराक्ष्या निरीक्ष्यमाणः सुतरां दयालुः ॥ 52 ॥
अर्थ:
देवदेव महादेव के अनुचर की बात सुनकर मनुष्यदेव (दिलीप) ने पुनः निवेदन किया। गाय उस समय उसे कातर नेत्रों से देख रही थी और उसके हृदय में दया और अधिक बढ़ रही थी।(Raghuvansh Mahakavya Dwitiya Sarg in Hindi)

क्षतात् किल त्रायत इत्युदग्र क्षत्रस्य शब्दो भुवनेषु रूढः ।
राज्येन किं तद्विपरीतवृत्तेः प्राणैरुपक्रोशमलीमसैर्वा ॥ 53 ॥
अर्थ:
‘क्षत्रिय, क्षत्रिय इसलिए कहा जाता है कि वह ‘क्षत’ (क्षति) से त्राण दिलाता है, जो इस प्रवृत्ति का न हो उसके राज्य से भी क्या और क्या उसके निन्दित प्राणों से ?

कथं नु शक्योऽनुनयो महर्षेर्विश्राणनाच्चान्यपयस्विनीनाम् ।
इमामनूनां सुरभेरवेहि रुद्रौजसा तु प्रहृतं त्वयास्याम् ॥ 54 ॥
अर्थ:
अन्य दुधारू गायों के दान से भी महर्षि का अनुनय संभव ही कैसे ? यह गाय कामधेनु से कम नहीं है। इस पर तुम जो आक्रमण कर सके, यह संभव हुआ भगवान् शिव के प्रभाव से ।

सेयं स्वदेहार्पणनिष्क्रयेण न्याय्या मया मोचयितुं भवत्तः ।
न पारणा स्याद् विहता तवैवं भवेदलुप्तश्च मुनेः क्रियार्थः ॥ 55 ॥
अर्थ:
अतः इसकी रक्षा मेरे अपने देह की एवज में करना और तुमसे इसे छुड़ाना सर्वथा उचित है। इससे न तो तुम्हारी पारणा रुकेगी और न होगी मुनि के यज्ञकार्य में कमी।

भवानपीदं परवानवैति महान् हि यत्नस्तव देवदारौ ।
स्थातुं नियोक्तुर्यदशक्यमग्रे विनाश्य रक्ष्यं स्वयमक्षतेन ॥ 56 ॥
अर्थ:
इसके अतिरिक्त आप स्वयं परतन्त्र हैं और जानते हैं कि रक्ष्य को नष्ट कर रक्षक स्वयं अक्षत रहते हुए स्वामी के समक्ष उपस्थित नहीं हो सकता।

किमप्यहिंस्यस्तव चेन्मतोऽहं यशः शरीरे भव मे दयालुः ।
एकान्तविध्वंसिषु मद्विधानां पिण्डेष्वनास्था खलु भौतिकेषु ॥ 57 ॥
अर्थ:
रही बात मेरी तो यदि आप मुझे किसी कारण अहिंसनीय मानते हैं तो मेरे कीर्त्तिकाय पर दया करें। स्थूल शरीर को तो एक दिन जाना ही है, अतः उस पर मुझ जैसों की अनास्था ही समझिए।

संबन्धमाभाषणपूर्व्वमाहुर्वृत्तः स नौ सङ्गतयोर्वनान्ते ।
तद् भूतनाथानुग ! नार्हसि त्वं संबन्धिनो मे प्रणयं विहन्तुम् ॥ 58 ॥
अर्थ:
माना जाता है ‘बातचीत हुई कि सम्बन्ध बना। वह (सम्बन्ध) यहाँ वन में मिले हम दोनों के बीच बन चुका, अब आप तो भूतनाथ भगवान् शिव के अनुचर हैं, आपको अपने इस सम्बन्धी की याचना तोड़ना शोभा नहीं देता।

तथेति गां मुक्तवते दिलीपः सद्यः प्रतिष्टम्भविमुक्तबाहुः ।
संन्यस्तशस्त्रो हरये स्वदेहमुपानयत् पिण्डमिवामिषस्य ॥ 59 ॥
अर्थ:
सिंह ने कह दिया ‘तथास्तु’। दिलीप का चिपका हाथ तत्काल छूट गया। उसने अस्त्र छोड़ा और सिंह को अपना शरीर मांसपिण्ड की भाँति भेंटकर दिया।

तस्मिन् क्षणे पालयितुः प्रजानामुत्पश्यतः सिंहनिपातमुग्रम् ।
अवाङ्मुखस्योपरि पुष्पवृष्टिः पपात विद्याधरहस्तमुक्ता ॥ 60 ॥
अर्थ:
राजा नीचे सिर किए बैठा था और सोच रहा था कि सिंह का भीषण पंजा उस पर अब पड़ा तब पड़ा कि पड़ी उस पर पुष्पवृष्टि, विद्याधर जाति के लोगों के हाथों से छूटी।

