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Garga Samhita श्री गर्ग संहिता

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Garga Samhita श्री गर्ग संहिता

श्री गर्ग संहिता (Garga Samhita) हिंदू धर्म में एक पवित्र ग्रंथ है, जो विशेष रूप से पौराणिक शैली से संबंधित है। इसका श्रेय ऋषि गर्ग को दिया जाता है, जो हिंदू पौराणिक कथाओं में एक प्रतिष्ठित ऋषि थे और ज्योतिष, खगोल विज्ञान और वेदों के गहन ज्ञान के लिए जाने जाते थे।

श्री गर्ग संहिता (Garga Samhita) मुख्य रूप से भगवान कृष्ण के जीवन और लीलाओं पर केंद्रित है, जो हिंदू धर्म के प्रमुख देवताओं में से एक हैं और महाकाव्य महाभारत में एक अधिपति हैं। इसमें कृष्ण के बचपन, युवावस्था और वयस्क जीवन से संबंधित संवाद और प्रवचन और विभिन्न कहानियाँ, शिक्षाएँ शामिल हैं, जो भक्तों को उनके दिव्य स्वभाव और शिक्षाओं के बारे में गहन जानकारी प्रदान करती हैं। श्री गर्ग संहिता में कृष्ण की लीलाओं का व्यापक वर्णन मुख्य है, जिसमें उनके बचपन के कारनामे, भक्तों के साथ बातचीत, और राधा और गोपियों के साथ वृन्दावन में दिव्य रासलीला (लीला) शामिल हैं।

यहां एक क्लिक में पढ़ें ~ सूर्य सिद्धांत हिंदी में

कई पौराणिक ग्रंथों की तरह, गर्ग संहिता (Garga Samhita) में भक्ति का स्वर है और इसे भक्ति (भक्ति) परंपरा के अनुयायियों द्वारा पवित्र माना जाता है। यह भगवान कृष्ण के प्रति भक्तों के प्रेम और भक्ति पर जोर देता है। गर्ग संहिता की विभिन्न पांडुलिपियाँ और संस्करण मौजूद हैं, और उनमें सामग्री में कुछ भिन्नताएँ हो सकती हैं। यह पाठ संस्कृत में लिखा गया है, और वर्षों से विभिन्न भाषाओं में अनुवाद का प्रयास किया गया है।

श्री गर्ग संहिता (Garga Samhita) को विभिन्न खंडों या अध्यायों में विभाजित किया गया है, जिनमें से प्रत्येक कृष्ण के जीवन और शिक्षाओं के विभिन्न पहलुओं से संबंधित है। यह हिंदू धर्म के भीतर विष्णु परंपरा के अनुयायियों, वैष्णवों द्वारा पूजनीय है, और अक्सर भारत और उसके बाहर के मंदिरों और घरों में इसका पाठ, अध्ययन और सम्मान किया जाता है।

यहां एक क्लिक में पढ़ें ~ गीतावली हिंदी में

श्रीगर्ग संहिता (Garga Samhita) यदुकुलके महान् आचार्य महामुनि श्रीगर्गकी रचना है। यह सारी संहिता अत्यन्त मधुर श्रीकृष्णलीला से परिपूर्ण है। श्रीराधाकी दिव्य माधुर्यभावमिश्रित लीलाओंका इसमें विशद वर्णन है। श्रीमद्भागवत में जो कुछ सूत्ररूपमें कहा गया है, गर्ग संहितायें वही विशद वृत्तिरूपमें वर्णित है। एक प्रकारसे यह श्रीमद्भागवतोक्त श्रीकृष्णलीलाका महाभाष्य है। श्रीमद्भागवतमें भगवान् श्रीकृष्णकी पूर्णताके सम्बन्धमें महर्षि व्यासने ‘कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्’ – इतना ही कहा है, महामुनि गर्गाचार्यने –(Garga Samhita)

यस्मिन् सर्वाणि तेजांसि विलीयन्ते स्वतेजसि ।
तं वदन्ति परे साक्षात् परिपूर्णतमं स्वयम् ।।
– कहकर श्रीकृष्णमें समस्त भागवत-तेजोंके प्रवेशका वर्णन करके श्रीकृष्णकी परिपूर्णतमताका वर्णन किया है।

श्रीकृष्ण की मधुरलीला की रचना हुई है दिव्य ‘रस’के द्वारा; उस रसका रासमें प्रकाश हुआ है। श्रीमद्भागवत में उस रासके केवल एक बारका वर्णन पाँच अध्यायोंमें किया गया है; किंतु इस गर्ग-संहितामें वृन्दावनखण्डमें, अश्वमेधखण्डके प्रभासमिलनके समय और उसी अश्वमेधखण्डके दिग्विजयके अनन्तर लौटते समय-यों तीन बार कई अध्यायोंमें उसका बड़ा सुन्दर वर्णन है। परम प्रेमस्वरूपा, श्रीकृष्णसे नित्य अभिन्नस्वरूपा शक्ति श्रीराधाजीके दिव्य आकर्षणसे श्रीमथुरानाथ एवं श्रीद्वारकाधीश श्रीकृष्णने बार-बार गोकुलमें पधारकर नित्यरासेश्वरी, नित्यनिकुञ्जेश्वरीके साथ महारासकी दिव्य लीला की है- इसका विशद वर्णन है। इसके माधुर्यखण्डमें विभिन्न गोपियोंके पूर्वजन्मोंका बड़ा ही सुन्दर वर्णन है। और भी बहुत-सी नयी-नयी कथाएँ हैं।(Garga Samhita)