उत्तिष्ठ वत्सेत्यमृतायमानं वचो निशम्योत्थितमुत्थितः सन् ।
ददर्श राजा जननीमिव स्वां गामग्रतः प्रस्रविणीं न सिंहम् ॥ 61 ॥
अर्थ:
उसे सुनाई दिया ‘वत्स! उठ!’ यह अमृत जैसी मीठी वाणी सुनी तो उठे दिलीप ने देखा कि वहाँ थनों से दूध चुवा रही नन्दिनी खड़ी है, सिंह है ही नहीं।

तं विस्मितं धेनुरुवाच साधो मायां मयोद्भाव्य परीक्षितोऽसि ।
ऋषिप्रभावान्मयि नान्तकोऽपि प्रभुः प्रहतु किमुतान्यहिंस्रः ॥ 62 ॥
अर्थ:
आश्चर्य में डूबे राजा से धेनु ने कहा ‘हे साधो मैंने यह माया रचकर तेरी परीक्षा ली है। महर्षि के प्रभाव से मुझ पर आक्रमण स्वयं यमराज भी नहीं कर सकते, दूसरे हिंसकों की तो विसात ही क्या था।

भक्त्या गुरौ मय्यनुकम्पया च प्रीतास्मि ते पुत्र ! वरं वृणीष्व ।
न केवलानां पयसां प्रसूतिमवेहि मां कामदुघां प्रसन्नाम् ॥ 63 ॥
अर्थ:
गुरुभक्ति और मुझ पर दया करने से, हे वत्स! मैं तुझ पर प्रसन्न हूँ वर माँग। यह मत समझ कि मैं केवल दूध ही देती हूँ, प्रसन्न होने पर मैं सभी कामनाएँ भी पूरी कर सकती हूँ।’(Raghuvansh Mahakavya Dwitiya Sarg in Hindi)

वाल्मीकि रामायण और रामचरितमानस में क्या अंतर है?

ततः समानीय स मानितार्थी हस्तौ स्वहस्तार्जितवीरशब्दः ।
वंशस्य कर्त्तारमनन्तकीर्त्तिं सुदक्षिणायां तनयं ययाचे ॥ 64 ॥
अर्थ:
तब याचकों को मान देने वाले और अपने भुजबल पर वीर कहलाते उस राजा ने हाथ जोड़कर माँगा – ‘पुत्र, जो सुदक्षिणा के गर्भ से उत्पन्न हो, जिसकी कीर्ति अनन्त हो और जिससे वंश भी चले।

सन्तानकामाय तथेति कामं राज्ञे प्रतिश्रुत्य पयस्विनी सा ।
दुग्ध्वा पयः पत्रपुटे मदीयं पुत्रोपभुङ्क्ष्वेति तमादिदेश ॥ 65 ॥
अर्थ:
पयस्विनी नन्दिनी ने तथास्तु कहकर आज्ञा दी में दुहकर मेरा दूध पी लो।’

वत्सस्य होमार्थविधेच होमार्थविधेश्च शेषमृषेरनुज्ञामधिगम्य मातः ! ।
औधस्यमिच्छामि तवोपभोक्तुं षष्ठांशमुर्व्या इव रक्षितायाः ॥ 66 ॥
अर्थ:
दिलीप ने निवेदन किया मातः! आपका दूध मैं अवश्य पीऊँगा, परन्तु बछड़े के पी लेने और होमकार्य पूरा होने से शेष बचे और गुरुजी आज्ञा दें, पुत्र दोने वह भी रक्षित पृथिवी के षष्ठ अंश के समान साधिकार।

इत्थं क्षितीशेन वसिष्ठधेनुर्विज्ञापिता प्रीततरा बभूव ।
तदन्विता हैमवताच्च कुक्षेः प्रत्याययावाश्रममश्रमेण ॥ 67 ॥
अर्थ:
क्षितीश दिलीप ने ऐसा निवेदन किया तो मुनि वसिष्ठ की धेनु और अधिक प्रसन्न हुई और उसके साथ हिमालय की कुक्षि से आश्रम आ पहुँची। उसे तनिक सा भी परिश्रम नहीं हुआ।

तस्याः प्रसन्नेन्दुमुखः प्रसादं गुरुर्नृपाणां गुरवे निवेद्य ।
प्रहर्षचिह्नानुमितं प्रियायै शशंस वाचा पुनरुक्तयेव ॥ 68 ॥
अर्थ:
राजा का चेहरा प्रसन्न था प्रसन्न चन्द्र जैसा वह राजाओं में सबसे बड़ा था। उसने नन्दिनी के प्रसन्न होने की बात गुरु वसिष्ठ जी को बतलाई। फिर बतलाई प्रिया को जो खुशी के लक्षण देख समझ ही गई थी, वाणी से भी वही निवेदन किया। वस्तुतः वह पुनरुक्ति सी थी।

स नन्दिनीस्तन्यमनिन्दितात्मा सवत्सलो वत्सहुतावशेषम् ।
पपौ वसिष्ठेन कृताभ्यनुज्ञः शुद्धं यशो मूर्त्तमिवातितृष्णः ॥ 69 ॥
अर्थ:
सत्पुरुषों पर स्नेह रखते दिलीप ने नन्दिनी का वत्स और यज्ञ से बच्चा दूध गुरु वसिष्ठ की आज्ञा मिलते ही बड़ी ही ललक के साथ पिया। वह मानों उसका अपना धवल यश ही था।

प्रातर्यथोक्तव्रतपारणान्ते प्रास्थानिक स्वस्त्ययनं प्रयुज्य ।
तौ दम्पती स्वां प्रति राजधानी प्रस्थापयामास वशी वसिष्ठः ॥ 70 ॥
अर्थ:
सबेरा होते ही, उक्त व्रत की पारणा हो जाने पर वशी गुरु वसिष्ठ ने प्रास्थानिक स्वस्त्ययन कर उन पति-पत्नी को अपनी राजधानी विदा कर दिया।

प्रदक्षिणीकृत्य हुतं हुताशमनन्तरं भर्तुररुन्धतीं च ।
धेनुं सवत्सां च नृपः प्रतस्थे सन्मङ्गलोदग्रतरप्रभावः ॥ 71 ॥
अर्थ:
राजा ने प्रस्थान किया। उसके पूर्व प्रदक्षिणा की आहुति से प्रज्वलित यज्ञाग्नि की, गुरु वसिष्ठ की, माता अरुन्धती की और सवत्सा धेनु (नन्दिनी) की इस उत्तम मङ्गल से उसका तेज और बढ़ गया था।

श्रोत्राभिरामध्वनिना रथेन स धर्म्मपत्नीसहितः सहिष्णुः ।
ययावनुद्घातसुखेन मार्ग स्वेनेव पूर्णेन मनोरथेन ॥ 72 ॥
अर्थ:
धर्मपत्नी सहित सहिष्णु दिलीप ने रथ से किया प्रस्थान उसकी ध्वनि कानों को अच्छी लग रही थी। उसका मार्ग ऊबड़खाबड़ नहीं था अतः सुखदायी था। वह रथ मानों उसका पूर्ण हुआ मनोरथ ही था।(Raghuvansh Mahakavya Dwitiya Sarg in Hindi)

तमाहितौत्सुक्यमदर्शनेन प्रजा: प्रजार्थव्रतकर्शिताङ्गम् ।
नेत्रैः पपुस्तृप्तिमनाप्नुवद्भिर्नवोदयं नाथमिवौषधीनाम् ॥ 73 ॥
अर्थ:
दिलीप राजधानी पहुँचे तो प्रजा ने उनके दर्शन अतृप्त नेत्रों से किए, कारण कि एक तो कुछ दिनों तक दर्शन मिले नहीं थे, अतः उत्सुकता जागी हुई थी और दूसरे प्रजा (पालक सन्तान) के लिए किए व्रत से ही थे वे कृश, नवोदित ओषधीनाथ (चन्द्र) के समान (उसका भी दर्शन ललक के ही साथ किया जाता है)।

पुरन्दरश्रीः पुरमुत्पताकं प्रविश्य पौरैरभिनन्द्यमानः ।
भुजे भुजङ्गेन्द्रसमानसारे भूयः स भूमेर्धुरमाससञ्ज ॥74॥
अर्थ:
इन्द्र जैसी कान्ति वाले और नगरवासियों से अभिनन्दित किए जा रहे उस दिलीप ने पताकाओं से मण्डित नगर में प्रवेश किया और अपनी सर्पाधिराजतुल्य बलशाली बाहुओं पर भूमि का दायित्व पुनः उठा लिया।

अथ नयनसमुत्थं ज्योतिरत्रेरिव द्यौः सुरसरिदिव तेजो वह्निनिष्ठ्यूतमैशम् ।
नरपतिकुलभूत्यै गर्भमाधत्त राज्ञी गुरुभिरभिनिविष्टं लोकपालानुभावैः ॥ 75 ॥
अर्थ:
अब रानी सुदक्षिणा ने गर्भ धारण किया वैसे ही जैसे द्यौ धारण करती है अत्रि के नेत्र से उत्पन्न ज्योति (चन्द्र) को या शिव के अग्नि में निक्षिप्त तेज (वीर्य) को सुरसरित् (गङ्गा) । यह गर्भ ही था उस राजकुल के अस्तित्व का मूल उसमें थे निहित (इन्द्र आदि) लोकपालों के गम्भीर अंश।(Raghuvansh Mahakavya Dwitiya Sarg in Hindi)