यह संहिता भक्त-भावुकोंके लिये परम समादरकी वस्तु है; क्योंकि इसमें श्रीमद्भागवतके गूढ तत्त्वोंका स्पष्ट रूपमें उल्लेख है। आशा है ‘कल्याण’ के पाठकगण इससे विशेष लाभ उठायेंगे।

श्री गर्ग-संहिता

।। श्रीहरिः ॥

ॐ दामोदर हृषीकेश वासुदेव नमोऽस्तु ते

“श्री गोविंद स्तोत्रम” भगवान कृष्ण के गुणों और दिव्य गुणों की प्रशंसा करने वाली एक भक्ति रचना है। यह भगवान कृष्ण को समर्पित एक विशिष्ट भजन है, श्री कृष्ण को गोविंदा के नाम से भी जाना जाता है। श्री गोविंद स्तोत्रम पाठ अक्सर भक्त पूजा या ध्यान के दौरान परमात्मा से जुड़ने के लिए ऐसे स्तोत्र का पाठ करते हैं।

यहां पढ़िए श्रीगोविन्दस्तोत्रम्
गर्ग ऋषि द्वारा रचित श्री गर्ग संहिता में गोलोकखण्ड के प्रथम अध्याय में शौनक-गर्ग-संवादः राजा बहुलाश्वके पूछनेपर नारदजीके द्वारा अवतार-भेदका निरूपण किया गया है। दूसरे अध्याय में ब्रह्मादि देवोंद्वारा गोलोकधाम का दर्शन का वर्णन किया है। तीसरे अध्याय में भगवान श्री कृष्ण के श्री विग्रह में श्री विष्णु आदिका प्रवेश; देवताओं द्वारा भगवान की स्तुति; भगवान का अवतार लेने का निश्चयः श्रीराधा की चिन्ता और भगवान का उन्हें सान्त्वना-प्रदान कारन है....

यहां पढ़े गर्ग संहिता गोलोक खंड पहले अध्याय से पांचवा अध्याय तक
गर्ग संहिता गोलोक खण्ड अध्याय छ: से अध्याय दस में कालनेमिके अंशसे उत्पन्न कंसके महान् बल-पराक्रम और दिग्विजयका वर्णन, कंसकी दिग्विजय - शम्बर, व्योमासुर, बाणासुर, वत्सासुर, कालयवन तथा देवताओं की पराजय वर्णन, सुचन्द्र और कलावतीके पूर्व-पुण्यका वर्णन...

यहां पढ़े गर्ग संहिता गोलोक खण्ड अध्याय छ: से अध्याय दस तक
श्री गर्ग संहिता में गोलोकखण्ड के ग्यारहवाँ अध्याय में भगवान का वसुदेव-देवकी में आवेश; देवताओंद्वारा उनका स्तवन; आविर्भावकाल; अवतार-विग्रह की झाँकी;आदि का वर्णन किया गया हे। बारहवाँ अध्याय में श्रीकृष्ण-जन्मोत्सवकी धूम; गोप-गोपियोंका उपायन लेकर....

यहां पढ़े गर्ग संहिता गोलोक खण्ड ग्यारहवाँ अध्याय से पंद्रहवाँ अध्याय तक
श्री गर्ग संहिता में गोलोक खण्ड के सोलहवें अध्याय में भाण्डीर-वनमें नन्दजीके द्वारा श्रीराधाजीकी स्तुति; श्रीराधा और श्रीकृष्णका ब्रह्माजीके द्वारा विवाह ब्रह्माजीके द्वारा श्रीकृष्णका स्तवन तथा नव-दम्पतिकी मधुर लीलाओ का वर्णन है। सत्रहवाँ अध्याय में श्रीकृष्णकी बाल-लीलामें दधि-चोरीका वर्णन, अठारहवाँ अध्याय में नन्द, उपनन्द और...

यहां पढ़े गर्ग संहिता गोलोक खण्ड सोलहवाँ अध्याय से बीसवाँ अध्याय
श्री गर्ग संहिता में वृन्दावनखण्ड के प्रथम अध्याय में सन्नन्दका गोपोंको महावनसे वृन्दावनमें चलनेकी सम्मति देना और व्रजमण्डलके सर्वाधिक माहात्यका वर्णन कहा गया है। दूसरे अध्याय में गिरिराज गोवर्धन की उत्पत्ति तथा उसका व्रजमण्डल में आगमन हुआ है।

यहां पढ़े श्री गर्ग संहिता वृन्दावनखण्ड पहले अध्याय से पांचवे अध्याय तक
श्री गर्ग संहिता में वृन्दावनखण्ड के अध्याय छः में अघासुर का उद्धार और उसके पूर्व जन्म का परिचय दिया गया है। अध्याय सात में ब्रह्माजी के द्वारा गौओं, गोवत्सों एवं गोप-बालकों का हरण का वर्णन किया है। अध्याय आठ में ब्रह्माजी के द्वारा भगवान श्री कृष्ण के सर्वव्यापी विश्वात्मा स्वरूप का दर्शन वर्णन है।

यहां पढ़े श्री गर्ग संहिता वृन्दावनखण्ड अध्याय छः अध्याय दस तक
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