इति रघुवंशे महाकाव्ये कालिदासकृतौ सुदक्षिणागर्भाधानो नाम द्वितीयः सर्गः ॥ 2 ॥
अर्थ:
इस प्रकार पूर्ण हुआ ‘महाकवि कालिदास की कृति’ रघुवंश महाकाव्य में सुदक्षिणागर्भाधान नामक द्वितीय सर्ग ॥ 2 ॥

यहां एक क्लिक में पढ़ें ~ रघुवंशम् महाकाव्य तृतीय सर्गः

द्वितीय सर्ग कथा:-

(Raghuvansh Mahakavya Dwitiya Sarg in Hindi)

प्रातःकाल होतेही रानीसहित राजाने गौका पूजन कर बछडेको दूध पिछाय गौको बनजा – नेकै निमित्त छोडा, और आप उसकी सेवा करनेको साथ चला। थोडी दूर चलकर रानीको लौटा दिया, और गुरुके कहे अनुसार सेवा करने लगा, सुन्दर घास लाकर गाय खड़ी होने पर राजा खडा होता, बैठने पर बैठता, बहुत या छायाकी समान राजा खत्राता, उसके पीछे चलने लगा। संध्याको आश्रम में आता, उस समय रानीभी गौकी पूजा करती, दूध दुहनाने पर राजा फिर उनकी सेवा करता था।

इस प्रकार सेवा करते इक्कीस दिन बीतगये, तब गऊ राजाकी परीक्षा लेनेकी इच्छा से हिमालय पर्वतकी गंगा किनारेवाली गुफामें प्रवेश कर गई, वहां उसे एक सिंहने पकड लिया, राजाने यह देख धनुपार वाण चढाया, परन्तु राजाका हाथ वैसेही स्थित रहगया, तब सिंहने कहा राजा मैं कुम्भोदर नाम शिवजीका गण हूं, तुम्हारे आगे जो यह देवदारूका वृक्ष है, इसे पार्वतीने सींच कर पुत्रवत् पाला है। एक समय बनैले हाथियोंने आकर शिर खुजाकर इसकी छाल छुटा दी, तंब पार्वती के शौच करने पर शिवजीने मुझे सिंह बनाकर इस वृक्षकी रक्षाको यहाँ रखदिया है, और कह दिया है जो कोई जीव इस गुफा में आजाय, उसे भक्षण करो, सो आज परमेश्व- रकी दी हुई यह गौ आगई है सो मै इसे नहीं छोडूंगा।

तेरा पराक्रम मुझपर नहीं चलेगा, तब राजाने कहा शिवभीं मेरे’ मान्य है, परन्तु यह गुरुका धनभी नेत्रोंके सामने नष्ट नहीं किया जा सक्ता, इस्से इसके बदलेमें तू मुझे खा ले और गुरूकी गाय त्याग कर, सिंहने कहा राजा तू बडा मूर्ख है, जो एक गौके पीछे सुंदरशरीर और चक्रत्रतराजको नष्ट करता है, तेरे भक्षण से केवल एक गौ ही बचेगी, और जो तू बच गया तो अनेक विघ्नोंसे प्रजाकी रक्षा कर सकेगा, और इसमें तेरा वश नहीं चलता, इससे तेरा यशभी नष्ट नहीं होगा।

परन्तु राजाने यही हठ की कि इसे छोड मुझे खा ले, तब सिंहने. कहा यही हो, आओ ! राजा शेरक आगे जाकर गिरा और सिंहके खानेकी बाट देखने लगा, कि राजाके ऊपर फूलों की वर्षा विद्या- थरोंने की, और गौने राजासे कहा पुत्र उठ, और वर मांग ! मैं तुझसे, प्रसन्न हूं, मैंने तेरी परीक्षा ली थी, ऋषिके प्रतापसे मुझे कालकाभी भय नहीं है। राजा उठकर देखे तो सिंह नहीं है, केवल माताकी समान गौ स्थित है, तब राजाने हाथ जोड कर कहा सुदक्षिणा में कुलबढाने चाला कीर्तिमान पुत्र हे, गौ वोली अभी मेरा दूध दुहकर पी ले; राजाने कहा, गुरुके कार्यसे बचा दूध पिऊंगा, इससे गौ बहुत प्रसन्न हुई, और आश्रम में आ गुरुस समाचार सुनाय राजानें यज्ञसे बच्चा दूध पिया, फिर गुरु गुरुपत्नी और गौकी प्रदक्षिणा कर राजा अपने नगरमें आया, और रानी गर्भवती हुई।

 

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